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भारत में जनतंत्र हासिल करने का सफर अभी क्यों लंबा है? संदर्भ- अमेरिका का जार्ज फ्लायड हत्याकांड

अमेरिका के मिनेपोलिस शहर में काम करने वाले अफ्रीकी-अमेरिकन जार्ज फ्लायड की नृशंस हत्या और उसके विरुद्ध जिस तरह का राष्ट्रव्यापी-प्रतिरोध आज अमेरिका में देखा जा रहा है, उसे लेकर भारत के तमाम लोकतांत्रिक संगठनों, व्यक्ति-समूहों और व्यक्तियों में अब तक तीन तरह के विमर्श सामने आये हैं। अपने देश के बुद्धिजीवियों का एक हिस्सा हत्याकांड को अमेरिका में प्रभावी आज की दक्षिणपंथ की नस्लभेदी और नफ़रती राजनीति का नतीजा मान रहा है। उसका मानना है कि भारत में भी आज यही स्थिति है।

जिस तरह अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की अगुवाई में दक्षिणपंथी हावी हैं, उसी तरह प्रधानमंत्री मोदी की अगुवाई में यहां घोर दक्षिणपंथी और सांप्रदायिक तत्व सत्ता और समाज में प्रभावी हो गये हैं। इससे मुक्ति के लिए अमेरिका और भारत, दोनों को दक्षिणपंथ से किनारा करना होगा। इस विमर्श में अमेरिका के अफ्रीकी-अमेरिकन और अन्य अश्वेत लोगों की तुलना भारत के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय मुसलमानों से की जा रही है। इस तरह के विमर्श को मुखरित करने वालों में ‘उदार बौद्धिकों’ के अलावा वाम-रुझान के कुछ लेखक और टिप्पणीकार भी शामिल हैं।

दूसरे विमर्श को मुखर करने वाली देश की कुछ नामी-गिरानी हस्तियां ट्विटर और इंस्टाग्राम पर जार्ज फ्लायड की हत्या की तीखे शब्दों में निंदा कर रही हैं। इससे आगे की और कोई बात उनके दिमाग में नहीं है। इस मामले को वे भारतीय संदर्भों से जोड़ने की भी कोई कोशिश नहीं कर रहे हैं। वे बस अमेरिकी लोकतांत्रिक विमर्श से अपने को सम्बद्ध भर कर रहे हैं। उनके इस कदम से न तो किसी तरह के विवाद की गुंजाइश है और न ही किसी तरह के जोखिम की आशंका है। इसे मुखरित करने वालों में सिने अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा और करीना कपूर जैसे अनेक सेलिब्रिटी भी शामिल हैं।

तीसरा विमर्श भारतीय समाज के ‘बहुजन’ बौद्धिकों और सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं का है। इनका मानना है कि भारत में दलित-उत्पीड़ित समाज के लोगों की हैसियत और हालत अमेरिका के अश्वेत अफ्रीकी-अमेरिकन से भी बहुत ज्यादा गई-गुजरी है। इन उत्पीड़ित लोगों में पसमांदा मुस्लिम और अन्य अल्पसंख्यकों का बड़ा हिस्सा भी शामिल है। इस विमर्श के पैरोकार अन्य दोनों विमर्शों को गैर-गंभीर या गलत समझ पर आधारित बता रहे हैं।

इनमें ज्यादातर के पूर्वज और वे स्वयं भी इस तरह के भेदभाव के शिकार रहे हैं। ये सभी लोग जार्ज फ्लायड को अपना हिस्सा समझते हैं और उनकी नृशंस हत्या के शोक और रोष में अपने को शामिल मानते हैं। ऐसे लोगों में कई ऐसे युवा प्रवासी-भारतीय भी हैं, जो अमेरिका के विभिन्न क्षेत्रों में नौकरियां करते हैं, पढ़ते-पढ़ाते या शोध करते हैं। अमेरिका में उठ रही विरोध की आवाजों में उनकी आवाज भी शामिल है। इनके पास ठोस दलीलें भी हैं।

दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में समाज-तंत्र अध्ययन केंद्र के अध्यक्ष प्रो विवेक कुमार ने अचरज जताते हुए कहा, ‘ भारत के ऐसे उदारमना और गणमान्य लोग जो अमेरिका की घटना पर आज रोष प्रकट कर रहे हैं और वहां चल रहे आंदोलनों के प्रति अपना समर्थन जता रहे हैं, वो तो ठीक है। पर ऐसे लोगों की ‘दूर की नजर’ तो ठीक दिखती है पर ‘नजदीक की नजर’ को क्या हो जाता है? ऐसे तमाम लोग भारत में दलित और अन्य उत्पीड़ित लोगों के ऊपर ढाये जाने वाले जुल्मोसितम पर क्यों खामोश रहते हैं? अमेरिका की डेमोक्रेसी में वहां की पुलिस और शासन का बड़ा हिस्सा जार्ज फ्लायड की हत्या में अपने को दोषी महसूस करते हुए माफी मांग रहा है। पर हमारे यहां तो ऐसी तमाम हत्याओं पर शासन और पुलिस हत्यारों के साथ खड़े दिखते हैं। इसलिए यहां तो ज्यादा मुखर होकर विरोध की जरूरत है। पर वे यहां चुप रहते हैं!’

बीते चार-पांच दिनों से देश के कई बुद्धिजीवी, एकेडेमिक और कलाकार अमेरिका में चल रहे प्रतिरोध आंदोलन से अपनी एकजुटता दिखा रहे हैं। कुछ प्रमुख भारतीय सेलिब्रेटी, खासकर फिल्मी हस्तियों ने ट्विटर पर चल रहे वैश्विक-निंदा अभियान # BlackLivesMatter का हिस्सा बनते हुए इस अमेरिकी हत्याकांड और अश्वेतों पर आम अत्याचार की भर्त्सना की है। ऐसे लोगों पर सवाल उठाते हुए देश के एक प्रमुख दलित-मीडिया प्लेटफार्म ‘दलित दस्तक’ के संपादक अशोक दास कहते हैं, ‘ ये तमाम सेलिब्रिटीज भारत में दलितों-उत्पीड़ितों के जुल्मोसितम के वक्त क्यों सोई रहती हैं? यहां इन्हें कौन रोकता है?

क्या यहां इनकी आत्मा से अन्याय के खिलाफ आवाज नहीं उठती? इन जैसों के विरोध का एक और पहलू भी है कि प्रियंका चोपड़ा जैसी भारतीय अभिनेत्री जब हॉलीवुड में जाती हैं तो उसे भी अमेरिकी समाज में व्याप्त नस्ल और रंगभेद की बात समझ में आने लगती है, स्वयं भी झेलने को अभिशप्त होना पड़ता है। लेकिन भारत में जो लोग सदियों से यह सब झेलने को अभिशप्त हैं, वहीं प्रियंका चोपड़ा उनके बारे में खामोश रह जाती हैं क्योंकि भारत में वह स्वयं उत्पीड़ितों के समाज से नहीं हैं।’

यह समझना वाकई महत्वपूर्ण है कि अमेरिका में जार्ज फ्लायड की पुलिसिया-हत्या के खिलाफ उभरे जनाक्रोश में अश्वेत और श्वेत, सभी तरह के अमेरिकी शामिल हैं। जनाक्रोश की तीव्रता का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि वाशिंगटन स्थित ह्वाइट हाउस के सामने जब प्रदर्शनकारी तनिक उग्र होते दिखते हैं तो अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियां दुनिया के सबसे ताकतवार मुल्क के सबसे ताकतवर व्यक्ति यानी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके परिवार को आनन-फानन में राष्ट्रपति-निवास के एक गोपनीय बंकर में ले जाती हैं। कुछ छोटे समूहों की बेदिमाग-हिंसा को हम कत्तई जायज नहीं ठहरा रहे हैं।

पर सच ये है कि ट्रंप प्रशासन हत्या का विरोध कर रहे लोगों को समझाने और भरोसे में लेने में विफल साबित हुआ है। उनसे बेहतर पहल स्थानीय प्रशासन की तरफ से हुई है। मिनेसोटा प्रदेश के श्वेत पुलिस अधिकारी डेरेक शौविन को जार्ज की हत्या के जुर्म में हिरासत में लिया गया और उसके सहित तीन अन्य पुलिसकर्मी सेवा से बर्खास्त हुए। मियामी में तो स्थानीय पुलिस ने घुटने टेककर डेरेक के आपराधिक कदम के लिए आंदोलन कर रहे लोगों से माफी मांगी। लोगों ने वहां पुलिस के खिलाफ मोर्चे बंदी बंद भी की।

लेकिन अपने भारतीय जनतंत्र में दलितों-आदिवासियों या अल्पसंख्यकों  की स्थिति की तस्वीर देखिए। बिहार, गुजरात, दिल्ली(दंगे), आंध्र या छत्तीसगढ़, ज्यादातर राज्यों में दमन की एक सी तस्वीर है। राज्यों में उत्पीड़ित लोगों के हत्यारों को सत्ता का संरक्षण पाते देखा जाना आम बात है। बिहार के लक्ष्मणपुर बाथे, शंकरबिगहा और बथानी टोला सहित असंख्य हत्याकांड हैं, जिनमें उत्पीड़ितों के हत्यारों के बचाव में स्वयं शासकीय एजेंसियां, बड़े अफसरों और नेताओं के नाम सामने आये।(कोबरापोस्ट वृत्तचित्र, अगस्त,2015)। ऐसे ज्यादातर हत्यारे सवर्ण-सामंती पृष्ठभूमि के दबंग थे। गुजरात के दंगों के बाद भी ऐसा ही देखा गया। मुकदमों के समय हत्यारों को शासकीय एजेंसियों और अन्य संवैधानिक संस्थाओं में कार्यरत उसी तरह की सामाजिक पृष्ठभूमि के प्रभावशाली लोगों का संरक्षण मिला।

लक्ष्मणपुर बाथे का एक दृश्य।

अगर बारीकी से देखें तो दलितों और अन्य उत्पीड़ितों के दमन में शासन से लेकर समाज तक उन समुदायों के प्रति जिस तरह की हिकारत का भाव होता है, वह काफी हद तक अमेरिकी अश्वेतों के साथ वहां के नस्लवादी श्वेतों के भाव से मिलता-जुलता है। बीते कुछ वर्षों से मुसलमानों के साथ भी ऐसा ही भाव पैदा करने का अभियान चलाया जा रहा है। जो लोग नियमित रूप से दलितों-उत्पीड़ितों के दमन के विरुद्ध आवाज और सवाल उठाते रहे हैं, उनका बड़ा हिस्सा इन दिनों जेल में है या किसी न किसी तरह के फर्जी मुकदमों के अभियुक्त बनाये जा चुके हैं या अपनी अच्छी-खासी नौकरियों से हाथ धो चुके हैं या फिर सत्ताधारियों के निशाने पर हैं। अधिवक्ता और मानवाधिकार कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज, अधिवक्ता अरूण फरेरा, प्रो आनंद तेलतुंबड़े और पत्रकार व मानवाधिकार कार्यकर्ता गौतम नवलखा जैसे अनेक प्रमुख लोग हिरासत में हैं। इनके अलावा ऐसे दर्जनों लोग सत्ताधारियों की हिट लिस्ट में हैं। ऐसे तमाम मामलों को लेकर भारतीय समाज में कितना प्रतिरोध हुआ है?

विडम्बना ये है कि अपने देश में प्रतिरोध की संस्कृति का दायरा हाल के वर्षों में काफी सिमटा है। ये प्रतिरोध एक जानी-पहचानी मध्यवर्गीय सर्किल तक सीमित हैं। इसके आकार में ज्यादा इजाफा नहीं दिखता। इनके मुद्दों में इन दिनों अल्पसंख्यक-उत्पीड़न और सांप्रदायिकता के सवाल सबसे अहम हैं। निस्संदेह अपने देश में हाल के वर्षों में अल्पसंख्यक-उत्पीड़न बेतहाशा बढ़ा है। लेकिन प्रतिरोध का दायरा सिर्फ इसी एक मुद्दे तक सीमित होते जाने से दलित-आदिवासी और अन्य उत्पीड़ितों के मामलों पर मध्य वर्ग और उदार बौद्धिकों के बीच खामोशी को तर्क सा मिल गया है।

शंकरबीघा नरसंहार।

लगता है, मानो आज का फौरी एजेंडा सांप्रदायिक विद्वेष का मुकाबला करना भर है। नब्बे के दशक या उसके बाद भी लंबे समय तक ऐसा नहीं था। क्या यह आश्चर्यजनक नहीं कि कोरोना लॉकडाउन के भयावह दौर में मजदूरों की पीड़ा पर कविताएं और सोशल मीडिया पोस्ट तो बहुत लिखी गईं पर लाखों की सदस्यता वाली मजदूर यूनियनों ने भी इस बाबत कोई हस्तक्षेप नहीं किया!

वास्तविकता ये है कि कई राज्यों में वैध ढंग से एफआईआर न दर्ज किये जाने के बावजूद इस वक्त दलित और आदिवासियों पर अत्याचार के मामले लगातार और बेतहाशा बढ़ रहे हैं। (संदर्भ नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की रिपोर्ट-2017)। लाकडाउन और कोरोना-दौर में जिन मजदूरों की त्रासदी और मजूबरी भरी गांव-वापसी को प्रवासी-पलायन बताकर शासन और मीडिया में पेश किया गया, उसमें सबसे बड़े भुक्तभोगी दलित-आदिवासी, विपन्न ओबीसी और पसमांदा मुसलमान ही रहे हैं।

कोविड-19 से जिस अमेरिका में अब तक सबसे ज्यादा लोग मौत के शिकार हुए हैं और सबसे ज्यादा लोग संक्रमित हैं, वहां श्वेतों सहित हर समुदाय और हर उम्र के लोग जार्ज फ्लाय़ड़ की हत्या के खिलाफ सड़कों पर उतर आए। पर भारत बीते कई सप्ताहों से मजदूरों और उनके परिजनों की मौत (जो किसी हत्या से कम नृशंस नहीं है!) के सिलसिले का खामोश गवाह बना हुआ है। सिर्फ श्रमिक ट्रेनों की बदइंतजामी के चलते 80 मजदूरों की मौत हो गई। भूख और प्यास से बीमार हुई गुजरात की चली अरविना खातून की लाश बिहार के एक रेलवे स्टेशन पर उतारी गई। अपनी मां की मौत से अनजान उसके छोटे से बच्चे का वह हृदय विदारक चित्र भी दुनिया ने देखा, कैसे वह लाश के ऊपर पड़ी चादर को खींचते हुए अपनी मां को जगाने की कोशिश कर रहा है!

आनन-फानन में घोषित लाकडाउन ने 600 से अधिक मजदूरों की जान ली और बदइंतजामी के चलते हजारों को संक्रमण के खतरे की तरफ बढ़ाया। क्या इन घटनाओं और शासन की नीतियों के चलते घटित नृशंस कांडों का हमारे सामूहिक विवेक पर कोई असर पड़ा? इन गरीबों के मामले हमारी शीर्ष न्यायपालिका में कितने दिनों बाद सुने गए? हमारे समाज में उसकी क्या प्रतिक्रिया थी? क्या इन उत्पीड़ितों, जिनका बड़ा हिस्सा दलित-आदिवासी-पसमांदा-ओबीसी था, को लेकर सामूहिक विवेक की कोई अनुगूंज थी और क्या वह कहीं सुनी गई? ज्यादा पुरानी बात नहीं है, हमारे देश की शीर्ष कोर्ट ने एक बेहद चर्चित मामले में अभियुक्त को गुनहगार बताते हुए फांसी की सजा सुनाई और उक्त फैसले के पीछे भारतीय समाज के सामूहिक-विवेक या अंतःकरण के भाव को भी प्रेरक माना था।

—-इतना अंतर तो है ही अमेरिका और भारत में, इसके बावजूद कि कारपोरेट के भारी वर्चस्व के चलते अमेरिका और उसके कथित जनतंत्र को अनेक विख्यात अमेरिकी और यूरोपीय लोकतंत्रवादी विचारक भी सुसंगत-जनतंत्र नहीं मानते। पर भारत, पाकिस्तान या बांग्लादेश जैसे देशों के कथित जनतंत्र के साथ जब उसकी तुलना करते हैं तो अमेरिकी समाज जिंदादिल और तरक्की-पसंद नजर आता है। उस समाज के दामन पर रंगभेद के गहरे दाग़ अब भी हैं पर शायद उनका रंगभेद हमारी ब्राह्मणवादी-वर्णव्यवस्था के सामने कहीं नहीं ठहरता। रंगभेद के खिलाफ वहां सदियों की लड़ाइयों का इतिहास है। पर भारत में अगर दक्षिण के केरल और तमिलनाडु आदि जैसे कुछ इलाकों को छोड़ दें तो वर्ण व्यवस्था और सवर्ण-सामंती वर्चस्व के विरुद्ध समाज-सुधार की लड़ाइयां देश के बड़े हिस्से में नहीं लड़ी जा सकीं और इस तरह भारत संवैधानिक रूप से ‘जनतंत्र’ लागू करने के ऐलान के बावजूद एक समावेशी और जनतांत्रिक समाज में तब्दील नहीं हो सका।

हमारे देश की संविधान सभा के सिर्फ एक सदस्य ने इस बारे में भविष्य के सत्ता संचालकों को आगाह किया था। वह सदस्य थे-डॉ. भीम राव अम्बेडकर। उन्होंने  संविधान सभा के अपने आखिरी भाषण में 25 नवम्बर, 1949 को कहा, ‘ एक राष्ट्र के रूप में हम 26 जनवरी,1950 को अंतर्विरोधों के जीवन में दाखिल होने जा रहे हैं। राजनीतिक जीवन में समानता के कानून होंगे-एक व्यक्ति-एक वोट का सिद्धांत लागू होगा लेकिन सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमानता कायम रहेगी।

इसके चलते हम राजनीतिक जीवन में समानता के सिद्धांत या मूल्य का निषेध करते रहेंगे। इस अंतर्विरोध को हम कब तक जारी रखेंगे? अगर सामाजिक और राजनीतिक जीवन में व्याप्त असमानता को यथासंभव शीघ्र खत्म नहीं किया गया तो हमारा राजनीतिक लोकतंत्र नहीं बचेगा। असमानता से पीड़ित लोग उसके विध्वंस के लिए आगे आएंगे और लोकतंत्र की उस रचना को ही खत्म कर देंगे, जिसका निर्माण हमारी इस सभा ने इतने परिश्रम से किया है।’(संविधान सभा में डॉ. अम्बेडकर का आखिरी संबोधन, 25 नवम्बर,1949)।

डॉ. अम्बेडकर की वाजिब चिंता और भारत के राजनीतिक लोकतंत्र के बारे में सही आकलन के बावजूद चेतावनी की शैली में की गई उनकी भविष्यवाणी सही नहीं साबित हुई। सामाजिक आर्थिक असमानता से बुरी तरह पीड़ित भारत के आम लोगों ने बीते सत्तर सालों के दरम्यान अन्यायपूर्ण तंत्र को लगातार बर्दाश्त किया है। छिटपुट कोशिशें भले हुई हों पर अंतर्विरोध-ग्रस्त लोकतंत्र के ढांचे को ध्वस्त करने की व्यापक जनता ने कभी कोशिश नहीं की। शासक समूह ही ज्यादा से ज्यादा निरंकुश बनने के लिए इस ढांचे पर अलग-अलग समय पर हमला करते रहे हैं। यानी भारत एक लोकतंत्र के रूप में सिर्फ कागजों तक सिमटा हुआ है। इसीलिए आज तक वह यूरोप या यहां तक कि अमेरिकी लोकतंत्र की बराबरी की बात तो दूर रही, उसके आसपास भी नहीं पहुंच सका।

अमेरिकी समाज की और जो भी खामियां हों, वह भारत के सड़े हुए मनुवादी-वर्चस्व के वर्णवादी समाज से अपनी जिंदादिली और प्रतिरोध की संस्कृति के चलते बिल्कुल अलग है। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो अपने यहां सवर्णों का बौद्धिक हिस्सा भी उत्पीड़ित समाज के लोगों के जुल्मो-सितम के विरुद्ध अपने सजातीय या स-वर्णीय शक्तियों के खिलाफ नहीं खड़ा हो पाता। सकारात्मक कार्रवाई के बेहद साधारण संवैधानिक कदम भी उसे नागवार गुजरते हैं। वह खुलेआम उसे ‘मेरिट’ के विरुद्ध बताता है। लेकिन मूल संवैधानिक प्रावधानों के बगैर उच्च वर्ण के लोगों के लिए जब नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था होती है तो वह उसका विरोध करने की बात तो दूर रही, उसे जरूरी बताने में भी शर्म महसूस नहीं करता। इस बात पर भी उसे शर्म नहीं आती कि नौकरशाही, मीडिया और न्यायपालिका के शीर्ष पदों पर ही नहीं, विश्वविद्यालयों के कुलपतियों से लेकर प्रोफेसरों तक की सूची में भी सिर्फ कुछ ही वर्णों के लोग पदासीन नज़र आते हैं। निश्चय ही भारत का जनतंत्र हासिल करने का सफर बहुत लंबा है।

(उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं। और राज्यसभा टीवी के कार्यकारी संपादक रह चुके हैं। आप आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

This post was last modified on June 2, 2020 2:47 pm

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