Wednesday, December 8, 2021

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कृषि कानूनों में काला क्या है -4: नया कानून मौजूदा मंडियों का डेथ वारंट है

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मोदी सरकार कहती है कि तीनों किसी कानूनों में काला क्या है यह आज तक किसानों ने नहीं बताया लेकिन किसानों का कहना है कि कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य संवर्धन और सरलीकरण कानून पूरी तरह काला कानून है, जिसमें किसानों को एक गहरी खाई के किनारे पर खड़ा कर दिया गया है और मोदी सरकार कॉरपोरेट व्यापारी जब चाहे किसान को एक धक्का देकर खाई में धकेल सकते हैं।नया कानून मौजूदा मंडियों का डेथ वारंट है।

नई मंडी प्रणाली में मौजूदा मंडी प्रणाली को एक तरफ रख दिया गया है । नए एक्ट  की धारा 2ए में जो खरीद केंद्र की परिभाषा दी गई है, उसने व्यापारी को छूट दी गई है कि वह दूर किसी अन्य राज्य अथवा देश में बैठा अपने नियुक्त किए गए नुमाइंदे द्वारा ऐसी किसी जगह फार्म गेट रानीखेत में से अथवा फैक्ट्री एरिया वेयरहाउस, लोहे के बड़े ढोल, कोल्ड स्टोरेज अन्य स्थानों से सीधे किसानों से फसल खरीद सकता है और दूसरे राज्यों में ले जा सकता है या किसी अन्य देश में निर्यात कर सकता है। उस पर पाबंदी नहीं कि वह एमएसपी पर फसल खरीदे। खरीद करने के लिए उक्त जगहों में मौजूदा मंडी शामिल नहीं है ना इसमें मार्केट कमेटी का बनाया हुआ कोई यार्ड, खरीद केंद्र शामिल है। इस एक्ट की धारा 2ए में साफ लिखा हुआ है ट्रेड एरिया में मौजूद मंडियां अथवा उप यार्ड शामिल नहीं होंगे यह मौजूदा मंडियों का डेथ वारंट है।

इससे स्पष्ट है कि किसान से सीधी खरीद करते समय कोई सरकारी एजेंसी मुकाबले में नहीं होगी जो कि एफसीआई के लिए एमएसपी पर खरीद करेगी यह पुरानी उंगलियां छुपाकर मूल्य तय करने वाली स्थिति में पहुंचने की बात है।

मान लिया जाए कि किसान मंडी में लाकर फसल की ढेर लगा देता है और वहां खरीदने वाला व्यापारी नहीं तो खरीद कौन करेगा? मौजूदा मंडी को क्योंकि अब खरीद केंद्र की परिभाषा से बाहर कर दिया गया है। सरकार खेती उपज के मंडीकरण से बाहर निकल चुकी है। इसका सीधा अर्थ है कि किसानों को बड़े और कारपोरेट व्यापारियों के रहमोकरम पर छोड़ दिया गया है। इन पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं होगा क्योंकि आवश्यक वस्तु कानून में संशोधन करके सरकार पहले ही अपने हाथ काट चुकी है और किसी प्रकार का कंट्रोल ऑर्डर ना कर सकने का कानून पास कर चुकी है।

एक्ट में खरीदार की परिभाषा में सरकारी एजेंसी कारपोरेशन अर्थात फ़ूड कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया और सरकारी संस्था पीएससी निकाल दिए गए अब वह खरीदार नहीं रहे इसका स्पष्ट अर्थ है सरकार और फ़ूड कारपोरेशन मंडी से बाहर निकल चुके हैं।

एक्ट की धारा 2 के अनुसार इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग एंड ट्रांजैक्शन प्लेटफॉर्म बिजली उपकरणों द्वारा व्यापार पर लेखन का प्लेटफार्म तैयार किया गया है जिसके द्वारा ऑनलाइन खरीद-फरोख्त होगी। इसके अनुसार अब दो तरह से व्यापार का घेरा होगा।एक इंटरस्टेट ट्रेड,जिसके अनुसार एक राज्य में बैठे दूसरे राज्य से माल खरीदना और बेचना, राज्यों की हदबंदी खत्म कर दी गई है। दूसरा भाग  इंटरेस्ट ट्रेड अर्थात राज्य की सीमाओं के अंदर का वाणिज्य और व्यापार, जिसके अनुसार व्यापारी खाद्य पदार्थ उसी राज्य में, जहां की पैदावार हुई, खरीदेंगे और बेचेंगे।

पहले सिस्टम में ट्रेड एरिया उस राज्य के मंडी करण कानून के तहत बनाई गई मंडियां, यार्ड और खरीद केंद्र नहीं माने गये हैं। अब ट्रेड एरिया की परिभाषा बदल दी गई है। अब ट्रेड एरिया उपज वाली जगह, फसल इकट्ठा करने वाली जगह, जिसमे फार्मगेट, फैक्ट्री एरिया ,वेयरहाउस,कोल्ड स्टोर या अन्य स्थान का सरकार निर्धारण करेगी, शामिल होंगे ।यह सभी दूसरे विकसित देशों के बड़े फार्मों में हैं और लगता है कि नया सिस्टम किसी विकसित देश की नकल की कोशिश है।

यदि मौजूदा मंडी, ट्रेड एरिया ही नहीं रही तो सरकार भी मंडी में बतौर खरीदार बाहर हो जाएगी फिर खरीदार कौन रह जाएगा, सिर्फ इलेक्ट्रॉनिक व्यापारी। अगर बाहर का व्यापारी आधे गांव की पैदावार खरीद बाकी छोड़ देता है तो वह किसान फसल लेकर कहां जाएगा? मौजूदा मंडी तो खरीद केंद्र रही नहीं।

सरकार ने कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) कानून, 2020 के तहत किसान एपीएमसी यानी कृषि उत्पाद विपणन समिति के बाहर भी अपने उत्पाद बेच सकने का प्रावधान किया था। इस कानून के तहत बताया गया था कि देश में एक ऐसा इकोसिस्टम बनाया जाएगा, जहां किसानों और व्यापारियों को मंडी के बाहर फसल बेचने की आजादी होगी। प्रावधान के तहत राज्य के अंदर और दो राज्यों के बीच व्यापार को बढ़ावा देने की बात कही गई थी। साथ ही, मार्केटिंग और ट्रांसपोर्टेशन पर खर्च कम करने का भी जिक्र था। नए कानून के मुताबिक, किसानों या उनके खरीदारों को मंडियों को कोई फीस भी नहीं देनी होती।

अब इस कानून में सरकार ने सिर्फ इतना कहा था कि किसानों को अपना अनाज बेचने के लिए सिर्फ मंडियों पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है। वे मंडी से बाहर जा कर अपनी फसल को ऊंचे दामों में बेच सकते थे। सरकार तर्क दे रही थी कि ऐसा होने से किसानों के लिए ज्यादा विकल्प खुल जाएंगे और उनकी मंडियों पर निर्भरता भी कम होगी। इस कानून को लेकर किसानों का साफ कहना था कि ऐसा होने पर एपीएमसी मंडियां समाप्त कर दी जाएंगी।निजी खरीदारों के पास ज्यादा ताकत होगी और वो अपनी इच्छा अनुसार अपने दाम पर फसल खरीद सकेंगे।

इसका ज्वलंत उदाहरण हिमाचल प्रदेश में दिखा जहां अडानी समूह ने एकतरफा सेव के थोक खरीदी दाम कम कर दिए और इससे किसानों की आय पर खासा असर पड़ा।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)  

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