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Friday, August 6, 2021

एक था बीकू: बेटे की याद में कॉमरेड येचुरी को याद आई महाकवि निराला की कालजई कविता

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नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में 1980 के दशक के प्रारंभ में पढ़ने वाले स्टूडेंट्स फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया (एसएफआई) के अधिकतर सदस्य छात्र-छात्राएं भी उनके माता-पिता की तरह उनके बचपन में उन्हें बीकू कहते थे। उनका औपचारिक नाम आशीष येचुरी था, ये जानकारी मुझे कोविड-19 महामारी से 22 अप्रैल, 2021 की सुबह को दिल्ली के पास हरियाणा के गुडगांव के मेदांता अस्पताल में हुई उनकी मृत्यु की खबर फैलने के बाद ही मिली।

आशीष येचुरी का जन्म 9 जून, 1986 को हुआ था। अल्प आयु में ही 22 अप्रैल, 2021 को उनकी मृत्यु हो गई। उन्होंने एसियन कॉलेज ऑफ़ जर्नलिज़्म (चेन्नई) से पत्रकारिता की पढ़ाई कर टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह और इंडिया टुडे समूह समेत कुछेक मीडिया संस्थानों के लिए कार्य किया था।

मैंने बीकू को गोद में खिलाया था। उनके पिता सीताराम येचुरी और माँ इंद्राणी मजूमदार एसएफआई के नेता रहे हैं। वे आशीष के जन्म के समय नई दिल्ली में संसद भवन के पास रफी मार्ग पर बने ‘वीपी हाउस‘ परिसर में सरकार द्वारा मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (सीपीएम) के सांसदों को मिले कमरों में से एक में एसएफआई दिल्ली के चले कार्यालय के बगल के कमरे में रहा करते थे।

कॉमरेड सीताराम येचुरी वहां से एसएफआई के राष्ट्रीय पदाधिकारी के रूप में उसकी पत्रिका ‘स्टूडेंट स्ट्रगल‘ का प्रकाशन शुरू कर चुके थे। कॉमरेड इंद्राणी मजूमदार, जनवादी महिला समिति (जेएमएस) में भी काम करने लगी थीं। वहीं  जेएमएस कार्यालय से वह उसकी भी एक पत्रिका निकालने लगी थीं। मैं उन पत्रिकाओं के प्रकाशन में सहयोग करता रहता था।

दोनों जेएनयू में मुझसे पहले के स्टूडेंट रहे थे। उसी दौरान दोनों के बीच प्रेम के बाद विवाह हुआ था। बहुत बाद में दोनों अलग हो गए और कॉमरेड सीताराम येचुरी ने बीबीसी की पूर्व भारत प्रमुख सीमा चिश्ती से दूसरा विवाह किया। बीकू का औपचारिक उप नाम पिता के उपनाम पर ही पड़ा। उनकी माँ, कॉमरेड सीताराम येचुरी से विवाह के पहले जो उपनाम लिखती थीं वही बना रहा। कॉमरेड इंद्राणी इन दिनों अपनी माँ वीणा मजूमदार द्वारा स्थापित ‘सेंटर फॉर वुमन्स डेवलपमेण्ट स्टडीज‘ (सीडब्ल्यूडीएस) में कार्यरत हैं। नई दिल्ली के गोल मार्केट में सीपीएम का मुख्यालय, एके गोपालन भवन और सीडब्ल्यूडीएस भवन अगल-बगल हैं।

वीपी हाउस परिसर में रहने वाले श्रमजीवी कॉमरेडों ने अपनी अबोध संतान के लालन-पालन के लिए वहीं पर एक छोटा सा पालना घर (क्रेच) खोल लिया था। इस पालना घर में बीकू ही नहीं एक्टिविष्ट शबनम हाशमी और मशहूर शायर गौहर रजा की भी संतान पली। बहुत बाद में सीपीएम के केन्द्रीय हिन्दी मुखपत्र ‘लोकलहर‘ के संपादक बने राजेन्द्र शर्मा और इस पार्टी की बुकशॉप संचालित करने वाली उनकी पत्नी वंदना शर्मा के पुत्र कबीर शर्मा (मट्टू) भी पले बढ़े।

मैंने जेएनयू के छात्र-जीवन में ही पत्रकारिता शुरू कर दी थी। मुझे पहली नियमित नौकरी समाचार एजेंसी यूनाईटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया (यूएनआई) में मिली, जिसका मुख्यालय 9 रफी मार्ग पर वीपी हाउस की बगल की कोठी में अभी भी है। अब सुरक्षा आदि कारणों से बहुत कुछ बदल चुका है। तब दोनों भवन के बीच दो-तीन फीट ऊंची दीवार होती थी।

मैँ अपनी ड्यूटी के दौरान ब्रेक में यूएनआई की स्टाफ कैंटीन में रियायती दर पर उपलब्ध ‘मद्रासी केसरी हलवा‘ खरीद कर बीकू, मट्टू और अन्य बच्चों को खिलाया करता था। कुछ केसरी हलवा खाने के चक्कर में किसी बड़े की मदद से दीवार पार कर मुझे ढूंढते हुए यूएनआई परिसर के भीतर आ जाते थे।  

कुछ दिन पहले मुझे आशीष येचुरी की तमिलनाडु के पक्षीविद और शौकिया चित्रकार मित्र गोकुला वर्धराजन द्वारा बनाया स्केच मिला। गोकुला वर्धराजन मेरे और अन्य साथियों के रांची में स्थापित अलाभकारी संगठन, पीपुल्स मिशन, द्वारा 15 अगस्त 2020 से प्रारंभ ‘क्रांतिकारी कामरेड शिव वर्मा मीडिया अवार्ड्स‘ के सोशल मीडिया ग्राफिक केटेगरी में पुरस्कार प्राप्त कलाकर्मी हैं।

मैंने ये स्केच पीपुल्स मिशन की तरफ से सुंदर फ्रेम में लगवा कर उसका एक-एक सेट आशीष के माता-पिता को भेंट करने का निश्चय किया। एसएमएस भेजने पर कामरेड सीताराम येचुरी से एके गोपालन भवन में 17 जून, 2021 को दोपहर बाद पाँच बजे मिलने का समय मिल गया।

मैंने उन्हे उनके कक्ष में वो स्केच भेंट कर कहा कि दूसरा सेट कामरेड इंद्राणी के लिए है। ये सुन वह बहुत भावुक हो गए। बहुत कम समय में कुछ और बातें भी हुईं।

मैं किसी भी सियासी पार्टी का सदस्य नहीं हूँ। लेकिन सबके पदाधिकारियों से बातचीत होती रहती है। हम सब आपसी सुख–दुख में मानवीय आधार पर पारस्परिक भेंट भी करते हैं। कामरेड सीता (हम उन्हें यही कहते हैं) से मेरा दशकों पुराना परिचय है। 

मूलतः तुलुगू- भाषी कामरेड सीताराम येचुरी को पुत्रशोक की व्यक्तिगत व्यथा में भी वृहत्तर सामाजिक सरोकार के अपने कर्तव्यबोध से महाकवि सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला की करीब सौ बरस पहले लिखी उस कविता की याद आना अचंभित करने वाला वाकया है। उन्होंने अधिकांश जीवन इलाहाबाद में रहे ‘निराला जी’ रचित इस कविता की कुछ पंक्तियाँ सुनाई। वह कविता सम्पूर्ण रूप में निम्नवत है :

नहीं मालूम क्यों यहाँ आया

ठोकरें खाते हुए दिन बीते।

उठा तो पर न सँभलने पाया

गिरा व रह गया आँसू पीते।

ताब बेताब हुई हठ भी हटी

नाम अभिमान का भी छोड़ दिया।

देखा तो थी माया की डोर कटी

सुना वह कहते हैं, हाँ खूब किया।

पर अहो पास छोड़ आते ही

वह सब भूत फिर सवार हुए।

मुझे गफलत में ज़रा पाते ही

फिर वही पहले के से वार हुए।

एक भी हाथ सँभाला न गया

और कमज़ोरों का बस क्या है।

कहा- निर्दय, कहाँ है तेरी दया,

मुझे दुख देने में जस क्या है।

रात को सोते यह सपना देखा

कि वह कहते हैं “तुम हमारे हो

भला अब तो मुझे अपना देखा,

कौन कहता है कि तुम हारे हो।

अब अगर कोई भी सताये तुम्हें

तो मेरी याद वहीं कर लेना

नज़र क्यों काल ही न आये तुम्हें

प्रेम के भाव तुरत भर लेना।

पीपुल्स मिशन के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर में शामिल रांची के अग्रणी चिकित्सक डॉक्टर राजचंद्र झा ने त्वरित अध्ययन कर जो जानकारी भेजी वह इस प्रकार है। 

महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने ‘कुल्ली भाट’ में लिखा था: मैं डालमऊ में गंगा के तट पर खड़ा था। जहाँ तक नज़र जाती थी गंगा के पानी में इंसानी लाशें ही लाशें दिखाई देती थीं। मेरे ससुराल से ख़बर आई कि मेरी पत्नी मनोहरा देवी भी चल बसी हैं।

मेरे भाई का सबसे बड़ा बेटा जो 15 साल का था और मेरी एक साल की बेटी ने भी दम तोड़ दिया था। मेरे परिवार के और भी कई लोग हमेशा के लिए जाते रहे थे। लोगों के दाह संस्कार के लिए लकड़ियाँ कम पड़ गई थीं। पलक झपकते ही मेरा परिवार मेरी आँखों के सामने से ग़ायब हो गया था। मुझे अपने चारों तरफ़ अँधेरा ही अँधेरा दिखाई देता था। अख़बारों से पता चला था कि ये सब एक बड़ी महामारी के शिकार हुए थे।

प्रथम विश्व युद्ध के लगभग तुरंत बाद भारत समेत पूरी दुनिया में फैली ‘स्पैनिश फ़्लू‘ महामारी से सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला जी की पत्नी मनोहरा देवी, भाभी, भाई, और चाचा की भी मृत्यु हो गई। परिवार में शेष बची उनकी पुत्री की भी कुछ समय बाद चल बसी।

बीकू कोई एक नाम उपनाम नहीं बल्कि प्रतीक है उन सारे लोगों और खास कर बच्चों का जिन्हें मानव समाज ने पिछले सौ बरस में अनेक महामारी में खोए हैं।

(चंद्र प्रकाश झा स्वतंत्र पत्रकार और पुस्तक लेखक हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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