Saturday, January 22, 2022

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किसान आंदोलन ने संसद को आवारा होने से रोक दिया

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The Farm Laws Repeal Bill, 2021 के लोकसभा में पास होने के साथ ही कल देश के संसद में इतिहास बन गया, जब देश की सरकार को अपने बनाये गए तीन कृषि कानून वापस लेने के लिए मज़बूर होना पड़ा। जी हां, यह बिल लोकसभा में बिना किसी चर्चा के पास हो गया, वो भी मात्र 4 मिनट में। राज्य सभा में पास करने के साथ-साथ चर्चा की मांग कर रहे 12 सांसदों को भी पूरे शीत सत्र के लिए निलंबित कर दिया गया। 

भाजपा सरकार की गैरलोकतांत्रिक कार्यप्रणाली बरकरार

महामारी के समय का फायदा उठाते हुए कैबिनेट में आर्डिनेंस के जरिये लाने के बाद जैसे तीनों कृषि कानून संसद में बिना किसी चर्चा के पास करवाए गए थे, वैसे ही बिना किसी बहस के वापस ले लिए गए। सांसद चर्चा की मांग करते रहे, परन्तु भाजपा सरकार ने लोकतंत्र को दरकिनार करते हुए संसद को मज़ाक बनाने का अपना बेहतरीन रिकॉर्ड कायम रखा और हमेशा की तरह आरोप भी विपक्ष पर ही लगा दिया गया कि वह सदन को चलने नहीं दे रहा है। ऐसे लगता है कि मेरे देश की संसद नियंत्रण के बाहर होती जा रही है और केवल सत्ता पक्ष के निर्णयों को लागू करने का काम कर रही है। मुद्दों पर चर्चा और विपक्ष को बिलकुल ही दरकिनार किया जा रहा है। बिना चर्चा और विपक्ष की भूमिका के लोकतंत्र अधूरा है।

संसद में बिना चर्चा के जल्दबाजी में बिल पास करने के प्रचलन को लेकर, देश के सर्वोच्च न्यायालय के माननीय मुख्य न्यायाधीश भी गहरी चिंता प्रकट कर चुके हैं। बहरहाल, राहत की बात यह है कि इस देश के बेलगाम होते संसद को सड़क पर आंदोलित किसानों ने लगाम लगाने का काम किया है। हम कई बार सुनते आये हैं कि “What Parliament do People can Undo” परन्तु किसान आंदोलन में हमने इसे असलियत में होते हुए देखा है। राम मनोहर लोहिया का प्रसिद्ध कथन है, “अगर सड़कें खामोश हो जांए, तो संसद आवारा हो जाएगी”। इस किसान आंदोलन ने संसद को आवारा नहीं होने दिया और कॉरपोरेट के मुनाफे की लालसा व उनके हितों का प्रतिनिधित्व कर रही भाजपा सरकार को हराते हुए, तीनों कृषि कानून संसद में वापस करवाए।

रस्सी जल गई, पर बल नहीं गया

संसद में भी सरकार के द्वारा पेश किए गए The Farm Laws Repeal Bill, 2021 के ‘the statement of object and reason’ में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मन की बात को ही पेश किया गया है। जब नरेंद्र मोदी ने तीनों कृषि कानून रिपील करने की घोषणा की थी, खूब रोना रोया था, और तीनों कृषि कानूनों को सैद्धांतिक तौर पर सही ठहराने का प्रयास किया था। संसद में पास हुए बिल के “The statement of object and reason” में भी यही प्रयास किया गया है और वापस लिए जाने वाले कृषि कानूनों गुणगान किया गया है।

इस पर आने से पहले जो सबसे आपत्तिजनक बात इसमें लिखी गई है, उसे देखना ज़रुरी है। जैसे प्रधानमंत्री ने ऐतिहासिक किसान आंदोलन को किसानों का विरोध घोषित किया था, उसी की तर्ज पर इस बिल में कहा गया है कि, “भले ही किसानों का एक समूह ही इन कानूनों का विरोध कर रहा हो, सरकार ने कई बैठकों और अन्य मंचों के माध्यम से कृषि कानूनों के महत्व के बारे में किसानों को जागरूक और इनके गुणों की व्याख्या करने का भरसक प्रयास किया है।” यह शब्द भाजपा सरकार के अड़ियल और तानाशाहीपूर्व रवैये को दर्शाता है।

यह देश के सबसे विशालतम और शांतिपूर्ण आंदोलन की ही तौहीन नहीं, बल्कि उन करोड़ों किसानों के अस्तित्व को ही स्वीकार करने से मुकरना है जो पिछले एक साल से आंदोलन में थे। उन किसानों के बलिदानों का अपमान है जिनकी जान इस आंदोलन में गई। वह लाखों किसान सरकार की नज़र में क्या हैं, जो पिछले एक वर्ष में हाड़ कंपा देने वाली ठण्ड और फिर झुलसने वाली गर्मी में दिल्ली की सीमाओं पर अपने जीवन की जंग लड़ रहे थे। देश के करोड़ों मज़दूर और नागरिक जो इस आंदोलन में सक्रियता से किसानों के साथ डटकर खड़े रहे, अगर वह भी सरकार को नज़र नहीं आते तो समस्या सरकार के नज़रिये में है। बाकियों की तो छोड़ो, इन कृषि कानूनों के विरोध में सरकार का साथ छोड़ कर जाने वाले NDA के सहयोगी कौन थे। अगर यह करोड़ों लोग कुछ किसान है, तो क्या अडानी और अम्बानी ही पूरा देश हैं।

कॉर्पोरेटस को सन्देश 

हालांकि इस बिल में कृषि कानूनों के बारे में सुझाये गए तथाकथित फायदों के बारे में देश के किसान भलीभांति जानते हैं और पिछले एक साल के आंदोलन ने जनता के सामने भी इनकी पोल खुल गयी है। लेकिन भाजपा सरकार की सुई अभी भी वहीं अटकी हुई है। दरअसल, यह उनकी पूंजीपतियों के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है। संसद में तीन कृषि कानूनों को रिपील के लिए लाए बिल में उनके फायदे गिनाने का मतलब है कि मोदी सरकार अपने पूंजीपति दोस्तों को स्पष्ट सन्देश दे रही है कि चाहे जनांदोलन के दबाव में उनको झुकना पड़ा है, परंतु सैद्धांतिक तौर पर भाजपा सरकार मज़बूती से कानूनों की मूल धारणा के साथ खड़ी है। मतलब मोदी सरकार भारत के संसद में अपने दोस्तों को संदेश दे रही है कि देश में उनके हितों और मुनाफे की रक्षा के लिए भाजपा कटिबद्ध है ताकि भाजपा देश के सरमायेदारों की पहली पसंद बनी रहे और उनके चंदे की पहली हक़दार भी।

झूठे दावों के ज़रिये भविष्य के लिए ज़मीन तैयार करने का प्रयास

बड़े ही बेहूदा ढंग से इन तीन कृषि कानूनों का एक उद्देश्य “किसानों को लाभकारी मूल्य प्राप्त करने के लिए अपनी पसंद के किसी भी स्थान पर, किसी भी खरीदार को अपनी उपज बेचने की स्वतंत्रता प्रदान करना” बताया गया है। हालांकि, यह प्रावधान लाभकारी मूल्य कैसे सुनिश्चित करते, शायद मोदी जी को छोड़ कर किसी को समझ नहीं आया। यहां तक कि भाजपा मंत्री भी आंदोलनकारी किसानों को कोई ठोस तर्क नहीं दे सके। वर्तमान वास्तविकता यह है कि भारत में केवल 6% किसानों को सीएसीपी- (कृषि लागत और मूल्य आयोग) द्वारा प्रस्तावित (A2+FL) का न्यूनतम समर्थन मूल्य मिल रहा है और वह भी सार्वजनिक खरीद प्रणाली के माध्यम से।

बड़ी संख्या में किसान निजी बाजार में भारी नुकसान और शोषण का सामना कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, इस वर्ष धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1960 रुपये प्रति क्विंटल घोषित किया गया है, लेकिन मध्य और पूर्वी उत्तर प्रदेश में किसान सार्वजनिक खरीद केंद्रों की कमी के कारण अपना धान निजी एजेंटों को 1100 प्रति क्विंटल रुपये की दर से बेचने को मजबूर हैं। यानी उन्हें औसतन 860 रुपये प्रति क्विंटल का नुकसान हो रहा है। यदि प्रति एकड़ उत्पादन औसतन 20 क्विंटल है, तो 17200 रुपये प्रति एकड़ का नुकसान किसान को एक सीजन में होता है।

डॉ एम एस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में राष्ट्रीय किसान आयोग ने अपनी रिपोर्ट (2006) में प्रस्ताव दिया था कि किसानों को उनकी उपज की कीमत के रूप में C2 + 50% मिलेगा। इसमें भूमि का किराया और क्रेडिट का ब्याज हिस्सा शामिल है। 2014 के आम चुनाव के भाजपा घोषणापत्र में इस वादे को शामिल किया गया था, लेकिन अपने शासन के पिछले सात वर्षों के दौरान इसे लागू नहीं किया। इस प्रावधान के अभाव में, किसी भी खरीदार को किसी भी स्थान पर बेचने का विकल्प लाभकारी मूल्य सुनिश्चित नहीं करेगा।

इसके बजाय इसका उद्देश्य एक राष्ट्र एक बाजार के आदर्श वाक्य के तहत कॉर्पोरेट कंपनियों को किसी भी स्थान पर, किसी भी किसान से खरीदने का विकल्प देते हुए लूटने की छूट देना है। इसलिए इस फार्म अधिनियम का उद्देश्य खरीद की एमएसपी प्रणाली के किसी प्रावधान के बिना कृषि बाजार के निगमीकरण का था। दूसरी तरफ, यह वर्तमान सार्वजनिक बाजार को कमजोर कर, इसे नव-उदारवादी पूंजीवादी बाजार की मुक्त व्यापार प्रणाली के साथ बदलने की कवायद है।

वैसे बड़ा प्रश्न तो यह भी है कि अगर आवश्यक वस्तु अधिनियम में बदलाव सही थे, तो सरकार को खाद्य तेल और दालों की कीमतों में भारी उछाल आने के बाद इन्हें नियंत्रण करने लिए क्यों हस्तक्षेप करना पड़ा, जब सरकार ने काला बाजारी रोकने के लिए सब व्यापारियों को अपने स्टॉक की सूचना देने के लिए कहा। दरअसल, सरकार ने जो दावे इस बिल में दोहराये हैं, पिछले एक साल में ही किसानों और आम जनता के अपने अनुभव इससे विपरीत रहे हैं जिसके चलते न केवल किसानों के आंदोलन को बल मिला, बल्कि सरकार और उसकी गोदी मीडिया का झूठा प्रचार भी जनता के सामने बेनक़ाब हो गया। 

किसानों को दया नहीं, अपना हक़ चाहिए

यह सब झूठे दावे करने के बाद, मोदी सरकार ने किसानों को जायज़ हक़ देने के निर्णय के बजाय उनको दया का पात्र जैसी भूमिका पेश करने की कोशिश करते हुए कहा कि “COVID अवधि के दौरान, किसानों ने उत्पादन बढ़ाने और देश की जरूरतों को पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत की है। जैसा कि हम स्वतंत्रता के 75वे वर्ष पर “आजादी का अमृत महोत्सव” जश्न मना रहे हैं- आवश्यकता है कि इस समय सबको एक साथ समावेशी विकास के पथ पर ले जाने का है।” यह दया दिखाते हुए और घड़ियाली आंसू बहाते हुए कृषि कानूनों को निरस्त करने का प्रस्ताव संसद में पेश किया गया।

Farm Laws Repeal Bill के इस मज़मून से साफ़ हो जाता है कि मोदी सरकार का दिल तो अभी भी इन कानूनों के साथ है, परंतु यूपी और उत्तराखंड सहित पांच राज्यों के आगामी महत्वपूर्ण चुनावों की पृष्ठभूमि में एक मात्र चुनाव पूर्व अवसरवादी इशारा है। इसका उद्देश्य लोगों को गुमराह करना और तीन कृषि कानूनों के कॉर्पोरेट-समर्थक पूर्वाग्रह को छुपाना है। इसलिए किसानों को ज़्यादा सावधान रहना होगा। 

सरकार के इस रवैये से किसान आंदोलन की जीत और ज्यादा ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि इसने शासक वर्ग के हितों के विपरीत जंग में सरकार को घुटनों पर ला दिया। इसी समर्पण और विश्वास के साथ किसान आंदोलन न्यूनतम समर्थन मूल्य के लिए कानून सहित अन्य मांगों के लिए संघर्ष में बलिदान देने को तैयार खड़ा है। 

(डॉ. विक्रम सिंह ऑल इंडिया एग्रिकल्चर वर्कर्स यूनियन के संयुक्त सचिव हैं।)

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