Tuesday, October 26, 2021

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पेगासस जासूसी और निजता का अधिकार

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पेगासस स्पाइवेयर विवाद में एक महत्वपूर्ण मोड़ यह आया है कि देश के पांच पत्रकारों, जिनका नाम, जासूसी की संभावित टारगेट सूची में होने की बात सामने आयी है, ने सुप्रीम कोर्ट में एक अलग से रिट याचिका दायर की है, जिसमें कहा गया है कि सरकारी एजेंसियों द्वारा निगरानी के अनधिकृत उपयोग ने उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया है। पेगासस स्पाइवेयर का उपयोग करके, अपने मोबाइल फोन की कथित हैकिंग से, सीधे प्रभावित और व्यक्तिगत रूप से पीड़ित होने का दावा करने वाले व्यक्तियों द्वारा, दायर यह पहली याचिका है।

याचिकाकर्ताओं में परंजॉय गुहा ठाकुरता, एसएनएम आब्दी, प्रेम शंकर झा, रूपेश कुमार सिंह और इप्सा शताक्षी हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि एमनेस्टी इंटरनेशनल द्वारा किए गए उनके मोबाइल फोन की फोरेंसिक जांच से पता चला है कि उनके मोबाइल फोन को पेगासस मैलवेयर का इस्तेमाल करके निशाना बनाया गया था। याचिका में कहा गया है कि, उनके पास यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि उनकी “भारत सरकार या किसी अन्य तीसरे पक्ष द्वारा गहन घुसपैठ और हैकिंग” की गयी है। याचिका में यह भी कहा गया है कि, “केंद्र सरकार ने अभी तक निगरानी उद्देश्यों के लिए पेगासस मैलवेयर का लाभ उठाने से स्पष्ट रूप से इनकार नहीं किया है।” जासूसी के इस संवेदनशील मुद्दे पर, अदालत की निगरानी में जांच की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पहले ही तीन रिट याचिकाएं दायर की जा चुकी हैं। द हिंदू के संपादक, एन राम और शशि कुमार द्वारा दायर जनहित याचिका में प्रकरण की न्यायिक जांच कराने की मांग की गई है। 

सुप्रीम कोर्ट में इसकी सुनवाई 05 अगस्त को शुरू हुयी और अदालत ने कहा कि यदि यह तथ्य सच हैं तो यह एक गम्भीर आरोप है। अदालत ने सरकार को अभी कोई नोटिस नहीं जारी किया है और याचिकाकर्ताओं को कहा है कि, वे सरकार के पास भी अपनी शिकायते भेजें। अगली सुनवाई 10 अगस्त को होगी। इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई के दौरान, निजता के अधिकार पर भी बात उठी। यह निगरानी एक सामान्य फोन टैपिंग की तरह नहीं है। यह इजराइल की कंपनी एनएसओ द्वारा विकसित एक बेहद आधुनिक और उच्च तकनीकी का एक सॉफ्टवेयर है जो मिस्ड कॉल के द्वारा किसी के भी स्मार्टफोन में इंजेक्ट कर के उसके फोन में सुरक्षित सभी डेटा और गतिविधियों को निगरानी केंद्र में भेज सकता है। यह स्पाइवेयर जिसे पेगासस नाम दिया गया है, हथियार की श्रेणी में आता है और इसे आतंकियों के सर्विलांस के उद्देश्य से विकसित किया गया है। पर दुनियाभर में, कुछ सरकारों द्वारा इसके दुरुपयोग की खबरें आ रही हैं और दुर्भाग्य से भारत का भी नाम उसमें है। 

इस जासूसी के अन्य पहलुओं के बजाय आज हम इसके कानूनी पक्ष जो निजता के अधिकार से सम्बंधित है पर ध्यान केंद्रित करेंगे। 

भारतीय संविधान के मौलिक अधिकारों में निजता के अधिकार का कहीं उल्लेख नहीं है, पर अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के मौलिक अधिकार से, निजता का अधिकार स्वतः आच्छादित हो जाता है। निजता के अधिकार पर पहली बार एक गंभीर बहस तब शुरू हुई जब आधार कार्ड के द्वारा नागरिकों की बहुत सी निजी सूचनाएं लेने के लिये एक कानून लाया गया। तब यह भी सवाल उठा कि, क्या सरकार इन सूचनाओं की गोपनीयता बनाये रखने के लिये सक्षम और कृतसंकल्प है भी ? सरकार ने तब सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कहा था, कि उसने नागरिकों के डेटा सुरक्षित रखने के लिये सारे ज़रूरी कदम उठाए हैं और यह आंकड़े एक मजबूत दीवार के घेरे में सुरक्षित हैं। 

आधार पर, यह विवाद इसलिए पैदा हुआ क्योंकि आधार में व्यक्ति की बायोमेट्रिक और तमाम निजी जानकारियां होती हैं। आधार में, धारक की उंगलियों के निशान भी शामिल होते हैं। यह सब सूचनाएं, किसी भी नागरिक की निजी सूचनाएं होती हैं, और इनका सार्वजनिक हो जाना या किसी के द्वारा चुरा लेना, उक्त व्यक्ति की निजता के अधिकार का उल्लंघन तो है ही साथ ही इन सूचनाओं के दुरूपयोग से, उक्त व्यक्ति को तरह-तरह से नुकसान भी पहुंचाया जा सकता है। निजता के अधिकार और डेटा को सुरक्षित रखे जाने सम्बंधित मामले में, सुप्रीम कोर्ट में माना है कि,

“निजता का अधिकार जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के दायरे में आता है और इसमें किसी के व्यक्तिगत निर्णयों पर स्वायत्तता का अधिकार, शारीरिक अखंडता और व्यक्तिगत जानकारी भी शामिल है। यद्यपि यह अधिकार प्रकृति में पूर्ण नहीं है और कानून द्वारा बनाए गए प्रत्येक कानून जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी भी व्यक्ति की निजता के अधिकार का उल्लंघन करता है।” 

अब एक नज़र निजता के अधिकार के विकास पर डालते है – 

  • स्वाधीनता के पहले भी निजता के अधिकार पर अदालत और अन्य समाज में बहस छिड़ चुकी थी। 1935 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक महत्वपूर्ण मामला अदालत के सामने आया था, निहाल चंद बनाम भगवान देई का। उसकी सुनवाई मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सुलेमान ने की थी। उंस मामले में अपने मकान में खिड़की खोलने पर निजता के भंग होने का आरोप था। अदालत ने माना कि, दूसरे के घर की तरफ जहां उसकी जमीन नहीं है, खिड़की खोलना निजता के अधिकार में अतिक्रमण है। हालांकि यह कोई महत्वपूर्ण विवाद बिंदु नहीं था, पर अदालत में पहली बार, निजता की परिभाषा, सीमा और उसके अधिकार पर बहस चली और अदालत ने इसे माना कि व्यक्ति की निजता उसका एक अधिकार है और उसमे सेंध लगाने की इजाज़त सबको नहीं है। 
  • 1948 में संयुक्त राष्ट्र संगठन, यूएनओ ने एक यूनिवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स जारी किया जिसमे मानव की प्रतिष्ठा और उसकी निजता के अधिकार की बात कही गयी है। हालांकि निजता का अधिकार इस चार्टर में अलग से परिभाषित नहीं है अपितु वह व्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के अंदर ही समाहित है। यदि किसी व्यक्ति की निजता के मामले में कोई दखल देता है तो, वह उसके निजी स्वतंत्रता के मामले में भी दखल होगा, और इसी पर्सनल लिबर्टी को यूडीएचआर ने अपने चार्टर में मुख्य स्थान दिया है। भारतीय संविधान में जो मौलिक अधिकार हैं वे भी 1948 के यूडीएचआर की घोषणा पर आधारित हैं। 
  • एक महत्वपूर्ण मामला है, एमपी शर्मा बनाम सतीश चंद्र का जिसमे 8 जजो की पीठ ने निजता के अधिकार के संबंध में यह फैसला दिया है कि,

“कानूनी कार्यवाही के दौरान तलाशी और जब्ती के राज्य के अधिकार, निजता के अधिकार का उल्लंघन नहीं करते हैं।”

एमपी शर्मा का मामला 15 मार्च 1954 का है। यह मामला डालमिया समूह की कंपनियों के दस्तावेजों की तलाशी और जब्ती से संबंधित था। इसमें डालमिया जैन एयरवेज लिमिटेड के कारोबार की जांच हुई थी। इस कंपनी का पंजीकरण जुलाई 1946 में हुआ था और जून 1952 में यह कंपनी बंद हो गई थी। जांच में ज्ञात हुआ कि, कंपनी के भीतर भ्रष्टाचार हुआ है। जांच में पाया गया कि गलत बैलेंस शीट के जरिए शेयरधारकों से वास्तविक जानकारी छुपाने के प्रयास किए गए थे। इस मामले में 19 नवंबर 1953 को एफआईआर दर्ज कराई गई थी और दिल्ली के जिला मजिस्ट्रेट से दरख्वास्त की गई कि इस मामले में सर्च वारंट जारी किया जाए। इस पर आरोपी ने दस्तावेजों की तलाशी और जब्ती को अदालत में चुनौती दी थी। मामले में मुख्य विचाराधीन मुद्दा ‘संपत्ति के संवैधानिक अधिकार’ और ‘खुद पर दोष लगाने से बचाव के अधिकार’ था।

न्यायाधीशों को इस मामले में यह पता लगाना था कि, ‘निजता के अधिकार के उल्लंघन की स्थिति में क्या सरकार द्वारा तलाशी और जब्ती के अधिकार के लिए कोई संवैधानिक सीमाएं हैं।’  इसमें सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एमसी महाजन की अगुआई वाली आठ जजों की पीठ ने फैसला दिया था कि,

“तलाशी और जब्ती का अधिकार राज्य का है। समाज की रक्षा के लिए कानून के तहत राज्य को ये अधिकार मिले हैं। संविधान बनाने वालों ने भी इस मामले को निजता के अधिकार के दायरे में भी सीमित नहीं किया है।” 

  • इसी प्रकार का एक मामला, खड़क सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य का है जिंसमे, न्यायालय ने यह स्थापित किया कि ‘गोपनीयता मौलिक अधिकार नहीं है।’ इस मामले में यूपी पुलिस ने खड़क सिंह नामक एक व्यक्ति को एक मुकदमे में गिरफ्तार किया था, लेकिन साक्ष्य के अभाव में वह बरी हो गया। मुकदमे से बरी हो जाने के बाद भी पुलिस उसकी गतिविधियों पर नजर रख रही थी और इसका काऱण, पुलिस के पास उसकी अवांछित गतिविधियों के संबंध में कुछ सूचनाएं थीं। इस निगरानी पर, खड़क सिंह ने न्यायालय में याचिका दायर की और याचिका में कहा कि 

“पुलिस की जासूसी के कारण उसके निजता के अधिकार का हनन हो रहा है। पुलिस रात में भी मेरे घर में छापेमारी करती है।”

इस पर अदालत ने खड़क सिंह का तर्क नहीं माना और, कहा कि आपराधिक और अवांछित गतिविधियों की सूचना पर, पुलिस को निगरानी और अन्य निरोधक उपचार जो पुलिस रेगुलेशन, पुलिस एक्ट और सीआरपीसी या अन्य पारित आपराधिक कानूनो में दिए गए हैं, कर सकती है। यूपी पुलिस को मिले अधिकार के मुताबिक वह रात में भी छापेमारी कर सकती थी। कोर्ट ने इसे निजता के अधिकार का हनन मानने से इंकार कर दिया था।

  • पुलिस निगरानी पर एक और रोचक मामला मध्यप्रदेश के गोविंद का है। गोविंद मध्यप्रदेश का निवासी था और उस पर, 1960-1969 की अवधि के दौरान कई अपराधों का आरोप लगाया गया था, जिनमें से कुछ को उसने झूठा बताया था। वर्ष 1962 में, अदालत ने उसे, दोषी पाया और दो महीने की कैद और ₹ 100 के जुर्माने की सजा दी। एक अन्य मामले में भी, उसे दोषी पाया गया और एक महीने के कारावास के साथ-साथ ₹ 501 रुपये के जुर्मानें की सजा दी गई। 

इसी बीच, एमपी पुलिस ने, मध्य प्रदेश पुलिस रेगुलेशन की धारा 855 और 856 की स्थापना की, जिसके अनुसार

“किसी न किसी आपराधिक गतिविधि में शामिल होने के संदेह पर, संदिग्धों के नाम एक रजिस्टर में दर्ज किए जाने चाहिए और ऐसे व्यक्तियों को निरंतर निगरानी में रखा जाना चाहिए। इन व्यक्तियों के घर का अनियमित अंतराल पर भ्रमण किया जाना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे किसी भी आपराधिक कृत्य में तो शामिल नहीं हैं जो सार्वजनिक नीति के खिलाफ हैं।”

इस प्राविधान के बाद, गोविंद को एक आदतन अपराधी के रूप में सूचीबद्ध किया गया और उसकी नियमित निगरानी की गई। उन्होंने दावा किया कि उनके घर में पुलिस अधिकारी नियमित रूप से आते थे और कई बार इन पुलिसकर्मियों ने उन्हें पीटा और मारपीट की। उसने इस आधार पर नियम 855 और 856 का विरोध किया कि वे निजता के अधिकार के अनुसार नहीं थे और लागू कानून द्वारा भी समर्थित नहीं थे।” 

इस कानून के बन जाने के बाद गोविंद को पुलिस ने आदतन अपराधी की श्रेणी में रखा, और उसे नियमित निगरानी सूची में रख दिया। इस पर गोविंद ने इसे अपने निजता के अधिकार का हनन माना और कहा कि यह प्रावधान, उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। इस पर लंबी बहस हुई और मामला सुप्रीम कोर्ट में गया। अदालत ने माना कि नियम 855 और 856 वैधानिक है, और यह पुलिस अधिनियम, 1888 की धारा 46 (2) (सी) के अंतर्गत है, जिसमे सरकार को ऐसे नियम बनाने की शक्ति है, जो अपराधों की रोकथाम में ज़रूरी हों। संदिग्धों की नियमित निगरानी के डर से, अपराधी तत्वो की आपराधिक गतिविधियों में कमी आएगी और अपराध कम होंगे।  

  • मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) का भी एक मामला इस विषय में चर्चित है। वर्ष 1977 में मेनका गांधी का पासपोर्ट वर्तमान सत्तारूढ़ जनता पार्टी सरकार द्वारा ज़ब्त कर लिया गया था। जवाब में उन्होंने सरकार के आदेश को चुनौती देने के लिये सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की। इस मामले में उन्होंने अनुच्छेद 21 का हवाला दिया, जिसके अंतर्गत, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान किया गया है जो यह सुनिश्चित करता है कि बिना, कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुपालन के अतिरिक्त, कोई भी व्यक्ति अपने जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जा सकेगा। इस मुकदमे के निर्णय के अस्तित्व में आने से पहले अदालतों द्वारा किसी भी कानून पर सवाल उठाने का दृष्टांत नहीं मिलता है, चाहे वह कानून के अनुकूल हो या ना हो, चाहे वह जीवन के अधिकार या व्यक्तिगत स्वतंत्रता के उल्लंघन के मामले में मनमाना या दमनकारी ही, क्यों न हो। हालाँकि अनुच्छेद 21 के अंतर्गत, अपने आप को कानून की पुनर्समीक्षा का अधिकार देकर न्यायालय ने पर्यवेक्षक से संविधान के प्रहरी का रूप धारण कर लिया।

मेनका गांधी मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का मूल अर्थ यह था कि 

“अनुच्छेद 21 के संदर्भ में ‘कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ के साथ ‘कानून की उचित प्रक्रिया’ को ध्यान में रखा जाएगा।”

बाद के एक निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 

“अनुच्छेद 21 के अनुसार कोई भी व्यक्ति वैध कानून द्वारा स्थापित न्यायसंगत और उचित प्रक्रिया के अलावा अपने जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं होगा।”

  • वर्ष 1994 में, “आर राजगोपाल बनाम भारत संघ” के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय का विचार था कि,

“व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का एक हिस्सा होने से संबंधित अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में दी गई सभी सुरक्षा को कवर करने के रूप में माना जाना चाहिए और एक कार्रवाई योग्य दावे के रूप में सामने लाया जाए।”

यानी अदालत ने, निजता के अधिकार को, व्यक्तिगत स्वतंत्रता का ही एक अंग माना है और प्रकारांतर से इसे भी मौलिक अधिकारों में समाविष्ट, स्वीकार किया है। 

  • टेलीफोन टेपिंग को लेकर 1997 में पीयूसीएल ने एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की थी, जिस पर जस्टिस कुलदीप सिंह की बेंच ने जो कहा, उसे पढिये, 

“टेलीफोन-टैपिंग किसी व्यक्ति की निजता पर गंभीर आक्रमण है। अत्यधिक परिष्कृत संचार प्रौद्योगिकी के विकास के साथ-साथ, बिना किसी हस्तक्षेप के अपने घर या कार्यालय की गोपनीयता बरकरार रखते हुए, टेलीफोन पर बातचीत करने के अधिकार नागरिक को है। निःसंदेह यह भी सही है कि प्रत्येक सरकार, चाहे वह कितनी भी लोकतांत्रिक क्यों न हो, अपनी खुफिया एजेंसियों के माध्यम से राज्य और जनहित में, ऐसे निगरानी की व्यवस्था रखती है। लेकिन साथ ही नागरिकों के निजता के अधिकार का हनन, अधिकारियों द्वारा इस शक्ति के दुरुपयोग से न हो सके, इसका ध्यान, राज्य द्वारा सुनिश्चित किया जाना चाहिए।”

याचिकाकर्ता ने भारतीय टेलीग्राफ अधिनियम, 1885 (अधिनियम) की धारा 5(2) की संवैधानिक वैधता को भी चुनौती दी। इसके विकल्प में यह तर्क दिया जाता है कि उक्त प्रावधानों का मनमाना दुरुपयोग न हो सके, इसके लिए ज़रूरी सुरक्षा मेकवनिज़्म के उपायों को भी शामिल करना होगा। जिससे अंधाधुंध टेलीफोन टैपिंग न की जा सके। 

  • वर्ष 2004 में जिला रजिस्ट्रार और कलेक्टर बनाम केनरा बैंक और अन्य के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने फिर से यह उल्लेख किया कि अनुच्छेद 19 के तहत प्रदान की गई स्वतंत्रताएं निजता के अधिकार को और मजबूत करने के लिए हैं। यह दृष्टिकोण, जिला रजिस्ट्रार और कलेक्टर बनाम कैनरा बैंक में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में दिया है। अदालत ने कहा कि 

“एक बैंक और उसके ग्राहकों के बीच बैंकिंग लेनदेन के संबंध में गोपनीयता का एक तत्व मौजूद होता है। गोपनीयता का अधिकार, ग्राहक द्वारा बैंक को दी जाने वाली गोपनीय जानकारी के परिणाम स्वरूप खो नहीं जाता है। बैंक को सूचना देने के साथ उसकी गोपनीयता नष्ट नहीं होती है। इसके अलावा, बैंक गोपनीयता बनाए रखने के लिए बाध्य है, जब तक कि इसके प्रकटीकरण की आवश्यकता, कानून द्वारा नहीं होती है। बैंक और ग्राहक के बीच का संबंध परस्पर विश्वास पर आधारित है।” 

अदालत ने आयकर रिटर्न की जानकारी को भी निजता के अधिकार के दायरे में माना है। 

“कोई भी जानकारी, जो करदाता ने आयकर विभाग को अपने रिटर्न में दिया हैं यह उसकी व्यक्तिगत जानकारी मानी जायेगी। किसी व्यक्ति द्वारा दायर आयकर रिटर्न का किसी अनधिकृत व्यक्ति को, किया गया खुलासा, या ऐसी मांग करने से उस व्यक्ति की निजता का हनन होगा।”

  • वर्ष 2010 में सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य के मामले ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण तथ्य सामने लाया गया क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मानसिक और शारीरिक गोपनीयता में गोपनीयता के वर्गीकरण के संबंध में की गई टिप्पणियों के कारण, एक बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू पर चर्चा की गई थी, और इस पर निजता के अधिकार को अनुच्छेद 20(3) के मौलिक अधिकार से जोड़ने का निर्देश दिया।

सेल्वी बनाम कर्नाटक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने, पहले कहा था कि 

“जांच अधिकारी किसी मामले में आरोपी को नार्को या लाई डिटेक्टर टेस्ट किए जाने के लिए मजबूर नहीं कर सकता क्योंकि इन टेस्टों में आरोपी अपने ही खिलाफ बयान दे सकता है जो संविधान के अनुच्छेद 20 (3) का हनन है।” 

लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने, संवैधानिक प्रावधानों और अपने ही अन्य फैसलों पर विचार करते हुए कहा, 

“सबूतों की पुष्टि के लिए किसी भी व्यक्ति के फिंगर और फुट प्रिंट लिए जा सकते हैं और इसे अनुच्छेद 20 (3) के अंतर्गत मिले नागरिक अधिकारों का हनन नहीं माना जा सकता।” 

यह मामला, उत्तर प्रदेश के इटावा का था। 

  • 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने निजता के अधिकार को, मौलिक अधिकारों का एक अंग माना है। शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि,

“जीने का अधिकार, निजता के अधिकार और स्वतंत्रता के अधिकार को अलग-अलग करके नहीं बल्कि एक समग्र रूप देखा जाना चाहिये।” 

न्यायालय के शब्दों में 

“निजता मनुष्य के गरिमापूर्ण अस्तित्व का अभिन्न अंग हैं और यह सही है कि संविधान में इसका जिक्र नहीं है, लेकिन निजता का अधिकार वह अधिकार है, जिसे संविधान में गढ़ा नहीं गया बल्कि मान्यता दी गयी है। निजता के अधिकार को संविधान संरक्षण देता है क्योंकि यह जीवन के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का एक बाईप्रोडक्ट है। निजता का अधिकार, स्वतंत्रता और सम्मान के साथ जीने के अन्य मौलिक अधिकारों के साहचर्य में लोकतंत्र को मज़बूत बनाएगा।” 

निजता की श्रेणी तय करते हुए न्यायालय ने कहा कि,

“निजता के अधिकार में व्यक्तिगत रुझान और पसंद को सम्मान देना, पारिवारिक जीवन की पवित्रता, शादी करने का फैसला, बच्चे पैदा करने का निर्णय, जैसी बातें शामिल हैं। किसी के अकेले रहने का अधिकार भी उसकी निजता के अंतर्गत आएगा। निजता का अधिकार किसी व्यक्ति की निजी स्वायत्तता की सुरक्षा है और जीवन के सभी अहम पहलूओं को अपने तरीके से तय करने की आज़ादी देता है।” 

न्यायालय ने यह भी कहा है कि 

“अगर कोई व्यक्ति सार्वजनिक जगह पर हो तो ये इसका अर्थ यह नहीं कि वह निजता का दावा नहीं कर सकता।”

अन्य मूल अधिकारों की तरह ही निजता के अधिकार में भी युक्तियुक्त निर्बन्धन की व्यवस्था लागू रहेगी, लेकिन निजता का उल्लंघन करने वाले किसी भी कानून को उचित और तर्कसंगत होना चाहिये।

न्यायालय ने यह भी कहा है कि, 

“निजता को केवल सरकार से ही खतरा नहीं है बल्कि गैरसरकारी तत्त्वों द्वारा भी इसका हनन किया जा सकता है। अतः सरकार डेटा सरंक्षण का पर्याप्त प्रयास करे।” 

न्यायालय ने सूक्ष्म अवलोकन करते हुए कहा है कि, 

“किसी व्यक्ति के बारे में जानकारी जुटाना उस पर काबू पाने की प्रक्रिया का पहल कदम है।” 

इस तरह की जानकारियों का प्रयोग असहमति का गला घोंटने में किया जा सकता है। अतः ऐसी सूचनाएँ कहाँ रखी जाएंगी, उनकी शर्तें क्या होंगी, किसी प्रकार की चूक होने पर जवाबदेही किसकी होगी ? इन पहलुओं पर गौर करते हुए कानून बनाया जाना चाहिये।

निजता के अधिकार के संदर्भ में, जिन प्रमुख मुकदमो का उल्लेख ऊपर किया गया है, उनसे यह निष्कर्ष निकलता है कि, 

  • निजता का अधिकार, मौलिक अधिकार के अनुच्छेद 21 में समाविष्ट है और वह अलग से लिखित नहीं है।
  • मौलिक अधिकारों के समान ही वह निर्बाध और असीमित रूप में नागरिकों को प्राप्त नहीं है। उस पर विधिक प्रतिबंध राज्य द्वारा लगाए जा सकते हैं। राज्य इनके लिये सक्षम है। 
  • राज्य विधिहित औऱ जनहित में कानूनन अवांछित व्यक्तियों की निगरानी कर सकता है और इसके लिये राज्य कानून भी बना सकता है। 
  • लेकिन, राज्य का यह भी दायित्व है कि वह इन कानूनों, निगरानी की शक्तियों और अधिकारों का दुरुपयोग न होने दे। इसके लिये उचित मेकेनिज़्म बनाये और एजेंसियों द्वारा कोई भी विधिविरुद्ध कार्य न होने दे। 

अब इस अधिकार के संदर्भ में पेगासस जासूसी के मामले को देखते हैं। भारत में राज्य और केंद्रीय एजेंसियों द्वारा की जा रही निगरानी पूरी तरह से अवैध और कानूनन प्रतिबंधित नहीं है। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, (आईटी एक्ट) 2000 की धारा 69A के अनुसार,

“आईटी अधिनियम की धारा 69 (ए) सरकार को उन पोस्ट और अकाउंट्स के खिलाफ कार्रवाई करने की अनुमति देती है जो सार्वजनिक व्यवस्था या भारत की संप्रभुता और अखंडता, भारत की रक्षा, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध के हित के लिए खतरा बन सकते हैं।” 

इंटेलिजेंस ब्यूरो और रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) सहित 10 केंद्रीय एजेंसियां टेलीफोन टैप करने के लिए सरकार द्वारा अधिकृत है। 2013 में हुए एक आरटीआई खुलासे के अनुसार,  

“केंद्र सरकार द्वारा मासिक आधार पर 5,000 से 9,000 वैध सर्विलांस आदेश जारी किए जा रहे थे। यहां तक ​​कि निजता का अधिकार विधेयक, जिसे अभी पारित किया जाना है, भारतीय नागरिकों को निगरानी से पूरी तरह मुक्त नहीं करता है।” 

हालांकि, यह निगरानी फोन टैपिंग या लोकेशन ट्रेसिंग या फोन सुनकर कोई जानकारी जुटाना और उससे कानून के हित मे कोई निष्कर्ष निकालना ही होता था, और इसके लिये सामान्य उपकरण इस्तेमाल किये जाते हैं। इंडिया टुडे में छपे एक लेख के अनुसार, 

“एक भारतीय सुरक्षा सलाहकार, नाम न छापने का अनुरोध करते हुए, कहते हैं कि पेगासस मैलवेयर, जैसा कि एनएसओ बता रहा है, वास्तव में आतंकवाद विरोधी कार्यवाहियो के लिए विकसित किया गया है। मुंबई 26/11 जैसी घटना के दुबारा, होने वाली स्थिति में, सुरक्षा बलों को यह जानने के लिए कि आतंकवादियों की गतिविधियां क्या हैं यह स्पाइवेयर उनके फोन में पहुंचाया जा सकता है जिससे उनकी क्या योजनाएं हैं, यह पता चल सके या लक्ष्य का फोन डेटा निकाला जा सकता है या उन्हें भ्रमित करने के लिए इसका उपयोग किया जा सकता है।”  

भारत सरकार ने अभी तक पेगासस की खरीद से इनकार नहीं किया है। लेकिन मीडिया में छपी खबरें बताती हैं कि, मैलवेयर का एक अधिक उन्नत स्तर भी खरीदा गया है और माना जाता है कि कम से कम एक भारतीय राज्य सरकार ने 2017 के आसपास स्पाइवेयर खरीदा था। पर क्या यह पेगासस है, इस पर सरकार मौन है और इसी मामले में जांच को लेकर, संसद ठप है। 

जिस तरह से नागरिकों, जजों, मंत्रियों, सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री से जुड़े अधिकारियों, पत्रकारों, चुनाव आयुक्त और सुप्रीम कोर्ट के जजों के नाम पेगासस जासूसी के टारगेट सूची में उजागर हो रहे हैं उसे देखते हुए, इस मामले की जांच सरकार द्वारा करा ली जानी चाहिए। अब सुप्रीम कोर्ट इन याचिकाओं पर क्या निर्णय लेता है यह तो बाद में ही पता चलेगा, फिलहाल यह एक ज्वलंत बिंदु है और सरकार द्वारा इस मामले में की गयीं कोई भी नजरअंदाजी घातक हो सकती है। 

(रिटायर्ड आईपीएस अफसर विजय शंकर सिंह का लेख)

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