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मी लॉर्ड की बाइक की तस्वीर पर टिप्पणी भी अवमानना! सड़कों पर मजदूरों की पिटाई का कोई हवाला नहीं?

प्रशांत भूषण के मामले में अब सबको 20 अगस्त की प्रतीक्षा है, जब उनके जुर्म की सज़ा का एलान होगा। लेकिन जिस जल्दीबाजी में कई न्यायिक औपचारिकताओं को नजरअंदाज कर के इस मामले की जल्दी जल्दी सुनवाई पूरी की गई है उससे कानून के जानकार और सवाल उठा रहे हैं। यह मुकदमा प्रशांत भूषण अवमानना प्रकरण का पटाक्षेप नहीं करेगा बल्कि इतने सवाल खड़े कर देगा जिससे हो सकता है, अवमानना मानने की ऐसी परंपरा के मद्देनज़र और कई अवमाननाओं के मामले न सुनना पड़ जाएं। अदालत, वकील, कानून, दलील और नज़ीर पर बराबर बहसें और चर्चा होती रही हैं यह लीगल प्रोफेशन का एक स्वाभाविक चरित्र है। इससे न केवल कानून के कई गिरह खुलते हैं बल्कि बेहतर कानून बनाने की प्रेरणा भी मिलती है।

अब जब सुप्रीम कोर्ट ने यह मान लिया है कि अदालत की अवमानना हो चुकी है और उसके लिये प्रशांत भूषण दोषी साबित हो चुके हैं तो इस विषय पर बात करने का अगर कोई अकादमिक उद्देश्य न हो तो, कोई लाभ नहीं है। जस्टिस सबरवाल के समय भी सुप्रीम कोर्ट के किसी फैसले पर, संभवतः दिल्ली में सीलिंग को लेकर, काफी विवाद उठा था तो जस्टिस सबरवाल का कहना था कि फैसले पर चाहे जो टिप्पणी हो, पर सर्वोच्च होने के नाते, सुप्रीम कोर्ट का निर्णय अंतिम है। लेकिन ट्वीट में मानवाधिकार और जनता के हित के लिये, समय पर उचित संज्ञान न लेने का भी उल्लेख प्रशांत भूषण ने अपने ट्वीट में किया है तो सुप्रीम कोर्ट को उस पर भी आत्मावलोकन करना चाहिए।

जैसी फ़ोटो जस्टिस बोबडे की 50 लाख की मोटरसाइकिल पर बैठे वायरल हो रही है और जिसके कारण सुप्रीम कोर्ट की गरिमा भरभरा कर गिरने की बात की जा रही है, अगर ऐसे ही किसी राजनीतिक दल के नेता की महंगी मोटरसाइकिल पर बैठे किसी पुलिस के एसआई की फ़ोटो वायरल हो गयी होती तो वह सब इंस्पेक्टर अब तक सस्पेंड हो गया होता, और उसकी विभागीय जांच शुरू हो गयी होती।

उस पर आरोप लगता कि उसका यह कृत्य एक अधिकारी के लायक नहीं है यानी, अनबिकमिंग ऑफ एन ऑफिसर है। अखबार चटखारे ले कर खबरें छापते। वह बेचारा यही सफाई देते-देते थक जाता कि वह तो उत्कंठा वश बैठ गया था और वह तो यह भी नहीं जानता था कि वह किसी नेता की है। सार्वजनिक जीवन से जुड़ी नौकरियों में यह एक आम खतरा है कि जनता बहुत बारीकी से सरकारी सेवक की हर हरकत देखती है। जनता किसी को नहीं छोड़ती है। और अब तो हर हाथ में इंटरनेट और हर मोबाइल में कैमरा आ ही गया है।

अच्छी गाड़ी और बाइक के अगर आप शौकीन हैं तो, यह एक सामान्य उत्कंठा उस पर बैठ जाने की होती है और, ऐसी उत्कंठा पालना कोई अपराध भी नहीं है। अच्छे रेस्टोरेंट में खाना, अच्छी फिल्में सिनेमाघरों में देखना, अच्छे लोगों के साथ मित्रतापूर्ण वार्तालाप करना और उनके साथ वक्त गुजारना, एक अच्छी आदत है। यह आदत मेरे में भी है। लेकिन व्यक्ति जब सार्वजनिक जीवन में होता है तो ऐसी उत्कंठायें और ललक अक्सर तकलीफ और विवाद का कारण भी बन जाती हैं। जस्टिस बोबडे ने उक्त रुपये पचास लाख की मोटरसाइकिल पर बैठते हुए यह सोचा भी नहीं होगा कि, यह फ़ोटो और क्षण, सुप्रीम कोर्ट के एक चर्चित मुकदमे का कारण बन जायेगा और देश के कानूनी इतिहास में सदा-सदा के लिए दर्ज हो जाएगा।

आने वाले समय में कानून के छात्र न केवल अवमानना के इस मुकदमे के कानूनी पहलू की पर बहस करेंगे बल्कि संवैधानिक पद पर आसीन न्यायमूर्तियों के आचरण की सीमा पर चर्चा करेंगे। वकालत के पेशे में लीगल हिस्ट्री और रुलिंग्स का बहुत महत्व है यह आप किसी भी बड़े वकील के चैंबर में रखी हुई एफआईआर की मोटी-मोटी पोथियों को देखकर अंदाजा लगा सकते हैं। आज, दुनिया भर में यह फोटो वायरल हो गयी है और अब तो उस पर कानूनी बहस भी हो रही है।

प्रशांत भूषण को क्या सज़ा मिलती है और कितनी सज़ा मिलती है यह अदालत को तय करना है और सज़ा प्रशांत भूषण को भुगतना है। जनता को जस्टिस बोबडे के बाइक पर सवार होने से कोई बहुत सरोकार नहीं है। लेकिन इन सारे हंगामा ए हालात के बीच इस ट्वीट में उठाये गए मूल सवाल अब भी अनुत्तरित हैं कि

● जब हज़ारों लोग सड़कों और भूखे प्यासे नंगे पांव बेबस भटक रहे थे तो संविधान की रक्षा की शपथ लिये न्यायमूर्तियों को उनकी खबर लेने की सुधि क्यों नहीं आयी ?

● जब सॉलिसीटर जनरल अदालत में यह झूठ बोल रहे थे कि माई लॉर्ड सड़क पर कोई नहीं है, जबकि पूरा देश सोशल मीडिया पर मजदूर पलायन के बंटवारे की त्रासदी जैसे दृश्य देख रहा था। रेलवे प्लेटफार्म पर एक बच्ची को अपनी मरी हुयी मां की चादर खींचते हुए देख कर सकते में था। सॉलिसीटर जनरल के झूठ को बेशर्मी से बेनकाब होते देख रहा था। तो क्या यह अदालत की अवमानना नहीं थी?

● क्या यह अदालत को जानबूझकर सरकारी वकील द्वारा गुमराह करना नहीं था?

● इस झूठ और गलत बयानी को बंद लिफाफे में रखे सुबूतों की तरह चुपचाप स्वीकार कर लेना, क्या यह जनता को न्याय से वंचित नहीं करना था ?

● क्या सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले पर सभी संबंधित राज्यों से स्टेटस रिपोर्ट तलब नहीं करनी चाहिए थी ?

● क्या यह सम्मानपूर्वक जीने के मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं था ?

● क्या सॉलिसीटर जनरल से यह नहीं पूछा जाना चाहिए था कि उन्होंने जानबूझकर अदालत को क्यों गुमराह किया?

● क्या अदालत को जानबूझकर कर गुमराह करना अदालत की उपेक्षा, अवहेलना और अवमानना करना नहीं है ?

सॉलिसीटर जनरल द्वारा अदालत में गलत बयानी का यह अकेला उदाहरण नहीं है। और भी उदाहरण है। प्रशांत भूषण के ट्वीट में यही तो कहा गया है,

“भारत के चीफ़ जस्टिस ऐसे वक़्त में राज भवन, नागपुर में एक बीजेपी नेता की 50 लाख की मोटरसाइकिल पर बिना मास्क या हेलमेट पहने सवारी करते हैं जब वे सुप्रीम कोर्ट को लॉकडाउन में रखकर नागरिकों को इंसाफ़ पाने के उनके मौलिक अधिकार से वंचित कर रहे हैं।”

इसमें क्या गलत है, सिवाय एक हेलमेट के? खड़ी बाइक पर हेलमेट धारण करना, आवश्यक नहीं है। खैर, अब मोटरसाइकिल की बात तो हो गयी और प्रशांत भूषण को दोषी भी तय कर दिया गया। 20 अगस्त को जो सजा उन्हें मिलनी है मिल ही जाएगी।

पर ट्वीट का दूसरा भाग जो मौलिक अधिकारों से जुड़ा है, उस पर सुप्रीम कोर्ट का क्या कहना है यह अब तक अस्पष्ट है। हज़ारों लाखों की संख्या में बेंगलुरु, चेन्नई, मुम्बई, सूरत, अहमदाबाद, पंजाब, दिल्ली आदि से जो मज़दूर अपने घरों की ओर गिरते, पड़ते और घिसटते, बेबस और बेहिस से जा रहे थे। उनके मौलिक अधिकारों, सम्मानपूर्वक जीवन के अधिकार के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष जब खड़े होने का अवसर आया तो देश की सबसे बड़ी अदालत चूक गई और पीड़ितों को कोई राहत नहीं दे पाई। पर जब इसी मामले में सोशल मीडिया पर पूरी छीछालेदर हो गयी तब सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान ज़रूर लिया लेकिन वह विलम्ब से जागना था।

झूठ बोलना सरकार की मजबूरी हो सकती है और सभी सरकारें झूठ बोलती रहती हैं, पर किसी झूठ को जस का तस स्वीकार कर लेना तो अदालत की कोई मज़बूरी नहीं थी। उसे तो सरकार से आंकड़े तलब करने चाहिए थे। जो पूरा देश सामने देख रहा है उसे सरकार भले ही न देख सके पर सत्य के अन्वेषण का दायित्व तो सुप्रीम कोर्ट या न्यायपालिका का ही है। कोई सहमत हो या न हो लेकिन यह बात तय है कि जनता से जुड़े मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्गत हाल के कुछ निर्णय और अप्रोच जनविरोधी रहा है।

सोशल मीडिया की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इसने जो कुछ भी तोपने ढंकने की कोशिश की जा रही थी उसे उधेड़ कर रख दिया है। पहले लोग देखते थे, कुढ़ते थे और नियति मान लेते थे। अब देखते हैं, कुढ़ते भी हैं तो आक्रोशित भी होते हैं और सबसे बड़ी बात है उसे अभिव्यक्त कर देते हैं। हो सकता है यह अभिव्यक्ति एक खतरे के रूप में कुछ संस्थाओं और लोगों द्वारा देखी जाए पर लोकतंत्र का सबसे सुखद पल है जब हम ताकतवर से ताकतवर लोगों को भी अपने सामने जवाबदेह पाते हैं। खामोश न रहें, बोलना सीखें और दृढ़ तथा मर्यादित शब्दों में जो अभिव्यक्त किया जा सकता है वह शोर और अपशब्दों में नहीं कहा जा सकता है।

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

This post was last modified on August 15, 2020 9:36 pm

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