Tuesday, October 19, 2021

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किसानों और मोदी सरकार के बीच तकरार के मायने

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किसान संकट अचानक नहीं पैदा हुआ। यह दशकों से कृषि के प्रति सरकारों की उपेक्षा का नतीजा है। हम इस विशेष लेख माला में किसान मुद्दे पर 25 सितम्बर को आयोजित किये जा रहे भारत बंद के सिलसिले में विभिन्न आयाम की गहन चर्चा करेंगे। 

अर्थव्यवस्था

भारतीय अर्थव्यवस्था का एक कड़वा सच यह है कि ज्यादातर आबादी, जीविका के लिए कृषि और उससे जुड़ी गतिविधियों पर निर्भर है। लेकिन सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कृषि तथा संबंधित गतिविधियों का योगदान लगातार कम होता जा रहा है। उदारीकरण के दौर में खेतिहर आबादी की आमदनी अन्य पेशेवर तबकों की तुलना में बड़ी धीमी गति से बढ़ रही है। ज्यादातर किसान परिवार, जीविका का कोई अन्य विकल्प मौजूद न होने की स्थिति में खेती में लगे हैं। देश के अधिकतर किसान, सीमांत हैं।

उनकी जोत बहुत अधिक नहीं है। सरकारी कर्ज मिलने की मुश्किल के कारण अक्सर उन्हें भारी सूद पर महाजनों से उधार लेना पड़ता है। हर साल लगभग 12 हजार किसान अपनी जान दे देते हैं। भारत के करीब नौ करोड़ खेतिहर परिवारों में से करीब 70 फीसदी परिवार कमाई से अधिक, उपज की लागत पर करते हैं। एक दशक में कृषि क्षेत्र में बजट आवंटन में बढ़ोतरी तो हुई पर उसका लाभ किसानों के बजाय कृषि उत्पादों के कारोबारियों को मिल रहा है।

बजट 2020 

संसद ने पूरी दुनिया के कोरोना की चपेट में आ जाने के बाद 24 मार्च को वित्त विधेयक सभी दल के नेताओं की रज़ामंदी से बिना बहस के ही ध्वनि मत से पारित कर 2020-21 के केंद्रीय बजट पर भारतीय विधायिका का पूरा ठप्पा लगा दिया। बजट संसद में एक फरवरी को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पेश किया था जिसके कुछ प्रावधान तत्काल प्रभाव से लागू भी हो गये थे। बाकि बजट भी कुछ संशोधनों के साथ वित्त विधेयक पास हो जाने के साथ लागू हो गये। वित्त विधेयक पारित करने के बाद संसद को अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया गया। राज्य सभा ने भी इसे आनन-फानन में बिना चर्चा के लोकसभा को लौटा दिया। राज्य सभा में वित्त विधेयक पर मतदान का प्रावधान नहीं है। सांसद चाहते थे कि कोविड-19 से उत्पन्न स्थिति के कारण संसद का कामकाज वित्त विधेयक पारित होते ही स्थगित कर दिया जाये। वही हुआ भी।  

वित्त विधेयक में कर में संशोधन के प्रस्तावों को मंज़ूरी मिल गई, जिसमें अन्य बातों के अलावा निगमित कर में 15% की छूट दी गई है। विधेयक में आयकर अधिनियम के तहत “निवासी” की परिभाषा को बदल दिया गया है। पहले भारत का निवासी उसे ही समझा जाता था जिसके वैश्विक आय पर भारत में 182 दिनों से अधिक समय रहते कर लगाया जाता है। इस समय सीमा को घटाकर 120 दिन कर दिया गया। हाय तौबा मची तो वित्त मंत्रालय ने 2 फ़रवरी को ही स्पष्टीकरण जारी किया कि नए प्रावधान  उन भारतीय नागरिकों को कर के दायरे में लाने के लिये नहीं है जो विदेश में वैध तरीक़े से काम कर रहे हैं।

विधेयक में आयकर अधिनियम में 41 संशोधन किये गए जिनमें बेनामी परिसंपत्ति कारोबार प्रतिबंध अधिनियम (1988) में संशोधन भी है। 16वीं लोकसभा में 2018 में भी वित्त विधेयक ‘ गिलोटिन‘ के जरिये बिना किसी चर्चा के पास कर दिया गया था। बजट में अत्यंत विवादित नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर (एनपीआर) के लिए 13 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया। पर कोरोना से मुकाबला करने के लिये देश भर की मेडिकल सेवाओं के वास्ते 15 हजार करोड़ रुपये का ही प्रावधान किया गया जो इस आपदा से निपटने के केरल सरकार के बजटीय प्रावधान से भी कम था। 

सरकार ने वित्त विधेयक के जरिये चालबाजी से लगभग चुपके से पेट्रोल, डीजल पर 18 रुपया प्रति लीटर तक टैक्स और बढ़ाने की मंजूरी ले ली। पहले पेट्रोल पर अधिकतम 8 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 4 रुपये का अतिरिक्त उत्पाद कर लग सकता था जिसे क्रमश: 18 रुपये और 12 रुपये कर दिया गया। रोड एवं इन्फ्रास्ट्रक्चर सेस अधिकतम 8 रुपये प्रति लीटर लगाया जा सकता था जिसे बढ़ा कर 18 रुपये कर दिया गया। संसद भवन और प्रधानमंत्री की कोठी (सेंट्रल विस्टा) के नवनिर्माण के लिए 20 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान कर दिया गया। 

बजट का अंत्य-परीक्षण 

  1. फूड सब्सिडी 

आर्थिक विषयों के जानकार मुकेश असीम के अनुसार बजट में बताई संख्याओं का रत्ती भर भरोसा नहीं है। सब निराधार, झूठ, फ्रॉड हैं। पिछले साल ही काफी हद तक ऐसा हो चुका था। इस बार तो पूरी तरह हुआ। उदाहरण के लिये बजट में फूड सब्सिडी 1.84 लाख करोड़ रुपये घोषित था। पर यह असल में 1.08 लाख करोड़ रहा। जबकि फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया पर दो लाख करोड़ रुपये का बैंक कर्ज है। 

2.किसान मान धन

इसके नाम पर 75 हजार करोड़ किसानों के खाते में जाने का अनुमान था। पर गया 30 हजार करोड़ रुपये से भी कम। फिर भी मानधन के लिये 75 हजार करोड़ रुपया का प्रावधान कर दिया गया।

  1. आर्थिक विकास 

पिछले साल सरकार ने आर्थिक विकास में 24% वृद्धि के अनुमान पर बजट पेश किया पर जनवरी 2020 तक वृद्धि के बजाय कमी आ गई। इस बार फिर 12% वृद्धि का अनुमान दिखाया गया। जबकि अर्थव्यवस्था में मंदी बढ़ी। बीते साल विनिवेश से 16 हजार करोड़ रुपये ही प्राप्त कर पाई मोदी सरकार ने विनिवेश से 2.10 लाख करोड़ रुपये की आय का अनुमान दिखा दिया। 

4. फर्जी आय, फर्जी खर्च 

आय फर्जी है तो खर्च के लिए आवंटन भी फर्जी हैं। फूड सब्सिडी उसका उदाहरण है। इतने फर्जी आँकड़ों के बावजूद भी कुल खर्च 0.43% घटा। फर्जी बढ़ी आय के बावजूद भी शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला बाल कल्याण, दलित आदिवासी विकास आदि पर खर्च बढ़ाने की जो खबर गोदी मीडिया से प्रचारित की गई वह आँकड़ों की हेराफेरी है। आम जनता के लिए जो थोड़ा खर्च होता आया है उसमें भारी कटौती कर दी गई। बजट में खर्च घट गया फिर भी घाटा बढ़ गया है।

(चंद्रप्रकाश झा वरिष्ठ पत्रकार हैं। आप न्यूज़ एजेंसी यूएनआई में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं।)

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