Sat. Aug 24th, 2019

भारत में आधुनिक मानसिकता के निर्माण के लिए ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को तोड़ना जरूरी क्यों है?

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भले ही भौतिक साधनों और तकनीकी प्रगति के मामले में भारत एक आधुनिक देश दिखता हो, लेकिन मानसिक तौर पर अधिकांश भारतीय आज भी मध्यकालीन मानसिकता में जीते हैं। इसे उत्तर प्रदेश और गुजरात की हाल के अन्तर्जातीय विवाहों पर लोगों की प्रतिक्रिया से समझा जा सकता है। गुजरात में तो दलित प्रेमी की हत्या कर दी गई और उत्तर प्रदेश में दलित प्रेमी जान बचाते फिर रहा है। इन दोनों मामलों में दलित युवकों का अपराध यह है कि उन्होंने जाति व्यवस्था के पिरामिड के शीर्ष पर विराजमान उच्च जातियों की लड़की से प्रेम करने और शादी करने की जुर्रत की। पहले भी ऐसी बहुत सारी घटनाएं हो चुकी हैं। भारत में मध्यकालीन मानसिकता के दो बुनियादी आधार हैं।

पहला जाति और दूसरा जातिवादी पितृसत्ता या ब्राह्मणवादी पितृसत्ता। लोहिया ने इसे जाति और योनि का कटघरा कहा था। आधुनिक विदुषी उमा चक्रवर्ती ने जाति और पितृसत्ता के बीच के संबंधों का गहरा अध्ययन किया और इसे ब्राह्मणवादी पितृसत्ता नाम दिया। हालांकि सबसे पहले आधुनिक भारत में जाति और पितृसत्ता को एक ही सिक्के के दो पहलू के रूप में जोतिराव फुले ने देखा था। जिसे पेरियार और डॉ. आंबेडकर ने आगे बढ़ाया। आइए देखते हैं कि जातिवादी या ब्राह्णवादी पितृसत्ता क्या है और क्यों इसे तोड़े बिना आधुनिक मानसिकता का निर्माण नहीं किया जा सकता है।

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ब्राह्मणवादी पितृसत्ता पदबंध दो शब्दों से मिलकर बना है। पहला ब्राह्मणवाद और दूसरा पितृसत्ता। दोनों कोई नए शब्द नहीं हैं। न अलग-अलग इनका इस्तेमाल नया है। हां एक साथ इनका इस्तेमाल कुछ लोगों को नया लग सकता है। ब्राह्मणवाद शब्द का इस्तेमाल दक्षिण भारत से लेकर उत्तर भारत तक दलित-बहुजन आंदोलन द्वारा व्यापक पैमाने पर होता रहा है। ब्राह्मणवाद के पर्याय के रूप में मनुवाद का भी इस्तेमाल किया जाता है। ब्राह्मणवाद का अर्थ है वर्ण-जाति आधारित वह व्यवस्था जिसमें वर्ण-जाति के आधार पर ऊंच-नीच का एक पूरा पिरामिड है, जिसके शीर्ष पर ब्राह्मण हैं और नीचे अतिशूद्र या ‘अछूत’ हैं, जिन्हें आज दलित कहते हैं।

चूंकि इस व्यवस्था की रचना में ब्राह्मणों की केंद्रीय भूमिका थी और उनके द्वारा रचे गए ग्रंथों ने इस मुकम्मिल शक्ल और मान्यता प्रदान किया था, जिसके चलते इसे ब्राह्मणवाद कहा जाता है। चूंकि मनुस्मृति में वर्ण-जाति व्यवस्था के नियमों और विभिन्न वर्णों के अधिकारों एवं कर्तव्यों को सबसे व्यापक, व्यवस्थित और आक्रामक तरीके से प्रस्तुत किया गया है, जिसके चलते इसे मनुवादी व्यवस्था भी कहा जाता है। यहां एक बात बहुत ही स्पष्ट तरीके से समझ लेनी चाहिए कि ब्राह्मणवादी-मनुवादी व्यवस्था पदबंध के सबसे बड़े सिद्धांतकार डॉ. आंबेडकर साफ शब्दों में कहते हैं कि ब्राह्मणवाद विरोधी आंदोलन के निशाने पर कोई जाति विशेष या व्यक्ति विशेष नहीं है, बल्कि पूरी ब्राह्मणवादी व्यवस्था है, जिसके जहर का शिकार पूरा भारतीय समाज है और इसने हिंदुओं को विशेष तौर मानसिक रूप में बीमार बना दिया है।

अब पितृसत्ता शब्द को लेते हैं। यह एक विश्वव्यापी स्वीकृत अवधारणा है। पितृसत्ता की केंद्रीय विचारधारा यह है कि पुरुष स्त्रियों से अधिक श्रेष्ठ है तथा महिलाओं पर पुरुषों का नियंत्रण होना चाहिए। इसमें सारत: महिलाओं को पुरुषों की सम्पत्ति के रूप में देखा जाता है। पितृसत्ता में स्त्रियों के जीवन के जिन पहलुओं पर पुरुषों का नियंत्रण रहता है, उसमें सबसे महत्वपूर्ण पक्ष उसके प्रजनन क्षमता पर नियंत्रण। इसके लिए उसकी यौनिकता पर नियंत्रण जरूरी है। स्त्री की यौनिकता पर नियंत्रण के अलावा उसकी उत्पादकता और श्रम शक्ति पर भी नियंत्रण पुरूष का हो जाता है। एंगेल्स ने इस पूरी प्रक्रिया के संदर्भ में कहा कि “यह स्त्री की विश्व स्तर की ऐतिहासिक हार थी। पुरुष घर का स्वामी बन गया, स्त्री महज पुरुष की इच्छाओं की पूर्ति का माध्यम भर रह गई।”

भारत की पितृसत्ता विश्वव्यापी पितृसत्ता के सामान्य लक्षणों को अपने में समेटे हुए भी खास तरह की पितृसत्ता है, जिसका वर्ण-जाति व्यवस्था से अटूट संबंध है यानी भारतीय सामाजिक व्यवस्था में वर्ण-जाति व्यवस्था और पितृसत्ता को अलग ही नहीं किया जा सकता है, दोनों एक दूसरे पर टिके हुए हैं। इसका केंद्र सजातीय विवाह है। जाति को तभी बनाए रखा जा सकता है और उसकी शुद्धता की गांरटी दी जा सकती थी, जब विभिन्न जातियों की स्त्रियों का विवाह उन्हीं जातियों के भीतर हो। अर्थात स्त्री  यौनिकता और प्रजनन पर न केवल पति, बल्कि पूरी जाति का पूर्ण नियंत्रण कायम रखा जाए।

इसके लिए यह जरूरी था कि हिंदू अपनी-अपनी जाति की स्त्रियों के जीवन पर पूर्ण नियंत्रण कायम करें और इस नियंत्रण को पवित्र कर्तव्य माना जाए। इसी बात का उल्लेख आंबेडकर ने भी 1916 में कोलंबिया विश्वविद्यालय में अपने शोध-पत्र (भारत में जातियां : उनका तंत्र, उत्पत्ति और विकास) में किया था कि जाति की व्यवस्था तभी कायम रखी जा सकती है, जब सजातीय विवाह हों और सजातीय विवाह के लिए जरूरी है कि स्त्री की यौनिकता पर न केवल उसके पति का, बल्कि पूरी जाति का नियंत्रण हो। इसी को ब्राह्मणवादी पितृसत्ता कहते हैं, जिसको ध्वस्त करने का पोस्टर जैक डोरसे ने अपने हाथों में उठाया था।

फुले, पेरियार और डॉ. आंबेडकर ने शूद्रों-अतिशूद्रों पर सवर्णों के वर्चस्व और महिलाओं पर पुरुषों के वर्चस्व के बीच सीधा और गहरा संबंध देखा। सारे ब्राह्मणवादी ग्रंथ शूद्र और स्त्री को एक ही श्रेणी में रखते हैं। वे साफ शूब्दों में कहते हैं कि-“स्त्रीशूद्राश्च सधर्माण:” (अर्थात स्त्री और शूद्र एक समान होते हैं)। गीता के अध्याय नौ के बत्तीसवें श्लोक में जन्म से ही स्त्रियों, वैश्यों और शूद्रों को पाप योनियों की संज्ञा दी गई है। धर्मग्रंथों का आदेश है कि- “स्त्रीशूद्रौ नाधीयाताम्” ( अर्थात स्त्री और शूद्र अध्ययन न करें)। शूद्रों की तरह स्त्रियों को भी ब्राह्मणवादी धर्मग्रंथ स्वतंत्रता के योग्य नहीं मानते हैं। मनुस्मृति का आदेश है कि- “पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने। रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्र्यं अर्हति”।

इन्हीं तर्कों के चलते शूद्रों की तरह स्त्रियों को वेद सुनने, शिक्षा ग्रहण करने और संपत्ति रखने का अधिकार नहीं था। जैसे शूद्रों का मुख्य कार्य ब्राह्मणवादी ग्रंथ द्विजों की सेवा करना बताते हैं। उसी तरह महिलाओं का मुख्य कार्य पुरुषों की सेवा करना है। जनेऊ धारण करने का अधिकार शूद्रों और स्त्रियों दोनों को नहीं, क्योंकि दोनों को अपवित्र माना गया है। जिस तरह गुण-अवगुण देखे बिना शूद्रों को द्विजों का सम्मान और सेवा करना है, उसी तरह स्त्री को अपने पति की सेवा करनी है। घर के अंदर स्त्री को वे सभी कार्य करने होते हैं, जिन्हें शूद्र वर्ण की विभिन्न जातियां करती हैं।

भले फुले, पेरियार और आंबेडकर ने वर्णजाति व्यवस्था और पितृसत्ता अटूट संबंध को रेखांकित किया हो और सजातीय विवाह को जाति व्यवस्था बनाए रखने का केंद्रीय तत्व माना हो, लेकिन इसे ब्राह्मणवादी पितृसत्ता नाम नारीवादी महिला अध्येताओं ने दिया और इसे परिभाषित किया। ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को सटीक रूप में उमा चक्रवर्ती ने परिभाषित किया है। उन्होंने लिखा है कि “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता नियमों और संस्थाओं का ऐसा समूह है, जिममें जाति और जेंडर एक-दूसरे से संबंधित हैं और परस्पर एक-दूसरे को आकार प्रदान करते हैं। जहां जातियों के बीच की सीमाएं बनाए रखने के लिए महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।

इस ढांचे के पितृसत्तात्मक नियम सुनिश्चित करते हैं कि जाति व्यवस्था को बंद सजातीय यौन विवाह संबंधों के जातिक्रम का उल्लंघन किए बिना बनाए रखा जा सकता है। महिलाओं के लिए ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक कानून उनके जातीय समूहों के अनुरूप एक-दूसरे से भिन्न होते हैं, जिसमें महिलाओं की यौनिकता पर सबसे कठोर नियंत्रण ऊंची जातियों में पाया जाता है। ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के कायदे कानून अक्सर शास्त्रों से लिए जाते हैं, विशेषकर उच्च जातियों को विचारधारात्मक आधार प्रदान करते हैं, लेकिन कई बार उन्हें निचली कही जाने वाली जातियों द्वारा भी आत्मसात कर लिया जाता है।”

आंबेडकर का कहना था कि सती प्रथा, विधवा विवाह न होना और बाल विवाह का प्रचलन भी स्त्री की यौनिकता को नियंत्रित करने और जाति की पवित्रता को बनाए रखने के लिए हुआ था। 

भारत में जाति और पितृसत्ता के बीच अटूट संबंध है। पितृसत्ता को तोड़े बिना जाति नहीं टूट सकती और जाति टूटे बिना पितृसत्ता से मुक्ति नहीं मिल सकती। क्योंकि दोनों एक साथ ही पैदा हुए हैं और दोनों की मृत्यु भी एक साथ ही होगी। हम अपने अनुभव से भी देख रहे हैं कि जितना पितृसत्तात्मक बंधन ढीले हो रहे है, सजातीय विवाह की जगह अंतरजातीय विवाह उतना ही अधिक हो रहा है। इसके साथ ही इतिहास की अध्येता सुवीरा जायसवाल की इस बात को रेखांकित कर लेना चाहिए कि भारत में वर्ग, जाति और पितृसत्ता एक साथ ही पैदा हुए थे। इसका अर्थ है इनका अंत भी एक साथ ही होगा।

ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को ध्वस्त करने का मतलब है, सबके लिए स्वतंत्रता, समता और न्याय आधारित लोकतांत्रिक भारत के निर्माण का पथ प्रशस्त करना।

(डॉ. सिद्धार्थ फारवर्ड प्रेस के हिंदी प्रकाशन के संपादक हैं।)

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