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Categories: बीच बहस

न्याय होते हुए दिखना भी चाहिए योर ऑनर!

ऐसा प्रतीत हो रहा है कि देश की न्यायपालिका शनि की साढ़ेसाती से प्रभावित है। एक के बाद एक कई चीफ जस्टिस आए और गए, लेकिन न्यायपालिका की छवि सुधरने के बजाय और धूमिल होती चली गई।

2019 में एक के बाद एक आए फैसलों से न्यायपालिका जनता की नजरों में अपनी छवि नहीं सुधार पाई। कहा जाता है कि न्याय होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए, लेकिन कई मामलों में देश को न्याय होते नहीं दिखा। स्थिति की गम्भीरता का अंदाजा इसी से समझा जा सकता है कि उच्चतम न्यायालय के पूर्व जज जस्टिस कुरियन जोसेफ को कहना पड़ा कि देश के सभी संवैधानिक संस्थान विश्वसनीयता संकट का सामना कर रहे हैं।

कोच्चि में 28 दिसंबर को आयोजित अखिल भारतीय अधिवक्ता संघ के 13वें राष्ट्रीय सम्मेलन में, “वर्तमान युग में भारतीय संविधान के सामने चुनौतियां” विषय पर सेमिनार का उद्घाटन करते हुए जस्टिस कुरियन जोसेफ ने कहा कि ऐसी स्थिति को दस-पंद्रह साल पहले भी नहीं समझा जा सकता था।

उनके अनुसार, एकमात्र उदाहरण जहां न्यायपालिका आंतरिक आपातकाल के दौरान लोगों की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाई और देश को इसके परिणाम भुगतने पड़े। जस्टिस कुरियन जोसेफ ने कहा कि प्रत्येक भारतीय की पवित्र पुस्तक भारतीय संविधान थी और यह वह संविधान था जिसने देश को एक साथ जोड़ा, जो धर्मों, भाषाओं, बोलियों और जातीयताओं में विविधतापूर्ण था।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लेख करते हुए जस्टिस जोसेफ ने कहा कि संविधान भारत के सभी क्षेत्र में हर व्यक्ति के लिए लागू था और संविधान ने उन लोगों का भी ध्यान रखा जो बाहर से भारत आए।

वैसे तो न्यायपालिका का प्रदर्शन हाल के वर्षों में संविधान और कानून के शासन के लिहाज़ से अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहा है। 2019 में न्यायपालिका संवैधानिक नैतिकता और वैधता के प्रति नरेंद्र मोदी सरकार के उपेक्षा भाव का खामियाजा झेल रहे लोगों के पक्ष में खड़े होने में विफल रही है।

इन विफलताओं में सबसे आगे रहा है उच्चतम न्यायालय, जो न केवल विश्वसनीयता के संकट से जूझता रहा है, बल्कि तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई पर उनकी ही एक महिला स्टॉफ द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों पर वही मुजरिम, वही मुंसिफ की तर्ज़ पर उच्चतम न्यायालय ने कार्यस्थल पर महिला उत्पीड़न में दिए गए अपने ही विशाखा दिशा निर्देशों की धज्जियां उड़ा दीं।

इसमें षड्यंत्र की थ्योरी डालने के लिए एक शिखंडी को भी खड़ा किया गया और उससे हलफनामा लेकर जस्टिस पटनायक जांच कमेटी बनाई गई, जिसने षड्यंत्र की थ्योरी को सिरे से ख़ारिज कर दिया। पूरा देश इंतजार करता रह गया कि झूठा हलफनामा देने वाले पर उच्चतम न्यायालय ने क्या कार्रवाई की, लेकिन आज तक पता नहीं चला।

यही नहीं उच्चतम न्यायालय  के रजिस्ट्रार सूर्य प्रताप सिंह ने विवादास्पद ‘अनुशासनात्मक जांच’ का संचालन किया था, जिसके परिणामस्वरूप उस जूनियर कोर्ट असिस्टेंट को बर्खास्त कर दिया गया, जिसने जस्टिस गोगोई पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। दरअसल रजिस्ट्रार सूर्य प्रताप सिंह से चीफ जस्टिस रंजन गोगोई का पूर्व संबंध रहा है और वे उनके चहेते रहे हैं।

जस्टिस गोगोई पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश थे तो सूर्य प्रताप सिंह वहां तैनात थे। जब जस्टिस गोगोई उच्चतम न्यायालय में चीफ जस्टिस बनकर आए तो उन्होंने सूर्य प्रताप सिंह को उच्चतम न्यायालय में बुला लिया। ऐसे में पीड़िता के विरुद्ध आन्तरिक जांच कहीं से निष्पक्ष नहीं थी।

अधिकांश मामलों में न्यायपालिका राष्ट्रवादी मोड में नजर आई। अर्थात न्यायपालिका मोदी सरकार का पक्ष लेते दिखी, जिसके लिए न्यायपालिका सरकार और उसकी एजेंसियों को ढील देने के लिए लचर दलीलों का इस्तेमाल करती नज़र आई, जबकि ज़्यादातर एजेंसियां न्याय के मान्य सिद्धांतों की हदों को तोड़ते हुए काम कर रही थीं, जिससे न केवल संविधान बल्कि कानून के शासन की अवधारणा को चोट पहुंची।

ये रवैया भारत की उच्चन्यायालय के उन वरिष्ट न्यायाधीशों का रहा, जिन्हें चुन-चुन कर ऐसे मामलों की सुनवाई सौंपी गई जो सरकार की परेशानी का कारण बन सकते थे। यह सब चीफ जस्टिस के मास्टर ऑफ़ रोस्टर की भूमिका से संभव हुआ।

पांच महीने हो गए हैं, जबसे जम्मू-कश्मीर के लोग इंटरनेट से वंचित हैं। पत्रकार इंटरनेट बंद होने से बेरोजगार हो गए हैं। वहां मीडिया को भारी पाबंदियों के बीच काम करना पड़ रहा है। इंटरनेट पांच अगस्त को बंद किया गया था, जब मोदी सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 370 को अप्रभावी बनाते हुए जम्मू कश्मीर का विशेष दर्जा छीन लिया था।

तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों फारूक़ अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती समेत दर्जनों वरिष्ठ नेता अस्थायी जेलों में कठोर सार्वजनिक सुरक्षा कानून के तहत समय काटने को मजबूर हैं, क्योंकि सरकार मानती है कि उन्हें मुक्त करने से भारत के सुरक्षा हितों को नुकसान पहुंच सकता है।

न्यायपालिका का कश्मीर पर रवैया संविधान नहीं राष्ट्रवादी मोड में है, जो बेहद चिंताजनक है। जम्मू कश्मीर के विशेष दर्जे को निरस्त किए जाने की संवैधानिक वैधता का मुद्दा उच्चतम न्यायालय के पांच जजों की संविधान पीठ के सामने लंबित पड़ा है।

जम्मू कश्मीर में लॉकडाउन के दो महीने बीतने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता संबंधी याचिकाओं का अंबार लग जाने के बाद एक अक्टूबर को उच्चतम न्यायालय  ने 70 दिनों बाद 10 दिसंबर को याचिकाओं पर सुनवाई शुरू की। यही नहीं कश्मीर के एक 65 वर्षीय राजनीतिक बंदी की प्रयागराज के नैनी जेल में मौत हो जाने पर भी न्यायपालिका ने कोई कदम उठाने की जरूरत नहीं समझी

सार्वजनिक सुरक्षा कानून के तहत हिरासत में रखे गए गुलाम मोहम्मद भट्ट उन 300 राजनीतिक कैदियों में से एक थे, जिन्हें पांच अगस्त के बाद कश्मीर से बाहर हिरासत में रखा गया था। आगामी नौ जनवरी को उनकी हिरासत की अवधि पूरी होने वाली थी, लेकिन जेल में ही उन्होंने दम तोड़ दिया।

इसी तरह नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली कई याचिकाएं उच्चतम न्यायलय में दायर हो चुकी हैं। एक पूर्व जज समेत कई कानूनविदों ने भारत के तीन पड़ोसी देशों के अल्पसंख्यकों को धर्म के आधार पर नागरिकता देने वाले नए कानून को ‘असंवैधानिक’ बताया है। पर उच्चतम न्यायालय को अभी तक इस मामले में कोई तात्कालिकता नज़र नहीं आई है और उसने मामले की अगली सुनवाई की तिथि 20 जनवरी निर्धारित कर दी है।

उत्तर प्रदेश सहित एक-एक कर विभिन्न राज्य धारा 144 लागू करते गए, इंटरनेट बंद करते गए, पुलिस को प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने और गिरफ्तार करने का आदेश देते गए, पर न्यापालिका की जड़ता नहीं टूटी है। भाजपा शासित उत्तर प्रदेश और कर्नाटक राज्यों की पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी की, और देश भर में अब तक कम-से-कम 25 लोगों की जान जा चुकी है। मृतकों में उत्तर प्रदेश के वाराणसी का एक आठ वर्षीय बच्चा भी शामिल है।

पुलिस की बर्बरता के अनेकों वीडियो सामने आ चुके हैं, जिनमें पुलिसकर्मियों को मुस्लिम बहुल इलाकों में घरों में घुसते, लूटपाट और तोड़फोड़ करते, पुरुषों की पिटाई करते, महिलाओं और बच्चों के साथ दुर्व्यवहार करते, सड़कों पर मनमाने ढंग से लोगों को हिरासत में लेते, अस्पतालों में धावा बोलते या विश्वविद्यालय परिसरों के बाहर गोलीबारी करते हुए देखा जा सकता है। दिल्ली हाईकोर्ट और उच्चतम न्यायालय में कई याचिकाएं दायर होने के बावजूद न्यायपालिका द्वारा सरकार या पुलिस से कोई सवाल नहीं पूछा गया है।

ऐसा नहीं है कि 2019 में न्यायपालिका विफल ही रही। तमाम मामलों में न्यायपालिका ने सकारात्मक फ़ैसले भी सुनाए। गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने असम में इंटरनेट सेवाओं को बहाल करने का आदेश तब दिया जब किसी अन्य राज्य या अदालतों ने ऐसा करने के बारे में सोचा भी नहीं था। मद्रास उच्च न्यायालय ने समाज में बढ़ती मॉरल पुलिसिंग के बीच कहा कि किसी अविवाहित जोड़े का होटल के एक कमरे में ठहरना कोई अपराध नहीं है।

कर्नाटक उच्च न्यायालय ने धारा 144 के तहत तीन दिन के प्रतिबंध आदेश के लिए राज्य पुलिस और सरकार को कड़ी फटकार लगाई और कहा कि वह अनुच्छेद 14 के तहत कोई मनमाना या अनुचित आदेश नहीं दे सकती है। अदालत ने इंटरनेट प्रतिबंध को ‘भाषण की स्वतंत्रता का उल्लंघन’ क़रार दिया।

फ़िलहाल वर्ष 2020 के सामने ढेरों चुनौतियां हैं। भारत के 47वें मुख्य न्यायाधीश के पद की शपथ लेने से कुछ ही दिन पहले जस्टिस एसए बोबडे ने देश भर की उम्मीदों को बढ़ाने वाली बात की थी कि वे अपने पूर्ववर्ती जस्टिस रंजन गोगोई से अलग (बेहतर) साबित होंगे।

जनवरी में नागरिकता संशोधन अधिनियम की संवैधानिकता का परीक्षण होना है। साथ ही कि राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर यानी एनआरसी और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) का पेच भी सुलझाना पड़ सकता है। सबरीमाला पर भी सुनवाई और फ़ैसला लंबित है जो न्यायपालिका के सामने ‘समानता के अधिकार’ को स्थापित करने के मार्ग में एक बड़ी चुनौती होगी।

कश्मीर के नागरिकों को भी न्यायपालिका के निष्पक्ष फ़ैसले का इंतज़ार है। इसके अलावा न्यायपालिका पर भारत की स्वायत्त जांच एजेंसियों की साख बचाने का दारोमदार भी है। वर्ष 2019 में न्यायपालिका का जो भी रवैया रहा हो, उम्मीद है कि वर्ष 2020 में वह स्वतंत्र और निष्पक्ष रहेगी।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार होने के साथ कानूनी मामलों के जानकार भी हैं।)

This post was last modified on January 3, 2020 3:25 pm

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