Tuesday, October 3, 2023

राहुल गांधी और उनके संघर्षों को कैसे देखें?

भारतीय राजनीति में कांग्रेस और नेहरू खानदान की प्रासंगिकता के साथ-साथ, उनकी कमियां और बहुत सारी कमजोरियां रही हैं। नेहरू ने डिस्कवरी ऑफ इण्डिया के भारत की जो आधारभूत संरचना खड़ी की, जिसके साथ उन्होंने भारत की विकास की यात्रा प्रारम्भ की, भले ही वह प्रगतिशीलता के खांचे में नहीं समा सका था, फिर भी वह पुरातनपंथी नहीं कहा जा सकता। वैचारिकी में वह वामपंथ से दूर होते हुए भी, दक्षिणपंथी हिंसा और नफरत को आत्मसात नहीं किए हुए था। वह अधिनायकवादी होते हुए भी निर्लज्ज जनविरोधी नहीं था। वह कॉर्पोरेट परस्त होते हुए भी, किसान-मजदूरों की बर्बादी पर जश्न मनाने वाला नहीं था।

खाद-बीज, कृषि उपकरणों के कारखानों की नींव उसी ने रखी मगर उसी के काल में उदारवादी अर्थव्यवस्था की कोख से उनके उजड़ने की कहानी भी लिख दी गई। आज तो, बिना आधारभूत संरचना का निर्माण किए, आयातित संस्कृति से, नेहरू के बुनियाद को दफ्न करने का काम किया जा रहा है। गुटनिरपेक्षता की वैश्विक राजनीति की बात तो छोड़िए, समर्पण कर विदेशी नेता का चुनाव प्रचार किया जा रहा है।

यह सही है कि कांग्रेस के जमाने में विदर्भ के किसानों की आत्महत्याओं का दौर शुरू हुआ पर उनकी मौत के आंकड़े जब्त नहीं किए गए, वे सामने आते रहे। तब इतनी संवेदनहीनता नहीं थी कि मौत पर मातम न मनाया जाए? अब तो सब तरफ पर्देदारी है। ऐसा कभी नहीं हुआ कि इस कृषि प्रधान देश में किसानों के रास्ते में कीलें गाड़ी गई हों। किसानों की जमीनों या कृषि उपज के उचित मूल्य का प्रश्न हो या नरेगा जैसी मजदूर पक्षधर नीतियों की, आलोचना का अवसर मिला, विरोध प्रदर्शन हुए तो कुछ सुनवाई भी हुई। यद्यपि तब भी सब कुछ पाक-साफ था, ऐसा नहीं कहा जा सकता। बाबरी मस्जिद का ताला खोलना, इमरजेंसी का दमन और सिख विरोधी दंगों का कलंक कांग्रेस के माथे रहा मगर गुजरात जैसे दंगे के दाग से वह बची रही।

युवा नेता राहुल गांधी का दिल छोटा सही, उन्होंने सिख विरोधी दंगों के लिए माफी मांग ली। राजीव गांधी के जमाने में गरीब विरोधी नई शिक्षा नीति और मनमोहन सिंह के जमाने में कॉर्पोरेटपरस्त अर्थव्यवस्था की बुनियाद रखी गई मगर जेएनयू, आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थानों को बर्बाद नहीं किया गया? माब लिंचिंग और धर्मांधता का जश्न नहीं मनाया गया? बलात्कारियों और हत्यारों के गले में मालाएं नहीं डाली गईं? बेशक उसकी नीतियां, एकदम वैज्ञानिक सरोकारों पर नहीं टिकी थीं मगर वैज्ञानिक संस्थानों की स्वायत्तता का संकट न था। राफेल में नींबू और हरी-मिर्च लटकाने का जमाना न था। 

कांग्रेस के पतन का कारण, उसकी जड़ होतीं नीतियां थीं। उसके नेताओं का अभिजात्य वर्गीय चरित्र था जहां दलित, पिछडे़, अल्पसंख्यक और आदिवासी, पूरी आजादी से नहीं जी रहे थे। फलस्वरूप जैसे ही बहुजन राजनीति और शैक्षिक चेतना का विकास हुआ, बहुजन आंदोलन की जमीन तैयार होती गई। उसी प्रक्रिया में उत्तर प्रदेश और बिहार में बहुजनों की सत्ताएं स्थापित हुईं। बहुजनों का उभार और कांग्रेस का पराभव, साथ-साथ हुआ। उसके आधारभूत वोट बैंक खिसक गए और पूरे देश में क्षेत्रीय दलों का उभार, स्थानीय मुद्दों और वंचितों की चेतना ने कांग्रेेस को किनारे लगा दिया। हिन्दी पट्टी में वह संभल न पाई।

बहुजनों का वह उभार, अभिजातवर्गीय, ब्राह्मणवादी कांग्रेसी राजनीतिज्ञों को भाया नहीं। उससे मुक्ति की तलाश में वे भटकते रहे। चक्रव्यूह बनाते रहे। कांग्रेस के अंदर वह नीति, वह तेवर, वह ताप, वह नफरत, वह हिंसा नहीं थी, जो बहुजन राजनीति को परास्त कर सके। तभी हिन्दू कट्टरपंथियों ने भाजपा का नया संस्करण तैयार किया, जहां ‘गर्व से कहो हम हिन्दू हैं’ और ‘जै श्रीराम’ के नारे सुनाई देने लगे थे जो अंततः अल्पसंख्यक और दलित विरोधी हिंसा और नफरत का पोषण करने लगे। यह नफरत बहुजनों के प्रति थी मगर धार मुसलमानों के प्रति मोड़ी गई जिससे बहुजनों की एक बड़ी आबादी, उनके नारों और धार्मिक फांसों में फंसकर, काल्पनिक वर्गशत्रुओं के पीछे टूट पडे़। और वही हुआ। बाबरी विध्वंस से लेकर गुजरात दंगों में बहुजनों की भागीदारी इसका उदाहरण है।

भाजपा, कांग्रेसी वर्णवादियों का सुरक्षित ठिकाना बन गई। सम्मोहित करने के लिए भ्रष्टाचार और उससे मुक्ति का लॉलीपॉप उछाला गया। अन्ना आंदोलन प्रायोजित हुआ। जो समाज अभी बहुजन वैचारिकी को पूरी तरह आत्मसात न कर सका था, वह न तो बहुजन नेताओं पर दबाव बना सका और न कांग्रेस में वह ताकत बची थी जो, अपना नया नैरेटिव गढ़ कर उन्हें आकर्षित कर सके। लिहाजा हिन्दुत्व के सम्मोहन का जादू, कांग्रेस के सफाए का कारण बना। 

भाजपा ने कांग्रेस मुक्त भारत का अभियान चलाया। नायक गढ़े गए। खलनायक निर्मित किए गए। ‘अच्छे दिन’ और ‘पप्पू’ का आविष्कार इसी काल की देन है। कांग्रेस अपने पापों के प्रायश्चित की स्थिति में न थी और न खुद की गलतियों को सुधार और स्वीकार कर, पप्पू को परिभाषित कर, लड़ने की स्थिति में थी।

छद्म राष्ट्रवाद, जनपक्षधरता का अपहरण करता है और नारों, मिथकों, स्वप्न और संस्कृतियों के बहाने, निम्नजातियों का खून चूसकर, अमीरों या कुलीनों का पक्षपोषण करता है। भारतीय राजनीति में वही दौर शुरू हुआ। समाज हिन्दुत्व के नशे में बेहोश रहा और भाई से दुश्मनी निभाता रहा।

आर्थिक असमानता, कॉर्पोरेट लूट, शिक्षा की बर्बादी, बेरोजगारी, महंगाई, हिंसा, नफरत और धर्मांधता ने जनता का जीना मुहाल कर दिया। नायक का मिथ धराशायी होने लगा।

दमन और उत्पीड़न के बीच, असलियत तक पहुंचने में अभी दशक पूरा नहीं हुआ है। विडंबना देखिए, ‘पप्पू’ की गढ़ी गई काल्पनिक छवि से पर्दा उठ गया है। जो सीना फुलाए घूम रहे थे, उनकी शिक्षा का संकट खड़ा हो गया है। ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का जश्न अभी ठीक से मना भी नहीं कि माथे पर सलवटें दिखाई देने लगीं हैं। धार्मिक उद्दंडता की धार, भोथरा होने लगी है। गढ़े गए पप्पू का मिथ, गढ़ने वाले के कपार पर प्रेत की तरह मंडराने लगा है। समय के बदलते ही, आत्मविश्वास लौट आया है।

लोकसभा का चुनाव आने वाला है। सत्ता पर भाजपा काबिज है। विपक्ष अभी एकताबद्ध होने के जुगाड़ में है। बहुजन नेता बिखरे हुए हैं और कुछ भाजपा की मदद में हैं। ऐसे समय में राहुल गांधी ने खुद को नए तौर-तरीकों से मांजना शुरू कर दिया है। भारत जोड़ो यात्रा के गर्भ में उनकी राजनैतिक दिशा, जवान हो रही है। मैं कत्तई उन्हें चमत्कारिक नायक नहीं गढ़ने जा रहा। यह जानता हूं कि यह वही राहुल हैं, जो भारतीय वर्णवादी खाल को भले न पहनते हों, पर टांगे चलते हैं। कभी ब्राह्मण दिखने के लिए जनेऊ निकाल लेते हैं तो कभी माथे पर चंदन पोत लेते हैं। आज उनकी बहन प्रियंका गांधी, मध्य प्रदेश में कुछ ज्यादा ही धार्मिकता का चोला चढ़ाने लगी हैं। संभव है राहुल, भारतीय राजनीति के क्रांतिकारी पथ पर चलने की हिम्मत न जुटा पाए हों या उसकी अड़चनें वह जानते हों।

एक दूसरी सच्चाई हमारे सामने है। भारत जोड़ो यात्रा में जिस तरह वह आम जन के करीब जा रहे थे। किसी बच्चे को कंधे पर बैठाते, मल्लाहों की बस्ती में विचरते, समुद्र में छलांग लगाते या बारिश में भीगते, जनसमुदाय को संबोधित करते हुए खुद भीगते, यह फोटो शूट करने का तमाशा नहीं था।

वर्ष 2023 की कई घटनाएं मुझे गहरे तौर पर प्रभावित कर रही हैं। वह अपनी राजनैतिक आभा, नए-नए वस्त्रों को बदलकर, नहीं गढ़ रहे हैं। वह इतिहास का अध्ययन कर बदल रहे हैं। वह अपनी आभा आम जन के अनुरूप गढ़ रहे हैं।

दक्षिण अफ्रीका से लौटे गांधी, जिस तरह 1915 में पैंट, शर्ट, कोट और टाई को टांग देते हैं, घुटने तक की धोती में आ जाते हैं, राहुल गांधी भी अपनी यात्रा में कुछ-कुछ आमजन की तस्वीरों में बदलते दिख रहे हैं। अप्रैल 2023 में वह एकाएक दिल्ली के चांदनी चौक और बंगाली मार्केट में जाकर गोलगप्पे और चाट का आनंद लेते हैं। कर्नाटक में आम शहरी से हाथ मिलाते, आइसक्रीम खाने चले जाते हैं तो दिल्ली के मुखर्जी नगर में प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी में लगे युवक-युवतियों के बीच सड़क पर बैठ जाते हैं। उनके अनुभव सुनते हैं। राहुल गांधी के ये तौर-तरीके उन्हें सहज बना रहे हैं।

मई महीने में वह चण्डीगढ़ की यात्रा में ट्रक की सवारी करने लगे थे। एक डिलीवरी ब्वॉय के बाइक के पीछे बैठ कर सड़क पर घूमते देखे गए। जब जून में वह अमेरिका में थे, न्यूयार्क जाते समय एक ट्रक पर बैठ गए और चालक के अनुभव सुनते रहे। अभी हाल ही में राहुल गांधी दिल्ली विश्वविद्यालय के लड़कों के हॉस्टल में जा पहुंचे। वहां उन्होंने लड़कों के साथ हॉस्टल का खाना खाया और उनसे घंटों बतियाते रहे। 27 जून को रात 9.30 बजे, करोलबाग स्थित एक मोटर गैराज में जा पहुंचे और बाइक में पेचकस से स्क्रू कसने का अनुभव लेने लगे।

हर कहीं राहुल ने खुद को आम जन से जोड़ा है और उनके जीवन को करीब से देखने का प्रयास किया है। राहुल की गढ़ी गई पप्पू की छवि तार-तार हो चुकी है। जिस सहजता और बेतकल्लुफी से वह अमेरिका में पत्रकारों और एनआरआई के बीच अपनी बात रख रहे थे, उतनी सहजता से बातचीत करते फिलहाल किसी अन्य भारतीय राजनेता को नहीं देखा गया है।

देश की वर्तमान समस्याओं, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, साम्प्रदायिकता, आदि पर जिस तरह राहुल ने अपनी बात रखी है, लोक सभा में जिस चतुराई से सत्ता पक्ष को बेनकाब किया है, आने वाले दिनों में राहुल से देश की उम्मीदें बढ़ जाती हैं। बेशक वह राजनीतिक परिवार से आते हैं। आप उन्हें वंशपरंपरा के वाहक भी कह सकते हैं, मगर फिलहाल भारतीय राजनीति में भाजपा के प्रतिपक्ष में खड़ा होने वाले वह साहसी राजनेता के रूप में दिखाई देते हैं। अर्थशास्त्रियों के पक्ष को सुनना, शिक्षाविदों से ज्ञान प्राप्त करना और युवाओं से खुद को बार-बार जोड़ने का प्रयास करना, राहुल का अपनी संवेदना को मजबूत बनाना है।

राहुल ने अडानी-अम्बानी पर सवाल खड़े किए जबकि सच्चाई यह भी है कि अम्बानी साम्राज्य को यहां तक लाने में कुछ हाथ उनकी पार्टी का भी रहा है। छत्तीसगढ़ और राजस्थान की उनकी सरकार में आदिवासी हितों की अनदेखी होने पर भी वह, आदिवासियों के प्रश्न को उठा रहे हैं। अगर राहुल ने सचमुच अपने कांग्रेस के वर्ग चरित्र पर गंभीरता से विचार कर, उसे जनपक्ष धर बनाने का प्रयास जारी रखा, तो भविष्य उनका होगा। उन्हें सोचना होगा कि एक दक्षिणपंथी, कॉर्पोरेटपरस्त पार्टी का विकल्प दूसरी दक्षिणपंथी, कॉर्पोरेटपरस्त पार्टी नहीं हो सकती। 

वैसे जिस जड़ और ठस कांग्रेस को राहुल संवारने का काम कर रहे हैं, वहां मुश्किलें बहुत हैं। यही कारण है कि कई बार देर से राजनीतिक निर्णय लेने की विवशता, भाजपा के मुकाबले, कांग्रेस को पीछे धकेलती दिखाई देती रही है। कांग्रेस खुद को बदलने की प्रक्रिया में है। अब युवा कार्यकर्ताओं को स्थान मिलने लगा है लेकिन उत्तर प्रदेश और बिहार, दो बड़े प्रदेशों में कांग्रेस का वजूद, विस्तार नहीं पा रहा है। इसके लिए जिस लगन और परिश्रम की आवश्यकता है, वह कांग्रेस करती नहीं दिख रही है। एक तो खुद राहुल की भारत जोड़ो यात्रा इधर नहीं निकली है, दूसरे, उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी पिछले विधान सभा चुनाव के बाद कभी लखनऊ में देखी नहीं गईं हैं।

अब लखनऊ या पटना में कभी-कभार की सुगबुगाहट से कुछ बात बनने वाली नहीं है। पूरी तरह से जुटे बिना यहां कांग्रेसी आधार बनना इसलिए भी मुश्किल भरा काम है, क्योंकि यह जमीन जहां एक ओर बहुजन राजनीति के उभार की रही है, वहीं धार्मिक प्रचंडता की भी। यह सही है कि राहुल बहुजन संदर्भों और अल्पसंख्यकों की समस्याओं पर अपने विचार रख रहे हैं। वह नफरत को प्रेम से जीतने की राह पर हैं मगर जातियों में विभाजित समाज में प्रेम को पिरोना मुश्किल और श्रमसाध्य काम है, पर कठिन नहीं है।

राहुल चूंकि अपने चेहरे की चमक का ख्याल नहीं रखते हैं, तो इसलिए वह चाहें तो जोखिम उठा कर कांग्रेस को खड़ा कर सकते हैं। विपक्ष को एकजुट करने में भी उनकी बड़ी भूमिका होनी चाहिए। शायद वह इसलिए खुद को प्रधानमंत्री की कुर्सी का दावेदार नहीं मानते। वह लड़ने का माद्दा रखते हैं। सांसदी चली गई है। सुरक्षा का ताना-बाना कम हो गया है। वह आम जनता पर भरोसा रख रहे हैं और भारतीय राजनीति में उनकी धमक सुनाई देने लगी है।

(सुभाष चन्द्र कुशवाहा लेखक एवं इतिहासकार हैं।)

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