Monday, August 8, 2022

ग्राउंड रिपोर्ट: खुद ढिबरी और लालटेन के दौर में जी रहा है दुनिया को रौशन करने वाला नेतरहाट

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नेतरहाट (लातेहार)। आजादी के 74 साल और अलग राज्य गठन के 21 साल बाद झारखंड आज भी बुनियादी सुविधाओं से कोसों दूर हैं। इसका जीता जाता उदाहरण है लातेहार जिले का महुआडांड़ प्रखंड का कुरगी और ताहेर गांव। आदिम जनजाति बहुल वाले ये गांव आधे और कुरगी पहाड़ों पर अगल-बगल में बसे हैं, वहीं ताहेर नेतरहाट से तीन किलोमीटर दूर होने के बावजूद टापू के समान हैं। बता दें कि आधे गांव में 49 घर और कुरगी गांव में 45 घर बिरजिया आदिम जनजाति परिवारों का है।

वहीं लगभग 200 की जनसंख्या वाला ताहेर गांव के घरों की कुल संख्या 30 है। जहां आदिम जनजातियों में 17 घर बिरजिया और 13 घर नागेसिया जनजातियों का है। ताहेर गांव दो टोली में बसा है। वैसे तो नेतरहाट से गांव पहुंचने के लिए तीन किलोमीटर की सड़क है। लेकिन वह काफी जर्जर है। गांव में पीने के लिए शुद्ध पेयजल की व्यवस्था नहीं है, बिरजिया आदिम जनजातियों की गर्भवती महिलाओं का प्रसव ज्यादातर गांव में ही होता है। गांव में आंगनबाड़ी केंद्र नहीं है न ही विद्यालय है। बच्चों को पड़ने वाला बीसीजी और डीबीसी टीका भी समय पर नहीं लगता है।

वहीं आधे और कुरगी गांवों तक जाने के लिए कोई व्यवस्थित सड़क नहीं है। वन विभाग द्वारा जंगल की निगरानी के लिए बनाई गई कच्ची सड़क पर चलकर इन गांवों तक पहुंचा जाता है। जो दूरूप पंचायत अंतर्गत दौना गांव से आधे गांव तक 10 किलोमीटर दूर है। दोनों गांवों के ग्रामीणों को यही सड़क गांव तक पहुंचाती है। दौना से प्रखंड मुख्यालय जाने के लिए इन्हें वाहन मिल जाता है।

बता दें कि झारखंड के लातेहार जिले का महुआडांड़ प्रखंड का पंचायत है नेतरहाट, जो प्रखंड मुख्यालय से 45 किलोमीटर दूर है। सर्वविदित है कि नेतरहाट राज्य में नेतरहाट विद्यालय व पर्यटन के लिए सुप्रसिद्ध है। यहां पूरे साल हजारों की संख्या में पर्यटक घूमने आते हैं। नेतरहाट एक पहाड़ी पर्यटन-स्थल है। यह समुद्र सतह से 3622 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। राजधानी रांची से इसकी दूरी 150 किलोमीटर है। प्रकृति ने इसे बहुत ही खूबसूरती से संवारा है। यहाँ पर लोग सूर्योदय व सूर्यास्त देखने आते हैं। यह नजारा नेतरहाट से करीब 10 किमी की दूरी पर आकर्षक ढंग से देखा जा सकता है। इसके अलावा यहां घाघरी एवं लोअर घाघरी नामक दो छोटे-छोटे जलप्रपात भी हैं, जो काफी प्रसिद्ध हैं।

नेतरहाट विद्यालय की स्‍थापना नवम्‍बर 1954 में हुई थी। तत्कालीन बिहार राज्‍य सरकार द्वारा स्‍थापित और गुरुकुल की तर्ज पर बने इस स्‍कूल में अभी भी प्रतियोगिता परीक्षा के आधार पर नामांकन होता है। यहां के अनेक छात्रों ने हरेक क्षेत्र में इस विद्यालय का नाम रौशन किया है। अभी भी छात्रों की आय के हिसाब से ही इस विद्यालय में फीस ली जाती है। हिन्‍दी माध्‍यम के इस विद्यालय में अग्रेंजी और संस्‍कृत भी पढ़ायी जाती है। बावजूद इसके नेतरहाट पंचायत के अंतर्गत आने वाले कई गांवों के लोग आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है।

नेतरहाट पंचायत का ताहेर गांव पूरी तरह मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। क्षेत्र का प्रशासनिक हलका इतना भ्रष्ट है कि इस गांव में एक भी शौचालय नहीं बनाया गया है। लेकिन इसे ओडीएफ (ओपेन डेफिकेसन फ्री यानी खुले में शौच मुक्त) घोषित कर दिया गया है। ऐसे में आलम यह है कि पुरूषों या सामान्य महिलाओं को कोई विशेष परेशानी तो नहीं होती है, क्योंकि उन्हें शौच के लिए खेतों या जंगल में जाना उनकी आदत में शुमार है। लेकिन वर्तमान दौर में गर्भवती महिलाओं व बीमार लोगों के लिए दूर जाना काफी कष्टकारी हो जाता है।

सबसे दुखद पहलू यह है कि गांव या आसपास के किसी गांव में स्वास्थ्य केन्द्र नहीं है, जिसकी वजह से खासकर गर्भवती महिलाओं को प्रसव के लिए काफी सोचना पड़ता है। अत: सामान्यत: उनका प्रसव पारंपरिक तौर पर गांव की कोई बुजुर्ग महिला करवाती है, जिसमें कभी-कभी बच्चा व जच्चा के लिए काफी खतरनाक स्थिति बन जाती है। कभी-कभी तो दोनों की भी जान चली जाती है। ऐसे में कई महिलाएं सुरक्षित प्रसव के लिए मायके या किसी रिश्तेदार के पास चली जाती हैं, जहां अस्पताल और शौच की सुविधा रहती है।

वहीं आधे और कुरगी गांवों की लगभग 500 की जनसंख्या वाली बिरजिया आदिम जनजाति शुद्ध पेयजल की समस्या से जूझ रही है। इन दो गांवों में ना एक चापाकल है ना कुआं है। हालांकि प्रशासन आधे और कुरगी गांव में पेयजल समस्या को देखते हुए 2017 में पीएचईडी विभाग द्वारा लाखों रूपए खर्च करके जलमीनार बनवाये गए हैं, जो अब ”चू-चू का मुरब्बा” साबित हो रहा है। सोलर एनर्जी एवं मोटर के माध्यम से घरों तक पेयजल आपूर्ति का लक्ष्य था, जो हाथी का दांत साबित हुआ है। शायद फाइल में ही इस विशिष्ट जनजाति वाले आदिवासियों के घरों तक पानी पहुंच रहा होगा। लेकिन जमीन की हकीकत इससे परे है। आधे गांव के ग्रामीण चुआं से, तो वहीं कुरगी गांव के ग्रामीण नदी का पानी पीने को आज भी मजबूर हैं। दोनों गांवों की महिलाएं आधा किलोमीटर दूर पहाड़ से नीचे उतरकर चुआं से पानी लाती हैं।

इन पहाड़ी गांवों की भौगोलिक संरचना ऐसी है, कि खेती भी अधिक नहीं होती है। इन आदिम जनजाति के परिवारों की माली हालत काफी खराब रहती है। राज्य सरकार द्वारा मुख्यमंत्री डाकिया योजना ही एक मात्र इनका सहारा है। बरसात में राशन की गाड़ी भी गांव तक नहीं पहुंच पाती है। लिहाजा इन्हें दौना गांव जाकर राशन लाना पड़ता है। मुख्यमंत्री डाकिया योजना के तहत चावल तो मिल जाता है, लेकिन अन्य जरूरतों के लिए पैसों की आवश्यकता होती है, जो इनके पास नहीं होने के कारण इन्हें रोजगार के लिए अन्य राज्यों में जाना पड़ता है। वैसे मुख्यमंत्री डाकिया योजना के अलावा आदिम जनजातियों के लिए मुख्यमंत्री राज्य आदिम जनजाति पेंशन योजना भी है जिसके लाभ से भी ये वंचित हैं। ऐसे में गांव में रोजगार नहीं रहने के कारण युवक-युवती केरल, दिल्ली और उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में रोजगार के लिए पलायन करते हैं।

बता दें यहां विकास की हालत यह है कि क्षेत्र में बिजली के पोल-तार तो हैं, लेकिन बिजली नहीं है। आधे गांव में बिजली के पोल गाड़े गये हैं, लेकिन तार आज तक नहीं लगाया है। वहीं कुरगी गांव में पोल और तार समेत ट्रांसफर भी लगाया गया है, लेकिन बिजली नहीं है। ग्रामीण बताते हैं कि एक दिन मात्र टेस्ट के लिए लाइट आयी थी, उसके बाद आज तक उसका दोबारा दर्शन नहीं हुआ।

गांव के लोगों का कहना है कि हम लोग आज भी आदिम युग में जी रहे हैं। विजय बिरजिया बताते हैं कि हम लोग लालटेन, ढिबरी (घासलेट से जलने वाला दीया) जलाकर रात गुजारते हैं। पानी टंकी बनी लेकिन चालू नहीं की गयी है। चुआं व नदी से हम सब पानी पीते हैं। कोई अधिकारी गांव तक नहीं आता है। गांव के अरुण बिरजिया, फूलचंद बिरजिया और अजय बिरजिया का कहना है कि सड़क नहीं होने के कारण गर्भवती महिलाओं व बीमार लोगों को अस्पताल ले जाने के लिए घाटी व पथरीले रास्तों से गुजरना काफी मुश्किल होता है। उन्हें टोकरी या फिर खटिया में रखकर दौना गांव तक ले जाते हैं। उसके बाद ही कोई साधन उपलब्ध हो पाता है। क्योंकि गांव तक एंबुलेंस नहीं पहुंच पाती है।

आधे गांव के ग्राम प्रधान अंशु बिरजिया कहते हैं कि गांव में बिजली की व्यवस्था नहीं रहने से जंगली जानवरों का खतरा बना रहता है। हम गांव से पैदल दौना जाते हैं और वहां से 60 रुपया भाड़ा देकर गाड़ी द्वारा महुआडांड़ प्रखंड मुख्यालय जाते हैं। दोनों गांव के लिए एक स्कूल है। एक आंगनबाड़ी केंद्र भी है।

कुरगी गांव के ग्राम प्रधान अर्जुन बिरजिया बताते हैं कि गांव में ग्राम सभा तो होती है। लेकिन रोजगार नहीं मिलता है। वन प्रक्षेत्र के कारण खेती के लिए प्रर्याप्त जमीन नहीं है। सिंचाई के लिए पानी नहीं है। गर्भवती महिलाओं का प्रसव गांव में होता है। अगर कोई बीमार हो जाए या प्रसव के लिए अस्पताल जाना पड़े तो बहुत मुश्किल की स्थिति हो जाती है। गांव में बीसीजी और डीबीसी टीकाकरण भी समय पर नहीं लगता है।

ताहेर गांव की भी स्थिति वही है, यहां भी रोजगार के अभाव में गांव के लगभग सभी नौजवान दूसरे राज्यों में पलायन को मजबूर हैं। बता दें कि ताहेर गांव में एक भी चापाकल नहीं है। जिसके कारण ग्रामीण गांव से सटे कुछ दूर जंगल में स्थित चुआं का पानी पीने को विवश हैं। वहीं कुछ लोग पहाड़ी नाला की रेत को हटाकर गड्ढा करके चुआं बनाकर पानी पीते हैं। हालांकि गांव में एक कुआं था। गांव में पेयजल की समस्या दूर करने के लिए उस कुएं में 2019 की 14वीं वित्तीय योजना के तहत सोलर सिस्टम से चलने वाली पानी की टंकी लगायी गयी थी। मगर 2020 से कुआं धंसने के कारण पानी की टंकी बेकार पड़ी हुई है। बता दें कि गांव के आदिवासी परिवार चुआं और नाले का इस्तेमाल पानी पीने के साथ-साथ मवेशी को नहलाने एवं कपड़ा धोने के रूप में भी करते हैं।

ताहेर गांव के वीरेन्द्र बिरजिया बताते हैं कि गांव में पीने के पानी की भारी समस्या है, हम लोग चुआं और नाले से पानी पीते हैं। मवेशी भी इसी से पानी पीते हैं। गांव में पुराना कुआं था, वह एक साल पहले धंस गया। जनप्रतिनिधि भी ध्यान नहीं देते हैं। गांव तक पहुंचने वाली सड़क भी काफी जर्जर है। जनप्रतिनिधियों के सामने कई बार गुहार लगा चुके हैं। लेकिन सुनवाई नहीं, चुनावों के समय तो बड़े-बड़े दावे व वादे किए जाते हैं। किंतु चुनाव जीतने के बाद जनप्रतिनिधि फोन तक नहीं उठाते हैं।

गांव की सुचिता नगेसिया कहती हैं, ताहेर गांव में एक भी शौचालय नहीं बनाया गया है। लेकिन इसे ओडीएफ घोषित कर दिया गया है। पुरुषों या सामान्य महिलाओं को कोई विशेष परेशानी इसलिए नहीं महसूस होती है कि शौच के लिए खेतों या जंगल में जाना उनकी आदत में शुमार है। लेकिन वर्तमान दौर में गर्भवती महिलाओं व बीमार लोगों के लिए दूर जाना काफी कष्टकारी हो जाता है। सुचिता कहती हैं कि गांव या आसपास के किसी गांव में स्वास्थ्य केन्द्र नहीं है, जिसकी वजह से गर्भवती महिलाओं को प्रसव के लिए काफी सोचना पड़ता है। अत: सामान्यत: उनका प्रसव पारंपरिक तौर पर गांव की कोई बुजुर्ग महिला करवाती है, जिसमें कभी-कभी बच्चा व जच्चा के लिए काफी खतरनाक स्थिति बन जाती है। कभी दोनों की जान भी चली जाती है। ऐसे में कई महिलाएं सुरक्षित प्रसव के लिए मायके या किसी रिश्तेदार के पास चली जाती हैं, जहां अस्पताल की सुविधा रहती है। सुचिता बताती हैं कि वैसे तो महिलाओं को सशक्त करने के लिए गांव में दो महिला समूह ‘सरई फूल’ व ‘सहेली समूह’ बनाया गया है, जिसमें एक में 10 एवं दूसरे मे 12 महिला सदस्य हैं, लेकिन यह सिर्फ नाम का है। आज तक एक भी बैठक नहीं हुई। संस्था जेएसपीएल के सीसी इस समूह की तरफ कभी ध्यान नहीं देता है।

ग्राम प्रधान।

वार्ड सदस्य शांति देवी कहती हैं कि गांव में कोई रोजगार का साधन नहीं है, मनरेगा के तहत भी कोई योजना नहीं चलती है। कौन रोजगार सेवक है? इसकी भी जानकारी ग्रामीणों को नही है। गांव तक कोई अधिकारी नहीं आता है। क्षेत्र की भौगोलिक संरचना ऐसी है कि खेती भी नहीं के बराबर होती है। क्योंकि सिंचाई का कोई साधन नहीं है। लगभग 25 से अधिक युवक इस वर्ष गांव छोड़कर केरल, दिल्ली या अन्य राज्यों में कमाने चले गये हैं। दूसरी तरफ सरकारी राशन लेने के लिए ग्रामीणों को तीन किलोमीटर पैदल चलकर नेतरहाट जाना पड़ता है।

बता दें कि यह क्षेत्र जंगल, झाड़, नदी, झरना, वन प्राणी एवं प्राकृतिक संपदाओं से भरा पड़ा है। वैसे तो महुआडांड़ प्रखंड में लगभग सभी जातियां निवास करती हैं। लेकिन प्रखंड में विशिष्ट आदिम जनजाति बिरजिया परिवार के दर्जनों गांव हैं। सरकार इन आदिम जनजातियों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने को लेकर हमेशा से प्रयासरत रही है। किंतु स्थानीय प्रशासन द्वारा लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी जमीन पर इसका कोई असर देखने को नहीं मिलता है।

(नेतरहाट से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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