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Categories: बीच बहस

नेताजी सुभाष चंद्र बोस : राजनेता और विचारक

आज़ादी के बाद के दशकों में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की एक रूढ़ छवि गढ़ दी गई। एक सेनानायक की छवि। सैनिक वेश-भूषा में, बूट पहने, सावधान की मुद्रा में खड़े, सुभाष चंद्र बोस की छवि। यह छवि किसने गढ़ी, क्यों गढ़ी, ये सवाल उतने महत्वपूर्ण नहीं हैं, जितना यह कि आखिर क्यों आज़ादी के बाद की पीढ़ियों ने नेताजी की इस रूढ़ और भ्रामक छवि को जस-का-तस स्वीकार कर लिया। इस रूढ़ छवि का फायदा, आज वे राजनीतिक दल और संगठन उठाते हैं, जिन्होंने न तो राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लिया और न ही उनके पास कोई राष्ट्रीय नायक है।
जाहिर है कि सुभाष बाबू की सेनानायक वाली यह छवि रोमांचित करने वाली तो है, पर यह विचार, चिंतन के लिए कोई जगह नहीं छोड़ती। कहने की जरूरत नहीं कि विचारहीन-चिंतन रहित इस रूढ़ छवि के प्रचार से, नेताजी के वैचारिक पक्ष को, समाजवादी विचारधारा के प्रति उनके रुझान को और उनके सांप्रदायिकता के विरोध की, बड़ी आसानी से उपेक्षा की जा सकती है। 
सुभाष बाबू का नजरबंदी से फरार होना, अफगानिस्तान से होते हुए जर्मनी जाना, फिर वहाँ से जापान जाकर, रासबिहारी बोस और मोहन सिंह के साथ, भारतीय युद्धबंदियों को संगठित करके आज़ाद हिन्द फ़ौज का नेतृत्व करना, यह एक साहसिक दास्तान है। पर इस दास्तान में; “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा” की गूँज में, उस सुभाष चंद्र बोस को भुला दिया जाता है, जो राजनेता था, चिंतक था, विचारक था। नेताजी के विचारक पक्ष को जानना हो, तो कम-से-कम 1938 में, हरिपुरा कांग्रेस में दिया गया उनका अध्यक्षीय भाषण ही पढ़ लेना चाहिए। देश के सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक मसलों पर ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय राजनीति और वैश्विक मुद्दों की बारीक समझ और सुभाष बाबू की सुलझी हुई भावी दृष्टि का परिचायक है ये भाषण।
अपने इस भाषण में, नेताजी ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विश्वव्यापी ढांचे की कमियों और शक्तियों का विस्तृत विश्लेषण किया। इस अध्यक्षीय भाषण में आज़ाद हिंदुस्तान के सामाजिक-आर्थिक पुनर्निर्माण के लिए समतावादी दृष्टि भी है। जहाँ एक ओर नेताजी साम्राज्यवाद को खुली चुनौती देते हैं, वहीं इस बात पर भी ज़ोर देते हैं कि साम्राज्यवाद से संघर्ष का मतलब, साम्राज्यवादी देशों और उनकी जनता के प्रति किसी प्रकार की दुर्भावना या विद्वेष रखने की मनोवृत्ति से उबरना भी है।
उनके अनुसार उपनिवेशों का मुक्ति-संग्राम अवश्य ही, ब्रिटेन के पूंजीपति सत्ताधारी वर्ग के अस्तित्व पर चोट करेगा और ब्रिटेन में समाजवादी तंत्र की स्थापना का मार्ग प्रशस्त करेगा। उनका ये विश्वास था कि भारत और अन्य गुलाम देशों में जारी राजनीतिक स्वतंत्रता की लड़ाई, एक तरह से ब्रिटिश जनता की आर्थिक मुक्ति का संघर्ष भी है।उन्होंने यह बात भी कही कि ब्रिटिश भारत और देसी रियासतों की जनता की आकांक्षाएँ और आशाएँ एक-समान हैं और यह भी कि इनके बीच विभाजन पूरी तरह से ‘कृत्रिम’ है। उन्होंने अपने भाषण में अल्पसंख्यकों के साथ दलितों के भी मुद्दे उठाए, और धार्मिक, आर्थिक तथा राजनीतिक मुद्दों पर आपसी समझ और “जियो और जीने दो” की नीति को अपनाने की सलाह दी।
आज स्वतंत्र भारत में, वे लोग और संगठन जो नेताजी को अपना आदर्श बताते हुए भी, सांप्रदायिकता की ओछी राजनीति करने से बाज नहीं आते, वे बड़ी सुविधा से यह बात भुला देते हैं कि सांप्रदायिक सौहार्द्र और हिन्दू-मुस्लिम एकता नेताजी के लिए सर्वोपरि थी। उनके लिए हिन्दू-मुस्लिम एका, सिर्फ साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष के लिए ही नहीं, बल्कि आज़ाद हिंदुस्तान में स्वतंत्रता और बराबरी के लिए भी जरूरी थी।       

आज़ाद भारत के लोकतांत्रिक आधार के प्रति भी सुभाष बाबू सजग थे। उनका मत था कि “एक से अधिक दलों का अस्तित्व तथा कांग्रेस पार्टी का लोकतांत्रिक आधार ही भविष्य के हिन्दुस्तानी राज्य को अधिनायकवादी बनने से रोकेगा और फिर दल का लोकतांत्रिक आधार यह भी सुनिश्चित करेगा कि जनता पर नेता ऊपर से नहीं थोपे जाते, बल्कि नीचे से चुनकर आते हैं।”
आर्थिक-सामाजिक दृष्टि से भारत के पुनर्निर्माण के लिए और देश से गरीबी, अशिक्षा और बीमारी के उन्मूलन और उत्पादन और वितरण से जुड़ी समस्याओं को निबटाने के लिए सुभाष बाबू ने योजना-निर्माण और आर्थिक पुनर्रचना की समाजवादी पद्धति पर ज़ोर दिया। राष्ट्र-निर्माण की इस प्रक्रिया में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की महती भूमिका से भी बोस वाकिफ थे, और इसलिए उन्होंने ‘विज्ञान और राजनीति के बीच परस्पर व्यापक सहयोग’ की जरूरत बताई।
अक्तूबर 1938 में, नेताजी ने “राष्ट्रीय योजना समिति” के गठन की घोषणा की। 19 अक्तूबर 1938 को जवाहरलाल नेहरू को लिखे एक खत में, बोस ने लिखा “मुझे आशा है कि आप योजना समिति का अध्यक्ष बनना स्वीकार करेंगे। यदि इसे सफल बनाना है, तो आपको इसका अध्यक्ष बनना चाहिए।” उनका मानना था कि भारत का स्वाधीनता संघर्ष, सिर्फ़ ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध न होकर, विश्व साम्राज्यवाद के विरुद्ध था। वे कहते हैं कि भारत की आज़ादी की लड़ाई के सेनानी “महज भारत के लिए नहीं, बल्कि मानवता के लिए लड़ रहे हैं। भारत की मुक्ति का अर्थ है मानवता की रक्षा।” 

पर त्रिपुरी कांग्रेस में जिस तरह सुभाष बाबू के अध्यक्ष चुने जाने के बाद उन्हें अलग-थलग कर दिया गया, और कार्यकारिणी समिति के सदस्यों ने सहयोग के आश्वासन के बावजूद जिस तरह सामूहिक रूप से इस्तीफा दे दिया, वह राष्ट्रीय कांग्रेस के इतिहास में काले धब्बे की तरह है। इसके बावजूद अगर आप सुभाष चंद्र बोस, महात्मा गांधी और नेहरू के खत पढ़ें, जो नेताजी वांग्मय के अंतिम खंड में संकलित हैं तो आप पाएंगे कि असहमतियाँ होने के बावजूद, कांग्रेस नेतृत्व और उसकी कार्यप्रणाली को लेकर विचारों में गहरी दरार उभर आने के बावजूद, इन तीनों राष्ट्रीय नेताओं में कोई मनमुटाव नहीं था। याद रहे कि यह सब कुछ घटित होने के बावजूद ये सुभाष बाबू ही थे, जिन्होंने 6 जुलाई, 1944 को आज़ाद हिंद रेडियो पर दिये गए वक्तव्य में, महात्मा गांधी को पहली बार “राष्ट्रपिता” कहा था और उनसे हिंदुस्तान की आज़ादी की आखिरी लड़ाई के लिए और इस मुक्ति-संग्राम में विजय पाने के लिए आशीर्वाद मांगा था।                             

“नेताजी संपूर्ण वांग्मय”, शिशिर बोस और सुगत बोस द्वारा संपादित, 9 खंडों में, प्रकाशित किया गया है। इसमें सुभाष बाबू के भाषण, पत्र और उनकी दो पुस्तकों “द इंडियन स्ट्रगल” और उनकी आत्मकथा “एन इंडियन पिलग्रिम” के अनुवाद भी संकलित हैं। आने वाली पीढ़ियाँ, शिशिर बोस और कोलकाता स्थित ‘नेताजी रिसर्च ब्यूरो’ की कृतज्ञ रहेंगी, जिनके प्रयासों से नेताजी के भाषण, लेख, किताबें आज हमारे सामने हैं और आने वाले समय में भी हमें प्रेरणा देते रहेंगे।

(यह लेख रमाशंकर सिंह के फेसबुक पेज से साभार लिया गया है।)

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This post was last modified on January 23, 2020 1:01 pm

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