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तेलुगु श्याम राव का हरियाणवी स्वामी अग्निवेश बनना

(सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश का आज दिल्ली में निधन हो गया। लंबे समय से वह बीमार थे और कुछ दिनों पहले उन्हें दिल्ली के इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड बिलेयरी साइंसेज (आईएलबीएस) में भर्ती कराया गया था। डॉक्टरों के मुताबिक, शाम 6 बजकर 30 मिनट पर दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हुआ है। लेकिन यह अधूरी बात है। स्वामी जी के असमय निधन का प्रमुख कारण संघ-भाजपा राज्य में उन पर होने वाला प्रायोजित हमला है। पिछले दिनों जिस तरह से झारखंड और दिल्ली में दो-दो बार संघ-भाजपा के गुंडों ने उन पर प्राणघातक हमला किया उससे स्वामी अग्निवेश जी के स्वाभिमान और आत्मसम्मान को गहरी ठेस लगी थी। जीवन भर एक आदर्श एवं वैज्ञानिक विश्व का सपना देखने वाले शख्स के लिये असहनीय था। स्वामी अग्निवेश के जीवन और संघर्ष की कहानी स्वामी जी के शब्दों में-प्रदीप कुमार सिंह)

जैसा मुझे बताया गया और मैं यह मानकर भी चल रहा हूं कि मेरा जन्म 21 सितंबर, 1939 को छत्तीसगढ़ के शक्ति रियासत में हुआ। भारतीय पंचांग के अनुसार मेरा जन्मदिन क्या है, मैं नहीं बता सकता। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह मेरा जन्मदिन है। यह अजीब है कि भारतीय परिवारों में उस समय अंग्रेजी कैलेंडर का प्रचलन नहीं रहा होगा। लेकिन जब से मैंने होश संभाला तब से यूनिवर्सिटी और कॉलेज में यही मेरा जन्मदिन है। यही मेरे पासपोर्ट में भी दर्ज है और हर जगह यही जन्मतिथि है। चूंकि मैं तो इसका स्वयं प्रमाण नहीं बन सकता लेकिन मुझे बताया गया की यही तुम्हारा जन्मदिन है तो मैंने यही मान लिया। जहां तक मेरे बचपन की बात है तो बहुत बचपन की बात तो याद नहीं रहती है। साल-दो साल या तीन साल की बात किसी को शायद ही याद रहती हो, मुझे भी नहीं याद है। लेकिन बचपन की एक बात मुझे आज तक याद है।

जब मैं लगभग चार साल का था तब मेरे पिता जी की मृत्यु हो गई। उस समय हम लोग विशाखापट्नम में रहते थे। वहां हमारे मौसाजी एम. सुब्बाराव का घर था। वे शहर के काफी अच्छे और बड़े वकील थे। उनके बड़े बेटे एम. रामकृष्णा और माधव अभी जीवित हैं। उनके कई संतानें थीं लेकिन उनमें से कई का निधन हो गया है। सुब्बाराव के घर पर ही हम लोग ठहरे थे। वहीं विशाखापट्नम में मेरे पिताजी का इलाज चल रहा था। बाद में मुझे पता चला कि उनको गैंगरिन हो गई थी। उन दिनों इस तरह की बीमारी से निजात पाना काफी मुश्किल था। और उस समय तक उसका इलाज भी नहीं था। मेरे मन में उनका चेहरा या कोई खास छवि अंकित नहीं है। बाद में उनके कई फोटो हमने देखे। पिता का नाम वेपा लक्ष्मी नरसिंहम पंतलु था। पंतलु तेलुगु भाषा में आदर सूचक शब्द और वेपा तेलुगु ब्राह्मणों की उपाधि है।

संन्यास के बाद में जब पं. बुद्धदेव विद्यालंकार ने मेरे पिताजी का नाम सुना तो उन्होंने कहा कि यह तो वेपा अर्थात वेदपाठी परिवार है। हो सकता है कि आंध्र प्रदेश में ब्राह्मणों का कुछ परिवार वेदपाठी परिवार रहा हो। उसी परंपरा वाले परिवार में मेरा जन्म हुआ हो। लेकिन मैं यह कह सकता हूं कि मेरे पिता जी निश्चित रूप से वेदपाठी नहीं थे। वे सरकारी विभाग में काम करते थे। पुलिस विभाग या किसी और में, मैं ठीक से कह नहीं सकता। मुझे उनकी बहुत कम यादे हैं। मैं बता नहीं सकता कि वे किस विभाग में काम करते थे। लेकिन उनके दिवंगत होने के बाद मेरे जीवन में बहुत उतार-चढ़ाव आया। शायद पिताजी के कोई भाई नहीं थे। य़दि रहे भी होंगे तो उन्होंने हम लोगों को पालने-पोसने की जिम्मेदारी नहीं निभाई।

मेरे से बड़े एक भाई और एक बहन थे और मेरे से छोटी एक बहन थी और एक बहन का जन्म मेरे पिता जी की मौत के एक दो महीने बाद हुआ। कुल मिलाकर हम पांच भाई-बहन थे। जिसमें दो भाई और तीन बहनें। जिसमें सबसे बड़े वेपा राजेश्वर राव, दूसरे नंबर पर कुसुमलता राव, तीसरे नंबर मैं वेपा श्याम कुमार राव बाद में (स्वामी अग्निवेश), चौथे नंबर पर वाणी राव और पांचवें पर कमला राव। अब लड़कियों की शादी होने के बाद तो उनके सरनेम आदि बदल ही जाते हैं। उनके पतियों के नाम आ जाते हैं। फिलहाल इसको यही पर विराम।

कुल मिला कर पिता जी मृत्यु के बाद छह लोगों के परिवार को जब कोई सहारा नहीं मिला तो मेरे नानाजी ने आगे बढ़ कर सहारा दिया। उस समय मेरे नाना अपने पैतृक घर पर नहीं रहते थे। हमारा पैतृक घर  ब्रह्मपुर था। ब्रह्मपुर पहले आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम जिला का अंग था। प्रांत के बंटवारे के बाद अब यह ओडिशा के गंजाम जिले का हिस्सा बन चुका है। आज भी ब्रह्मपुर में तेलुगुभाषी रहते हैं।

फिर हम लोग नाना जी के यहां पहुंचे। नाना जी का नाम एम. दासरथी राव था। वह छत्तीसगढ़ के एक छोटी सी रियासत शक्ति में नायब दीवान थे। बाद में दीवान भी बने। लेकिन उस समय तक छत्तीसगढ़ अलग राज्य नहीं था। उस क्षेत्र की पहचान छत्तीसगढ़ के नाम से थी लेकिन तब वह मध्य प्रदेश का ही हिस्सा था।1943 के आसपास हम छत्तीसगढ़ आ गए। मेरी माताजी का नाम सीता देवी था। मेरे जन्म के समय भी मां शक्ति आई थीं। नाना के घर ही मेरा जन्म हुआ था। जन्म के बाद फिर मेरी मां मायके से ससुराल आ गईं थीं। लेकिन ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था चार साल बाद फिर उन्हें हमेशा के लिए नाना के पास वापस लौटना पड़ा।

शक्ति में ही मेरी शिक्षा-दीक्षा शुरू हुई। जहां तक मुझे याद है छह साल की उम्र में मेरी पढ़ाई शुरू हुई। स्कूल जाने के पहले घर के जिस कमरे में देवताओं के मूर्ति और चित्र लगे थे वहां ले जाकर मुझे “ग- गणेश” लिखवाया गया। ये एक परिपाटी थी। स्कूल जाने के पहले यह स्लेट पूजा की जाती थी। घर के पास ही सरकारी स्कूल था। टाटपट्टी पर बैठ कर पढ़ते थे। वहां हम लोग पैदल ही जाते थे। बाहर हम लोग छत्तीसगढ़ी में बात करते थे। स्कूल में हिंदी में पढ़ाई होती थी। घर में तेलुगु बोली जाती थी। मातृभाषा तेलुगु थी। बाहर की भाषा छत्तीसगढ़ी और शिक्षा की भाषा हिंदी रही। आज भी मुझे छत्तीसगढ़ी बहुत प्यारी भाषा लगती है। तेलुगु तो घर में सुन-सुन करके हमने कुछ सीखा था।

आज भी जब तेलुगु कोई बोलता है तब मैं समझ लेता हूं। लेकिन मैं स्वयं बहुत बोल नहीं सकता। छत्तीसगढ़ी बोलने का भी बहुत अवसर नहीं मिला। पहले स्कूल में हिंदी माध्यम से पढ़ाई होती थी। मिडिल स्कूल में आने पर छठी कक्षा से बैठने के लिए बेंच मिला। सातवी-आठवीं में आने के बाद जूता मिला। नवीं में आने पर चमड़े का जूता खरीदा था। उसे बहुत संभाल कर पहनता था। पढ़ाई में मैं मान लिया गया था कि अच्छा हूं। शिक्षक मेरा बहुत ध्यान देते थे क्योंकि मैं दीवान का नाती था। 11वीं तक हमारी पढ़ाई शक्ति के ही सरकारी स्कूल से हुई।

हमारा स्कूल और शक्ति रियासत की कचहरी आपस में सटे हुए थे। कचहरी में रियासत के कर्मचारी समेत मेरे नाना भी बैठते थे। मेरे नाना का कमरा काफी बड़ा था। उसमें एक पंखा जैसा लगा था जिसकी रस्सी को एक आदमी खींचता रहता था और वह हवा देती थी। उस समय वहां बिजली के पंखे तो थे नहीं, पंखे के रूप में यही था।

मुझे बचपन में कई अध्यापकों से बहुत प्यार मिला। उसमें से एक शिक्षक रामलाल पटेल का नाम आज भी याद है। बाद के दिनों में जब मैं शक्ति गया तो उनसे जरूर मिला। उस समय अध्यापकों में काफी लगन थी। लगभग में मुफ्त में पढ़ाई होती थी। दोपहर में भी हम लोग भागकर घर आ जाते और खाना खाकर फिर स्कूल चले जाते थे।

मेरा घर अपेक्षाकृत समृद्ध माना जाता था। क्योंकि यह शक्ति रियासत करे दीवान का परिवार था। लेकिन हमारे घर में बिजली नहीं थी। रोशनी के लिए हर कमरे में लालटेन होता था। लालटेन जलाने के पहले उसको साफ किया जाता था। लालटेन को छत्तीसगढ़ी में कंडली कहा जाता है। लालटेन की रोशनी में मेरी पढ़ाई हुई। बिजली उस समय बहुत अभिजात्य मानी जाती थी।

घर का काफी हिस्सा खपरैल था। बाद में कुछ हिस्सा पक्का भी बना। उस घर में मुझे काफी समय बिताना पड़ा। लगभग सत्रह साल तक मैं उस घर में रहा। मेरे स्कूल के दिनों में मेरे कुछ नजदीकी मित्र हुआ करते थे। जो पढ़ने में मुझसे तेज थे उसमें मोहम्हद लतीफ का नाम लिया जा सकता है। उनके घर हड्डियों का व्यापार होता था। लेकिन मैं उनके घर जाता था। बचपन में वे मेरे मित्र थे। एक सरदार जी थे यशवंत नाम था उनका। एक आदिवासी युवक थे। बहुत दूर से पढ़ने आते थे।

याद नहीं आता कि मेरे स्कूल में केवल लड़के ही थे या लड़कियां भी थी। लेकिन जब नवीं में पहुंचा तो एक दो लड़कियां पढ़ने के लिए आईं। एक बंगाली अधिकारी की लड़कियां थी। वे क्लास शुरू होने पर आकर बैठकर जाती थीं। हमारे यहां अध्यापक बहुत प्यार करते थे। रामावतार शास्त्री जी रायपुर के रहने वाले थे। हमारे स्कूल में प्रसिद्ध साहित्यकार पदुमलाल पुन्नालाल बक्शी के परिवार के देवेंद्र बक्शी अध्यापक थे। रामावतार जी मुझे जीवन की उपयोगी बातें सिखाते थे। स्कूल में फुटबॉल आदि खेल हम लोग खेलते थे।

हम लोगों के बचपन में बरसात खूब होती थी। वर्षा का पानी नदी-नालों के बाद खेत और सड़क को भी अपनी चपेट में ले लेता था। हम लोग बरसात के पानी में खूब दौड़ लगाते और तैरते थे। छत्तीसगढ़ की मिट्टी लाल है। बरसात के समय लाल-लाल पानी चारों तरफ उमड़ पड़ता था। ऐसा लगता था कि चाय चारों तरफ तैर रही है। हम लोग गंदगी की परवाह किए बिना उसमें खेलते थे। लेकिन कुछ समय बाद ही गंदे पानी की वजह से हम बच्चों को फोड़े-फुंसी हो जाया करते थे। फोड़े-फुंशी से मैं काफी परेशान रहता था। एक बार ऐसा हुआ कि मेरे एक मामा टार्च की बैटरी को फोड़ कर उसको मेरे शरीर पर लगा दिए। उससे मुझे काफी जलन हुई।

हमारे यहां कई तरह की प्रथाएं थीं। हमारे नाना बहुत कर्मकांडी थे। तेलुगु में नानाजी को (तातजारू) कहते हैं। नानी या मामी को ददम्मा या चेनम्मा कहते थे। मां को अम्मा कहते थे। मैं बचपन में पूजा-पाठ ज्यादा करता था। आंगन में तुलसी का चबूतरा था। उसके ऊपर घड़ा रखा जाता था जिसमें एक छिद्र होता था और उससे पानी टपकता रहता था। हमारे आंगन में कुआं था। उसमें से बाल्टी से पानी खींचकर नहाया करते थे। सामान्य रूप से बचपन की ये बाते हैं। देवी-देवताओं की पूजा और तिरूपति के वेंकटेश्वर बालाजी की विशेष भक्ति थी मेरे परिवार में। रात में सोने के पहले हनुमान चालीसा पढ़ता था। बचपन में ये सारे संस्कार-विचार मेरे दिमाग में आ गए थे।

मेरे नाना जी गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित बाल सखा और कल्याण पत्रिका मंगाते थे। मैं उसे पढ़ता था। रामचरित मानस, दोहावली और विनय पत्रिका को पढ़कर एक परीक्षा भी दिया था। मेरे संस्कारों के निर्माण में मेरे नाना और परिवार का बहुत योगदान है। अगर वे न होते तो मुझे अनाथों की तरह जीवन बिताना पड़ता। लेकिन इसके लिए मेरी मां को बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। वे अकेले संयुक्त परिवार का भोजन बनाती और चौके की लिपाई पुताई करतीं। लकड़ियां गीली होती थी उसको फूंक-फूंक कर उनकी आंखें सूज जाती थी। लेकिन माता जी के मेहनत को जब याद करता हूं तो सोचता हूं कि वह कितना काम करती थीं।

शक्ति में रहते मैंने हाई स्कूल तक की पढ़ाई की और इस दौरान आरएसएस की शाखा में भी गया। लेकिन एक दो दिन के बाद फिर मैं नहीं गया। मेरे परिवार का माहौल काफी धार्मिक था। भगवान शंकर की पूजा के लिए मैं तालाब से कमल का फूल तोड़ कर लाता था। घर के पास ही तालाब था। हनुमान चालीसा भी पढ़ता था। एक बात और मेरे दिमाग में आता था कि भगवान के कई तरह के चेहरों के देखकर हमारे मन में जिज्ञासा होती थी। ये सब चीजें हमारे मन में कई तरह के अंधविश्वास का भी जन्म दिया। परीक्षा के समय हम लोग हनुमान जी के मंदिर में प्रार्थना करने जाया करते थे। हाई स्कूल हमने फर्स्ट डिवीजन में पास किया।

अंग्रेजी में मेरिट लिस्ट में भी मेरा नाम था। लेकिन अब आगे की पढ़ाई का कोई विकल्प नहीं था। क्योंकि वहां पर आगे के लिए कोई स्कूल नहीं था। आगे की पढ़ाई के लिए दूसरे शहर जाना पड़ता। मैं रायपुर जाकर इंजीनियरिंग में दाखिला के लिए पता भी किया। लेकिन वहां हॉस्टल में रहना पड़ता और फीस वगैरह देने का कोई प्रबंध था नहीं। यदि मेरे नाना-मामा ने कृपा नहीं की होती तो स्कूल की भी पढ़ाई नहीं हो पाती।

मेरे नाना के पास बहुत खेत था। शाम को मजदूर गाय-बैल को लेकर आते और बांध देते थे। हम लोग उन्हें कमिया बोलते थे। वे अपने काम का हिसाब हाथ जोड़कर दिया करते थे। बाद में आज जब हम बंधुआ मजदूरी पर काम कर रहे हैं तो यह पता चलता है कि कानून की नजर में कमिया बंधुआ मजदूर थे। कमिया का मतलब वे जो काम करते हैं। मेरे बचपन के दिनों में हम कमिया मजदूरों को छू नहीं सकते थे। उनको कुछ खाने के लिए देने जाने पर हमें सख्त हिदायत दी जाती हं उन्हें छू नहीं सकते। उनको खाना देने जाते समय हम डरते हुए जाते और ऊपर से खाना फेंक कर चले आते थे।

ये मजदूर ही खेत में अनाज पैदा करते थे और गाय-भैस का दूध दुहते थे। लेकिन वही हमारे लिए अछूत थे। हमारे घर के पिछवाड़े की तरफ एक दलित परिवार रहता था। उस औरत का नाम लेढ़ी था और उसके पति मजदूरी करते थे। मिट्टी के एक-दो कमरे का उनका घर था। मुझे याद है कि मैं उनके परिवार में जाता और खेलता था। मुझे उस लेडी ने दूध भी पिलाया है। आज जो मैं अपने जीवन में अनुभव करता हूं उसके संस्कार मुझे बचपन से ही मिले थे, ऐसा तो मैं नहीं कह सकता हूं। लेकिन मेरे बचपन के ही कुछ संस्कार थे जिसकी वजह से कलकत्ते में मैं आर्य समाज की तरफ आकर्षित हुआ।

कश्मीर यात्रा और हरियाणा जाने का संयोग

1966 की गर्मियों में गुरुकुल झज्जर में ब्रह्मचारी इन्द्रदेव मेधार्थी से मेरी पहली भेंट हुई। इस भेंट का संयोग अचानक बना था। दरअसल, मैं बिरला परिवार के बच्चों का ट्यूटर था। गर्मियों की छुट्टियों में बिरला परिवार के साथ मैं कश्मीर घूमने गया था। परिवार की एक वृद्ध महिला को चोट लगने से कश्मीर–यात्रा बीच में ही स्थगित करनी पड़ी। मैंने कोलकाता लौटते समय सोचा कि क्यों न दिल्ली में रूक कर स्वामी संपूर्णानंद जी से मिलता चलूं। स्वामी संपूर्णानंद जी का मुझ पर विशेष स्नेह था। वे जब भी प्रचारार्थ कोलकाता जाते थे तो उनसे मेरी घण्टों बातचीत चलती थी। स्वामी संपूर्णानंद जी आर्य समाज के मूर्धन्य मनीषी थे जो अद्भुत प्रज्ञा के धनी थे। स्वामी दयानन्द की क्रान्तिकारी विचारधारा का उन्होंने तलस्पर्शी अध्ययन किया था।

उनके दिल में आर्य समाज को लेकर भारी तड़प थी। जब वे मंच पर खड़े होकर धाराप्रवाह रूप से बोलते थे तो श्रोता मंत्रमुग्ध हो उठते थे। वेदमन्त्रों की व्याख्या करने में उन्हें विलक्षण महारत हासिल थी। मैं उनका मुरीद था। अत: इसी वजह से उनसे मिलने की अपनी इच्छा को मैं दबा नहीं सका। उन दिनों स्वामी जी दीवान हाल के उसी कमरे में रहते थे जिसमें बाद में आचार्य कृष्ण जी (स्वामी दीक्षानन्द जी) रहने लगे थे। जब मैं दीवान हाल की ऊपरी मंजिल पर पहुंचा तो स्वामी जी बाहर चारपाई पर लेटे हुए थे और लेटे–लेटे दोनों पैरों से साइक्लिंग कर रहे थे।

स्वामी जी से वार्तालाप करते हुए मैंने कहा स्वामी जी ! मैंने निश्चय किया है कि अपना पूरा समय आर्य समाज को दूं और कुछ विशेष योजना के साथ कुछ ऐसा कर जाऊं जो अब तक किसी ने न किया हो। नौकरी तो लाखों लोग कर रहे हैं लेकिन अपने लिए कर रहे हैं मैं कुछ समाज के लिए करना चाहता हूं जिससे एक परिवर्तन लाया जा सके। ऋषि दयानन्द के विचारों की जो व्याख्या आप करते हैं वह समाज में कहीं दिखाई नहीं देती। आर्य समाज चारदीवारी में घिरकर एक सम्प्रदाय, एक मठ बनता जा रहा है और ऋषि की क्रान्ति भ्रान्ति बनकर इस चारदीवारी में दम तोड़ती जा रही है।

आर्य समाज में युवक आ नहीं रहे और पुरानी पीढ़ी के लोग धीरे–धीरे विदा होते जा रहे हैं। आर्य समाज में एक स्थिरता आ गई है और इसका जुझारू स्वरूप विलुप्त होता जा रहा है। यह सब देखकर मन खिन्न हो जाता है और मन अपने आप से विद्रोह करने लगता है और विचार उठता है कि कुछ कर गुजरने के लिए प्रोफेसरी को अलविदा कह दूं। मैं आपसे मार्गदर्शन लेने आया हूं। आपने आर्य समाज को नजदीक से देखा व समझा है अत: आपका दीर्घ अनुभव रहा है और निश्चय ही आपका मार्गदर्शन मुझे सही दिशा व सही मंजिल तलाशने में सहायक होगा।

स्वामी संपूर्णानंद जी पहले मेरी इस योजना से सहमत नहीं हुए क्योंकि वे जानते थे कि मैं एक संवेदनशील और भावुक युवक हूं और जवानी में ऐसे जलजले मन में प्राय: उठा करते हैं। उन्होंने कहा कि एक अच्छी नौकरी छोड़ना व्यावहारिक नहीं है, लोग अपना धंधा करते हुए समाज की सेवा कर ही रहे हैं तो आपको ऐसा करने में क्या कठिनाई है? सारी उम्र मुझे चीखते–चिल्लाते बीत गई लेकिन जमाना एक बने–बनाये ढर्रे पर चल रहा है, आर्य समाज में शिथिलता भले न हो लेकिन स्थिरता अवश्य आ गई जो भविष्य के लिए शुभ नहीं है। जमाना किस तेजी से बदला है यह हमने अपनी आंखों से देखा है।

आर्य समाज को न जाने किसकी नजर लगी है कि इतनी अच्छी विचारधारा को पनपने की जमीन नहीं मिल रही और इसका क्रान्तिकारी व आन्दोलनात्मक स्वरूप निरन्तर तेजहीन होता जा रहा है। आप जैसे युवकों को देखकर मन को कुछ संतोष अवश्य मिलता है लेकिन ऐसे युवक हैं कितने जिनके मन में तड़प हो, लगन हो, जलजला हो, आग हो? पुरानी पीढ़ी के कुछ दिग्गज लोग हैं जो इस ढहती दीवार को थामे खड़े हैं लेकिन जब ये नहीं होंगे तो आर्य समाज अपने को कैसे संभाल पायेगा?

मैंने कहा स्वामी जी ! मैं आपके पास निराशा की बातें सुनने नहीं, मार्गदर्शन लेने आया हूं क्योंकि मैंने दृढ़ निश्चय कर लिया है कि समर्पित भावना से आर्य समाज के लिए कुछ करूं। लेकिन जब तक मुझे ऐसी सम्भावना की गारंटी नहीं मिल जाती कि मेरा यह त्याग निरर्थक नहीं जायेगा तब तक मैं असमंजस में बना रहूंगा, कोई निर्णय नहीं ले सकूंगा, कोई योजना नहीं बना सकूंगा। मुझे ऐसे साथी कहां मिल सकते हैं जिनका सहयोग पाकर मैं परिवर्तन का बिगुल बजा सकूं और आर्य समाज को यथास्थितिवाद के जाल से मुक्त करा सकूं।

स्वामी जी ने कहा, श्यामराव ! हरियाणा ही एक ऐसा प्रदेश है जहां गुरुकुलों का जाल फैला हुआ है, गांव–देहात तक में आर्य समाज का प्रकाश फैला हुआ है, अत: एक बार हरियाणा अवश्य घूम आओ, शायद वहां तुम्हारे मन की मुराद पूरी हो जाये।

मैंने हंसते हुए कहा,स्वामी जी ! आप तो ऐसी बात कर रहे हैं जैसे हरियाणा एक प्रान्त न होकर छोटा–सा नगर हो कि जिसके ओर–छोर को एक दिन में लांघ कर ऐसी सम्भावना की तलाश कर आऊं जो मेरे निश्चय को पूरा कर सके।

स्वामी जी कुछ देर सोच में पड़ गये ओर फिर बोले, तो ऐसा करो श्याम! एक बार आप गुरुकुल झज्जर हो आओ। वहां जाकर ब्रह्मचारियों से मिलो, उनका मन टटोलो, उनके विचारों की थाह पाओ और कोशिश करो कि तुम्हारे हम–सफर वहां मिल सकें। मैं समझता हूं कि हरियाणा में तुम्हारे लिए, तुम्हारी योजना के लिए अपार सम्भावनाएं हैं। लेकिन इन सम्भावनाओं की खोज तो तुम्हें स्वयं करनी होगी। मेरा आशीर्वाद सदैव तुम्हें प्राप्त रहेगा। स्वामी संपूर्णानंद जी की ये बातें सुनकर मुझे कुछ तसल्ली हुई और अगले ही दिन मैं दिल्ली से झज्जर रवाना हो गया।

गुरुकुल झज्जर में इन्द्रदेव मेधार्थी से मुलाकात

स्वामी इन्द्रवेश जी से अपने सम्पर्क को मैं संयोग अथवा आकस्मिक घटना न मानते हुए ईश्वर की अनुकम्पा मानता हूं। गुरुकुल झज्जर के परिसर में सन् 1966 में मैं स्वामी इन्द्रवेश जी से मिला। उन दिनों उनका नाम इन्द्रदेव मेधार्थी हुआ करता था। सब वे संन्यासी नहीं बल्कि ब्रह्मचारी का जीवन जी रहे थे। मेधार्थी जी उन दिनों गुरुकुल झज्जर के प्रधानाचार्य थे और मैं कलकत्ता के सुप्रसिद्ध सेंट जेवियर्स कालेज में कामर्स एवं बिजनस मैंनेजमेन्ट पढ़ाता था। मेधार्थी जी से मेरी यह यह भेंट पूर्व निर्धारित नहीं थी और न ही हम दोनों के बीच पहले कभी पत्राचार ही हुआ था।

इस मुलाकात के बाद मेरे जीवन में एक नया मोड़ आया। यदि ये भेंट न होती तो मैं स्वामी अग्निवेश की बजाए प्रो. श्यामराव बना रहता और अंतत: नौकरी से अवकाश प्राप्त करने के बाद हजारों बुद्धिजीवियों की तरह गुमनामी के अन्धेरे में पड़ा रहता।   इस भेंट के कारण न केवल हम दोनों के ही जीवन का कांटा बदल गया बल्कि आर्य समाज के इतिहास में आगे चलकर एक नया अध्याय भी रचा गया। जिस तरह से यह भेंट हुई उसे जान कर ऐसा लगता है कि यह सब परमात्मा और नियति का ही रचा हुआ एक खेल था।

हम दोनों के बीच न भाषा का मेल और न संस्कारों का मेल। तब यह सब कैसे सम्भव हुआ कि हम दोनों में इतनी प्रगाढ़ मैत्री हो गई कि आग और पानी इकट्ठा हो गये। न जाने कितनी भविष्यवाणी, जो हम दोनों को लेकर की जाती रही, एक–एक कर झूठी सिद्ध होती रहीं और हम दो आत्माएं कभी जुदा न हुईं, कभी हम दोनों में खटास पैदा नहीं हुई, दो रेलवे लाइनों की तरह समानान्तर भूमिका में रहते हुए भी कभी एक–दूसरे से दूर नहीं हुए बल्कि एक–दूसरे का पूरक बनकर एक ने दूसरे से बढ़कर आर्य समाज के इस नये अध्याय का सूत्रपात किया।

(प्रदीप कुमार सिंह की प्रस्तुति।)

This post was last modified on September 11, 2020 9:21 pm

प्रदीप सिंह

लेखक डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और जनचौक के राजनीतिक संपादक हैं।

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प्रदीप सिंह

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