येदियुरप्पा एक बार फिर जाति का कार्ड खेलने की तैयारी में

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कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा एक बार फिर अपनी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को चुनौती देने की तैयारी में हैं। पार्टी नेतृत्व चाहता है कि वे अपनी उम्र के आधार पर मुख्यमंत्री पद छोड़ दें, लेकिन येदियुरप्पा ऐसा करने को तैयार नहीं दिखते। हालांकि जाहिरा तौर पर वे यही कह रहे हैं कि पार्टी नेतृत्व जो भी आदेश देगा उसका वे पालन करेंगे। लेकिन दूसरी ओर वे अपनी जाति का कार्ड खेलते हुए पार्टी नेतृत्व पर दबाव बनाने की तैयारी में भी जुटे हुए हैं।

पिछले सप्ताह येदियुरप्पा दिल्ली आए थे। अपने दिल्ली प्रवास के दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा से मुलाकात की थी। इन मुलाकातों के आधार पर ही कहा जा रहा है कि पार्टी नेतृत्व ने उन्हें इस्तीफा देने के लिए कह दिया है। हालांकि येदियुरप्पा ने इन खबरों को सिरे से खारिज किया है। उन्होंने साफ कहा है कि न तो उनसे किसी ने इस्तीफा देने के लिए कहा है और न ही वे ऐसा करने जा रहे हैं। इसी के साथ उन्होंने यह भी कहा है कि वे पार्टी के अनुशासित कार्यकर्ता हैं और पार्टी नेतृत्व जब जो भी निर्देश देगा, वे उसका पालन करेंगे।

येदियुरप्पा के इसी बयान के आधार पर मीडिया में अटकलें लगाई जा रही हैं कि आगामी 26 जुलाई को मुख्यमंत्री पद पर अपने मौजूदा कार्यकाल के दो साल पूरे होने के मौके पर येदियुरप्पा अपने इस्तीफे का ऐलान कर देंगे। लेकिन येदियुरप्पा ने दिल्ली से बेंगलुरू लौटते ही एक बार फिर जाति का कार्ड खेलते हुए पार्टी नेतृत्व पर दबाव बनाने के लिए राजनीतिक कवायद शुरू कर दी है। उन्होंने बीते मंगलवार को अपने सरकारी आवास पर लिंगायत समुदाय के अलग-अलग मठों के करीब 35 साधु-संतों से मुलाकात की। प्रदेश भर के लिंगायत मठों के साधु-संत उनसे मिलने बेंगलुरू पहुंचे थे और उन्हें अपना समर्थन दिया’ येदियुरप्पा से मिलने के बाद लिंगायत मठाधीशों ने कहा कि अगर येदियुरप्पा को हटाया गया तो कर्नाटक भाजपा की सरकार तो जाएगी ही, पार्टी भी बर्बाद हो जाएगी।

एक वरिष्ठ लिंगायत संत ने कहा कि कर्नाटक में भाजपा सिर्फ येदियुरप्पा की वजह से ही सत्ता का स्वाद चख सकी है और आज भी सत्ता में है, लेकिन भाजपा ने उन्हें पहले भी कार्यकाल पूरा नहीं करने दिया और इस बार भी कार्यकाल पूरा करने से पहले ही हटाना चाहती है। हालांकि येदियुरप्पा ने साधुओं से भी यही कहा कि वे इस मामले में कुछ नहीं बोल सकते हैं और वे पार्टी नेतृत्व जैसा कहेगा, वैसा ही करेंगे। लेकिन येदियुरप्पा की इस बात से उनके समर्थक खासकर लिंगायत मठों के साधु-संत सहमत नहीं हैं।

गौरतलब है कि भाजपा में जब से मोदी-शाह युग शुरू हुआ है तब से यह नीति लागू कर दी गई है कि 75 वर्ष से ज्यादा की आयु के किसी भी नेता को न तो कोई चुनाव लड़ाया जाएगा और न ही सरकार में कोई पद दिया जाएगा। इस नीति के तहत कई नेताओं को या तो घर बैठाया गया है या फिर उन्हें राज्यपाल बना दिया गया है। पूरी पार्टी में येदियुरप्पा ही एकमात्र ऐसे नेता हैं, जिन्हें 75 वर्ष की उम्र पार करने के बावजूद मुख्यमंत्री बनाना पड़ा है और वे इस समय 79वें वर्ष की उम्र में भी अपने पद पर बने हुए हैं।

दरअसल येदियुरप्पा ही भाजपा में एकमात्र ऐसे नेता भी हैं जो पार्टी आलाकमान की मेहरबानी से नहीं बल्कि हर बार अपने दम पर मुख्यमंत्री बने हैं। कर्नाटक के अलावा भाजपा शासित हर राज्य में मुख्यमंत्री पार्टी आलाकमान या आरएसएस नेतृत्व की पसंद से बनाया गया है। येदियुरप्पा की स्थिति सबसे अलग है तो इसकी वजह है राज्य में उनका अपना सामाजिक आधार। कर्नाटक में राजनीतिक तौर पर दो समुदाय लिंगायत और वोकालिग्गा बेहद प्रभावी हैं। इनमें भी लिंगायत का ज्यादा असर है और येदियुरप्पा इसी समुदाय से आते हैं।

राज्य के कुल मतदाताओं में 23 फीसदी लिंगायत हैं, जिनके निर्विवाद नेता येदियुरप्पा हैं। उनके जैसा सामाजिक आधार वाला नेता पार्टी में दूसरा कोई नहीं है। येदियुरप्पा की वजह से ही भाजपा को दक्षिण भारत में भाजपा को पैर रखने और कर्नाटक में सत्ता का स्वाद चखने को मिला है। लेकिन इसके बावजूद येदियुरप्पा पार्टी नेतृत्व के कभी प्रिय नहीं रहे हैं। इसकी वजह शायद उनका मजबूत जनाधार वाला नेता होना ही रहा है।

येदियुरप्पा पहली बार 2007 में जनता दल सेक्यूलर और भाजपा का गठबंधन टूटने के बाद मुख्यमंत्री बने थे। हालांकि वे महज सात दिन ही इस पद पर रह सके थे और विधानसभा में बहुमत साबित न कर पाने पर उन्हें इस्तीफा देना पडा था। इससे पहले जनता दल सेक्यूलर के साथ साझा सरकार में उप मुख्यमंत्री थे। मई 2008 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा सबसे बडी पार्टी बन कर उभरी बहुमत थोडा ही पीछे रही लेकिन निर्दलियों की मदद से सरकार बनाने में सफल रही। येदियुरप्पा फिर मुख्यमंत्री बने। लेकिन मुख्यमंत्री बनते ही वे भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरने लगे। अवैध खनन के मामले राज्य के तत्कालीन लोकायुक्त न्यायमूर्ति संतोष हेगडे की रिपोर्ट के आधार पर उन्हें 31 जुलाई 2011 को मुख्यमंत्री पद छोडना पड गया। मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद जमीन घोटाले में लिप्पता के चलते उन्हें जेल भी जाना पडा।

वर्ष 2018 का विधानसभा चुनाव भी पार्टी ने उनके चेहरे पर ही लडा, जिसमें वह एक बार फिर सबसे बडी पार्टी के रूप में तो उभरी लेकिन बहुमत से दूर रही। राज्यपाल ने सबसे बडी पार्टी के नेता के तौर पर येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई। लेकिन बहुमत जुटाने में नाकाम रहने के कारण दो दिन बाद ही उन्हें इस्तीफा देना पडा। उनके इस्तीफे के बाद जनता दल (सेक्यूलर) और कांग्रेस ने मिल कर सरकार बनाई जो महज 14 महीने बाद ही दोनों दलों के कई विधायकों के दलबदल के चलते गिर गई। भाजपा को फिर सरकार बनाने का मौका मिला और येदियुरप्पा ने चौथी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

येदियुरप्पा के पुराने रिकॉर्ड और ताजा तेवर देखते हुए लगता नहीं कि वे आसानी से इस्तीफा देकर पार्टी नेतृत्व की इच्छा पूरी करेंगे। लेकिन अगर वे ऐसा करते भी हैं तो फिर ऐसा करने की एवज में अपनी कुछ शर्ते पार्टी नेतृत्व से मनवाएंगे। उनकी मुख्य शर्त यह होगी कि नया मुख्यमंत्री उनकी पसंद का हो और लिंगायत समुदाय से ही हो। दूसरी शर्त के तहत वे अपने छोटे बेटे को कोई अच्छी दिलवाएंगे। वे अपनी करीबी सहयोगी शोभा करंदलाजे को पहले ही केंद्र में मंत्री बनवा चुके हैं।

(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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