Wednesday, April 17, 2024

आज की तारीख में भगत सिंह का वारिस होने का मतलब

अपनी भावनाओं, विचारों और कुर्बानियों के चलते कोई व्यक्ति किसी देश में क्रांति की अनवरत जलती मशाल बन जाता है, चाहे जितनी आंधी आए, चाहे जितने तूफान आएं, वह मशाल बुझती नहीं। हां उसकी लौ कभी धीमी पड़ती और कभी तेज हो जाती है। भारतीय समाज में सिर्फ साढ़े तेईस वर्ष का एक नौजवान भगत सिंह क्रांति की एक ऐसी ही मशाल बन गया, जो लोगों के दिलो-दिमाग में जलती रहती है और दिलो-दिमाग को रोशन करती रहती है। सच कहूं तो भारत की क्रांतिकारी चेतना को भगत सिंह ने यदि अपने लहू से खाद-पानी दिया, तो अपने विचारों से उसे पल्लवित-पुष्पित किया और इंकलाब जिंदाबाद के प्रतीक बन गए।

ऐसी महान शख्तियत को कई रूपों में याद किया जा सकता है। एक तरीका तो यह है कि उन्हें ब्रिटिश साम्राज्य विरोध संघर्ष के एक महानायक के रूप में याद करें और अतीत में उनकी भूमिका के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित कर और इतिहास अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ले। इस रूप में भगत सिंह पूरे भारतीय उप महाद्वीप (भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश) में करीब सर्वस्वीकृत हैं। एक हद तक दुनिया भर में।

दूसरे रूप में इससे थोड़ा आगे बढ़कर उनके साम्राज्यवाद और पूंजीवाद, धर्म, साम्प्रदायिकता, जातिवाद, पितृसत्ता (मर्दवाद) विरोधी विचारों को दुहरा लें या नास्तिकता संबंधी उनके विचारों की पुरजोर चर्चा कर लें। इससे दो कदम और आगे बढ़कर क्रांति के संदर्भ में उनके उद्धरणों का जोर-जोर से पाठ कर लें, जैसे ‘क्रांति की तलवार विचारों की शान पर तेज होती’ है थोड़ा और गहरे में जाकर उनके भाषा, लिपि, साहित्य और क्रांतिकारी संघर्षों के इतिहास (विशेषकर पंजाब के संदर्भ) संबंधी उनके विचारों पर चिंतन-मनन करे लें। ऐसा ही और बहुत कुछ।

उपरोक्त सभी बातें मायने रखती हैं, बहुत अधिक मायने रखती हैं लेकिन हमारे सामने कोई ऐसी को ठोस चुनौती या कसौटी पेश नहीं करती जिसके आधार हम आज के कार्यभारों के संदर्भ में खुद को जांचे-परखें और भगत सिंह की कसौटी पर खुद को तौलें। भगत सिंह की जिंदगी और मौत हमारे सामने कुछ चुनौतियां प्रस्तुत करती है। उनका वारिस होने का दावा करना जोखिम उठाने को तैयार रहना और खतरों को आमंत्रित करना है।

भगत सिंह को याद करते ही सबसे पहले जो चुनौती सामने आती है, वह यह कि आप अपने समय के अन्याय खिलाफ संघर्ष में अपना सब कुछ निछावर करने के लिए तैयार हैं या नहीं। सब में कुछ परिवार, कैरियर, नौकरी, सुख-सुविधा यहां तक कि जिंदगी की कुर्बानी भी शामिल हैं। यदि आप जेल और मौत से डरते हैं, तो भगत सिंह को अपना नहीं सकते हैं, उनके रास्ते पर चल नहीं सकते हैं। यदि आप जेल और मौत (फांसी) से बचने के लिए झुक जाते हैं, माफी मांग लेते हैं, तो आप सावरकर के वारिस हो सकते हैं, भगत सिंह के नहीं।

अन्याय की मुखालफत के लिए सब कुछ कुर्बान करने की भावना और अमली जामा पहनाने के साहस का नाम ही भगत सिंह। भगत सिंह के इसी साहस को याद करते हुए आंबेडकर लिखते हैं, “‘हमारी जान बख्श दें’ ऐसी दया की अपील इन तीनों में से किसी ने भी नहीं की थी। हां, फांसी की सूली पर चढ़ाने के बजाए हमें गोलियों से उड़ा दिया जाए, ऐसी इच्छा भगत सिंह ने प्रगट की थी, ऐसी ख़बरें अवश्य आयी हैं। मगर उनकी इस आखिरी इच्छा का भी सम्मान नहीं किया गया.’ (13 अप्रैल 1931, ‘जनता’ की संपादकीय)।

भगत सिंह के समय में अन्याय के दो सबसे बड़े रूप या अन्याय के दो सबसे पहाड़ भारतीय जनता के पीठ पर लदे थे- साम्राज्यवाद और सामंतवाद। दलित-बहुजन विचारधारा भारत में सामंतवाद को ब्राह्मणवाद के रूप में चिन्हित करती है। भगत सिंह ने साम्राज्यवाद को अपना पहला और मुख्य निशाना बनाया। हालांकि वे सामंतवाद (ब्राह्मणवाद) के खिलाफ लिखते रहे, लेकिन उन्होंने अपनी जिंदगी ब्रिटिश साम्राज्यवाद को उखाड़ फेंकने के लिए कुर्बान कर दी। अपना सबकुछ निछावर कर दिया।

लेकिन वे अच्छी तरह समझते थे कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद (गोरों) के जाने के बाद भारत का शोषक-उत्पीड़क और अन्यायी वर्ग (काले अंग्रेज) भारतीय जनता की पीठ पर सवार हो जाएंगे। इसीलिए उन्होंने कहा था कि अन्याय के खिलाफ संघर्ष तब तक जारी रहेगा जब तक अन्याय के सभी रूपों का खात्मा नहीं हो जाता। भगत सिंह इस समझ को रेखांकित करने के लिए भगत सिंह को ही उद्धृत करते हुए भगत सिंह की शहादत के बाद पेरियार ने लिखा, ‘हमारी लड़ाई उस समय तक जारी रहेगी, जब तक साम्यवादी दल सत्ता में नहीं आ जाते और लोगों के जीवन-स्तर और समाज में जो असमानता है, वह पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाती। यह लड़ाई हमारी मौत के साथ समाप्त होने वाली नहीं है। यह प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष रूप से लगातार चलती रहेगी।’ (कुदी आरसू)

सवाल यह है कि आज अन्याय के खिलाफ कौन सी लड़ाई चल रही है, जो भगत सिंह के सपनों को जमीन पर उतारने में मदद कर सकती है। भगत सिंह अच्छी तरह जानते थे कि साम्राज्यवाद पूंजीवाद का ही एक रूप है। उन्होंने बार-बार रेखांकित किया है कि पूंजीवाद के खात्मे के बिना अन्याय और शोषण-उत्पीड़न का खात्मा नहीं हो सकता है।

आज भारत में पूंजीवाद देश-दुनिया के कार्पोरेट के गठजोड़ के रूप में हमारे सामने है। इस गठजोड़ का सबसे आक्रामक हमला आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन पर है। जिस पर कार्पोरेट किसी भी तरह कब्जा कर लेना चाहता है। आज आदिवासी ही जमीन पर कार्पोरेट के खिलाफ सबसे निर्णायक लड़ाई लड़ रहे हैं। भारतीय राजसत्ता ने उस संघर्ष को ‘नक्सली-माओवादी’ नाम देकर उस पर हमला बोल दिया है। जो कोई भी किसी तरह उनका सहयोग करता है, साथ देता है, उसे नक्सली-माओवादी ठहराकर जेल में ठूंस दिया जाता है या जेल में ही मार दिया जाता है।

कॉर्पोरेट विरोधी (पूंजीवाद) विरोधी आदिवासियों के संघर्ष को कुचलने के लिए पुलिस बल के साथ अर्धसैनिक बल उतार दिया है। यहां तक कि आसमान से बमबारी भी की जा रही है, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से सेना की मदद ली जा रही है।

भगत सिंह पूंजीवाद की समाप्ति चाहते थे। आज की तारीख में आदिवासियों जल, जंगल और जमीन बचाने के संघर्ष में हिस्सेदारी किए बिना क्या हम कह सकते हैं कि हम भगत सिंह के अनुयायी हैं, उनके दिखाए रास्ते पर चलते हैं, उनके सपनों को पूरा करना चाहते हैं, पूंजीवाद (कॉर्पोरेट) का खात्मा करना चाहते हैं। आज की तारीख में यह भारत की धरती पर पूंजीवाद के खिलाफ चल रहा यह सबसे निर्णायक संघर्ष है, क्या इससे मुंह मोड़कर भगत सिंह की आंखों में आंखे डालकर उनसे बात कर सकते हैं। मेरा मानना नहीं।

मैं भी मानता हूं, ऐसा करने में बहुत जोखिम है, बहुत खतरा है, यह बड़े साहस की मांग करता है, इसमें जान जाने का भी जोखिम है, सब कुछ के बर्बाद हो जाने का खतरा है। लेकिन खतरा मोल लेने, जोखिम उठाना और इसके लिए साहस का परिचय देने का नाम ही तो भगत सिंह है। भगत सिंह जुबानी जमा खर्च करने वाले व्यक्ति का नाम नहीं है, जीवन में चरित्रार्थ करने का नाम है।

आदिवासियों के बाद जो तबका सबसे अधिक कॉर्पोरेट लूट ( पूंजीवाद) की मार सह रहा है, उसके शोषण-उत्पीड़न का शिकार है, वह मेहनतकश (विशेषकर शारीरिक मेहनत करने वाला) मजदूर वर्ग है। आज का पूंजीवाद (कॉर्पोरेट) उनके खून की एक-एक बूंद जूस रहा है, उसके बदले में उनको सिर्फ उतना ही देता है, जिससे वे किसी तरह जिंदा रह सके। भगत सिंह मेहनतकशों का राज कायम करना चाहते। वे नौजवानों से मेहनतकशों के बीच जाने और उन्हें संगठित करने का आह्वान करते हैं। क्या आज हम मध्वर्गीय जीवन और सुविधाओं को छोड़े बिना मेहनतकशों से कोई सीधा रिश्ता बना सकते हैं, क्या शोषण-उत्पीड़न और अन्याय-अत्याचार के खिलाफ उनके संघर्ष और अपना राज (साम्यवादी राज) कायम करने की उनकी कोशिशों में कोई मदद कर सकते हैं, उनका रोज-बरोज का साथी बन सकते हैं, जैसा की भगत सिंह चाहते थे।

यदि भगत सिंह के सपनों को पूरा करना चाहते हैं, तो हमें मध्यवर्गीय स्वप्नों, आकांक्षाओं, सुविधाओं को छोड़ना पड़ेगा। मेहनकशों से जीवंत रिश्ता बनाना पडे़गा। उनके रोज-बरोज के संघर्षों में हिस्सेदारी करनी पडे़गी। सिर्फ जुबानी तौर पर मेहनकशों की बात से कुछ भी नहीं होने वाला है, सिद्धांतों-विचारों को जीवन में उतारने और बरतने का नाम है, भगत सिंह। जो सिद्धांतों-विचारों को जीवन में उतार नहीं सकता है, वह खुद को भगत सिंह का वारिस नहीं कह सकता। हां भगत सिंह के विचारों का ज्ञाता या विशेषज्ञ हो सकता है।

कल के भगत सिंह पर हम गर्व कर सकते हैं, करना भी चाहिए, उनकी महानता का गुणगान कर सकते है, जो जरूरी भी है, उनके साहस की प्रशंसा कर सकते हैं, जरूर ही करना चाहिए। उनकी समझ की दाद दे सकते हैं, देनी ही चाहिए। अध्ययन की भूरी-भूरी प्रशंसा कर सकते हैं, जो करने लायक है। अन्याय के हर रूप के खिलाफ उनके आक्रोश देखकर उत्तेजना से भर सकते हैं। हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ने वाले भगत सिंह को याद कर रोमांंचित हो सकते हैं, यह रोमांच जरूर होना चाहिए। उनके क्रांतिकारी गीतों को गाकर मस्ती से झूम सकते हैं, झूमना ही चाहिए। लेकिन हमारा काम कल के भगत सिंह से नहीं चलने वाला है, हमें आज का भगत सिंह चाहिए, जो अपने समय के सबसे बड़े अन्यायों की पहचान कर सके, उसके खिलाफ सारी ताकत के साथ खड़ा हो, सब कुछ कुर्बान करने को तैयार। फांसी के फंदे को भी चूमने को तैयार। यही भगत सिंह का वारिस होने का मतलब है। यही भगत सिंह से नाता कायम करने का मतलब है।

ऐसा नहीं भगत सिंह जैसे जज्बा रखने वाले, उनकी जैसी कुर्बानी देने वाले, शोषण-उत्पीड़न और अन्याय रहित दुनिया का स्वप्न देखने वाले और उसके लिए जेल और मौत चुनने वाले भारत में भगत सिंह के बाद कोई नौजवान पैदा नहीं हुआ है, सैकड़ों ही नहीं हजारों पैदा हुए हैं। ऐसे लोग भी आज भी हैं, कम हैं, पर इतने भी कम नहीं कि उंगलियों पर गिने जा सकें। देश के हर कोने में पैदा हुए। तेलंगाना, नक्सलबाड़ी, भोजपुर और बस्तर तो सिर्फ चंद चर्चित मिशालें हैं। जो सबकी जुबान पर हैं। लेकिन आज हजारों नहीं, लाखों नहीं, बल्कि करोड़ों भगत सिंह की देश को जरूरत है।

(डॉ. सिद्धार्थ स्वतंत्र पत्रकार एवं लेखक हैं।)

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