Thursday, December 2, 2021

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स्टेन स्वामी की मौत से नंगा हो गया है केन्द्र सरकार का फ़ासीवादी चेहरा

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विगत 5 जुलाई 2021 को होली फैमली अस्पताल मुंबई में दिन के 1:30 बजे स्टेन स्वामी ने अंतिम सांस ली। इस दौरान मुंबई हाई कोर्ट में स्टेन स्वामी की अंतरिम जमानत की सुनवायी चल रही थी। उसी समय अस्पताल प्रबंधन ने कोर्ट को सूचना दिया कि स्टेन स्वामी का हार्ट अटैक से निधन हो गया है। ये शब्द सुन कर संबंधित न्यायधीश के पास बोलने के लिए कोई शब्द नहीं था ऐसा कहना था माननीय न्यायधीश महोदय का। शब्द भी क्यों होता! क्योंकि न्यायिक हिरासत में स्टेन स्वामी की हत्या जो हो गई थी। इस घटना के बाद पूरा झारखंड गहरे सदमे में है और सारे लोग उद्वेलित हैं। 

बताते चलें कि झारखण्ड अलग राज्य बनने के बाद पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी बने। राज्य बनने के बाद इनके नेतृत्व में कॉरपोरेट घराने के साथ लगभग तीन सालों में 65 एमओयू समझौता पत्र पर हस्ताक्षर किया गया। वहीं पोटा जैसे काले कानून के तहत झारखण्ड में 250 लोगों पर एफआईआर दर्ज किया चुका था और दर्जनों लोगों को गिरफ्तार किया गया था। ऐसी विषम परिस्थितियों के बीच झारखंड का जल, जंगल, जमीन एवं समस्त प्राकृतिक संपदाओं को बचाने के लिए 2005 में झारखण्ड विस्थापन विरोधी समन्वय समिति नामक पूरे झारखण्ड क्षेत्र से लगभग 24 जन संगठनों का एक मोर्चा बना। जिसमें स्टेन स्वामी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। जिसके तहत (एमओयू) समझौता पत्र जो कॉरपोरेट घराने के साथ किया गया है, उसे रद्द किया जाए एवं पूर्व में विस्थापितों के संपूर्ण जीवन स्तर को ऊंचा उठाया जाए आदि मांग के साथ आन्दोलन का सिलसिला चल पड़ा। 

2007 में इन्हीं जनांदोलनों एवं अन्य राज्य के विस्थापित संगठनों के साथ मिलकर 22-23 मार्च 2007 को पटेल भवन, लालपुर, रांची में एक अखिल भारतीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। जिसमें 13 राज्यों के लगभग 650 प्रतिनिधियों के बीच विस्थापन विरोधी जनविकास आन्दोलन नामक राष्ट्रीय मोर्चा का गठन कर जल जंगल-जमीन एवं समस्त प्राकृतिक सम्पदा की लूट का विरोध करने का आह्वान किया गया। मोर्चा गठन एवं उसे आगे बढ़ाने में स्टेन स्वामी की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इसके अलावा जब पोटा विरोधी जन मोर्चा बनाकर पोटा जैसे काले कानून का विरोध किया गया, तब भी स्टेन स्वामी अगली कतार में खड़े रहे।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के शासन काल में नक्सल उन्मूलन के नाम पर वर्ष 2009-10 में ऑपरेशन ग्रीनहंट पी चिदंबरम के नेतृत्व में चलाया गया। लेकिन इसके नाम पर जब निहत्थे आदिवासी, दलित फर्जी मुठभेड़ में मारे जाने लगे तब राँची, झारखंड में ऑपरेशन ग्रीनहंट विरोधी नागरिक मंच बनाकर इसका विरोध करने में स्टेन स्वामी की बड़ी भूमिका रही। वर्ष 2011 में एक फर्जी मामले में आदिवासी संस्कृतिकर्मी जीतन मरांडी को फांसी की सजा सुनाई गई थी। तब भी स्टेन स्वामी ने जीतन रिहाई मंच में शामिल होकर इस आदिवासी कलाकार की रिहाई के लिए काफी परिश्रम किया तब जाकर रिहाई संभव हुई। स्टेन स्वामी यहीं नहीं रूके, जब पूरे झारखण्ड में नक्सली, माओवादी बताकर हजारों आदिवासी, मूलवासी निहत्थे युवकों को जेलों में कैद किया गया तब उन्होंने इसका एक सर्वे करा कर इस बात को सामने लाने की कोशिश की। इन कॉडर ट्रायल बंदी को न्याय दिलाने हेतु कोर्ट में पीटिशन दायर की गयी एवं रिहाई के लिए हर संभव कोशिश की गयी। 

आज झारखण्ड अपना एक अभिभावक, मार्गदर्शक, जनांदोलनों का अगुवा खो दिया है, जिससे पूरे झारखंड को गहरा सदमा लगा है और पूरा झारखंड उद्वेलित है। 

बता दें कि उनके ऊपर आईपीसी की धारा 120(B), 121, 121(A), 124(A) और 34 लगाई गई थी। साथ ही यूएपीए की धारा 13, 16, 18, 20, 38 और 39 लगाई गई थी। एल्गार परिषद से जुड़े मामले में स्टेन स्वामी के अलावा 15 और लोगों को गिरफ्तार किया गया था।

84 वर्षीय स्टेन स्वामी की शारीरिक, मानसिक स्थिति से अवगत रहने के बावजूद जमानत देने में विलंब हुई, वह भी तब, जब भारत समेत पूरी दुनिया में कोरोना वायरस जैसी महामारी का दौर चल रहा है। खुद सुप्रीम कोर्ट के गाइड लाइन में जेलों में भीड़ कम करने का आदेश है, तब भी 84 वर्षीय स्टेन स्वामी सहित कई राजनीतिक, सामाजिक कार्यकर्ता एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता बंदी जेलों में बंद हैं, जो 60 साल से अधिक के हैं, जिनको अविलम्ब जमानत पर छोड़ना चाहिए। मगर ऐसा होते दिखाई नहीं दे रहा है, आखिर क्यों? 

इस पर सवाल खड़े करते हुए विस्थापन विरोधी जन-विकास आन्दोलन, झारखंड इकाई के संयोजक दामोदर तुरी कहते हैं कि क्या हमारे देश की न्यायपालिका किसी खास राजनीतिक पार्टी एवं वर्ग के लिए बदले की भावना से लैश होकर काम कर रही है? क्योंकि स्टेन स्वामी की न्यायिक हिरासत में हुई हत्या ने हमें अंदर से हिला दिया है। न्यायिक हिरासत में स्टेन स्वामी की हत्या के बाद हमें वीर बिरसा मुण्डा की ब्रिटिश हुकूमत की न्यायिक हिरासत में हत्या की याद ताजा हो गई है। आजादी के बाद भी हमें बिरसा मुण्डा के रूप में स्टेन स्वामी को खोना पड़ा है।

तूरी कहते हैं कि विडंबना ही है कि बिरसा का आंदोलन ब्रिटिश हुकूमत द्वारा जल, जंगल, जमीन व  समस्त प्राकृतिक संपदा की लूट के खिलाफ था, वहीं स्टेन स्वामी भी जल, जंगल, जमीन व समस्त प्राकृतिक संपदा का कारपोरेट घराने की लूट के खिलाफ आजीवन संघर्षरत रहे और आदिवासियों-दलितों एवं अन्य शोषित पीड़ित जनता के पक्ष में संवैधानिक अधिकारों जैसे सीएनटी व एसपीटी एक्ट, ऐसा कानून, पांचवीं अनुसूची, समता जजमेंट, वन कानून ग्राम सभा आदि को सुनिश्चित कराने हेतु कार्यरत थे। 

सामाजिक कार्यकर्ता सुनील मिंज कहते हैं कि एक तो स्टेन ईसाई मिशनरी से थे इन धर्मावलम्बियों को बीजेपी और उसके लगवे-भगवे संगठन मानव की श्रेणी में नहीं रखते हैं। आदिवासियों को तो वे जन्मजात महाशूद्र की श्रेणी में रखते हैं। स्टेन स्वामी ईसाई धर्म से ऊपर उठकर बंधुता, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, प्राकृतिक और संवैधानिक रूप से समानता और सभी तरह की स्वतंत्रता बहाल करने की लड़ाई लड़ रहे थे। वे कथित रूप से माओवादियों से जुड़ाव के नाम पर जेल के शिकंजे में डाले गये थे, वे दलित और आदिवासियों की रिहाई के लिए संघर्षरत थे। वे जल, जंगल, जमीन और प्राकृतिक संसाधन के न्यायपूर्ण वितरण के लिए आजीवन  चिंतनशील रहे।

यह सरकार जो कारपोरेट घरानों के इशारों पर चलती है, ऐसे तमाम प्रगतिशील जमातों को येन-केन प्रकारेण नेस्तनाबूद करना चाहती है, ताकि लूट का मैदान खाली रहे। मैं समझता हूं कि फादर स्टेन स्वामी इसी के शिकार हुए। उनकी पार्किंसन की बहुत पुरानी बीमारी थी। कारावास में बीमार पड़ने पर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। ऐसे 84 वर्षीय अगुआ वयोवृद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता को मार डालना, कहाँ की सुशासन व्यवस्था है? स्टेन स्वामी की इस मौत को मैं न्यायिक हत्या मानता हूं और इसे लेकर सरकार की कड़ी निंदा करता हूँ।

सामाजिक कार्यकर्ता वाल्टर केन्डुलना कहते हैं – ना सिर्फ स्टेन स्वामी बल्कि उसी प्रकार हजारों लोग, विशेषकर आदिवासी एवं समाज के हाशिये पर पड़े लोग शासकों के सिस्टमैटिक और कानून के दुरुपयोग द्वारा हत्या के शिकार हैं।

पत्रकार व सामाजिक कार्यकर्ता योगो पुर्ती का कहना है कि स्टेन स्वामी राज्य व देश में दबाये जाने वालों के साथ हमेशा मुखर होकर खड़े रहे। आदिवासियों की आवाज बने। 84 साल के ऐसे बीमार बुजुर्ग के साथ ऐसा अमानवीय व्यवहार किया जाना निंदनीय है। आदिवासियों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले को एक साजिश के तहत हमेशा के लिए दफन कर दिया गया।

स्वामी जी का निधन नहीं एक प्रायोजित हत्या है। एक मानवाधिकार कार्यकर्ता की इस तरह से हत्या करना भारतीय राजसत्ता की कमजोरी को दर्शाता है। 

आदिवासी अधिकार की वेबसाइट ‘सखुआ’ की संपादक मोनिका मरांडी बड़े द्रवित शब्दों में कहती हैं- फादर स्टेन स्वामी जी की मौत से मैं बहुत आहत हूँ। आदिवासी समाज के लिए एक बड़ी क्षति हुई है। वो जीवन भर आदिवासी लोगों के लिए संघर्ष करते रहे।

पार्किंसन से पीड़ित होने के बावजूद उनके साथ इतना बुरा व्यवहार किया गया। क्या ये मानवता के खिलाफ नहीं है? चोरी और कत्ल करने वाले लोगों को एसी रूम और अधिकारों की लड़ाई लड़ने वालों को पानी तक नसीब न हो।

क्या आपको नहीं लगता कि ये वैसा ही व्यवहार है जो भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों के साथ अंग्रेजों ने किया था। जो अंग्रेज सरकार हमारे देश को बस लूटने और तानाशाही करने आई थी। 

इससे साफ हो गया है कि ये सरकार आदिवासियों के पक्ष में तो बिल्कुल नहीं है। फादर स्टेन स्वामी को हम में से कोई भूल नहीं सकता और हम लड़ेंगे, जब तक इंसाफ नहीं मिल जाता।

भारत ज्ञान विज्ञान समिति के राष्ट्रीय महासचिव काशीनाथ चटर्जी कहते हैं — फादर स्टेन स्वामी की मौत को हम गम्भीर दुख के साथ कहते हैं कि यह हत्या है। दुखद यह है कि संविधान में जीने के अधिकार का कानून भी उन पर लागू नहीं हुआ। झारखण्ड में शोषित-पीड़ित व हाशिये पर स्थित आदिवासियों की आवाज और उनके जल, जंगल और जमीन के लिए लगातार संघर्ष करने वाले मानवाधिकार की एक बुलंद आवाज का जाना झारखंड ही नहीं देश के लिए एक अपूर्णीय क्षति है। 

असिस्टेंट प्रोफेसर नीतीशा खलखो कहती हैं — आदिवासियों के लिए लड़ने वालों के साथ अब यही हश्र होगा जिसके शिकार स्टेन स्वामी हुए।

अपनी जन्मभूमि से दूर रहकर एक मिशनरी व्यक्ति धर्म से इतर आदिवासियों को क्या कुछ देता है, वह आज उनकी मौत ने बता दिया है।

आरएसएस का रोना है कि आदिवासी क्रिश्चियन बन रहे हैं, ऐसे स्टेटमेंट पर फादर स्टेन स्वामी एक तमाचा जड़ते हैं, जो आदिवासियों के हित में अपना जीवन समाप्त करने तक लड़ते रहे। 84 वर्षीय बुज़ुर्ग की इस लोकतंत्र में हुई पोलिटिकल हत्या है ऐसे में आज जो आदिवासी के पक्ष में कई अन्य खड़े होने वाले लोग जेल में है, हमें उनकी चिंता बढ़ा दी है।

राजनीतिक व सामाजिक कार्यकर्ता रतन तिर्की कहते हैं – आदिवासियों और झारखंडियों के हक़ अधिकार के लिए हमेशा से आवाज उठाने वाले 84 वर्षीय बुजुर्ग फादर स्टेन स्वामी के निधन से देश मर्माहत है। सच कहा जाये तो स्टेन स्वामी मरे नहीं बल्कि मोदी सरकार के काले कानून यूएपीए के तहत पकड़कर उनकी हत्या कर दी गई। फादर स्टेन की मृत्यु से अब यूएपीए काले कानून के खिलाफ और भी जोरदाऱ आंदोलन की जरूरत है। 

तिर्की कहते हैं कि देश और झारखंड में आदिवासियों की एक मुखर आवाज थे स्टेन स्वामी। उनके साथ हमारा 30 सालों के साझे संघर्ष का इतिहास रहा है। दलित पिछड़े और गरीब आदिवासियों झारखंडियों के लिए हमेशा से स्टेन स्वामी संवैधानिक अधिकारों की वकालत करते रहे।

मुझे याद है ग्रीन हंट के खिलाफ राँची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में एक विशाल आंदोलन की कमान स्टेन स्वामी ने ही उठाया था। यही नहीं विस्थापन, पलायन, जंगल में मालिकाना अधिकार, चाईबासा पश्चिमी सिंहभूम में रोरो परियोजना से होने वाले विस्थापन पर भी उन्होंने आंदोलन की अगुवाई की थी। 1987 में आल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन आजसू द्वारा अलग राज्य आंदोलन को भी उनका मार्गदर्शन मिलता रहा था। उनके द्वारा उठाये गये हक़ अधिकार की आवाज़ अब थमने वाली नहीं है। संघर्ष और तेज होगा।

पूर्व सांसद थियोदोर किडो कहते हैं- गरीब, पिछड़े, लाचार आदिवासियों की आवाज फादर स्टेन स्वामी की स्वाभाविक मौत नहीं हुई, एक तरह की हत्या है, सिस्टम के हाथों हत्या! 84 साल के बीमार आदमी को महामारी के दौर में बिना किसी ठोस सबूत के लगातार जेल में रखना एक बड़ा गुनाह है। अफसोस, फादर स्टेन स्वामी आपने गरीब लोगों को न्याय दिलाने के लिए आजीवन संघर्ष किया, पर आपके साथ सरासर अन्याय हुआ! हम झारखंड सरकार से न्यायिक जांच की मांग करते हैं। 

एक युवा आकाश टुड्डू का कहना है कि झारखंड की सोरेन सरकार भी फादर को बचाने में विफल रही। झारखंड में आदिवासियों के नाम पर केवल राजनीति हुई है, कोई बदलाव नहीं।

आदिवासी चिंतक महादेव टोप्पो कहते हैं — आज जबकि पूरी दुनिया आदिवासी जीवन से प्रेरित होती दिख रही है, ऐसे समय में आदिवासियों के पक्ष में संघर्ष करता एक जुझारु व्यक्तित्व का गुजरना बेहद दुखद है। स्टेन स्वामी के संघर्ष की प्रासंगिकता भी स्वयंसिद्ध हो जाती है। लेकिन उनकी मौत कई सवाल भी खड़े करती है।

झारखंड जनाधिकार महासभा की अलका कहती हैं- महासभा दिवंगत जनाधिकारों के योद्धा साथी स्टेन को सादर हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करती है। स्टेन दशकों तक झारखंड के शोषित जनों की आवाज बने रहे। वे झारखंड जनाधिकार महासभा के गठन और संचालन में भी एक प्रमुख और अग्रणी भूमिका में रहे। उनके संकल्प हमारे लिए प्रेरक रहे हैं, प्रेरक बने रहेंगे। स्टेन हम सबकी यादों में और संघर्षों में जीवन्त रहेंगे। उनकी मौत सरकार द्वारा हत्या है। हम इसके लिए एनआईए और केन्द्र सरकार को पूरी तरह दोषी मानते हैं और उनकी भूमिका की निंदा करते हैं। साथी स्टेन की मौत केन्द्र की भाजपा सरकार के फासीवादी चेहरे को बेनकाब कर गयी।

सामाजिक कार्यकर्ता अनूप महतो कहते हैं – यह हत्या स्टेन स्वामी के साथ-साथ पूरे आदिवासी एवं झारखंडी जन आवाज की हत्या है। कहीं ना कहीं यह स्पष्ट दिखता है कि उद्योगपति एवं पूंजीपति घरानों की मंशा को पूरा करने के लिए केंद्र की हत्यारी व्यवस्था ने स्टेन स्वामी को मार डाला, किंतु उनके विचार और आवाज को उद्योगपति एवं पूंजीपति घरानों की दलाल सरकार कभी नहीं मार सकती, यह एक प्रायोजित हत्या है, इसका हम झारखंडी पूरे जोर से विरोध करते हैं, जिस काले कानून यूएपीए के तहत स्टेन स्वामी का शोषण एवं हत्या हुई है, इस काले कानून का भी हम झारखंडी पुरजोर विरोध करते हैं एवं स्टेन स्वामी की हत्या के खिलाफ हम आंदोलन में उतरेंगे।

आदिवासी मामलों की जानकार बंदना टेटे कहती हैं- एक वरिष्ठ नागरिक जो दूसरों पर हो रहे अन्याय के खिलाफ खड़ा था, उस इंसान को झूठे केस में फंसाकर और अमानवीय परिस्थितियों में केंद्र की सत्ता ने मार डाला। यह केंद्र प्रायोजित हत्या है।

सामाजिक कार्यकर्ता एलिना होरो कहती हैं- फादर स्टेन को मैं 2005 से जान रही हूं, उनका आदिवासियों / मूलवासियों के साथ बहुत नजदीकी का रिश्ता रहा, वे उनके साथ होते अन्याय के खिलाफ हमेशा मुखर रहे, खासकर झूठे मामलों में फंसाए गए विचाराधीन कैदियों जिनमें अधिकांश आदिवासी / मूलवासी रहे हैं, के लिए काम कर रहे थे, खासकर जमीन के अधिकार से वंचित करने संबंधी कानून हों या आदिवासियों के मानवाधिकार के उल्लंघन से संबंधित, वो हमेशा सच्चाई के लिए निडर खड़े रहे, उनका जीवन—संघर्ष बहुतों के लिए प्रेरणा और मार्गदर्शक होगा! उनकी मौत की जिम्मेवार केंद्र सरकार, एनआईए सहित पूरी व्यवस्था है, जो हमेशा मानवाधिकार के संरक्षकों को खतरा के रूप में देखती रही है। जिस वजह से आज हमारा प्रजातंत्र ही खतरे में है।

अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद, झारखंड के प्रदेश संयुक्त सचिव व वृहद झारखण्ड जनाधिकार मंच के केंद्रीय अध्यक्ष बिरसा सोय कहते हैं — फादर एक निर्दोष 84 साल के बुजुर्ग जो पार्किंसन बीमारी से ग्रसित थे, ऐसे सामाजिक कार्यकर्ता के साथ एनआईए ने जो अमानवीय व्यवहार किया, वो चिंता का विषय है। फादर पर कोरेगांव के तहत जो केस हुआ वह फर्जी था। इस उम्र के व्यक्ति को जेल में रखना और एनआईए द्वारा आरोप सिद्ध नहीं कर पाना साबित करता है कि फादर पर झूठे आरोप लगाए गए थे। इस लिए हम सभी सामाजिक कार्यकर्ता यही मानते हैं कि केंद्र सरकार और एनआईए ने फादर स्टेन स्वामी की हत्या की। फादर स्टेन स्वामी ने अपना पूरा जीवन पिछड़ों, गरीबों के लिए काम करने में लगा दिया। उनका दुखद निधन एक न्यायिक हत्या का मामला है, इसके लिए गृह मंत्रालय और कोर्ट दोनों बराबरी से जिम्मेदार हैं।

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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