Thursday, January 20, 2022

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मोदी राज में अडानी-अंबानी मालामाल, गरीब हुए कंगाल

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अगर यह सवाल, सरकार या नीति आयोग, जो उसका थिंकटैंक है, से पूछा जाए कि 2014 के बाद सरकार की आर्थिक नीति क्या है? तो उसका उत्तर होगा आर्थिक सुधार लागू करने की। फिर सवाल उठता है कि यह सुधार, किस बिगड़ी हुई चीज या नीति को सुधारने के लिए लागू किया जा रहा है? उत्तर होगा, देश में भ्रष्टाचार, बढ़ती बेरोजगारी, महंगाई, औद्योगिक विकास, आधुनिक बैंकिंग, संचार, डिजिटलाईजेशन, खेती आदि के सुधार के लिए जरूरी है। अब एक स्वाभाविक सवाल उठता है कि छह साल के शासनकाल में 2014 के बाद 2020 तक, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, महंगाई, औद्योगिक विकास, आधुनिक बैंकिंग, डिजिटाइजेशन, खेती आदि किस क्षेत्र में सुधार हुआ है।  इसका उत्तर संभवतः होगा कि सब कुछ सुधर जाता यदि कोरोना आपदा नहीं आती तो। अब यह सवाल पूछिए कि कोरोना तो 2020 के मार्च में आया।

अब केवल सरकार 2014 से 2020 तक यानी 31 मार्च 2020 तक की ही अपनी उपलब्धियों को बता दे कि किन आर्थिक सुधारों से देश की अर्थव्यवस्था में सुधार हुआ है? इसके उत्तर में एक झुंझलाहट भरा जवाब मिलेगा कि देश में 1947 से कुछ हुआ ही नहीं और आप को जवाहरलाल नेहरू के शिजरे, सोनिया गांधी की मलिका बरतानिया से भी अधिक संपत्ति के आंकड़े और राहुल गांधी से जुड़े तमाम व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी के रिसर्च पेपर तो मिल जाएंगे पर यह उत्तर सरकार का कोई भी जिम्मेदार व्यक्ति या भाजपा का नेता नहीं देगा कि आखिर 2014 के बाद सरकार ने किया क्या?

पर सरकार तो गिनाती है अपनी उपलब्धियां। वह कहती है, उज्ज्वला योजना, 2000 रुपये की किसान सम्मान निधि, ट्रिपल तलाक़ पर कानून, संविधान के अनुच्छेद 370 का खात्मा, सड़कों का निर्माण, तरह-तरह के लोन, और अन्य बहुत कुछ योजनाओं के नाम गिना दिए जाएंगे।

पर अगर देश की आर्थिक प्रगति हो रही है तो-
● देश की जीडीपी कैसे, और क्यों गिर रही है?
● मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में ऋणात्मक विकास क्यों है?
● बेरोजगारी के आंकड़े क्यों 2016 के बाद सरकार ने देना बंद कर दिए?
● नोटबंदी ने अपने घोषित उद्देश्य क्यों नहीं पूरे किए?
● नोटबंदी के कुछ उद्देश्य थे भी या वह भी सर्वोच्च सनक का परिणाम था?
● जीएसटी से कर सुधारों का कितना लाभ हुआ?

अब इन्ही सुधारों के क्रम में सरकार ने जून 2020 में कृषि सुधार के नाम पर तीन कृषि कानूनों को अध्यादेशों के माध्यम से लागू किया और फिर उन्हें संसद से शातिराना तरीके से पारित करवा लिया। अब स्थिति यह है कि पहले तो पंजाब का किसान इन कानूनों को समझा और उसने इनका विरोध किया, फिर देश के कृषि विशेषज्ञों और अर्थशास्त्रियों ने इन कानूनों के पीछे छिपी कॉरपोरेट की वास्तविक मंशा को समझा और उन्हें उजागर किया तो देश भर के किसान इन कानूनों के खिलाफ खड़े हो गए और लगभग 36 दिन से दिल्ली घिरी हुई है। 45 किसान धरनास्थल पर अपनी जान गंवा चुके हैं, और सरकार की समझ में नहीं आ रहा है कि वह कैसे इस मुसीबत से निपटे। 

ऐसा नहीं है कि 2014 के पहले की सरकारें कॉरपोरेट घरानों के लिए काम नहीं करती थीं, बल्कि देश मे कॉरपोरेट घरानों के प्रति सभी सरकारों का झुकाव रहा है। उसका कारण है हमारा आर्थिक मॉडल। हालांकि स्वाधीनता के बाद, जब कांग्रेस सत्ता में आई तो आर्थिक विकास का जो मॉडल उसने चुना वह समाजवादी समाज की स्थापना से प्रेरित था, जिसे जवाहरलाल नेहरू के शब्दों में सोशलिस्टिक पैटर्न ऑफ सोसायटी कहा गया। कांग्रेस में आर्थिकि के प्रति प्रगतिशील सोच स्वाधीनता संग्राम के समय से ही पड़ गई थी। जब सुभाष बाबू 1938 में हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन में अध्यक्ष चुने गए तो उन्होंने आर्थिक प्रस्ताव के अंतर्गत योजना आयोग के गठन का प्रस्ताव पारित कराया था। यही योजना आयोग, आज़ाद भारत में देश के आर्थिक विकास का थिंकटैंक बना और 2014 तक नियमित रूप से कार्य करता रहा।

फरवरी 1938 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कहा था कि स्वतंत्र भारत की सरकार को सबसे पहले देश में मौजूद विकराल गरीबी से निपटने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर योजना बनाने के लिए एक आयोग बनाना होगा। उस वक्त उन्होंने कांग्रेस की एक शाखा के तौर पर राष्ट्रीय नियोजन समिति बनाई, जिसके अध्यक्ष नियुक्त किए गए थे जवाहरलाल नेहरू, जो कि बाद में मार्च 1950 को गठित देश के पहले योजना आयोग के अध्यक्ष भी बने। तब से ही प्रधानमंत्री के योजना आयोग के पदेन अध्यक्ष बनने की परंपरा पड़ी।

तब अमेरिका दुनिया में विकास के नए मॉडल के रूप में उभर चुका था। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट आइजनहॉवर को एक पत्र के जरिए नेहरू ने देश में नियोजन प्रक्रिया के संबंध में सुझाव देने के लिए किसी अर्थशास्त्री भेजने के लिए अनुरोध  किया था। इसके उत्तर में अमेरिका ने  विख्यात अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन को भारत भेजा, लेकिन फ्रीडमैन के आर्थिक विकास का मॉडल नेहरू को पसंद नहीं था। वह मॉडल पूंजीवादी व्यवस्था का था, जो नेहरू के अनुसार भारतीय आर्थिकी के लिए घातक सिद्ध हो सकता है, तब नेहरू ने दुबारा अमेरिका को पत्र लिखा, जिसमें ऐसे व्यक्ति को भेजने पर नाराजगी जताई गई थी, जिसे नियोजन की अवधारणा पर ही भरोसा नहीं था। दरअसल स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ही देश में इस बात पर सहमति बन गई थी कि आजाद भारत की सरकार के सरोकार ब्रिटिश सरकार से अलग होंगे और गरीबी उन्मूलन और सामाजिक-आर्थिक पुनर्वितरण की जिम्मेदारी मुख्यतः सरकार की ही होगी। कांग्रेस, स्वाधीनता संग्राम के समय से ही एक लोककल्याणकारी राज्य की अवधारणा के प्रति प्रतिबद्ध थी।

70 साल पहले जब योजना आयोग गठित हुआ था, तब से आज तक उसका लाभ भी मिला। तब राष्ट्र निर्माण की विकराल चुनौती को देखते हुए, संसाधनों का नियोजित उपयोग जरूरी था। जब योजना आयोग भंग हुआ और नया नीति आयोग अस्तित्व में आया, तब तक हमारी अर्थव्यवस्‍था दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्‍थाओं में स्थान पा चुकी थी। तब योजना आयोग सार्वजनिक क्षेत्र का वह उपकरण माना गया था, जो अर्थव्यवस्‍था को नई ऊंचाइयां देने के लिए जरूरी था। 1950 से 1991 तक देश की मुख्य आर्थिक नीति, मिश्रित अर्थव्यवस्था के साथ नियंत्रित आर्थिकी की रही।

सार्वजनिक क्षेत्रों में बड़े-बड़े उद्योग और प्रतिष्ठान खड़े हुए। रेलवे, एयरलाइंस आदि के राष्ट्रीयकरण किए गए। इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े उद्योगों की स्थापना हुई और इस प्रकार, कॉरपोरेट और निजी क्षेत्रों के साथ सार्वजनिक क्षेत्र का एक संतुलन बना कर देश की आर्थिकी की दिशा तय की गई। 1969 में इंदिरा गांधी ने राजाओं के प्रिवीपर्स को खत्म और बैंकों के राष्ट्रीयकरण के साथ समाजवादी अर्थव्यवस्था की ओर झुकाव के स्पष्ट संकेत भी दे दिए थे।

1991 तक आते आते, देश की अर्थव्यवस्था पिछड़ने लगी। दुनिया भर में सोवियत रूस के विखंडन के बाद पूंजीवादी देश अपनी आर्थिकी के मॉडल के साथ सक्रिय हो गए। वह काल एकध्रुवीय विश्व का था, जिसे वैश्वीकरण का नाम दिया गया। भारत भी उस दौर से अछूता नहीं रहा। 1991 के बाद पूरी दुनिया के साथ-साथ भारत की आर्थिक नीति में भी बदलाव आए। नियंत्रित बाजार और कोटा लाइसेंस राज का अंत हो गया। घर की खिड़कियां और दरवाजे खुल गए और इस नयी बयार से देश में दुनिया भर की कंपनियों ने अपना व्यवसाय शुरू किया। उपभोक्ताओं को नए नए विकल्प मिले और देश की अर्थव्यवस्‍था ने विकास के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के बजाय निजी क्षेत्र की ओर देखना शुरू किया।

1991 में एक नया शब्द आर्थिकी को मिला आर्थिक सुधार। ज़ाहिर है 1991 के बाद नियंत्रित अर्थव्यवस्था को उदार किया गया, और दुनिया भर मे आर्थिकी जो करवट बदल रही थी, उसी के अनुरूप भारत की अर्थव्यवस्था भी बदलने लगी और उस समय के सबसे मोहक शब्द थे, उदारीकरण और वैश्वीकरण या ग्लोबलाइजेशन। इस बदलाव के नायक थे प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हाराव और सूत्रधार हुए डॉ. मनमोहन सिंह जो तब देश के वित्तमंत्री बने। डॉ. सिंह के लिए भारत की अर्थव्यवस्था नयी नहीं थी। वह वित्तमंत्री बनने के पहले, देश के वित्त सचिव, वित्तमंत्री के आर्थिक सलाहकार और रिजर्व बैंक के गवर्नर रह चुके थे। वे उदारीकरण और वैश्वीकरण के प्रबल समर्थक थे।

पर इस तथ्य से कोई इनकार नहीं कर सकता है कि 1991 में जो नीतिगत बदलाव अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में आया, उससे भारत की आर्थिक प्रगति हुई और 2014 तक देश लगभग इसी मॉडल पर चलता रहा और बाद में 2004 से 2014 तक, डॉ. मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री भी बने और जब वे हटे तो भारत दुनिया में सबसे अधिक तेजी से विकसित होने वाली अर्थव्यवस्था में बदल चुका था।

1996 से लेकर 2004 तक देश में या तो तीसरे मोर्चे की सरकार रही या फिर एनडीए की अटलबिहारी बाजपेयी की, लेकिन आर्थिकी का मॉडल वही रहा जिसकी नींव 1991 में पीवी नरसिम्हाराव और डॉ. मनमोहन सिंह ने डाली थी। 2014 में जब नरेंद्र मोदी एनडीए सरकार के प्रधानमंत्री बने तो उसी साल 15 अगस्त 2014 को दिए गए अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने योजना आयोग की जगह एक ऐसे नए संस्थान के गठन की घोषणा की, जो रचनात्मक सोच, सार्वजनिक-निजी भागेदारी, संसाधनों, खासकर युवाओं के अधिकतम उपयोग पर केंद्रीत होगा। यह घोषणा, योजना आयोग के खात्मे और एक नए थिंकटैंक के रूप में नीति आयोग के गठन के प्रारंभ की थी। मगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस घोषणा पर तब कई सवाल भी अर्थ विशेषज्ञों ने खड़े हुए, जिसमें प्रमुख था,
● उस समय चल रही बारहवीं पंचवर्षीय योजना का क्या भविष्य होगा, जिसे न सिर्फ केंद्र सरकार ने बल्कि राष्ट्रीय विकास परिषद ने भी स्वीकारा था, जिसमें गुजरात भी शामिल था।
● दूसरा, ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि राज्यों में विकास व्ययों के लिए योजनागत आवंटन करने की भूमिका केंद्रीय वित्त मंत्रालय को सौंपी जाएगी।

तब देवेगौड़ा सरकार में योजना मंत्री रहे वाईके अलघ ने यह पूछा था, “जिन राज्यों में ‌दूसरे दलों की सरकार है, क्या वह इसके लिए तैयार होंगे?”

राज्यों और योजना आयोग के बीच मतभेद पहले भी थे और अब भी हैं, मगर वाइके अलघ के अनुसार, पिछले साठ वर्षों में ऐसा एक भी मामला नहीं आया है, जबकि किसी राज्य ने योजना आयोग द्वारा किए गए वार्षिक आवंटन को खारिज किया हो। यह भी सवाल उठा कि केंद्रीय मंत्रालयों और केंद्र व राज्यों के बीच संसाधनों के आवंटन का काम अगर योजना आयोग से ले लिया गया, तो फिर ये किसे सौंपे जाएंगे?

राष्ट्रीय विकास परिषद और अंतरराज्यीय परिषद के अलावा योजना आयोग के विकल्प के तौर पर एक ऐसे संस्‍थान की जरूरत तो होगी ही जो, केंद्र और राज्य सरकारों के बीच मध्यस्‍थ की भूमिका निभा सके। तभी यह सवाल भी उठा था कि तब योजना आयोग की जिम्मेदारियां कौन और कैसे निभाएगा?

यह भी अर्थशास्त्रियों की चिंता थी कि,
● वित्त मंत्रालय में घाटा कम करने के लिए, योजनागत व्यय को कम करने की प्रवृत्ति होती है, ऐसे में, कोई ऐसा संस्‍थान आवश्यक है, जो राज्य सरकारों और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े मंत्रालयों की आवाज बन सके।
● फिर राज्यों में जो योजनाएं चल रही हैं, उन पर पर्यवेक्षण करने का काम कौन करेगा?
● अगर यह जिम्मेदारी केंद्रीय मंत्रालय उठाएंगे, तो क्या यह राज्य सरकारों, खासकर, जहां विरोधी दलों की सरकार है, को स्वीकार्य होगा।

यह भी तब कहा गया कि योजना आयोग की शोधकारी भूमिका भी है। अर्थव्यवस्‍था के विभिन्न क्षेत्रों की पूरी जानकारी योजना आयोग अपने पास रखता है, और इस शोधपरक जान‌कारियों का उपयोग सभी मंत्रालय करते हैं। योजना आयोग के खत्म होने पर यह जिम्मेदारी किसके सुपुर्द की जाएगी। इन सवालों का उचित जवाब ढूंढे बगैर, योजना आयोग को खत्म कर देना, नाहक अनिश्चितता की वजह बन सकता है। इस तरह की तमाम आशंकाओं की चर्चा अर्थ विशेषज्ञों ने की थी।

15 अगस्त 2014 को की गई प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद 1 जनवरी 2015 को नीति आयोग (राष्‍ट्रीय भारत परिवर्तन संस्‍थान) का गठन किया गया है। इसे सरकार के थिंकटैंक के रूप में, सरकार को निर्देशात्‍मक एवं नीतिगत गतिशीलता प्रदान करने, केंद्र और राज्‍य स्‍तरों पर सरकार को नीति के प्रमुख कारकों के संबंध में प्रासंगिक महत्‍वपूर्ण एवं तकनीकी परामर्श उपलब्‍ध कराने सम्बंधित दायित्व दिए गए। इसमें आर्थिक मोर्चे पर राष्‍ट्रीय और अंतर्राष्‍ट्रीय आयात, देश के भीतर, साथ ही साथ अन्‍य देशों की बेहतरीन पद्धतियों का प्रसार नए नीतिगत विचारों का समावेश और विशिष्‍ट विषयों पर आधारित समर्थन से संबंधित मामले सौंपे गए।

नीति आयोग का प्रमुख, एक मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) है, जिस पर आज कल अमिताभ कांत नियुक्त हैं। नीति आयोग के सदस्यों में विवेक देवराय, वीके सारस्वत, रमेश चंद्र और विनोद पाल शामिल हैं। योजना आयोग और नीति आयोग में मूलभूत अंतर यह बताया गया है कि इस नए थिंकटैंक के गठन से केंद्र से राज्यों की तरफ चलने वाले एक पक्षीय नीतिगत क्रम को एक महत्वपूर्ण विकासवादी परिवर्तन के रूप में राज्यों की वास्तविक और सतत भागीदारी से बदलने में लाभ मिलेगा। 

योजना आयोग का प्रमुख जहां एक राजनीतिक व्यक्ति होता था वहीं नीति आयोग का प्रमुख एक नौकरशाह को बनाया गया।

अब इसका अर्थ यह हुआ कि 1 जनवरी 2015 के बाद देश की व्यापक आर्थिक नीतियों की अवधारणा और उनका क्रियान्वयन नीति आयोग के अनुसार किया जाने लगा। इन कार्यक्रमों को सरकार और नीति आयोग दोनों ही सुधार का नाम देते हैं और वे जो नीतियां या कानून लाते हैं, उनके बारे में कहते हैं कि इनसे देश की अर्थव्यवस्था में सुधार आएगा और देश विकास की राह पर आगे बढ़ चलेगा। पर जब आप 2015 के बाद सरकार द्वारा जारी किए गए आर्थिक कदमों की समीक्षा कीजिएगा तो यही पाइएगा कि देश की आर्थिकी के बजाय प्रगति पथ पर बढ़ने के अधोगति की ओर चल रही है।

2015 के बाद उठाए गए आर्थिक सुधार, नोटबंदी, जीएसटी, बैंकिंग सेक्टर सहित एक भी ऐसा सुधार कार्यक्रम सफल नहीं हुआ है जिसका लाभ देश को मिला हो। न तो भ्रष्टाचार के क्षेत्र में उसे नियंत्रित करने के लिए लोकपाल और अन्य सतर्कता संस्थाओं को शक्ति संपन्न किया गया, न ही दो करोड़ हर साल रोजगार देने के वादे को पूरा करने के लिए कोई सार्थक उपाय किए गए। मेक इन इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया, वोकल फ़ॉर लोकल, आत्मनिर्भर, मुद्रा लोन जैसी आकर्षक नाम वाली योजनाएं ज़रूर इवेंट मैनेजमेंट और तामझाम से शुरू की गईं, लेकिन जब इसी अवधि के आर्थिक सूचकांकों का अध्ययन किया जाता है तो उन योजनाओं की उपलब्धि नहीं मिलती है और अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में चतुर्दिक गिरावट ही नज़र आती है। यह नीतिगत विफलता है या क्रियान्वयन न कर पाने की प्रशासनिक विफलता, या यह दोनों का एक घालमेल है, इस पर अलग से विस्तार में जाना उचित होगा। फिलहाल तो यह सरकार की विफलता है ही।

कोरोना महामारी एक वैश्विक आपदा है, लेकिन यदि 1 अपैल से अब तक के आंकड़ों को दरकिनार कर दिया जाए तो केवल 2015 से 2020 मार्च तक के आंकड़े जो संकेत देते हैं, उनसे यह स्पष्ट प्रमाणित है कि 2014 के पहले दुनिया की सबसे तेज गति से उर्ध्वगामी अर्थव्यवस्था 2020 के मार्च तक दुनिया की सबसे तेज गति से अधोगामी अर्थव्यवस्था में बदल गई है। अर्थव्यवस्था में तमाम गिरावट के बाद केवल यही एक ‘उपलब्धि’ हुई है कि देश में सरकार और प्रधानमंत्री के सबसे प्रिय औद्योगिक घराने, रिलायंस और अडानी ग्रुप की संपत्तियां और आर्थिक हैसियत बढ़ी है। जबकि देश में आर्थिक असमानता बढ़ी है, गरीब और गरीब हुआ है, लोककल्याणकारी कार्यों पर पूंजीपतियों का कब्ज़ा हुआ है, अस्पताल के बजाए मेडिक्लेम बिजनेस का विस्तार हुआ है, छोटे और मझोले व्यापारी चौपट हुए हैं, औद्योगिक उत्पादन निगेटिव हुआ है, जीवन स्तर में गिरावट आई है और दैनंदिन जीवन महंगा हुआ है।

अब हम उद्योगजगत के लोगों की व्यक्तिगत बात करते हैं। भारत के सबसे अमीर आदमी मुकेश अंबानी ने इन पांच सालों में अपनी संपत्ति दोगुनी से भी ज्यादा कर ली। उनकी संपत्ति 118 फीसदी उछाल के साथ 1.68 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 3.65 लाख करोड़ रुपये पहुंच चुकी है। गौतम अडानी के मामले में तो उछाल और भी ज्यादा है। उनकी संपत्ति में 121 फीसदी बढ़ोत्तरी दर्ज की गई। अडानी की संपत्ति पिछले 5 सालों में 50.4 हजार करोड़ रुपये से बढ़कर 1.1 लाख करोड़ रुपये पहुंच चुकी है। 2014 में वे 11वें सबसे अमीर भारतीय थे। अब 2019 में अडानी दूसरे नंबर पर पहुंच चुके हैं।

ऐसा क्या हो गया है 2014 से अब तक या अब भी ऐसा क्या हो रहा है कि देश में जीडीपी सहित आर्थिक सूचकांक निराशाजनक संकेत दे रहे हैं और इन दो चहेते पूंजीपतियों की संपत्ति बढ़ रही है? और इसे आर्थिक सुधार कहा जा रहा है! यह साफ तौर पर आईने की तरह से स्पष्ट है कि मोदी सरकार का हर कदम, हर नीति, हर कानून, हर निर्देश केवल कुछ चहेते पूंजीपतियों को ही ध्यान में रख कर बनाया जाता है और लागू किया जाता है। तीनों नये कृषि कानून उसी कॉरपोरेट प्रेम या गिरोहबंद पूंजीवाद की नीति जो पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का, अब तक का सबसे विकृत स्वरूप है, के परिणाम हैं। यह तीनों कानून केवल और केवल कॉरपोरेट के हित में हैं और भारतीय कृषि के लिए नितांत हानिकारक हैं।

आज जब किसान और लोग सरकार से इन कानूनों के बारे में सवाल उठा रहे हैं, सड़कों पर हैं, आंदोलनरत हैं और सरकार से इन कानूनों को वापस लेने के लिए देश भर में सड़कों पर हैं तो नीति आयोग के सीईओ को लगता है कि देश मे टू मच डेमोक्रेसी है और वह उनके आर्थिक सुधारों को लागू नहीं होने देगी। देर से ही सही, जनता अब यह समझने लगी है कि मोदी सरकार की सारी प्राथमिकताएं कॉरपोरेट हित में ही हैं न कि जनहित और लोककल्याण!

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

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