Wednesday, February 8, 2023

ग्राउंड रिपोर्ट: अयोध्या में रैदास के परती खेतों में उग रही है भांग, कोरोना में बंद हुए काम-काज 

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बीजेपी ने देश में सत्ता की सीढ़ियां अयोध्या को पायदान बना कर तय कीं। और जयश्री राम को उसने अपना केंद्रीय नारा बना लिया। यह नारा लोगों में धर्म के प्रति आस्था बढ़ाने या फिर आध्यात्म के लिए नहीं बल्कि धार्मिक उन्माद भड़काने और समाज को नफरत और घृणा के आधार पर बांटने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। बाबरी मस्जिद विध्वंस से लेकर राम मंदिर निर्माण तक अयोध्या बीजेपी की राजनीति का केंद्र रही। इससे बीजेपी ने तो बहुत कुछ हासिल किया।
लेकिन वहां के लोगों को क्या मिला? यह सबसे बड़ा सवाल बन जाता है।

चुनाव के इस मौके पर इसकी पड़ताल बेहद मौजूं हो जाती है। और मैं बस से निकल पड़ा इलाहाबाद से अयोध्या की यात्रा पर। रास्ते में सुल्तानपुर जिले का कूड़ेभार जैसे ही पीछे छूटा और अयोध्या जिला शुरू हुआ। मैं बस से सरहद पर स्थित चौरे बाज़ार में उतर गया। सामने केशराम अपनी मोची की दुकान पर बैठे काम कर रहे थे। और ग्राहक के रूप में एक शख्स उनकी दुकान के सामने खड़ा था। दुआ सलाम के बाद बातचीत में केशराम पहले बोलने के लिए तैयार नहीं हुये। एकाएक कारण समझ में नहीं आया। लेकिन पैनी नजर से देखने पर पता चला कि भगवा गमछा पहना वह शख्स केशराम की जुबान के लिए जिंदा ताला साबित हो रहा है। पूछने पर उसने अपना नाम शत्रुघन बताया।

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शत्रुघन।

अपने पूरे हाव-भाव में शत्रुघन मौजूदा सत्ता के प्रतिनिधि होने का एहसास दिला रहे थे। शत्रुघन कुर्मी समाज से आते हैं। उन्हें न केवल सारे जन सुखी दिख रहे थे बल्कि उनकी मानें तो, “पूरे सूबे में अमन-चैन का माहौल है। और सब सुरक्षित महसूस कर रहे हैं।” शत्रुघन का यह राग शायद बीजेपी के अनुप्रिया पटेल के अपना दल के साथ गठबंधन के चलते हो। लेकिन पीड़ा सहने की भी तो अपनी सीमा होती है। एक हद पार करने के बाद वह बाहर फूट पड़ती है। कुछ ऐसा ही केशराम के साथ हुआ। शत्रुघन के फटे जूते की सिलाई रोके बगैर उन्होंने सत्ता के खिलाफ पांच सालों में मन में जमी अपनी सारी भड़ास निकाल दी, “मेरे पास 10-12 बिस्वा खेत है लेकिन योगी के सांड़ों के चलते बुआई नहीं करते, परती रखते हैं। क्योंकि योगी के सांड़ सिर्फ़ फसल नहीं मेरी लागत भी चर जाते हैं”। मैंने उनसे जब तंज अंदाज में बोला कि इसीलिये तो मोदी जी कह रहे हैं कि आप लोग अपना खेत अडानी-अंबानी को दे दीजिये। फिर तो केशराम का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया, “ऐसे कइसे दइ देई अपनी ज़मीन। आएन बड़ा हमार खेत लेय वाले”।

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केशराम।

कोरोना में उपवास  

शत्रुघन के लिये जहां कोरोना काल ‘मजे का काल’ रहा वहीं मोची केशराम के लिये यह उपवास का काल साबित हुआ। सरकारी राशन के बारे में पूछने पर वह कहते हैं, “पांच किलो राशन में महीना भर तीन परानी के पेट कैसे पल जायेगा। एकै रोजी रही (मोची का काम) वो भी कोरोना में बंद रही। मोची के काम से दिन भर में कभी 100 तो कभी 50 रुपिया कमाई हो जाती है”।

महंगाई के मुद्दे पर शत्रुघन तपाक से बोल पड़ते हैं कि कोई भी सरकार आये महंगाई बढ़ेगी ही बढ़ेगी। इस पर केशराम मेरी पत्रकार की भूमिका में उतरते हुये शत्रुघन से पूछते हैं, “कड़ुवा तेल इतना महंगा ऐसे पहले के कौनो सरकार में रहा का”?

गैस वेल्डिंग का काम करने वाले रामचंदर की भी यही पीड़ा है। महंगाई उनको भी मार रही है, “कोरोना में दुकान दौरी बंद कइके घरे के सारी जमा पूंजी खाय के जिनगी बचाये हैं। महंगाई के बहुत असर है ज़िंदग़ी पर”। रामचंदर के मुताबिक “महंगाई की असली वजह लीलगाह (नीलगाय, सांड़) हैं। ये सारी फसल चट कर जाते हैं। रौंद डालते हैं। जब खेत में कुछ पैदा नहीं होगा तो महंगाई बढ़ेगी ही”।

बाजार में गेटकीपरी करने वाले 65 साल के राम भवन को मेहनताना के तौर पर 100 रुपये रोज़ाना मिलता है। वह कहते हैं, “कोरोना में राशनकार्ड कट गया। राशन नहीं मिलता। क्या करें”।

वहीं बाज़ार में साइकिल रिपेयरिंग का काम करने वाले खुशमिज़ाज राम प्रताप बताते हैं कि उनका काम लूज चल रहा है। वजह पूछने पर बताते हैं कि “सबका काम धंधा लूज चल रहा है तो मेरा भी लूज चल रहा है। चुनाव में स्थिति खराब अहै। कोरोना में दिक्कत बहुत भवा”। जिले का नाम बदलने के जीवन पर पड़ने वाले असर के सवाल पर राम प्रताप कहते हैं कि नाम बदलने से जीवन में अच्छा नहीं होता, अच्छा होने के लिये काम भी अच्छा होना चाहिये।   

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राम प्रताप।

युवा श्यामसुंदर तिवारी के पिता की चौराहे पर कपड़े की दुकान है। पिता की गैर मौजूदगी में दुकान पर बैठे श्याम सुंदर भाजपा के समर्थक हैं। वो इलाहाबाद में छात्रों पर हुई पुलिसिया बर्बरता पर तो नाराज़गी जाहिर करते हैं। लेकिन वह महंगाई की वजह कोविड को बताते हैं और बेरोज़गारी को मुद्दा बताते हैं। सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे श्याम सुंदर तिवारी निजीकरण को ज़रूरी और सरकार की मज़बूरी बताते हैं। वो कहते हैं विदेशों में निजी क्षेत्र भारत से ज़्यादा हैं इसलिये वो तरक्की कर रहे हैं।

नहीं शुरू हो पाईं कोरोना में बंद हुई दुकानें और काम-धंधे

टेलिरिंग शॉप चलाने वाले राजेश सरकार से बहुत ज़्यादा ख़फ़ा हैं। उनकी यह नाराजगी समस्याओं की लंबी फेहरिस्त के तौर पर सामने आती है, “सरकार से परेशान हैं हम लोग। बच्चों की पढ़ाई बर्बाद हो गई है। महंगाई एकदम चरम सीमा पर है। परिवार किसी तरह चल रहा है इस महंगाई में। कोरोना में काम काज चौपट हो गये। यहां इसी बाज़ार में कितने लोगों के काम धंधे बंद हो गये। फिर नहीं शुरू कर पाये वो। बेरोज़गारी कोरोना के बाद से बेतहाशा बढ़ गई है। ख़रीदारों के पास पैसा ही नहीं है तो उन्हीं में बहुत दुकान खोलकर बैठ गये हैं तो कौन ख़रीदेगा”।

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राजेश अपनी दुकान पर।

सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए वो कहते हैं, “लॉकडाउन में आदमी कि आमदनी हुई नहीं। आप हमसे दो पैसे कमा रहे हैं हम आपसे दो पैसे कमा रहे हैं। इसी तरह चल रहा था सबका। जो जमा पूंजी थी वो कोरोना में परिवार को खिलाने जिलाने में खर्च हो गया। हम सब ग़रीब आदमी हैं किसी तरह चल रही हैं ज़िंदग़ी”। जिले का नाम बदलने के सवाल पर राजेश कहते हैं “जो करना चाहिये वो तो कर नहीं रहे। नाम बदलने से क्या फर्क पड़ेगा”।  

रिक्शा चालक बजरंगी कहते हैं हमें स्कूलों में फीस पूरी देनी पड़ती है। दिन भर मेहनत करता हूँ तब जाकर पैसा मिलता है। लेकिन क्लास नहीं चलती। मोबाइल पर बच्चे क्या पढ़ेंगे।

खेलो इंडिया बिना स्टेडियम

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश में ‘खेलो इंडिया’ कार्यक्रम चला रहे हैं। लेकिन शायद यह डिजिटल कार्यक्रम है जिसमें स्टेडियम जैसे ज़मीनी इन्फ्रास्ट्रक्चर की ज़रूरत नहीं पड़ती। अयोध्या जिले में मायावती के शासन काल में बनना शुरू हुआ और उनकी सरकार जाने तक लगभग 70% बन चुका अंबेडकर इंटरनेशनल स्पोर्ट्स स्टेडियम विगत 10 वर्षों से उतने पर ही ठप पड़ा हुआ है। जबकि विगत 5 वर्षों से यूपी में डबल इंजन वाली भाजपा की सरकार चल रही है।

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निर्माणाधीन स्टेडियम।

स्टेडियम के ठीक सामने हाईवे की दूसरी तरफ़ परचून के दुकानदार इस मसले पर सरकार का बिल्कुल बचाव करते दिखे। उनका कहना था कि स्टेडियम भी बन जायेगा। अपना खेत उखड़ा (बटाई) पर देने वाले इन सज्जन को भी कुछ परेशानियां जरूर दिखती हैं लेकिन उसका भी वह तर्क ढूंढ लेते हैं, “इलाके में छुट्टा सांड़ों और नीलगायों का आतंक है लेकिन उसके लिये सरकार जिम्मेदार नहीं है। सरकार तो उन्हें रोकने के लिये योजना बना रही है”।

स्टेडियम के सवाल पर सलमान का कहना था कि 15वां साल तो शुरू हुए हो गया अभी और बहुत समय लगेगा, सरकार जाने कितना समय लगेगा? कामकाज के सवाल पर उन्होंने कहा कि किसी तरह ऊपर वाले के करम से जी रहा हूं। दो साल लगेगा वापस काम पटरी पर लौटने में।  

रोज़गार मांगने पर लाठी मारने वाली सरकार नहीं चाहिये   

स्नातक (बीएससी एग्रीकल्चर) कर चुके अतुल मौर्या ने हाल ही में एसएससी, सीजीएल का फॉर्म भरा था। पूछने पर उन्होंने परेशानियों का पिटारा खोल दिया, “जब घर जाते हैं तो लोग बाग पूछते हैं क्या कर रहे हो। कहते हैं पढ़ रहे हैं। तो घर गांव के लोग कहते हैं कब तक पढ़ते रहोगे अरे कुछ कमाओ-धमाओ तो चूल्हा-चौका चले। हम कहते हैं कुछ वैकेंसी नहीं निकल रही तो क्या करें। बाहर कमरा लेकर तैयारी करते हैं कि एक स्थायी नौकरी मिल जायेगी तो परिवार की सारी ज़रूरतें पूरी कर लेंगे। लेकिन इधर कई सालों से इस सरकार ने कोई वैकेंसी नहीं निकाली है। सब बंद हैं। तमाम विभागों में लाखों पद खाली पड़े हैं। कभी पेपर लीक हो जा रहा है तो परीक्षा रद्द हो जा रही है। पेपर होने के बाद भी कुछ हो जायेगा इसकी गारंटी नहीं है इस सरकार में। कहीं मामला कोर्ट में चला जा रहा है”।

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अतुल मौर्या।

लेकिन अतुल यही कहकर चुप नहीं बैठते। उनके पास इन परेशानियों का हल भी है, “हम रोजगार मांग रहे हैं तो हमको इस सरकार में लाठी मिल रही है। ये सरकार हम युवा लोगों के काबिल नहीं ऐसे में इस सरकार को अब हम उखाड़ फेकेंगे। सरकार को बदलेंगे तभी हम लोगों का कुछ काम होगा”।

केशव मौर्या तो डिप्टी सीएम हैं आपकी बिरादरी के हैं। क्या उनको वोट नहीं देंगे। इस सवाल पर अतुल मौर्या कहते हैं “वो डिप्टी सीएम हैं तो हमारे किस काम के हैं। जब वो हमें काम नहीं देंगे, रोज़गार नहीं देंगे तो हम उन्हें वोट क्यों दे। योगी बाबा जनता में नहीं जाते वो तो हवाई जहाज से चलते हैं उन्हें क्या पता कि जनता जी रही है कि मर रही है”। मैंने कहा कि सरकार तो कह रही है कि हमने फ़ैज़ाबाद को अयोध्या कर दिया है इसमें खुश हो जाइये। इसका अतुल बेहद सधे हुए अंदाज में काउंटर करते हैं, “माने हम ग़रीब हैं तो अपनी स्थिति बदलने के बजाय अपना नाम बदलकर अमीरचंद कर लें। या बेरोज़गार हैं तो तो अपना नाम कामचंद धर लें”।

इस सरकार से लोग भयभीत हैं

स्टेडियम के ठीक सामने डाभा सेमर गांव पड़ता है। अलीम कबाड़ बीनने का काम करते हैं। बताते हैं कोरोना में भूख से मरने वाले हालात पैदा हो गये थे। सबका काम काज बंद था तो मेरा भी बंद था। सांप्रदायिकता के सवाल पर अलीम कहते हैं हिंदू मुस्लिम जैसी कोई बात नहीं है। यहां सबमें भाईचारा है, प्रेम है। बताते हैं राशन मिलता है।

तुलसीराम भाई दिहाड़ी मजदूर हैं। कहते हैं “सबसे ज़्यादा लोग इस सरकार में हलकान हुये हैं। लोगों का सारा समय भय में बीतता है। कब जानें सनकी राजा तुग़लक की तरह सा नया फ़रमान ज़ारी कर दे। वो फैसले थोपते समय एक बार भी जनता की समस्याओं उसकी ज़िंदगी उसकी परेशानी के बारे में नहीं सोचते। कभी नोटबंदी, कभी लॉकडाउन, कभी कुछ, कभी कुछ”।

अर्जुन और विजय बताते हैं कि उनका राशन कार्ड नहीं बना है। वो कबाड़ बीनकर अपना जीवन यापन करते हैं। डिजिटल इंडिया में विजय के पास एक सामान्य मोबाइल फोन भी नहीं है। विजय सत्ता से इतने भयभीत हैं कि हमसे बात करने को तैयार नहीं होते वो कहते हैं भैय्या जीने-खाने दीजिये।

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स्टेडियम का अधबना हिस्सा।

बैटरी रिक्शा चालक अशोक मौर्या के सामने परेशानियों का पहाड़ खड़ा है। पूछने पर वह एक-एक कर गिनाना शुरू कर देते हैं, “कोरोना काल शुरू होने से एक सप्ताह पहले केवाईसी करवाकर खतौनी लगाकर बैंक से पैसा लेकर बैटरी रिक्शा ख़रीदा था। लेकिन 2 साल हो गये अभी तक एक किश्त नहीं दे पाया हूँ। बस किसी तरह से रोटी पानी चल रही है। रिक्शे की बैटरी खराब हो गई है लेकिन इतना सामर्थ्य नहीं है कि नई बैटरी लगवा लूँ। पैसा भरने का टेंशन अलग से है कहां से भरूं। खेत है 2-3 बीघे। लेकिन छुट्टा सांड़ों के चलते कुछ नहीं होता। महंगाई बहुत है। पहले 400 रुपये गैस था अब हजार रुपये में हो गई है। और कमाई वहीं कि वहीं है। बल्कि कम हो गई है। कड़ुवा तेल 200 रुपये हो गया। जितनी कमाई होती है बस खाने भर की होती है”।

उनकी समस्याओं की गठरी यहीं नहीं बंद हुई, “एक कमरे में पांच लोगों का परिवार रहता है। कॉलोनी के लिये आवेदन किया था आई थी लेकिन सेक्रेटरी ने कहा कि आपके पास पक्का मकान है। कैंसिल कर दिया। एक कमरा पक्का मकान हो गया है इस सरकार के मानक में। शौचालय, सिलेंडर सबके लिये फॉर्म भरा कुछ नहीं मिला। राशन कार्ड बना था। कोरोना के समय रद्द हो गया। किसी तरह से दोबारा राशन कॉर्ड बनवाया है लेकिन राशन नहीं मिल रहा। बहुत से लोगों का राशन कार्ड उस समय निरस्त हुआ। बड़े लोगों का नहीं छोटे लोगों का राशन कार्ड निरस्त हुआ”।    

अयोध्यानगरी में बंगाली दवाख़ाना

15 साल से अपनी मुक़म्मली की राह देखता अंबेडकर इंटरनेशनल स्टेडियम के सामने चौड़े हाईवे पर सरपट भागती महंगी कारों की हवा से बात करता बड़ी नहर के मुहाने पर टंगा बंगाली दवाखाना का विशाल होर्डिंग जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था का मजाक उड़ा रहा है। वहीं हाईवे पर परचून की दुकान चलाने वाले एक सज्जन ने बिना अपना नाम बताये बताया कि कोरोना में यहां बहुत लोग मरे हैं। लेकिन इसके लिये वो सरकार को जिम्मेदार नहीं मानते, महामारी को जिम्मेदार मानते हैं।

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बंगाली दवाखाना का बोर्ड।

लोग बताते हैं कि जिले की सार्वजनिक स्वास्थ्य बदहाल है। लोगों में बेपनाह ग़रीबी है। इसलिये वो गंभीर बीमारी की हालत में भी झोला छाप नीम हकीम डॉक्टरों के पास अपना इलाज कराने जाते हैं। मेडिकल स्टोर वाले भी आधे डॉक्टर हैं। लोग मर्ज बताकर मेडिकल स्टोर से भी दवाई लेकर खा लेते हैं। कोरोना के समय लोगों में भय था। जिनमें कोरोना के लक्षण भी थे उन्होंने बुखार सर्दी जुकाम की दाव लेकर खा ली। जो बच सकते थे बच गये।

परती खेतों में उग रही भांग

अयोध्या के तमाम गांवों की तस्वीर तो बिल्कुल बदली हुई है। कुछ घरों के सामने कंटीले तार दिखे तो कहीं महिलाओं की पुरानी साड़ियों से इलाकों को घेरा गया था। पता चला कि यह सब साड़ों और नीलगायों से बचाव के लिए किया गया है। दहशत और नुकसान का आलम यह है कि लोगों ने अब परंपरागत गेहूं, अरहर, मटर के बजाय सरसों बोना शुरू कर दिया है।

पूछने पर एक सज्जन अपना नाम न जाहिर करने की शर्त पर बताते हैं, “घर के सामने थोड़े बहुत साग-सब्जी बोने के लिये भी लोगों को कंटीले तार बांधने पड़ते हैं। जिनके पास कंटीला तार बांधने की क्षमता नहीं है वो लोग घर की महिलाओं की पुरानी साड़ी बांधकर साग-सब्जी को जानवरों से बचाने की नाकाम कोशिश करते हैं”।

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साड़ी से घेरेबंदी।

दलपतपुर मांझा गांव का एक किसान नाम न छापने की शर्त पर योगी पर तंज कसते हुये कहता है, “गंजेड़ी की सरकार में जनता के परती खेतों में भांग उग रही है। सरकार चाहती है हम लोग दिन रात वही भांग छानें मस्त रहें और घर परिवार रोटी-रोज़गार, खेती-बाड़ी की दुख पीड़ा से मुक्त रहें”।

इसी गांव के राम मूरत बताते हैं, “पहले खाने भर की हर फसल उगा लेते थे। लेकिन सांड़ों के उत्पात से अब गिनी चुनी फसलें हम बो रहे हैं। कई किसान थक हारकर परती छोड़ देते हैं तो उसमें कुछ नहीं होता है”।

चार ब्राह्मणों के घर के सामने लगी इंटरलॉक विधायक व सांसद की उपलब्धि  

डाभा सेमर गांव में चार ब्राह्मणों के घर के सामने 65 मीटर की इंटरलॉक सड़क बनवाने जैसी अप्रतिम उपलब्धि के लिये अयोध्या के विधायक वेद प्रकाश गुप्ता व अयोध्या के सांसद लल्लू सिंह ने एक खंडहर पर काली ग्रेनाइट के शिलापट पर सुनहरे अक्षरों से अपना नाम और उपलब्धि लिखवाकर लगवाया है।

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शिलापट समेत इंटरलॉक में कुल व्यय का ब्योरा भी इस शिलापट में दर्ज़ है।हमें फोटो लेते देख गांव के लोग हँसते हैं। पूछते हैं क्या यह भी आपके लिये मुद्दा है। 

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की अयोध्या से रिपोर्ट।)

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