Saturday, October 23, 2021

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स्थाई कमीशन के लिए सुप्रीमकोर्ट पहुंचीं सेना की 72 महिला अधिकारी

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उच्चतम न्यायालय में सेना की महिला अधिकारियों की ओर से अवमानना दायर की गई है। केंद्र सरकार इन 72 महिला अफसरों को फिलहाल बाहर नहीं करेगी। उच्चतम न्यायालय ने अंतरिम आदेश दिया है और केंद्र से इन महिला अफसरों को स्थाई कमीशन ना देने का कारण पूछा है। अगली सुनवाई 8 अक्टूबर को होगी।

इससे पहले 13 सितंबर को उच्चतम न्यायालय में ही इन 72 महिला अधिकारियों की अवमानना याचिका पर सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से कहा गया था कि अब वो दो हफ्ते के भीतर इन अधिकारियों की समस्याओं का समाधान निकालेगी। इन महिलाओं का दावा है कि कोर्ट के आदेश के बावजूद सेना ने उन्हें अभी तक स्थाई कमीशन नहीं दिया है। हालत ये है कि सेना की ओर से इन महिलाओं को चिठ्ठी भेजी गई है, किसी को भी स्थाई कमीशन नहीं दिया गया है।

उच्चतम न्यायालय ने 25 मार्च 2021 को फैसला सुनाया था कि दो महीने के भीतर इनको सेना में स्थाई कमीशन दिया जाए और साथ में अगले महीने प्रमोशन भी दिया जाए। बावजूद इसके इन महिलाओं को स्थाई कमीशन अब तक नहीं दिया गया। इसके बाद 10 अगस्त को इन महिलाओं ने रक्षा मंत्रालय और सेना को कानूनी नोटिस भेजा। उसका भी कोई जवाब नहीं मिला, तब जाकर इन महिलाओं ने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा फिर से खटखटाया।

कोरोना टीका केंद्र पर सिर्फ आधार नहीं और भी हों पहचान के तरीके

उच्चतम न्यायालय ने एक याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने को कहा है। इसमें याचिकाकर्ता ने कहा है कि केंद्र को निर्देश दिया जाए कि कोविड वैक्सीनेशन के लिए सिर्फ आधार कार्ड ही न मांगा जाए।सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने कहा कि कोविन ऐप में 7 तरह के पहचान पत्र की बात है, लेकिन वैक्सीनेशन सेंटर पर आधार ही मांगा जा रहा है। इसी पर जोर बना हुआ है। ऐसे में केंद्र को निर्देश जारी करने की जरूरत है।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि आप (याची) सिर्फ न्यूजपेपर आर्टिकल पर न जाएं बल्कि कोविन ऐप को भी देखें। वह अपडेट किया जा चुका है। ऐप में अन्य तरह के आईडी प्रूफ की भी बात है। सिर्फ आधार कार्ड ही स्वीकार नहीं हो रहा है। उसमें ड्राइविंग लाइसेंस, वोटर आई-कार्ड, राशन कार्ड , पासपोर्ट और पैन कार्ड आदि भी स्वीकार हो रहे हैं।तब सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता ने कहा कि हां यह सही है कि सात तरह के कार्ड कोविन ऐप में हैं। लेकिन, जब वैक्सीनेशन के लिए लोग सेंटर पर जाते हैं तो उनसे आधार कार्ड मांगा जा रहा है और उसके बिना वैक्सीन देने से मना किया जा रहा है।

याचिकाकर्ता ने दावा किया कि जहां तक सरकार की नीति का सवाल है तो वह पेपर पर जरूर है, लेकिन धरातल पर नहीं है। मेघालय हाईकोर्ट ने भी इस मामले में दखल दिया था। उच्चतम न्यायालय ने इस दलील के बाद केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है।

केवल परिकल्पना के आधार पर प्रबंधन के फैसले को पलटा नहीं जा सकता

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि श्रम न्यायालय प्रबंधन के फैसले को ‘ बिना साक्ष्य बयान देकर ‘ पलट नहीं सकता और उसका फैसला महज परिकल्पना पर आधारित नहीं होना चाहिए। यह देखते हुए कि श्रम न्यायालय ने खुद को “अपील की अदालत” में बदल दिया, उच्चतम न्यायालय ने श्रम न्यायालय के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसने एक कर्मचारी की सेवाओं को समाप्त करने के प्रबंधन के फैसले को पलट दिया था।

जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस अभय एस ओका की पीठ ने कहा कि औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 की धारा 11 ए के तहत एक श्रम न्यायालय के अधिकार क्षेत्र का विवेकपूर्ण तरीके से प्रयोग किया जाना चाहिए, और इसका प्रयोग सनक या मनमर्जी से नहीं किया जा सकता है। हालांकि ट्रिब्यूनल सबूतों की जांच या विश्लेषण कर सकता है, लेकिन यह महत्वपूर्ण है कि यह कैसे किया गया है।

औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 की धारा 11 ए श्रम न्यायालयों, न्यायाधिकरणों और राष्ट्रीय न्यायाधिकरणों की शक्तियों से संबंधित है, जो कामगारों को बर्खास्त करने या मुक्त करने के मामले में उचित राहत देते हैं। एक अनुशासनात्मक जांच के बाद पारित बर्खास्तगी के आदेश को पलटते हुए एक बैंक कर्मचारी को बहाल करने के ट्रिब्यूनल के आदेश के संदर्भ में ये टिप्पणियां की गई हैं। पीठ ने कहा कि ट्रिब्यूनल ने अनुशासनात्मक जांच के दौरान दर्ज किए गए निष्कर्षों में हस्तक्षेप करते हुए उनकी पूरी तरह से अनदेखी की और अपने अधिकार क्षेत्र को पार कर लिया, जिसमें प्रतिवादी कर्मचारी को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।

स्पष्ट मामला है कि रिश्तेदार का पक्ष लिया गया

उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को केरल के पूर्व मंत्री केटी जलील द्वारा केरल उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली उस याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया, जिसमें केरल लोकायुक्त की रिपोर्ट को भाई-भतीजावाद और पक्षपात का दोषी ठहराया गया था।

जलील, जो 2016-2021 के एलडीएफ सरकार के कार्यकाल के दौरान उच्च शिक्षा और अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री थे, ने केरल राज्य अल्पसंख्यक विकास वित्त निगम लिमिटेड में महाप्रबंधक के रूप में मानदंडों में बदलाव करके अपने रिश्तेदार अदीब को नियुक्ति देकर पद की शपथ का उल्लंघन किया था। रिपोर्ट के बाद उन्हें पिछले अप्रैल में मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था।

जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस बीआर गवई की पीठ ने याचिका पर विचार करने पर अनिच्छा व्यक्त करते हुए कहा कि यह एक रिश्तेदार का पक्ष लेने का स्पष्ट मामला है। इस पर याचिका वापस ले ली गयी।

यह स्वीकार करते हुए कि विचाराधीन व्यक्ति जलील से संबंधित है, उनके वकील वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने प्रस्तुत किया कि उनकी सुनवाई के बिना निष्कर्ष दर्ज किए गए थे। उन्होंने आरोप लगाया कि अदीब द्वारा प्रतिद्वंद्वी मुस्लिम लीग पार्टी के सदस्यों के खिलाफ एनपीए खातों से बकाया की वसूली के लिए कार्यवाही शुरू करने के बाद शिकायत दर्ज की गई थी। शिकायत मुस्लिम लीग पार्टी के कहने पर दर्ज की गई थी, जो वसूली की कार्रवाई से क्षुब्ध थी। उन्होंने कहा कि विवाद के एक महीने के भीतर अदीब ने इस्तीफा दे दिया। नियुक्ति मानदंडों में पेश की गई अतिरिक्त योग्यताएं, जिस पर लोकायुक्त ने आपत्ति जताई थी, सरकार द्वारा अनुमोदित की गई थी।

फिल्म ‘द कन्वर्जन’ की रिलीज पर रोक लगाने से इनकार

दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार को फिल्म ‘द कन्वर्जन’ की रिलीज पर रोक लगाने से इनकार किया। दरअसल, कथित तौर पर सांप्रदायिक रूप से आरोपित सामग्री प्रदर्शित करने और धार्मिक समुदायों के बीच नफरत फैलाने का आरोप लगाते हुए चुनौती दी गई थी।

चीफ जस्टिस डीएन पटेलऔर जस्टिस ज्योति सिंह की खंड पीठ ने कहा कि उत्तेजना लोगों के मानसिक रवैये पर निर्भर करती है। किसी को किसी भी बात से उकसाया जा सकता है, यहां तक कि बिना किसी के एक भी शब्द कहे। जबकि कुछ लोग कभी उत्तेजित नहीं हो सकते, वे बहुत शांत रहते हैं।

पीठ ने कहा कि फिल्म के पूरे संदर्भ के बिना केवल ट्रेलर के आधार पर याचिका दायर की गई है। पीठ ने कहा कि नोटिस “एक आदमी के उकसावे” के आधार पर जारी नहीं किया जा सकता है और इस प्रकार इसने सूचना और प्रसारण मंत्रालय को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए प्रतिनिधित्व पर यथासंभव शीघ्रता से निर्णय करे।

मनमाने तरीके से बंगलों पर कर्मचारी तैनात नहीं कर सकेंगे पुलिस अफसर

पुलिस अफसरों के बंगलों पर नियम से अधिक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की तैनाती पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि स्वीकृति पदों के मुकाबले अधिक कर्मचारियों की तैनाती न की जाए और उसका कड़ाई से पालन किया जाए।इसके साथ ही इस मामले में जिम्मेदार अफसर की तैनाती कर उसकी निगरानी की जाए। अगर पुलिस अफसरों के बंगलों पर सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं तो उसकी रिकार्डिंग की जाए। हाईकोर्ट रक्षक कल्याण ट्रस्ट की ओर से दाखिल की गई जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहा था।

याचिका पर अधिवक्ता राम अवतार वर्मा का तर्क था कि सरकार के 28 मार्च 2014 के आदेश के विरूद्ध पुलिस अफसरों के बंगलों में स्वीकृति पदों के मुकाबले अधिक संख्या में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की तैनाती किए हैं। इन कर्मचारियों से तरह-तरह के घरेलू काम कराए जा रहे हैं, जो कि घरेलू हिंसा के नियमों के विरूद्ध हैं। इसके अलावा आरक्षी और मुख्य आरक्षियों से भी घरेलू काम कराए जा रहे हैं। याचिका कर्ता ने अपने पक्ष में प्रदेश सरकार की ओर से 28 मार्च 2014 को जारी किए गए आदेश का हवाला दिया। कोर्ट ने सरकार से उसके आदेश का कड़ाई से अनुपालन करने का निर्देश दिया। कहा कि जिम्मेदार पुलिस अफसर के जरिए इसकी मॉनिटरिंग कराई जाए। अगर कोई पुलिस ऑफिसर आदेश की अवहेलना करते हुए पाया जाए तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाए।
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)

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