Wednesday, May 18, 2022

भारतीय पुनर्जागरण में महिलाओं का योगदान

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यह उस जमाने की बात है, जब भारतीय समाज में गाना-बजाना और नाच में लगी महिलाओं को नीची निगाह से देखा जाता था। तब अचानक कलकत्ता की एक बाई जी गौहर ज़ान ने घोषणा की कि हिंदुस्तान का वायसराय महीने में जितना पैसा कमाता होगा उतना तो मेरी रोज की आमदनी है। मशहूर लेखिका और वरिष्ठ पत्रकार मृणाल पांडे ने कुछ वर्ष पहले दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब हाल में आयोजित एक कार्यक्रम में बताया कि गौहर जान की यह आमदनी इतनी ज्यादा थी कि स्वयं गांधी जी ने उनसे कांग्रेस की मदद को कहा और गौहरजान राजी हो गईं। पर उन्होंने एक शर्त रखी कि वे अपनी एक दिन के शो की आमदनी कांग्रेस के कोष में दे देंगी मगर उस शो में गांधी जी को आना पड़ेगा। गांधी जी ने हां कह दी। पर उस कार्यक्रम में वे जा नहीं सके पर उन्हें वह कार्यक्रम और गौहर जान का वायदा याद रहा।

इसलिए कार्यक्रम के रोज उन्होंने कांग्रेस के एक कार्यकर्ता को भेजा कि जाओ गौहरजान से उस कार्यक्रम का पैसा ले आओ। कांग्रेस का कार्यकर्ता जब गौहरजान के पास पहुंचा तो गौहर जान ने कहा कि चूंकि गांधी जी ने स्वयं कार्यक्रम में आने का वायदा किया था पर वे नहीं आए इसलिए मैं इस कार्यक्रम का दो तिहाई पैसा ही दूंगी और बाकी का एक तिहाई अपने खर्चे का खुद रख लूंगी। 1930 में उस कार्यक्रम से 36 हजार रुपये की आमदनी हुई थी और गौहरजान ने 24 हजार रुपये कांग्रेस को दे दिए। मृणाल जी ने कहा कि आजकल वे उस समय की नाचनहारियों और गावनहारियों पर काम कर रही हैं उसी संदर्भ में उन्हें यह जानकारी मिली।

जब भी भारतीय रेनेसाँ की बात होती है हम सिर्फ पुरुष समाज के रेनेसाँ पर चर्चा करने लगते हैं हम भूल जाते हैं कि इसी समाज के समानांतर महिला समाज में भी तो नई चेतना का विकास हुआ होगा और उनके बाबत एक सन्नाटा खींच लिया जाता है। अंग्रेजों के आने के बाद से जो समुदाय सबसे ज्यादा तेज गति से आगे बढ़ा वह महिलाओं का ही था। महिलाओं ने खूब तरक्की की क्योंकि पुरुष समाज तो अंग्रेजों के आने के पूर्व भी समृद्ध था ही बौद्धिक रूप से भी और आर्थिक रूप से भी स्वतंत्र था पर महिलाओं की स्थिति बस परदा और आंगन तक सीमित थी। महिलाओं ने परदा छोड़ा और हर क्षेत्र में उन्होंने अपना नाम रोशन किया। न सिर्फ शिक्षा के क्षेत्र में बल्कि व्यावसायिक कुशलता के क्षेत्र में भी।

हम 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की एक प्रमुख योद्धा झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का नाम तो जानते हैं पर क्या यह जरूरी नहीं हो जाता कि उस दौर में ऐसी कितनी महिलाएं थीं जो अंग्रेजी शिक्षा ले रही थीं और व्यावसायिक शिक्षा ग्रहण कर रही थीं उन्हें भी याद किया जाए। पंडिता रमाबाई और सावित्री बाई फुले को भी याद करना चाहिए जिन्होंने अंग्रेजी शिक्षा ग्रहण की और बालिकाओं का विद्यालय खोला। इसी दौर में वाराणसी में भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र के कविता स्कूल में महिलाओं की भी भागीदारी थी मगर आज उनका कोई नामलेवा नहीं है। यह अलग बात है कि वे महिलाएं उस समय नाच-गाने वाले स्कूल से आई थीं और वे भारतेंदु बाबू तथा उनके स्कूल के अन्य कवियों की कविताओं का संगीतमय पाठ करती थीं।

भारतीय पुनर्जागरण की शुरुआत 18 वीं सदी से हुई जब 1757 में प्लासी की लड़ाई के बाद बंगाल की दीवानी लार्ड क्लाइव ने अपने हाथ में ले ली। नए भूमि कानूनों के चलते किसानों से फसल की लगान नगद ली जाने लगी और कृषि जोतों की पैमाइश नए तरीके से हुई। नतीजा यह हुआ कि खेती फायदे का काम नहीं रहा और किसान या तो गांव छोड़कर शहरों में आकर मजदूरी करने लगे अथवा नगदी फसलों के लिए अपनी जमीन रेहन रखने लगे। यानी कपास, नील और पाट या जूट की खेती शुरू हुई। इससे देश का औद्योगीकरण हुआ। कपास और पाट से कपड़े तथा बोरे व वारदाना बनाए जाने लगा। कलकत्ता में काटन व जूट की मिलें खुलनी शुरू हुईं। जिनमें मजदूरों की मांग बढ़ी। ये मजदूर गांव के किसान थे या शहरों के पेशेवर लोग। शहरों का विस्तार होना शुरू हुआ और गांव खाली होने लगे।

शहरों के विस्तार ने देश में अंग्रेजी शिक्षा का प्रसार किया जिसका नतीजा यह निकला कि भारतीयों में भी यूरोप के विकसित देशों के लोगों की तरह जनतांत्रिक चेतना विकसित हुई और असमानता व लैंगिक भेदभाव के खिलाफ जनमत बनने लगा। जातिप्रथा की नकेलें टूटने लगीं तो महिलाएं भी परदे और घर की चारदीवारी से बाहर निकलीं। यही वह दौर था जब महिलाओं ने अपनी शिक्षा के लिए संघर्ष शुरू किया और बंगाल में धार्मिक जकड़बंदी के खिलाफ महिलाएं तेजी से ब्राह्म समाज की तरफ खिंची। पर इसी बीच 1857 का स्वतंत्रता आंदोलन शुरू हो गया जिसे अंग्रेजों ने गदर या सिपाही विद्रोह बताया और भारतीयों ने इसे आजादी की लड़ाई का पहला चरण बताया।

तब अंग्रेजों ने अपनी कुटिल नीतियों से इस आंदोलन को तो दबा दिया मगर इसी के साथ ईस्ट इंडिया कंपनी का राज भी खत्म हो गया और भारत को सीधे ब्रिटेन की महारानी का प्रजा मान लिया गया और ब्रिटिश सरकार सीधे यहां का कामकाज देखने लगी। तब बहुत सारे वे कानून यहां भी लागू हुए जो अंग्रेज प्रजा को प्राप्त थे। इसका नतीजा यह हुआ कि देश में शहरी संस्कृति पनपी जो परंपरागत भारतीय किसान समाज से भिन्न थी और जिसमें जाति प्रथा की जकड़न नहीं थी तथा समाज के हर वर्ग के लिए तरक्की के रास्ते खुले थे। बाजार में जो भी चीज उपलब्ध थी उसकी मांग के अनुरूप कीमत आंकी जाने लगी।

ऐसी तमाम महिलाएं उस दौर में थीं जिन्होंने आजादी की लड़ाई में खुलकर योगदान किया। पर अपना स्थान बनाने के लिए महिलाओं को खूब जद्दोजहद करनी पड़ी। उस समय राजेंद्र बाला मित्र एक बड़ी लेखिका थीं पर चूंकि तब संभ्रांत घरों की महिलाएं न तो किसी लेखकीय सभा में जाती थीं न खुलकर अपने नाम से लेखनकार्य करती थीं। पर राजेंद्र बाला मित्र ने बंगवधू के नाम से खूब लिखा और आचार्य महाबीर प्रसाद द्विवेदी ने सरस्वती में उन्हें छापा भी। इसी तरह एक अज्ञात हिंदू महिला के नाम से लिखने वाली रमणी की असली पहचान तो आज तक किसी को पता ही नहीं चली।

1902 में जब कलकत्ता कोर्ट में दो महिलाएं प्रैक्टिस करने पहुंची तो बार के वकीलों ने उन्हें बैठने तक नहीं दिया। इसके पहले पंडिता रमाबाई को ऊँची डिग्री हासिल करने के लिए ईसाई धर्म अपनाना पड़ा क्योंकि हिंदू रहते उनकी ऊँची पढ़ाई संभव नहीं थी। माली जाति की सावित्री बाई फुले ने जब अपना कन्या विद्यालय शुरू किया तो संभ्रांत हिंदू परिवार अपनी लड़कियों को विद्यालय भेजते ही नहीं थे पर वे लगातार लगी रहीं और इसका नतीजा है कि आज भारतीय महिलाएं हर क्षेत्र में अव्वल हैं।

(शंभूनाथ शुक्ल वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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