ज्यों ही भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों को हिंदू धर्म छोड़ने का कोई विकल्प (मौका) मिला, बहुलांश लोगों ने हिंदू धर्म छोड़ दिया; आखिर क्यों?

निम्न चीजें छोड़ देना बुनियादी तौर पर हिंदू धर्म छोड़ देना होता है-

1- वेदों को ईश्वर की वाणी मानने से इंकार करना और उसकी

 सर्वोच्चता-श्रेष्ठता को खारिज कर देना।

2-अवतारवाद (ईश्वर के अवतार) को खारिज कर देना। 

3- ब्राह्मणों की श्रेष्ठता और सर्वोच्चता को खारिज करे देना। धार्मिक पुरोहित के रूप में और ईश्वर और इंसान के बीच उसकी बिचौलिए की भूमिका को मानने से इंकार कर देना।

4- वर्ण-जाति व्यवस्था और वर्णों-जातियों की श्रेष्ठता-निकृष्टता के श्रेणीक्रम को खारिज कर देना।

5- स्मृतियों की सामाजिक व्यवस्था को अस्वीकार कर देना।

हिंदू धर्म छोड़ने का लोगों को भारतीय उपमहाद्वीप में पैदा हुए निम्न विकल्प मिले-

1-हिंदू धर्म छोड़कर नाथपंथ अपनाने का विकल्प मिला, लोग नाथपंथी हो गए- 

गोरखानाथ (12वीं शताब्दी) ने भारत के लोगों के सामने हिंदू धर्म छोड़कर नाथपंथ अपनाने का विकल्प प्रस्तुत किया। लाखों-लाख की संख्या में लोग नाथपंथी हो गए। 

देश के बहुत बड़ी एरिया में इस नाथपंथ का विस्तार और विकास हुआ। आज भी इसकी देश के अलग-अलग कोनों में उपस्थिति इसका साक्ष्य प्रस्तुत करती है। 

इसमें हिंदू-मुसलमान दोनों शामिल थे, बिना किसी अंतर के। आज भी नाथपंथी हिंदू-मुस्लिम योगी दोनों मिलते हैं।

2- वासवन्ना (12वीं शताब्दी) ने लिंगायत धर्म का विकल्प दिया और लोग हिंदू धर्म छोड़कर लिंगायत हो गए- 

आज के कर्नाटक की उस समय की करीब एक तिहाई आबादी हिंदू धर्म छोड़कर लिंगायत हो गई। आज भी इसके लाखों अनुयायी हैं।

3- रैदास (14वीं शताब्दी) का रविदसिया पंथ- इस पंथ ने भी लोगों को हिंदू धर्म छोड़ने का  का विकल्प दिया, लोग हिंदू धर्म छोड़कर रैदास के पंथ के साथ हो लिए- 

इस पंथ के लाखों-लाख लोग अनुयायी बने। आज भी इस पंथ के धार्मिक स्थल और इसके लाखों अनुयायी मिलते हैं। 

4-कबीर (14वीं शताब्दी) और उनका कबीर पंथ का विकल्प-

कबीर ने लोगों को हिंदू धर्म छोड़ने का एक विकल्प उपलब्ध कराया। उनके नाम पर लाखों-लाख लोग कबीरपंथी हो गए। इसमें हिदू-मुसलमान दोनों थे।

5- नानक (15वीं शताब्दी) और उनके बाद के गुरुओं ने सिख धर्म का विकल्प प्रस्तुत किया और लाखों-लाख लोगों ने सिख धर्म अपना लिया। 

उपरोक्त सभी हिंदू धर्म की पांच बुनियादी बातें खारिज करते हैं। जिन पांच चीजों की चर्चा मैं ऊपर कर चुका हूं।

बाहरी पैदा हुए धर्मों का विकल्प- इस्लाम और ईसाई धर्म का विकल्प 

1-इस्लाम का विकल्प मिला और लोगों ने इस्लाम स्वीकार कर लिया-

ज्यों ही हिंदुओं के बहुसंख्यक हिस्से को हिंदू धर्म छोड़कर एक समता आधारित धर्म इस्लाम मिला। करोड़ों लोगों ने इस्लाम कबूल कर लिया।

आज भारत उपमहाद्वीप का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान और बांग्लादेश मुस्लिम बहुल है। भारत में इंडोनेशिया के बाद सबसे अधिक मुस्लिम धर्म के अनुयायी हैं।

तलवार के जोर पर लोग इस्लाम अपनाए थे, इस तर्क की धज्जियां तो हिंदू धर्म के सबसे बड़े पैरोकार, अध्येता और सन्यासी विवेकानंद ही उड़ा चुके हैं। इसके बारे में बहुत कुछ तथ्यों के साथ लिखा जा चुका है। 

हिंदुओं का बहुसंख्य हिस्सा समता की तलाश में इस्लाम कबूला था। 

2- ईसाई धर्म का विकल्प मिला, लोगों ने ईसाई धर्म स्वीकार किया- 

ईसाई धर्म अपनाने वालों के बारे में लोग कहते हैं, लोगों ने लोभ-लालच में यह धर्म अपनाया। सच यह है कि समता की तलाश में ही अपनाया।

इतिहास इस बात का साक्षी है कि एक धर्म छोड़कर दूसरा धर्म अपनाना एक इंसान के लिए सबसे कठिन निर्णयों में एक होता है। लोग अपनी जान दे देते रहे, पूरे के पूरे परिवार-समुदाय का बलिदान कर देते रहे हैं, लेकिन एक धर्म छोड़कर दूसरा धर्म नहीं अपनाए। यहां तक कि अपना निवास-स्थान (वास स्थान) तक छोड़कर हजारों किलोमीटर दूर परायी-अनजानी जगह चले जाते थे, लेकिन अपना धर्म नहीं छोड़ते थे। 

(यहां मैं प्राकृतिक धर्म का पालन करने वाले उन लोगों की बात नहीं कर रहा हूं, जिनके लिए प्रकृति प्रार्थना- पूजा ही धर्म था। उनके पास कोई व्यवस्थित धर्म नहीं था और जब उनके सामने कोई व्यवस्थित धर्म आया तो उन्होंने अपना लिया, हालांकि यह प्रक्रिया भी बहुत कठिन होती थी।) 

सवाल यह है कि जब भी कोई मौका मिला, क्यों लोगों ने हिंदू धर्म छोड़ दिया और कोई अन्य धार्मिक विकल्प अपना लिया-

किसी धर्म के धर्म होने और उसका अनुयायी बने रहने के लिए कम से कम तीन अनिवार्य शर्तें होती हैं-

1- उस धर्म के ईश्वर की नजर में उस धर्म के सभी अनुयायी समान होने चाहिए।

2- उस धर्म के धर्मग्रंथ उस धर्म के सभी अनुयायियों को समान दर्जा देते हों और उन्हें पढ़ने-छूने और रखने का सबको बराबर का अधिकार हो।

3- इस धर्म के धर्मस्थल तक सभी लोगों की बिना किसी भेदभाव पहुंच हो। धर्मस्थल पर किसी के साथ कोई ऊंच-नीच या ज्यादा-कम के आधार पर अंतर और भेदभाव न हो। 

धर्म की ये तीन सबसे न्यूनतम बुनियादी शर्तें हिंदू धर्म में मौजूद नहीं रही हैं और आज भी नहीं हैं। 

सिर्फ ब्राह्मण वर्ण के लोगों के लिए ही हिंदू धर्म में बराबरी थी। बराबरी क्या उन्हें सर्वोच्चता प्राप्त थी। ईश्वर ने स्वयं अपने मुंह से उन्हें पैदा किया था। शेष को ईश्वर ने स्वयं ब्राह्मणों से नीचा पैदा किया था। 

हिंदुओं के धर्मग्रंथ, जो स्वयं ईश्वर की वाणी (वेद) हैं, उन्हें पढ़ने-छूने और रखने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ ब्राह्मणों को प्राप्त था। बहुलांश के लिए उसे छूना भी अपराध और दंड की श्रेणी में आता था।

ईश्वर का वास स्थान (मंदिर) पर पूरी तरह ब्राह्मणों के कब्जे में था। एक बड़ी संख्या को वहां प्रवेश की इजाजत नहीं थी।

(इसी अर्थ में कहा जाता है कि हिंदू धर्म बुनियादी तौर पर ब्राह्मण धर्म है। पहले इसे ब्राह्मण धर्म के रूप में जाना भी जाता था।)

ऐसी स्थिति में हिंदुओं के बड़े हिस्से को हमेशा ऐसे धर्मों की तलाश रही, जहां वे ईश्वर की नजर में समान हों, नीच न हों। 

ईश्वर के वास स्थान या प्रार्थना स्थल (मंदिर-मस्जिद या चर्च या कोई और) तक उनकी आसानी से पहुंच हो, कोई रोक-टोक न हो। 

अपने धर्म के धर्मग्रंथ तक उनकी पहुंच हो, उसे छू सकें, पढ़ पाएं तो पढ़ सकें और अपने पास रख सकें।

यह सब हिंदू धर्म के बहुलांश लोगों को हिंदू धर्म छोड़कर ही हासिल हो सकता था। इसलिए उन्हें ज्यों ही देश के भीतर पैदा हुआ या बाहर से आया धर्म या पंथ मिला, उन्होंने हिंदू धर्म छोड़कर उसे अपना लिया। 

यह प्रक्रिया आधुनिक काल तक चलती रही। अभी भी चल रही है। इसे ही रोकने के लिए केंद्र सरकार और भाजपा की प्रदेश सरकारें धर्म-परिवर्तन के मामले में कडे़-कड़े नियम एक बाद एक बना रही हैं। 

(इस विवेचन में मैंने प्राचीन काल और आधुनिक काल की ज्यादा चर्चा नहीं की है।)

(डॉ. सिद्धार्थ लेखक और पत्रकार हैं।)

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