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किसान आंदोलन को बदनाम करना पंजाब में भाजपा को महंगा पड़ा

पहले हरियाणा, फिर राजस्थान और अब पंजाब! करीब तीन महीने से जारी किसान आंदोलन के दौरान इन तीनों राज्यों में स्थानीय निकाय चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को लगातार हार का मुंह देखना पड़ा है। इसमें भी पंजाब के नतीजे तो उसके लिए किसी सदमे से कम नहीं हैं। किसान आंदोलन में अहम भूमिका निभा रहे पंजाब में भाजपा को ही नहीं बल्कि कृषि कानूनों की मुखालफत करते हुए भाजपा का साथ छोड़ने वाले अकाली दल को भी सूबे में सत्तारुढ़ कांग्रेस के मुकाबले करारी हार का सामना करना पड़ा है। यही नहीं, बहुत उम्मीदों के साथ पहली बार स्थानीय निकाय चुनाव में उतरी आम आदमी पार्टी के लिए भी ये चुनाव नतीजे बेहद निराशाजनक रहे। 

किसान आंदोलन के दौरान हरियाणा और राजस्थान के बाद यह तीसरा बड़ा चुनाव था और माना जा रहा था कि इससे पंजाब के मतदाताओं के मूड का पता चलेगा। चुनाव नतीजे बता रहे हैं कि कांग्रेस को किसान आंदोलन का समर्थन करने का अच्छा प्रतिसाद मिला। यह उसके लिए तात्कालिक राहत तो है ही अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर सियासी बढ़त भी है। 

वैसे किसान आंदोलन का समर्थन तो अकाली दल भी कर रहा है और इसी मुद्दे पर वह केंद्र सरकार और भाजपा से अलग भी हुआ। लेकिन सफाए की हद तक हुई उसकी हार बताती है कि किसान विरोधी कानूनों के खिलाफ देरी से मुंह खोलने के लिए पंजाब की शहरी जनता ने भी उसे माफ नहीं किया। लोगों में उसके प्रति कितनी नाराजगी है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कुछ नगर निगमों और नगर पालिकाओं में तो उसका खाता तक नहीं खुल पाया। 

अकाली दल की किस कदर दुर्गत हुई है, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि वह अपने गढ़ बठिंडा में भी चुनाव हार गया। वहां कांग्रेस को 53 साल बाद जीत नसीब हुई। अकाली दल को किसी भी नगर निगम में जीत नहीं मिली और नगर पालिकाओं में भी वह कांग्रेस से बहुत पीछे रही, जबकि अकाली दल के प्रधान और पूर्व उप मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल ने चुनाव में पूरी ताकत झोंक रखी थी। 

पंजाब में भाजपा कोई बड़ी राजनीतिक ताकत नहीं है और वह हमेशा ही अकाली दल की सहयोगी पार्टी के रूप में ही राजनीति करती रही है। अकाली दल का साथ छूट जाने की वजह से उसे इस चुनाव में अकेले ही उतरना पड़ा था। चुनाव नतीजे बताते हैं कि किसानों के आंदोलन को दबाने और बदनाम करने के लिए केंद्र सरकार और भाजपा द्वारा जो हथकंडे अपनाए जा रहे हैं और जिस तरह इस आंदोलन को देश-विरोधी और खालिस्तानियों का आंदोलन बताया जा रहा है, उसे पंजाब के लोगों ने पसंद नहीं किया। भाजपा को सूबे में अपने हिंदू जनाधार पर बहुत भरोसा था, लेकिन हिंदू आबादी बहुल वाले गुरदासपुर और होशियारपुर जैसे जिलों में भी उसे शर्मनाक हार का मुंह देखना पड़ा। गुरदासपुर में तो वहां के भाजपा सांसद और फिल्म अभिनेता सनी देओल का जादू भी लोगों पर नहीं चल पाया। वहां नगर पालिका परिषद की सभी 29 सीटों पर कांग्रेस को जीत हासिल हुई। 

2014 के लोकसभा चुनाव में पंजाब की तीन सीटों पर जीत दर्ज कराने के बाद 2017 में पहली बार विधानसभा चुनाव में मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरने वाली आम आदमी पार्टी को उम्मीद थी कि किसान आंदोलन का पुरजोर समर्थन करने के कारण उसे इन चुनावों में अच्छी कामयाबी मिलेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उसके लिए संतोष की बात यही कही जा सकती है कि वह इन चुनावों में भाजपा से आगे रही है। फिर भी अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में सरकार बनाने की उसकी हसरतों को गहरा झटका लगा है। 

पंजाब के तीनों इलाकों माझा, दोआबा और मालवा में कांग्रेस का प्रदर्शन धमाकेदार रहा। उसने सूबे के 8 में से सभी 8 नगर निगमों में जीत दर्ज की। इनमें मोगा, अबोहर, बठिंडा, कपूरथला, होशियारपुर, मोहाली, पठानकोट और बटाला शामिल हैं। कांग्रेस को इन नगर निगमों के 401 वार्डों में से 308 में, जबकि अकाली दल को 33, भाजपा को 20, आम आदमी पार्टी को 9 और निर्दलीयों को 30 वार्डों में जीत मिली। इसके अलावा बरनाला, धुरी, चमकौर साहिब, मलेर कोटला, जिरकपुर, मेहतपुर, लोहिया खास और फिल्लौर में भी कांग्रेस को खासी जीत मिली। कुल 109 नगर पालिका परिषदों और नगर पंचायतों में कांग्रेस को 1,078, अकाली दल को 251, आम आदमी पार्टी को 50, भाजपा को 29, बहुजन समाज पार्टी को 5 और 375 वार्डों में निर्दलीय उम्मीदवारों को जीत मिली। 

कुल मिलाकर ये चुनाव नतीजे मोटे तौर पर पंजाब की जो ताजा सियासी तस्वीर सामने रखते हैं, वह यही है कि कांग्रेस के लिए यह एक बड़ी जीत और अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए मनोवैज्ञानिक बढ़त है। इसकी अहम वजहों में से एक बड़ी वजह किसान आंदोलन को कांग्रेस के द्वारा दिया जा रहा समर्थन भी है। ये नतीजे भाजपा और केंद्र सरकार को कृषि कानूनों के खिलाफ स्पष्ट संदेश देने के साथ ही इस बात के लिए भी आगाह कर रहे हैं कि वे किसान आंदोलन को खालिस्तानियों का आंदोलन बता कर पंजाब को और सिखों को बदनाम करने से बाज आएं। चुनाव नतीजे यह भी बता रहे हैं कि अकाली दल और आम आदमी पार्टी को पंजाब की जनता के बीच अपनी साख बहाल करने के लिए अभी बहुत कुछ करना होगा।

(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

This post was last modified on February 19, 2021 11:07 am

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