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अतीत के किसान आंदोलनों से क्यों अलग और खास है यह आंदोलन!

कुछ भयानक प्रदूषित महानगरों को छोड़कर मुझे तो भारत का हर हिस्सा सुंदर लगता है। कुछ सूबे/इलाके ज्यादा अच्छे लगते हैं, जैसे पंजाब, केरल, बंगाल-असम-झारखंड-छत्तीसगढ़ के कुछ इलाके, गोवा, महाराष्ट्र के कुछ इलाके और कश्मीर भी! पर पंजाब का आकर्षण सबसे अलग है! संयोगवश, इस वक्त पंजाब और उसके किसान राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बने हुए हैं। भारतीय जनता पर हुए सत्ता-कारपोरेट के साझा-हमले के विरूद्ध आज देश में जो बड़ी लोकतांत्रिक-लड़ाई लड़ी जा रही है, उसकी वैचारिक और सांगठनिक अगुवाई पंजाब ही कर रहा है-पंजाबी किसान!

क्या यह तथ्य पंजाब को नायाब और सबसे अलग नहीं दिखाता? इस शांतिपूर्ण-लोकतांत्रिक आंदोलन के स्वरूप, सोच और दिशा में गजब की एकरूपता है। मुझे याद नहीं, ऐसा कोई बड़ा जन-आंदोलन हाल के कुछ दशकों में पहले कभी हुआ हो! यह एक ऐसा सत्याग्रह है, जिसमें लोकतांत्रिकता के साथ दृढ़ता है, वैचारिकता है, देशी कारपोरेट और साम्राज्यवादी वित्तीय पूंजी के विरूद्ध राष्ट्रीय चेतना की संगठित सामाजिक-अभिव्यक्ति है। आंदोलन में हर समुदाय के किसान हैं, पुरूष, महिलाएं, युवा और बूढ़े भी। लेकिन नेतृत्व में किसी राजनीतिक दल की सीधी या पर्दे के पीछे से कोई भूमिका नहीं है।

दिल्ली-हरियाणा के बीच की सड़क पर दिसम्बर की इन कड़ी सर्दियों में भी किसान दिन-रात खुले आसमान के नीचे पड़े हुए हैं। कार्यकर्ता से नेता तक, सब एक जगह, एक जैसी स्थिति में! अब तक विभिन्न कारणों से इस आंदोलन में शामिल सात लोगों की मौत भी हो चुकी है। पर हजारों लोगों के लिए मिल-जुलकर धरना-स्थल पर ही खाना पक रहा है, वहीं बैठकें हो रही हैं, बहुतेरे बच्चे वहीं पढ़ाई भी कर रहे हैं और आंदोलन के पक्ष में गाने-बजाने का दौर भी चल रहा है।

पंजाब से उठे इस किसान आंदोलन का चेहरा अब व्यापक जन-आंदोलन का बन चुका है। समाज का शायद ही कोई तबका हो, जिसके लोग इसमें शामिल न हों! इसमें देश के ज्यादातर सूबों के लोग शामिल हो गये हैं। आंध्र-केरल से लेकर असम-बंगाल, कर्नाटक से बिहार और यूपी से ओडिशा तक हर जगह इस आंदोलन के पक्ष में आंदोलन-धरना-प्रदर्शन हो रहे हैं। सिंघू बार्डर पर भी पंजाब-हरियाणा के किसानों के साथ दर्जन भर से ज्यादा राज्यों के किसान जमे हुए हैं। पंजाब के किसान अपने लंगर के लिए खाद्यान्न लेकर चले थे।

पर उनके खाद्यान्न उनके टैक्टरों-ट्रकों में ही पड़े हुए हैं। हरियाणा और दिल्ली के आसपास के लोग खाद्यान्न, फल-सब्जी और यहां तक कि कंबल और गद्दा पहुंचा रहे हैं। इसके लिए किसी ने अपील नहीं की है। किसी तरह की सहायता का आह्वान नहीं किया गया था। आम किसान और अन्य लोग स्वाभाविक और अपनी पहल पर यह सब कर रहे हैं। इस आंदोलन ने जो राजनीतिक विचार पेश किया है-वह दीवार पर लिखी इबारत की तरह साफ है। इसका मुख्य राजनीतिक लक्ष्य है-सत्ताधारियों के साथ गलबहियां करते देश के बड़े कारपोरेट और भारत के विशाल खाद्यान्न बाजार पर कब्जा करने में जुटीं कुछ वैश्विक कंपनियों के गठबंधन की खतरनाक परियोजना को विफल करना। तीन बेहद जन-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी कानूनों के जरिये यह बहुद्देशीय योजना सामने आई है।

इस आंदोलन ने अपने स्पष्ट राजनीतिक विचार के साथ अपनी विशिष्ट जन-समावेशी संस्कृति और लोकतांत्रिक कार्यशैली को भी दुनिया के सामने रखा है। औपनिवेशिक-भारत में महात्मा गांधी की अगुवाई में चला चंपारण का बहुचर्चित किसान-सत्याग्रह हो या अन्ना-केजरीवाल की अगुवाई वाला कथित भ्रष्टाचार विरोधी अभियान-किसी भी आंदोलन में ऐसी वैचारिकता, व्यापक जन-एकता और नेता से कार्यकर्ता के बीच आंदोलन के मुद्दों पर ऐसी एकरूपता पहले कभी नहीं दिखी। ऐसी पारदर्शिता तो सचमुच हाल के किसी आंदोलन में कभी नहीं दिखी। कोई भी मुद्दा उभरता है तो सारे 35 या 40 (या कभी-कभी इससे ज्यादा भी)किसान नेता धरना-स्थल पर बैठकर गहन चर्चा के बाद भावी रणनीति का फैसला करते हैं।

इस मामले में भी भारत के आधुनिक इतिहास का यह अनोखा आंदोलन है। तीनों कृषि कानूनों को देशी-विदेशी कारपोरेट-संपोषित अर्थनीति और विदेशी ताकतों के इशारे पर लाये कथित सुधारों के कानूनी-उत्पाद और उपकरण के तौर पर देखा जाना चाहिए। देश का ताकतवर मीडिया, खासतौर पर न्यूज चैनल और ज्यादातर बड़े अखबार भी देशी-विदेशी कारपोरेट के साथ खड़े हैं। आंदोलन और जनता के खिलाफ खड़ा मीडिया! किसी लोकतंत्र में ऐसी तस्वीर कहां देखी गयी? महामारी की भयावहता से भी किसानों को जूझना पड़ा रहा है। ऐसे में सवाल उठता है-आंदोलन की इस फौलादी एकता, प्रतिबद्धता और इसके आवेग के पीछे क्या कहानी है?

मौजूदा सत्ता और इसके बड़े सियासी रणनीतिकार बड़ी आसानी से बड़ी-बड़ी पार्टियों और आंदोलनों में दरार पैदा कर देते रहे हैं या जनाक्रोश को दमन या किसी न किसी तिकड़म के बल पर दबा देते रहे हैं। वे इस आंदोलन के साथ अब तक ऐसा कुछ भी नहीं कर सके! विज्ञान भवन में होने वाली वार्ताओं में किसान नेताओं को वे सरकारी-चाय पिलाने में भी कामयाब नहीं हो सके! आखिर ये किसान आंदोलनकारी इतने अलग और खास क्यों दिख रहे हैं? आखिर एक निरंकुश और चालाक सत्ताधारी समूह के विरूद्ध पंजाब के किसानों में ऐसी ताकत और बेमिसाल संगठन-शक्ति कहां से आई? इसके सामाजिक-राजनीतिक स्रोत क्या हैं?

सन् 1995-97 के बीच मैं पंजाब में दो साल रह चुका हूं। इन दो सालों के प्रवास से पहले भी एक रिपोर्टर के तौर पर पंजाब के लगभग हर जिले, हर इलाके को देखने-समझने का मौका मिला। आॉपरेशन ब्लू स्टार के पहले और बाद में वहां रिपोर्टर के तौर पर दो बार जाना हुआ था। मैंने उस समाज के दोनों पहलू देखे। अगर कहीं कट्टरता सर उठा रही थी तो उसी जमीन से उसका विरोध और प्रतिकार भी देखा। इसके लिए लोगों ने जान दे दी। यह सच है कि वहां के समाज में सब कुछ अच्छा ही अच्छा नहीं है, कुछ कमियां भी हैं। वो हर जगह, हर समाज और हर व्यक्ति में होती हैं। जहां शहीदे-आजम भगत सिंह पैदा हुए, वहां कुछ बुरे लोग भी पैदा हुए।

लेकिन पंजाब के बारे में यह बात मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि इस सरहदी सूबे और इसके समाज में गजब की खूबियाँ हैं, जो इसकी कुछेक कमियों को भी ढंक देती हैं! पंजाब की ये खूबियाँ सिर्फ उसकी नदियों, उपजाऊ जमीन और तीखी नाक-नक्श वाले लोगों के कारण ही नहीं हैं, उसके समाज की बुनावट और विशिष्ट सांस्कृतिक-सामाजिक सोच की वजह से भी हैं! यह एक ऐसा समाज है, जहां सिख गुरुओं और अन्य समाज-सुधारक संतों की शिक्षाओं का असर सबसे ज्यादा है। सिखों का सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण ग्रंथ है-गुरु ग्रंथ साहिब! वह विभिन्न संतों की वाणी का संग्रह है। इनमें छह सिख गुरुओं-नानक जी, अंगद देव जी, अमर दास जी, राम दास जी, अर्जन दास जी और तेग बहादुर जी के अलावा संत कबीर सबसे उल्लेखनीय हैं।

ब्राह्मणवादी-वैचारिकी और हिन्दुत्ववादी धार्मिकता से अलग धार्मिक-आध्यात्मिक चिंतन की जितनी भी भारतीय धाराएं हैं, कमोबेश उन सबका पंजाब और यहां के सिखों व गैर-सिखों पर गहरा असर दिखता है। इनमें नामदेव, बाबा फरीद, बुल्ले शाह, रविदास, भिक्खान, बेनी, साधना आदि प्रमुख हैं। इन गुरुओं और संतों की शिक्षाओं को हर वर्ग, हर बिरादरी और हर पिंड में श्रद्धा के साथ याद किया जाता है! सिख गुरुओं, अन्य संतों और फकीरों की शिक्षाओं ने इस समाज को जोड़ा है और ताकतवर बनाया है। ‘हिंदुत्व’ या ब्राह्मणवादी कर्मकांडों पर आधारित धर्म अपनी ताकतवर वर्णव्यवस्था के चलते सामाजिक स्तर पर हमेशा विभाजनकारी और भेद-भाव आधारित रहा है। इसीलिए पंजाब में इसका आम लोगों पर कभी ज्यादा असर नहीं पड़ा!

कुछ हिंदुत्वा संगठनों और यहां तक कि आर्य-समाजियों ने एक दौर में सिख पंथ से अलग अपने प्रभाव-विस्तार की भरपूर कोशिश की। भाषा और जाति का भी इस्तेमाल करने की रणनीति अपनायी गई। पर वर्णवाद-आधारित हिंदुत्वा और उसके मान-मूल्यों को पंजाब और पंजाबी समाज ने कभी दिल से मंजूर नहीं किया। स्वाभाविक सेक्युलरवाद पंजाबियत में घुलमिल गया-शक्कर और पानी की तरह! यही कारण है कि पंजाब में ब्राह्मणत्व को कभी स्वीकार्यता नहीं मिली। सिख गुरुओं और संतों की शिक्षाओं में वर्ण-जाति के निषेध के साथ हर जगह और हर धर्म के लोगों को एक जैसा माना गया। इस तरह किसी एक धर्म या एक ईश्वर के बजाय मनुष्यता को सर्वोच्च माना गया। यह भी कहा गया कि सभी कुदरत के बंदे हैं: ‘ईश्वर, अल्ला नूर उपाया कुदरत दे सब बंदे, एक नूर तो सब जग उपजया, को भले को मंदे।’(गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित संत कबीर की पंक्तियां)। गुरु नानक जैसे ज्ञानवान और विचारवान महामानव ने जिस पंथ का मार्ग प्रशस्त किया, वह सिर्फ़ भारत ही नहीं, दुनिया के सभी धर्मों-पंथों में न सिर्फ  सबसे नया और सबसे आधुनिक है अपितु सबसे मानवीय और तार्किक भी है!

अलग और विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक बोध का भी एक बड़ा कारण है कि मौजूदा सत्ता की अगुवाई करने वाले लोगों की दाल पंजाब या वहां के किसानों में नहीं गल पा रही है। सत्ताधारिय़ों के पास सिर्फ हिंदुत्ववादी सोच ही नहीं है, देशी-विदेशी कारपोरेट की शक्ति भी है। ऐसी ताकतवर-निरंकुश सत्ता से टकराना कोई आसान काम नहीं! लेकिन मौजूदा किसान आंदोलन का पंजाब-आधारित नेतृत्व जिस सामाजिक-धार्मिक पृष्ठभूमि से निकला है, उसके मूल में समावेशी राजनीतिक-सोच और सुसंगत जीवन-मूल्य हैं। इसके कुछ अहम् पहलू हैं-अन्याय का हर कीमत पर विरोध, हर तरह के हमलों से किसानों और समाज के अन्य कमेरे हिस्सों को बचाना और इस तरह राष्ट्रीय अस्मिता की रक्षा करना। आंदोलन के भविष्य की अटकलों में मैं नहीं पड़ूंगा। पर इतना जरूर कह सकता हूं कि इस आंदोलन ने राजनीतिक-आर्थिक रूप से संकटग्रस्त भारत को एक लोकतांत्रिक प्रतिरोध का नया, सुसंगत और समावेशी मॉडल दिखाया है।

(उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार और कई चर्चित किताबों के लेखक हैं। एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर रहते राज्यसभा चैनल की शुरुआत करने का श्रेय आपको जाता है।)

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This post was last modified on December 7, 2020 8:19 pm

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