Sunday, May 29, 2022

झारखंड: अदालती आदेश के दो महीने बाद भी मजदूर संगठन समिति के कार्यालय से नहीं हटायी गयी सील

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रांची। “केन्द्र की मोदी सरकार ने मजदूरों के संघर्षों और बलिदानों के बल पर बने 44 श्रम कानून को समाप्त करके 4 लेबर कोड बना दिया है, जिससे मालिक वर्गों को मजदूरों के श्रम और अधिकारों को लूटने की खुली छूट मिल जा रही है, तथा मजदूरों को उद्योगों में कार्यस्थल पर बंधुआ मजदूर बनने पर विवश कर दिया जायेगा।” यह मानना है मजदूर संगठन समिति के केंद्रीय संयोजक बच्चा सिंह का।

दरअसल मजदूर संगठन समिति (एमएसएस) को पिछली 22 दिसंबर, 2017 को झारखंड की तत्कालीन भाजपा नीत रघुवर दास सरकार ने भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) का अग्र संगठन बताकर प्रतिबंधित कर दिया था।  

अब चार साल बाद पिछली 11 फरवरी, 2022 को रांची उच्च न्यायालय के न्यायाधीश चन्द्रशेखर ने मजदूर संगठन समिति पर लगे प्रतिबंध को यह कह कर निरस्त कर दिया कि कोई भी ऐसा सबूत झारखंड सरकार के द्वारा पेश नहीं किया गया, जिसके हिसाब से मजदूर संगठन समिति को भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) का अग्र संगठन माना जाए, न ही कभी कोई ऐसी शिकायत दर्ज हुई थी, जिससे ये पता चले कि मजदूर संगठन समिति किसी भी प्रकार की चरमपंथी गतिविधि या अराजकता में शामिल है। न्यायालय ने साथ-साथ ये नाराजगी भी जताई कि सरकार ने इस मामले में पूरी तरह से गैर-जिम्मेदाराना रवैया अख्तियार किया है।  

 गोष्ठी कार्यक्रम में मजदूर यूनियन के कार्यकर्ताओं ने कहा कि मोदी सरकार ने उदारीकरण, निजीकरण, भूमण्डलीकरण की नीतियों पर चलकर सभी सार्वजनिक उपकरणों एवं बैंक, बीमा सहित जल, जंगल, जमीन व खनिज सम्पदा को अपने चहेते मित्र अडानी-अम्बानी को सौंप देना चाह रही है। केन्द्र और राज्य की सरकारें देश में भयंकर रूप से बढ़ रही महगाई, बेरोजगारी को रोक लगाने में नाकाम साबित हो रही हैं। देश भर में मजदूरों की छंटनी लगातार हो रही है। ठेका प्रथा में काम कर रहे मजदूरों को सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी व अधिकार नहीं दिये जा रहे हैं।

देश के नौजवानों को रोजगार के लिए अन्य राज्यों में दर-दर की ठोकरें खानी पड़ रही है, दूसरी ओर जनता के जीवन स्तर से जुड़ा पेट्रोल, डीजल सहित खाद्य सामग्री, बच्चों की पढ़ाई, दवाई आदि काफी महंगी होती जा रही है। ऐसी स्थिति में देश एवं राज्यों के लड़ाकू मजदूर यूनियनों की जिम्मेवारी काफी बढ़ जाती है तथा सभी मजदूर संगठनों को एकजुट होकर मेहनतकश वर्गों के ऊपर फासीवादी सरकार द्वारा चलाये जा रहे चौतरफा हमलों के खिलाफ संघर्ष को आगे बढ़ाते हुए साम्राज्यवादी लूट व शोषण-शासन की नीतियों को ध्वस्त करने और शोषणमुक्त समाज बनाने के संघर्षो को आगे बढ़ाने की ओर अग्रसर होना होगा। 

 इस अवसर पर बच्चा सिंह ने बताया कि मजदूर संगठन समिति पर से उच्च न्यायालय द्वारा प्रतिबंध निरस्त किये जाने का आज 65 वां दिन हो गया, परन्तु आज भी संगठन के कार्यालय का सील, श्रमजीवी अस्पताल का सील, कार्यकर्त्ताओं का बैंक खाता एवं कार्यकर्त्ताओं पर लगाये गए फर्जी मुकदमे अभी तक समाप्त नहीं किये गये हैं। झारखण्ड की हेमंत सोरेन सरकार में उच्च न्यायालय के फैसलों की धज्जियां उड़ायी जा रही हैं। झारखण्ड के मुख्य सचिव को संगठन पर से प्रतिबंध वापस होने के बाद दो बार आवेदन व रिमाईंडर दिया गया, इसके बावजूद मुख्य सचिव चुप्पी साधे हुए हैं। 

कार्यक्रम में हेमंत सोरेन सरकार से मजदूर अधिकार संगठन, एटक, सीटू, एक्टू सहित तमाम जनवाद प्रेमी साथियों ने मजदूर संगठन समिति के कार्यकर्ताओं पर लगाये गये फर्जी मुकदमे बैंक खाता, कार्यालय के सील को अविलम्ब हटाने की मांग की है।

बताते चलें कि 1989 में धनबाद के वरिष्ठ अधिवक्ता सत्यनारायण भट्टाचार्य द्वारा बिहार श्रम विभाग में एक ट्रेड यूनियन पंजीकृत कराया गया था, जिसका नाम रखा था मजदूर संगठन समिति जिसका पंजीकरण संख्या 3113 / 89 मिला। प्रारंभ में इस मजदूर यूनियन का कार्यक्षेत्र सिर्फ धनबाद जिला था। धनबाद जिले के कतरास के आस-पास में बीसीसीएल के मजदूरों के बीच इसकी धमक ने जल्द ही इसे लोकप्रिय बना दिया। इसका प्रभाव धनबाद के अगल-बगल के जिलों पर भी पड़ा और जल्द ही यह मजदूर यूनियन तेजी से फैलने लगा।  2000 ईस्वी में बिहार से झारखंड अलग होने के बाद तो मजदूर संगठन समिति दिन दूनी रात चौगुनी की रफ्तार से मजदूरों के बीच अपनी लोकप्रियता हासिल किया और इसका फैलाव अन्य क्षेत्रों में होने लगा।

स्थिति यह हुई कि संगठन ने राज्य में तमाम तरह के मजदूर विरोधी कार्यों का जमकर विरोध किया, सरकार की हर जन विरोधी नीतियों का खुलकर विरोध किया, माओवाद का आरोप लगाकर पुलिस द्वारा आदिवासियों की की जा रही हत्याएं व फर्जी मुठभेड़ का विरोध किया, नतीजा यह हुआ कि 22 दिसंबर, 2017 को झारखंड की तत्कालीन भाजपा नीत रघुवर दास सरकार ने भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) का अग्र संगठन बताकर मसंस को प्रतिबंधित कर दिया था।  

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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