Saturday, January 22, 2022

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हिंदी रंग आलोचना के शिखर पुरुष नेमिचन्द्र जैन की रचनावली का प्रकाशन एक ऐतिहासिक घटना

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नेमि जी बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। कम्युनिस्ट पार्टी से लेकर इप्टा आंदोलन में सक्रिय रहे नेमि जी कवि, आलोचक  रंग चिंतक  संपादक  नाटक कार और अनुवादक  भी। साहित्य की हर विधा में योगदान दिया। 8 खण्डों में छपी उनकी रचनावली।

हिंदी साहित्य में रचनावलियों की भीड़ में मुक्तिबोध की रचनावली सबसे अलग है क्योंकि वह  अपनी बेहतर प्रस्तुति और सामग्री संचयन की दृष्टि से  हमेशा याद की जाती है। इसका संपादन मुक्तिबोध के मित्र एवं तार सप्तक के  मूर्धन्य कवि नेमिचन्द्र  जैन ने 1980 में किया था। आज उसी नेमि  जी की  रचनावली  का लोकार्पण हो रहा है। मुक्तिबोध की रचनावली मुक्तिबोध के निधन के करीब 12 साल बाद निकल पाई थी। नेमि जी की रचनावली उनके निधन के 16 साल बाद  आ रही है जिसका संपादन नंद किशोर आचार्य  और ज्योतिष जोशी ने किया है। वैसे भी हिंदी के लेखकों को यह सौभाग्य कहाँ मिल पाता कि वे  अपनी रचनावली जीते जी देख पाएं। नेमि जी पहले कवि के रूप में, फिर हिंदी उपन्यासों के आलोचक के रूप में  जाने गए। लेकिन जब से उन्होंने रंग मंच साहित्य में दिलचस्पी ली वे देखते-देखते हिंदी रंग आलोचना के शिखर पुरुष के रूप में समादृत हुए।

वे नटरंग पत्रिका के संपादक संग्रहकर्ता और रंग सहित्य संग्रहालय निर्माता के रूप में भी जाने गए  पर वे मुक्तिबोध के गहरे मित्र के रूप में भी याद किये जाते हैं। उनकी वजह से ही मुक्तिबोध का समग्र साहित्य हमारे सामने आया और उनके अवदान से हिंदी साहित्य परिचित हुआ। नेमि रचनावली के आने से भी हम उनके समग्र  योगदान से परिचित होंगे,ऐसा विश्वास है। ज्योतिष जोशी के अनुसार 8 खण्डों में करीब 37500 पृष्ठों में यह रचनावली फैली है। इसमें पहली बार उनकी कुछ कहानियां कुछ नाटक रेडियो नाटक और पन्द्रह बीस लेख भी पाठकों को पढ़ने को मिलेंगे। ये सब अब तक अप्रकाशित थे। इसमें उनका अंग्रेजी लेखन शामिल नहीं।

उनके अंग्रेजी में लिखे  गए लेखों समीक्षाओं के भी दो खण्ड आएंगे। उन्होंने 60 के दशक में स्ट्समैन,  टाइम्स ऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स में नाटकों की नियमित समीक्षा की। इस दृष्टि से वे  हिंदी के पहले लेखक हैं। उनका विपुल लेखन शोधार्थियों के लिए आधार समग्र बन गया है। आज़ादी के बाद हिंदी रंगमंच को नेमि जी के बिना समझा नहीं जा सकता। जगदीश चन्द्र माथुर के बाद वीरेंद्र नारायण  और  नेमि जी ही वे व्यक्ति हैं जिन्होंने रंग विमर्श को गम्भीरता से लिया और आगे बढ़ाया। नेमि जी की जन्मशती पर आयोजित समारोहों कार्यक्रमों व्यायख्यानों के जरिये नेमि जी को याद किया गया। आज फिर एक बार उनकी रचनावली के माध्यम से उन्हें याद किया जाएगा।

 इस  रचनावली  के बारे में दी गयी जानकारी के अनुसार  पहला खण्ड उनके आलोचनात्मक लेखन और विचार वैशिष्ट्य को दर्शाता  है। इस खण्ड में उनकी दो महत्त्वपूर्ण पुस्तकों ‘बदलते परिप्रेक्ष्य’ और ‘जनान्तिक’ से उन निबन्धों को रखा गया है जिनमें साहित्य के बदलते मान, मूल्य, युग-यथार्थ और साहित्य-बोध के परिवर्तनों के साथ-साथ लेखक के दायित्व पर भी गम्भीरता से विचार किया गया है। इसके अतिरिक्त कविता और कहानी के तत्कालीन परिदृश्य पर विचार करने के साथ-साथ नेमिजी द्वारा लिखी कविता और राजनीति सहित अनेक ज्वलन्त मुद्दों पर विचारपरक टिप्पणियों के साथ नामवर सिंह तथा रामविलास शर्मा की पुस्तकों पर समीक्षात्मक लेख भी इस खण्ड में शामिल हैं।

 इस रचनावली से पता चलता है कि इस खण्ड की लगभग आधी सामग्री ऐसी है जो किसी पुस्तक में शामिल नहीं है। यह असंकलित लेख और टिप्पणियाँ जहाँ अपनी वैचारिक ऊष्मा से हमें आन्दोलित करते हैं, वहीं एक बड़े साहित्यिक युग को भी हमारे समक्ष लाते हैं। इन असंकलित लेखों और टिप्पणियों में लेखक की स्वाधीनता, साहित्य किसके लिए, आलोचना और जनतन्त्र, परम्परा और जनतन्त्र, मुक्त बाज़ार और साहित्य जैसे विचारोत्तेजक विषयों पर गहनता से विचार किया गया है। इसके अतिरिक्त इस  खण्ड में मुक्तिबोध, रामचन्द्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी आदि के अवदानों पर लेखक के विचारों के साथ-साथ समाजवाद बनाम राष्ट्रीय समाजवाद, पुरस्कार और विवाद, हिन्दी में प्रगतिशील साहित्य तथा युवा लेखन की रूढ़ियाँ जैसे विचारपरक लेख साहित्य और विचार जगत की दुरभिसन्धियों को खोलने के साथ हमारी बद्धमूल चेतना को भी परिष्कृत करते हैं।

दूसरे खण्ड में 

नेमिचन्द्र जैन के आलोचना-कर्म का एक बड़ा हिस्सा कथा-साहित्य की आलोचना का है। यह कार्य उन्होंने मुख्य रूप से ‘अधूरे साक्षात्कार’ और ‘जनान्तिक’ जैसी पुस्तकों के माध्यम से किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने विपुल मात्रा में पत्र-पत्रिकाओं में लिखकर कथा-साहित्य की आलोचना को निरन्तर समृद्ध किया।

इसमें स्वाधीनता प्राप्ति के बाद के लगभग सभी महत्त्वपूर्ण उपन्यास शामिल हैं जिनका विस्तार से विवेचन-विश्लेषण है। इनमें ‘उसका बचपन’, ‘नदी के द्वीप’, ‘मैला आँचल’, ‘यह पथ बन्धु था’, ‘बूँद और समुद्र’, ‘झूठा सच’, ‘भूले बिसरे चित्रा’, ‘जयवर्द्धन’, ‘चारु चन्द्रलेख’, ‘राग दरबारी’, ‘गाँठ’, ‘हत्या’, ‘जुगलबन्दी’, ‘चिड़िया घर’, ‘टोपी शुक्ला’, ‘सूरजमुखी अँधेरे के’, ‘वह अपना चेहरा’, ‘अमिता’, ‘कब तक पुकारूँ’, ‘बावन पत्ते’, और ‘गोबर गणेश’, आदि तो हैं ही, छोटे-बड़े अन्य शताधिक उपन्यास हैं जिनके माध्यम से नेमिचन्द्र जैन ने हिन्दी के समग्र औपन्यासिक परिदृश्य को उसकी ख़ूबियों और ख़ामियों के साथ उपस्थित किया है। 

अब तक पुस्तकों में असंकलित रहे कथालोचन के कई महत्त्वपूर्ण लेख भी इस खण्ड में शामिल हैं जो पाठकों को कथालोचन में नेमिचन्द्र जैन के अप्रतिम योगदान से परिचित कराते हैं। 

रचनावली का यह तीसरा खण्ड उनके नाट्यालोचक व्यक्तित्व से हमारा परिचय कराता है जिसमें नाट्यालोचन से सम्बन्धित उनके चिन्तन को शामिल किया गया है। इस खण्ड में नाट्य के सैद्धान्तिक पक्ष को संकलित किया गया है जिसमें उनकी विख्यात पुस्तकों ‘रंगदर्शन’, ‘रंगकर्म की भाषा’, ‘रंग-परम्परा’ तथा ‘दृश्य-अदृश्य’ से चुनी हुई सामग्री है। इस स्तर पर पाठक देख सकेंगे कि रंग आलोचना के शिखर पर विद्यमान रहे नेमिचन्द्र जैन ने नाटक और रंगमंच को उसके व्यावहारिक निष्कर्षों के साथ रखते हुए कितना महत्त्वपूर्ण काम किया है। इसमें नाटक का अध्ययन, नाटक की रचना-प्रक्रिया और अभिनेयता, नाट्य प्रदर्शन के तत्त्व, रंगशाला, दर्शक-वर्ग, संस्कृत नाट्य-परम्परा की प्रासंगिकता, नाट्य प्रशिक्षण, नाट्यालोचन तथा भारतीय रंग- दृष्टि की खोज जैसे व्यापक विषयों पर गम्भीर विश्लेषणात्मक विमर्श है, तो आलेख, अभिनय और आलोचना को समेकित रंगभाषा के अन्तर्गत समझने-समझाने का महत्त्वपूर्ण प्रयत्न भी  है।

इसी खण्ड में भारतीय रंग-परम्परा को संस्कृत नाट्य-परम्परा के अतीत में देखते हुए वर्तमान रंग-परिदृश्य का उसके विस्तार में परीक्षण करने का स्तुत्य प्रयत्न भी है जिसे उत्कर्ष, विस्तार और अन्वेषण नामक विस्तृत अध्यायों में देखा जा सकता है। भारतीय कला में समन्वय, दृश्य, काव्य और दृश्य काव्य, नाट्य की स्वतंत्र भाषा और अभिनेता, निर्देशक या नाटककार जैसे विचारोत्तेजक विमर्शात्मक निबन्ध भी इसी खण्ड में हैं तो नाटक की भाषा और रंगभाषा तथा ‘सामाजिक विकास में सम्पर्क साधनों की भूमिका: आधुनिक नाट्य मंच’ जैसे असंकलित लेख भी इस खण्ड में शामिल किये गये हैं।

चौथे  खण्ड में आधुनिक भारतीय, विशेषकर हिन्दी नाटक और रंगमंच के ज्वलन्त प्रश्नों, समस्याओं और चुनौतियों पर गम्भीर विचार-विमर्श है। इसमें शामिल कुछ आरम्भिक निबन्ध ‘समसामयिक हिन्दी नाटक: उपलब्धियाँ और सीमाएँ’, ‘हिन्दी नाटक में आधुनिक प्रयोग’ और ‘अधूरेपन की त्रासदी’ जनान्तिक नामक पुस्तक से लिए गये हैं जिनमें समकालीन नाटकों के वैशिष्ट्य और सीमाओं के परीक्षण के साथ-साथ, हिन्दी नाटकों की आधुनिक प्रयोगशीलता तथा मोहन राकेश के नाटकों में अधूरेपन की त्रासद स्थिति का सम्यक् विवेचन है।

इस खण्ड में शामिल शेष आलेख असंकलित हैं जो पहले किसी भी पुस्तक में शामिल नहीं रहे हैं। इन असंकलित आलेखों में हिन्दी नाटक और रंगमंच के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य, नाट्य परम्परा, सामाजिक परिवर्तन में रंगमंच की भूमिका, हिन्दी नाटक रचना-प्रक्रिया, प्रसादोत्तर नाट्य साहित्य, विद्यालयों में रंगमंच, बाल नाटक, परम्परा और आधुनिकता के प्रश्न, नाट्य समीक्षा के विचारणीय मुद्दों सहित ऐसी ज्वलन्त चुनौतियों और समस्याओं पर विचार-विश्लेषण है जिससे गुज़रकर हम न केवल अपनी परम्परा को जान-समझ सकते हैं बल्कि आधुनिक हिन्दी नाटक और रंगमंच के उन संकटों से परिचित हो सकते हैं जिनसे अनजान रहकर हम आधुनिक हिन्दी नाटक और रंगमंच को समग्रता से समझ पाने का दावा कर सकते। 

यह खण्ड इसलिए भी समृद्ध और विचारोत्तेजक है कि इसमें रवीन्द्रनाथ ठाकुर, मोहन राकेश, भुवनेश्वर, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना प्रभृति नाटककारों के नाटकों की सार्थकता और उपादेयता पर गहरा विश्लेषण है, तो समकालीन नाट्य की उन दुरभिसन्धियों की तह में जाकर पड़ताल करने की सफल चेष्टा भी; जिसके कारण हमारा रंगकर्म बहुधा गतिरोधों का शिकार होता रहता है। 

 पांचवें खण्ड में ‘सत्ता और संस्कृति,’ ‘नव-संस्कार या अफ़सरशाही शिकंजा’, ‘औपनिवेशिक मानसिकता के ये रूप’ जैसे निबन्ध हैं जो नेमिचन्द्र जैन की पुस्तक ‘दृश्य-अदृश्य’ से लिए गये हैं। इसमें नाटक-रंगमंच के व्यावहारिक पक्षों पर भी गहरा अनुशीलन है जिसमेंµ‘नाटक में आधुनिकता बोध’, ‘रंगकार्य में सृजनात्मकता’, ‘निर्देशक और नाटककार’, ‘रंगमंच और प्रशिक्षण’, ‘हिन्दी रंगमंच की दिशा’, ‘दर्शक तक पहुँचने की समस्या’, ‘पूर्व और पश्चिम-रंगमंचीय अन्तः सम्बन्धों की तलाश’ जैसे विमर्शात्मक निबन्ध हैं।

इस खण्ड में अनेक लेख ऐसे भी हैं जो अब तक किसी पुस्तक में नहीं आ सके थे। इन असंकलित लेखों में ‘समकालीन नाटक’, ‘दर्शक-वर्ग और हिन्दी समाज’, ‘भारतीय रंगमंच और संगीत नाटक’, ‘व्यावसायिक रंगमंच की समस्याएँ’ और ‘समसामयिक भारतीय रंगमंच’ आदि शामिल हैं जो नाटक-रंगमंच के उन अनेक असुविधाजनक प्रश्नों से टकराते हैं जिन पर चिन्ता तो की जाती है, किन्तु पहले उन पर इतने विस्तार से विचार नहीं किया जा सका। 

रचनावली का खण्ड- छह मुख्य रूप से नाट्य प्रस्तुतियों की समीक्षा पर एकाग्र है जिसमें पारम्परिक रंगमंच के साथ-साथ गहरा सांस्कृतिक विमर्श भी है। नाट्य प्रस्तुतियों की समीक्षा से सम्बन्धित सामग्री नेमिचन्द्र जैन की बहुचर्चित पुस्तक ‘तीसरा पाठ’ से सम्बन्धित है जिसमें 1957 से लेकर 1991 तक यानी लगभग चालीस वर्षों की भारतीय, विशेषकर हिन्दी रंगमंच से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण प्रस्तुतियों की सांगोपांग समीक्षाएँ हैं। इन समीक्षाओं में ‘अन्धायुग’, ‘आषाढ़ का एक दिन’, ‘लहरों के राजहंस’, ‘आधे-अधूरे’, ‘कोमल गान्धार’, ‘हानूश’, ‘स्कन्दगुप्त’, जैसे हिन्दी के श्रेष्ठतम नाटकों की प्रस्तुतियों के साथ-साथ ‘तुग़लक’, ‘हयवदन’, ‘सखाराम बाइंडर’, ‘कन्यादान’, ‘उध्वस्त धर्मशाला’ जैसी चर्चित भारतीय नाट्य-प्रस्तुतियों और ‘आथेलो’, ‘हेमलेट’, ‘मैकबेथ’, ‘ईडिपस’ आदि विदेशी प्रस्तुतियों की विशद् समीक्षाएँ शामिल हैं। इस समीक्षा खण्ड में अनेक नाट्य समारोहों का भी विवेचन है, तो प्रस्तुति की चर्चा के बहाने अनेक रंगमंचीय प्रश्नों पर गहरा विचार-विमर्श भी।

इस खण्ड की शेष सामग्री असंकलित है जिसे पाठक पहली बार पुस्तक में पढ़ पायेंगे। असंकलित सामग्री का अधिकांश हिस्सा पारम्परिक भारतीय रंगमंच पर केन्द्रित है जिसमें ब्रज के पारम्परिक रंगमंच के रूप में रास, नौटंकी, पुतुल नाटक, जात्रा, भवाई, बीहू, रामलीला आदि की विशद मीमांसा है और भारतीय रंगमंच के विकास में उनके योगदान का रेखांकन भी। इस खण्ड के अन्तिम हिस्से में लोक संस्कृति, नृत्य, संगीत सहित भारतीय संस्कृति के ज्वलन्त प्रश्नों और चुनौतियों पर गम्भीर बहस भी है।

रचनावली का सातवां  खण्ड उनके सृजनात्मक लेखन से सम्बन्धित है। इसका अधिकांश हिस्सा उनकी कविताओं का है जिनमें ‘तार सप्तक’ में प्रकाशित कविताओं से लेकर ‘एकान्त’ और ‘अचानक हम फिर’ नामक संकलनों की कविताएँ शामिल हैं। इसके बाद उनकी असंकलित कविताएँ संकलित की गयी हैं। इन कविताओं से गुज़रते हुए पाठक देख सकेंगे कि ‘छायावाद’ के बाद हिन्दी कविता का अगला चरण अपने यथार्थ में कितना द्वन्द्वात्मक है और निज के जीवन के साथ समाज और व्यवस्था के स्तर पर कितना कठिन संघर्ष है तो कितना कठिन उन सपनों को जीना है जो स्वतन्त्रता-पूर्व दिखे और बाद में छिन्न-भिन्न होते चले गये।

कह सकते हैं कि सत्तर-पचहत्तर वर्षों की इस काव्य-यात्रा में हिन्दी कविता के विकास, द्वैत तथा संघर्ष को अनेक रूपों में देखा-समझा जा सकता है जो भूमिकाओं से लेकर काव्य-वस्तु में संकेतित हैं। यद्यपि मूलतः कवि होने के बावजूद नेमिचन्द्र जैन ने कविताएँ कम लिखीं पर जो लिखीं उनमें एक बड़ा संसार खुलता है। इनका विन्यास प्रयोगशील है और इनकी संवेदना विराट को छूती है। इस दीर्घ अवधि में बढ़ती हुई यह यात्रा व्यक्ति- समाज, भावना, बुद्धि आदर्श-यथार्थ तथा प्रत्यक्ष-परोक्ष सत्ता पर गहरे विमर्श के साथ जो प्रश्नाकुल परिवेश रचती है, उससे हिन्दी कविता समृद्ध होती है। यह कविता निरे तर्क और वक्तव्यों की कविता नहीं है, जीवन के गहरे क्षणों से साक्षात्कार की कविता है, इसलिए इसमें चिन्तनशीलता है और मन को उद्वेलित करनेवाली दृष्टि भी।

इस खण्ड में शरत् चन्द्र चट्टोपाध्याय के बहुचर्चित उपन्यास ‘बिराज बहू’ का नाट्य-रूपान्तरण सहित ‘सिन्दबाद जहाजी’ नामक मौलिक नाटक, ‘रामकथा’ पर कठपुतली नाटक, ‘बुन्देलखण्ड की शादी’ पर वृत्तचित्रा, आलेख और एक अप्रकाशित मर्मस्पर्शी कहानी भी है। इसके साथ-साथ हमारे पारम्परिक रंगमंच सहित आज के हिन्दी रंगमंच पर आधारित विचारोत्तेजक रेडियो रूपक भी हैं। 

अंतिम खण्ड मुख्य रूप से उनसे लिए गये साक्षात्कारों का संकलन है जिसमें एक हिस्सा ‘मेरे साक्षात्कार’ नामक उनकी पुस्तक की अविकल प्रस्तुति है। शेष साक्षात्कार असंकलित हैं जो अब तक पुस्तक का हिस्सा नहीं बने थे। इन साक्षात्कारों में दो साक्षात्कार नेमिजी द्वारा अज्ञेय और शमशेर बहादुर सिंह से की गयी बातचीत पर आधारित हैं।

इन साक्षात्कारों में नेमिजी के जीवन, उनके संघर्ष, मान्यताएँ और कृतित्व के प्रायः सभी पक्षों पर विस्तार से प्रकाश पड़ा है। स्वयं उन्होंने भी अपने जीवन के विविध पड़ावों पर खुलकर बात की है और शायद ही कोई पक्ष हो जिसे छुपाया हो। इस दृष्टि से कृष्ण बलदेव वैद और प्रतिभा अग्रवाल द्वारा लिए गये उनके साक्षात्कार विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं जिन्हें आप चाहें तो उनके जीवन की सफलताओं-विफलताओं के साथ उनके समेकित कृतित्व का सिंहावलोकन कह सकते हैं। शेष साक्षात्कार और असंकलित भेंटवार्ताएँ कविता, कहानी, आलोचना जैसी साहित्यिक विधाओं पर एक समग्र आलोचक के नाते नेमिचन्द्र जैन ने बेहद सधी हुई प्रतिक्रियाएँ दी हैं तो नाटक-रंगमंच के सैद्धान्तिक और व्यावहारिक पक्षों पर विस्तार से बात की है। इस तरह साहित्य, कला और संस्कृति के ज्वलन्त प्रश्नों पर गम्भीरता से विचार करते हुए नेमिजी ने जहाँ विचार और चिन्तन की अपरिहार्यता सिद्ध की है, वहीं सतत जागरूकता को सांस्कृतिक उदासीनता के बरअक्स एक आवश्यकता निरूपित की है। 

 उम्मीद है यह रचनावली एक सन्दर्भ सामग्री के रूप में जरूर पढ़ी जाएगी और नेमि जी के कृतित्व और व्यक्तित्व को  समग्रता में जानने का  मौका मिलेगा।

(विमल कुमार वरिष्ठ पत्रकार और कवि हैं।)

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