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Categories: बीच बहस

सरकार साफ़ क्यों नहीं बताती कि भारत-चीन वार्ता की एक और कोशिश भी नाकाम रही?

शनिवार, 6 जून को लेह-लद्दाख के चुशुल-मोल्डो क्षेत्र में सीमावर्ती बैठक स्थल पर हुई लेफ़्टिनेंट जनरल स्तरीय बातचीत भी बेनतीज़ा ही रही। हालाँकि, राजनयिक दस्तूर को देखते हुए विदेश मंत्रालय ने ऐसा साफ़-साफ़ कहने से परहेज़ किया है। फिलहाल, ‘दोनों पक्ष विभिन्न द्विपक्षीय समझौतों के मुताबिक सीमा पर शान्ति क़ायम रखने के लिए सहमत हुए, क्योंकि ये आपसी सम्बन्धों के विकास के लिए आवश्यक है। बाक़ी सैन्य और राजनयिक बातचीत आगे भी जारी रहेगी।’

विदेश मंत्रालय के बयान से साफ़ है कि अभी तक ‘सहमति सिर्फ़ सीमा पर शान्ति क़ायम रखने’ की ही बनी है। चीनी सेना वापस अपनी अप्रैल वाली ‘पोज़ीशन्स’ पर लौटने के लिए सहमत नहीं हुई है। इसीलिए इसका कोई संकेत भी सावधानी से तैयार किये गये विदेश मंत्रालय के बयान में दिखता नहीं। बाक़ी लद्दाख की पैंगोंग झील से जुड़ी ‘8-फिंगर्स’ क्षेत्र में चीनी घुसपैठ के बाद वाली ‘तनावपूर्ण शान्ति’ तो क़ायम है ही, क्योंकि चीनी रवैये से भारतीय पक्ष सन्तुष्ट नहीं हुआ।

हालाँकि, दोनों देशों की सेनाओं के बीच चल रही बातचीत का ये 16 वाँ दौर था। इससे पहले, मेज़र जनरल स्तर पर तीन दौर और स्थानीय कमांडर स्तर पर 12 दौर की बातचीत हो चुकी है। पिछली कोशिशें नाकाम रहीं इसीलिए बातचीत का स्तर लगातार ऊँचा होता गया। लेकिन मौजूदा चुनौती एक बार फिर ये बता रही है कि बात चाहे चीन सीमा की हो या पाक सीमा की, लगता नहीं कि भारत सरकार ने तमाम पुराने अनुभवों से सबक लेने की कोई रणनीति तैयार की है।

भारत सरकार के लिए सोचने-विचारने की सबसे बड़ी बात तो ये होनी चाहिए कि चाहे कारगिल हो या डोकलाम या उत्तराखंड के कुछेक इलाके या फिर पैंगोंग झील की ताज़ा सरगर्मी, हर बार मुस्तैदी से अपनी जान पर खेलकर सीमा की चौकसी करने वाली हमारी सेना को दुश्मन की घुसपैठ की ख़बर बहुत देर से क्यों लगती है? क्योंकि ऐसा होता है कि सीमा के उस पार दुश्मन तमाम निर्माण कर लेता है, दस-बीस किलोमीटर का भारत की दावेदारी वाले हिस्से पर क़ाबिज़ हो जाता है, तब हमें इसकी ख़बर मिलती है। जाने क्यों, हमारा ख़ुफ़िया तंत्र बार-बार नाकाम ही रह जाता है?

भले ही ये महज इत्तफ़ाक़ हो, लेकिन बीजेपी के शासनकाल में ही ज़ोरदार घुसपैठ वाले यादगार वाकये ज़्यादा हुए हैं। कारगिल घुसपैठ के वक़्त वाजपेयी सरकार सत्ता में थी तो डोकलाम और पैंगोंग झील के वक़्त तो उनसे भी लाख दर्ज़े ज़्यादा प्रतापी बताये जाने वाली मोदी सरकार सत्ता में है। ये तो दुश्मन से ‘लाल आँखें करके’, ‘ईंट का जवाब पत्थर से’ और ‘बन्दूक का जवाब तोप से देने’ में निपुण है। आश्चर्यजनक ये भी है कि दुश्मन की ओर से ऐसा दुस्साहस उन राष्ट्र प्रेमियों के ज़माने में होता है जिन्हें दुश्मन के घर में घुसकर सर्जिकल हमला करने आता है।

सीमा और पड़ोसियों से जुड़ी सारी चुनौतियों का राजनीतिक पक्ष तो और भी दिलचस्प है। छह साल से देश काँग्रेसियों के दौर वाली उस रोती-गिड़गिड़ाती सत्ता से मुक्त है, जिसे मोदी सरकार का हर मंत्री अपने-अपने ढंग से कोसता रहता है। उसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री डॉ. जितेन्द्र सिंह बहुत गर्व से बताते हैं कि मौजूदा भारत-चीन सीमा तनाव ‘नेहरू की दोस्ती वाले दौर’ का नतीज़ा है। देश आज भी 1962 वाले भारत-चीन युद्ध का हश्र झेल रहा है।

साफ़ है कि नेहरू की परछाई, उनका भूत आज 58 साल बाद भी बीजेपी के पीछे पड़ा हुआ है। वो भी तब जबकि बीते छह साल में मोदी सरकार मौजूदा भारत को महान आर्थिक और सैन्य महाशक्ति बना चुकी है। अब वो बात अलग है कि चीन और पाकिस्तान को तो छोड़िए, हमारा सदियों पुराना शान्तिप्रिय पड़ोसी नेपाल भी हमें आँखें दिखा रहा है। मुमकिन है कि हमारे तमाम पड़ोसी हमसे तरह-तरह का मज़ाक़ कर रहे हों। ये भी मुमकिन है कि एक हितैषी पड़ोसी की तरह वो अपने ख़ास अन्दाज़ से हमारी तैयारियों और दावों की पोल खोलकर, हमें सावधान करना चाहते हों!

इससे पहले, 27 मई को केन्द्रीय संचार और क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने भी वीर-रस से ओतप्रोत अपनी चिर-परिचित शैली में बयान दिया था कि ‘नरेन्द्र मोदी के भारत को कोई आँख नहीं दिखा सकता’। ज़ाहिर है कि अब 130 करोड़ भारतवासियों को ये मान लेना चाहिए कि चीन, नेपाल और पाकिस्तान की तमाम हरकतें महज मज़ाक़ हैं या फिर सीमा पर लुका-छिपी का कोई दोस्ताना खेल चल रहा है।

और हाँ, भूलकर भी इस दोस्ताना को नेहरू वाले ‘हिन्दी-चीनी भाई-भाई’ से जोड़कर मत देखिएगा। वर्ना, सरकार ख़फ़ा हो जाएगी। मुमकिन है आपके ख़िलाफ़ झूठ और नकारात्मकता फैलाकर देश का संकल्प कमज़ोर करने का मामला दर्ज़ हो जाए, आपकी गिरफ़्तारी हो जाए और जमानत के बग़ैर आपको जेल में सड़ना पड़े। इसीलिए, देश-हित में सरकार की कथनी को ही उसकी करनी समझें।

अब सवाल ये है कि भारतीय सेना जब बार-बार लगातार ये देख रही है कि सीमा पर उसकी कड़ी चौकसी और पेट्रोलिंग के बावजूद दुश्मन सैकड़ों शिविर खड़े कर लेता है। उसके सैनिक आठ-दस किलोमीटर तक के इलाके पर घुसपैठ करके कब्ज़ा कर लेते हैं, महत्वपूर्ण चोटियों पर अपने बंकर बना लेते हैं, सड़कें बना लेते हैं, इसके बाद ही हमें क्यों पता चलता है? अरे, वो पेट्रोलिंग ही क्या जो 24 घंटे में एक बार भी नहीं हो! यदि आप कहीं महीने में एक चक्कर लगाते हैं तो उसे दौरा तो कह सकते हैं, पेट्रोलिंग नहीं, चौकसी भी नहीं। साफ़ है कि ये हमारा कमज़ोर पक्ष है। सेना को इसे दुरस्त करना ही होगा।

लेह-लद्दाख, सियाचिन और जम्मू-कश्मीर की पाक अधिकृत कश्मीर से नियंत्रण रेखा वाले इलाकों में बतौर रक्षा-संवाददाता जाने का मेरा निजी अनुभव भी रहा है। बेशक़, हमारा सीमान्त इलाका बहुत दुर्गम है, वहाँ की चुनौतियाँ विकट हैं। सेना से जितना बन पड़ता है, वो करती भी है। फिर भी सेना को हमारी राजनीतिक समस्या का दंश भी झेलना पड़ता है। इसीलिए वक़्त की माँग है कि सीमा की निगरानी के काम में सेटेलाइट के इस्तेमाल को ख़ूब बढ़ाना चाहिए। अंतरिक्ष से जुड़ी भारत की दक्षता को इसरो ने बड़ी बुलन्दियों तक पहुँचाकर दिखाया है। हमारे उपग्रहों ने मौसम के पूर्वानुमान से जुड़े विज्ञान का कायाकल्प करके दिखा दिया है। अब ‘आत्मनिर्भर’ काल में हमें सीमा की निगरानी के काम को भी ‘रिमोट सेंसिंग वाली उपग्रह तकनीक’ से जोड़कर दिखाने का बीड़ा उठाना चाहिए।

(मुकेश कुमार सिंह स्वतंत्र पत्रकार और राजनीतिक प्रेक्षक हैं। तीन दशक लम्बे पेशेवर अनुभव के दौरान इन्होंने दिल्ली, लखनऊ, जयपुर, उदयपुर और मुम्बई स्थित न्यूज़ चैनलों और अख़बारों में काम किया। अभी दिल्ली में रहते हैं।)

This post was last modified on June 8, 2020 8:40 am

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