Friday, March 1, 2024

कड़ाके की ठंड, घना कोहरा और बारिश की कमीः यह जाड़ा किसानों को संकट की ओर ले जा रहा है

नई दिल्ली। इस दिसम्बर का अंतिम हफ्ता शहर के मध्यम और उच्च आय वर्ग के लिए एक लॉन्ग विकेंड में तब्दील हो गया था। हजारों गाड़ियां नये साल के स्वागत में पहाड़ों की ओर कूच कर गईं। हिमाचल और उत्तराखंड के पर्यटन स्थल गाड़ियों से भर गये। खासकर, हिमाचल के शिमला, मनाली से लेकर लद्दाख जाने वाली सड़कों पर गाड़ियां कई-कई किलोमीटर जाम हो गईं।

बर्फबारी का लुत्फ लेने के लिए उतावले लोगों में काफी उत्साह था। पिछली बारिश से तबाह हिमाचल के लिए इन गाड़ियों का आना कतई बुरा नहीं था। पर्यटन उद्योग में लगे लोगों के लिए इस तरह लोगों का उत्साह से आना अच्छा ही था।

मैदान के लोगों के लिए छुट्टियां बिताने के लिए पहाड़ जितना रूमानियत से भरा हुआ लगा होगा, पहाड़ का अपना मिजाज उतना अच्छा नहीं था। अमूमन अक्टूबर से लेकर नवम्बर और दिसम्बर के मध्य तक पहाड़ को जितनी बारिश की उम्मीद थी, उससे बेहद कम बारिश हुई है।

इस दौरान पश्चिमी विक्षोभ, यानी अरब सागर से उठने वाले बादल और हवाओं का दबाव अल नीनो के चलते प्रभावित हो गया है। पिछले साल, यहां से दो चक्रवाती तुफान उठे। इसमें से एक गुजरात के तट पर टकराया और उत्तर-पश्चिमी प्रदेशों में बढ़ते हुए दिल्ली तक इसके प्रभाव में आया। दूसरा, पश्चिमी एशिया के देशों की ओर बढ़ गया।

अक्टूबर के महीने से उठने वाले ये विक्षोभ पश्चिमी एशियाई देशों और भारत के पश्चिमोत्तर इलाकों और पहाड़ी क्षेत्रों में बारिश लाते हैं। इस बार हिमाचल में इस समयावधि में होने वाली बारिश अमूमन 82.5 मिमी होती है। लेकिन इस बार यह बारिश महज 45.2 मिमी ही हुई है। यह 45 प्रतिशत कम है। खासकर, दिसम्बर के महीने बारिश सिर्फ 5.8 मिमी हुई है जो 85 प्रतिशत कम है। सिरमूर और हमीरपुर में दिसम्बर के महीने में 90 प्रतिशत तक कम बारिश हुई है।

यदि हम हिमाचल में कुल बारिश को देखें, तो यहां सामान्य से 20 प्रतिशत अधिक बारिश हुई है। बादल फटने और अचानक बाढ़ आने की सैकड़ों घटनाएं हुईं जिसमें बहुत से लोग मारे गये और लगभग 12 हजार करोड़ रुपये की संपत्ति का नुकसान हुआ।

वहीं 2023 के फरवरी महीने में ही गर्मी ने पिछले 123 साल के रिकॉर्ड को तोड़ दिया था। हिमाचल में पिछले साल का गुजरा असामान्य मौसम इस साल में प्रवेश कर चुका है। कर्म बर्फबारी से वहां की न सिर्फ फसलों को नुकसान पहुंचाएगा, साथ ही नदियों में पानी के स्रोतों की कमी आएगी।

डाउन टू अर्थ ने मौसम विभाग के आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर बताया है कि 1 अक्टूबर, 2023 से 2 जनवरी, 2024 के बीच पश्चिमी विक्षोभ का 16 बार असर हुआ है। इसमें से पांच अक्टूबर में, पांच नवम्बर में और 6 दिसम्बर में। इन विक्षोभों का अर्थ बारिश और बर्फबारी होती है। इसकी कमी की वजह से उत्तराखंड में 47 प्रतिशत कम बारिश हुई है। इसके 13 जिलों में से 8 की स्थिति खराब की श्रेणी में है। हिमाचल के लाहौल और स्पिति में तो 73 प्रतिशत कम बारिश हुई है।

अमूमन, नवम्बर के महीने से ही पश्चिमी विक्षोभ की सक्रियता बढ़ जाती है। इसका असर जनवरी के अंत तक रहता है। इसकी वजह से भारत के मध्यवर्ती और पश्चिमोत्तर राज्यों में बारिश होती है। गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, पंजाब, हिमाचल, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड, दिल्ली और उत्तर प्रदेश तक बारिश को देखा जा सकता है। इसका असर निचले इलाकों में कनार्टक के कुछ हिस्सों में भी देखा जाता है।

लेकिन, दक्षिण भारत के राज्यों में बारिश उत्तर-पूर्व से उठने वाले बादल और हवा के दबाव से होती है। यह केरल और तमिलनाडु से उठते हुए अंदर के इलाकों में आता है। पिछले दिनों मिचौंग चक्रवाती तूफान और इसके बाद असामान्य बारिश से तमिलनाडु का बड़ा हिस्सा और केरल के कुछ जिले बुरी तरह से प्रभावित हुए थे। लेकिन इसके बाद अपेक्षाकृत सूखा समय गुजर रहा है।

अल नीनो की वजह से बारिश में इस तरह की असामान्य प्रवृति खेती को बुरी तरह प्रभावित कर रही है। महाराष्ट्र में 81 प्रतिशत, तेलगांना में 57 प्रतिशत और कर्नाटक में 36 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। ये वे इलाके हैं, जहां भारत की रबी की फसल सबसे अधिक होती है, खासकर गेहूं और तिलहन का उत्पादन।

भारत की हरित क्रांति का यही क्षेत्र है जो मुख्यतः फर्टिलाइजर और सिंचाई के साधनों के बल पर अधिक उत्पादन देने वाली फसलों के किस्मों पर आधारित थी। बारिश की कमी निश्चित ही किसानों की लागत को बढ़ा देगी और बारिश की कमी से होने वाली अन्य परेशानियों का इजाफा करेंगी।

इसका सीधा असर, फरवरी के बाद तापमान में होने वाली वृद्धि से पड़ सकता है। आर्द्रता की कमी और ठंडी हवाओं के बाद अचानक तापमान के बढ़ने से उत्पादकता और गुणवत्ता दोनों ही प्रभावित होगी। पानी के स्रोतों की कमी खरीफ की फसलों को भी प्रभावित करेगा।

उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्सों और बिहार, झारखंड के कुछ हिस्सों में जरूर थोड़ी सी बारिश का असर देखने को मिला है। दिल्ली में दिसम्बर के अंतिम हफ्तों से लेकर जनवरी के मध्य तक बारिश का समय रहता है। इस बार मौसम विभाग बारिश का अनुमान तो लगा रहा है, लेकिन फिलहाल बारिश देखने का नहीं मिली है। अनुमान लगाया जा रहा है कि आगामी हफ्ते बारिश हो सकती है।

इस साल दिल्ली में 16 से 18 घंटे तक के कुहरे की स्थिति को देखा गया है। यहां की ठंड पहाड़ के शिमला को पीछे छोड़ दिया। हवा का मानक लगातार अति-खराब की श्रेणी में बना हुआ है, जबकि हवाएं लगातार चल रही हैं। आमतौर पर जाड़े में स्मॉग की स्थिति रहती है लेकिन दोपहर तक तापमान में वृद्धि से हवा का दबाव कम होता है और धूप निकलने के साथ ही हवाओं की गुणवत्ता में सुधार आ जाता है।

इस बार, बारिश की कमी का असर दिल्ली की वायु गुणवत्ता पर पड़ने का अनुमान लगाया जा रहा है। द इंडियन एक्सप्रेस ने अपने रिपोर्ट में बताया है कि पंजाब में पराली जलाने का असर अभी तक दिल्ली की हवा पर बना हुआ है। निश्चित ही बारिश से बनने वाली आर्द्रता और हवाओं का बहाव छोटे और बड़े कणों को स्थिर करने और उन्हें पानी के साथ समाहित करने की क्षमता होती है।

यही कारण था कि दिल्ली की हवाओं को साफ रखने के लिए फॉगिंग की व्यवस्था की लंबी चौड़ी योजना बनाई गई। लेकिन, कणों को स्थिर करने के लिए जिन अन्य कारकों की जरूरत होती है, उसकी अनुपस्थिति में फॉगिंग बेअसर साबित होने लगी।

दिल्ली का वातावरण कोई एकल व्यवस्था नहीं है और न ही पंजाब कोई विशिष्ट कारक है। यह विश्व तामपान में होने वाली वृद्धि, काबर्न उत्सर्जन, वनों की कटाई और पानी के स्रोतों का अंधाधुंध क्षरण वे बड़े कारण हैं जिससे समुद्र अल नीनो के प्रभाव से ग्रस्त होते हैं और पहाड़ के ग्लेशियर पिघलते हैं, जंगलों में आग लगती है और खेतों में फसलें असमय सूखने को अभिशप्त हो जाती हैं। शहरों की सांस घुटने लगती है।

हम एक ओर विश्व का फेफड़ा कहे जाने वाला अमेजन जंगल और हजारों कथानकों के साथ बहने वाली सदानीरा अमेजन नदी वनों की कटाई के वहज से सूख चला है, ताप और आग से बर्बाद हो रहा है। लेकिन, एक देश के तौर पर हम अमेजन की इस घटना से कितना परिचित हैं और उससे कितना सीख रहे हैं। अब हम इस देश का फेफड़ा कहे जाने वाले हसदेव जंगल को अडानी के मुनाफे की हवस में नष्ट होते हुए देख रहे हैं।

अब भी समय है, सांस लेने की लिए ही, इस जंगल को बचाया जाये। यह देश के सबसे घने जंगलों में से एक है, जहां सिर्फ जीव और जानवर ही नहीं रहते हैं, सिर्फ नदियां ही नहीं बहती हैं, सिर्फ मानसून ही यहां नहीं उतरता है, यहां वे लोग रहते हैं जिनसे हमारी हजारों साल का इतिहास बनता है और सुरक्षित रहता है। दरअसल, यहां हमारी सांसें सुरक्षित हैं जिन्हें बचाकर रखना जरूरी है।

(अंजनी कुमार पत्रकार हैं।)

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