चुनाव जीत कर सरकार बनाने से मनमानी का लाइसेंस नहीं मिल जाता कानून मंत्री जी!

जेपी सिंह September 12, 2020

भारत में लोकतंत्र है और चुनाव में कोई जीते कोई हारे इससे जीतने वाली पार्टी को यह लाइसेंस नहीं मिल जाता कि वह संविधान और कानून के शासन का रोज उल्लंघन करे। मनमानियां करे और न्यायपालिका उसके निर्णयों को संविधान के प्रावधानों पर न कसे। सरकार की प्रशस्ति में रागदरबारी गाए। कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद जी! आपने इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख लिखकर कहा है कि एक प्रतिकूल फैसले की स्थिति में न्यायाधीशों के खिलाफ शातिर अभियान शुरू करने से न्यायपालिका की स्वतंत्रता को खतरा है।

रवि शंकर प्रसाद जी, न्यायपालिका की स्वतंत्रता को खतरा नहीं है बल्कि यह लोकतंत्र की मजबूती का परिचायक है, जिसमें न्यायपालिका के संविधानेतर निर्णयों, क़ानूनी प्रावधानों की मनमानी व्याख्याओं, सत्तारूढ़ दल के एजेंडों को क़ानूनी मुद्दा बनाकर न्यायिक आदेशों से लागू करने की कोशिशों और सरकार के सभी निर्णयों की न्यायिक पुष्टि करने का साहस आम जन में आता जा रहा है।

लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों की सरकार होती है। यह राजतन्त्र नहीं है रवि शंकर प्रसाद जी, जहां सरकार के सभी मनमाने निर्णयों को जनता स्वीकार करे। जनप्रतिनिधि जनता के प्रतिनिधि होते हैं, लेकिन एक बार चुने जाने के बाद जब वे सत्ता में बैठ जाते हैं तो उनमें राजतंत्र की भावना बलवती हो जाती है और वे पैदायशी राजा की तरह व्यवहार करने लगते हैं। तब जनता चुनाव में उन्हें पराजित करके सत्ता से बाहर कर देती है रवि शंकर प्रसाद जी!

केन्द्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने उच्चतम न्यायालय के फैसलों का बचाव करते हए लिखा है, हम सभी न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए प्रतिबद्ध हैं, जो हमारी संवैधानिक राजनीति के लिए अभिन्न है। हमें उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों की असाधारण विरासत में स्वतंत्रता, सशक्तीकरण, इक्विटी और भ्रष्टाचार की रोकथाम की खोज पर गर्व है। इन दिनों, कथा बनाने का नया चलन है, जनहित याचिका दाखिल करना, सोशल मीडिया अभियान के बारे में बताना कि अदालत द्वारा किस तरह का निर्णय दिया जाना चाहिए और यदि व्यापक दलीलों के बाद अंतिम फैसला वह नहीं होता जो कोई चाहता था, फिर एक शातिर अभियान चलाया जाता है। मेरा रास्ता या राजमार्ग  का यह रवैया हाल के दिनों में न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है।

आपने न्यायपालिका के सरकार समर्थक निर्णयों का यह कहकर बचाव किया है कि जब से मोदी के नेतृत्व वाली सरकार सत्ता में आई है, ऐसे कई उदाहरण हैं जहां उच्चतम न्यायालय ने सरकार के खिलाफ फैसला किया है। इस सरकार की पहली बड़ी पहल, कोलेजियम प्रणाली की जगह एक राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग की स्थापना करना, जो कि वास्तव में बहस के योग्य होने के कारण सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अलग रखा गया था, लेकिन हकीकत में आपकी सरकार ने कोलेजियम प्रणाली पर ही कुंडली मार दी है।

कोलेजियम की सिफारिशों पर सरकार कुंडली मारकर बैठ जाती है और साल-साल भर बाद बिना कारण बताए सिफारिशें वापस कर देती है। सत्ता के मनमाफिक सिफारिशों को सरकार फ़ौरन से पेश्तर मान लेती है, जबकि सत्ता के खिलाफ फैसला देने वाले जजों की प्रोन्नति की फाइलें या तो अस्वीकृत कर दी जा रही हैं या अनंत कल तक लटकाकर स्वीकृति दी जा रही है, ताकि उनका वरिष्टता क्रम प्रभावित हो जाए।

आखिर यह संयोग तो नहीं हो सकता रवि शंकर प्रसाद जी कि इस समय इलाहबाद हाईकोर्ट से गए एक जाति विशेष के तीन न्यायाधीशों में दो उच्चतम न्यायालय में हैं और तीसरे एक हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस हैं, जिन्हें उच्चतम न्यायालय में लाने की कोशिशें हो रही हैं। यह कोलेजियम प्रणाली का कमाल है या अंदरखाने मिलीभगत का।

रवि शंकर प्रसाद जी, आपने लिखा है कि उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन के परीक्षण के लिए कहा गया था। कर्नाटक के मामले में यह वही था जहां अदालत ने रात में बैठकर निर्देश दिया कि एक दिन में एक मंजिल परीक्षण किया जाए। अरुणाचल प्रदेश विधानसभा के मामले में इसी तरह का हस्तक्षेप किया गया था, लेकिन रवि शंकर प्रसाद जी तीनों जगह लाभान्वित होने वाली पार्टी भाजपा थी। आपने एमपी का जिक्र नहीं किया, जहां उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप पर आपकी पार्टी की सरकार जल्दी बन गई थी। आपने राजस्थान के मामले का ज़िक्र नहीं किया जहां न्यायपालिका ने आपकी पार्टी की सरकार बनवाने की हर मुमकिन परोक्ष  कोशिश की और कर्नाटक, एमपी, अरुणाचल की तरह त्वरित हस्तक्षेप नहीं किया तथा मामले को लटकाए रखा।  

आपने लिखा है कि अनुच्छेद 370 के हनन को चुनौती देने वाली याचिका संविधान पीठ के समक्ष लंबित है, जबकि नागरिकता संशोधन अधिनियम को चुनौती देने वाली याचिका तीन न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष लंबित है। पर जिस महत्वपूर्ण प्रकृति के यह मामले हैं उनकी सुनवाई राष्ट्रवादी मोड में उच्चतम न्यायालय नहीं कर रहा है? क्या संविधान से सीधे संबंधित इन मामलों की सुनवाई त्वरित नहीं होनी चाहिए? इस पर सवाल उठाने वाले आपको देशद्रोही प्रतीत होते हैं।  

आपने लिखा है कि कोविड-19 के दौरान भी, सरकार को निर्देश देते हुए समय-समय पर विभिन्न निर्णय पारित किए गए हैं। मैं समझता हूं कि कुछ लोगों को एक समस्या है, क्योंकि आजकल भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं है, जो यूपीए सरकार के दौरान आदर्श बन गया था। रविशंकर प्रसाद जी कोविड-19 के संक्रमण के शुरुआती दौर से न्यायपालिका के माननीय स्वयं अपनी जान बचाने के लिए आयरन कर्टेन के पीछे चले गए, जबकि उन्हें आगे बढ़कर कोविड-19 से निपटने के लिए लीड करना चाहिए था। कोविड में प्रवासी मजदूरों के प्रति न्यायपालिका का रवैया और आचरण सदैव सवालों के घेरे में रहेगा।

आपने परोक्ष रूप से तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के बचाव में महाभियोग की मांग को न्यायपालिका की स्वतंत्रता से जोड़ा है, वह सिर्फ आप ही कर सकते हैं। आपने लिखा है कि जिस तरह से उच्चतम न्यायालय के एक पीठासीन चीफ जस्टिस के खिलाफ कांग्रेस के करीबी वरिष्ठ वकीलों की सक्रिय भागीदारी के साथ महाभियोग चलाने की मांग की गई थी, वह न्यायपालिका को खत्म करने की कोशिश करने की मानसिकता को दर्शाता है। जब राज्यसभा के सभापति ने मंजूरी देने से इनकार कर दिया, तो उच्चतम न्यायालय में एक रिट याचिका दायर की गई और बाद में वापस ले ली गई। यह हाल के दिनों में न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सबसे बड़ा धब्बा बना हुआ है।

यह सर्वविदित है कि मेडिकल प्रवेश घोटाले के नाम से जाने जाने वाले इस पूरे मामले की एसआईटी जांच की मांग करने वाली एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में आई, जिसकी सुनवाई 9 नवंबर, 2017 को जस्टिस एस अब्दुल नजीर और जस्टिस जे चेलामेश्वर की पीठ ने की। बेंच ने इसे गंभीर माना और इसे पांच वरिष्ठतम जजों की बेंच में रेफर कर दिया। इस बेंच में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा को भी रखा गया और सुनवाई के लिए 13 नवंबर 2017 की तारीख तय की गई।

इसी तरह के एक और मामले का जिक्र कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म (सीजेएआर) नाम की संस्था ने भी 8 नवंबर 2017 को जस्टिस चेलामेश्वर की अगुवाई वाली बेंच के सामने रखा था। उस मामले में पीठ ने 10 नवंबर को सुनवाई की तारीख तय की थी, लेकिन 10 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट में हुए एक हाई वोल्टेज ड्रामे के बाद मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने जस्टिस चेलामेश्वर की अध्यक्षता वाली पीठ द्वारा 9 नवंबर को दिए गए उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें अदालत को रिश्वत देने के आरोपों में एसआईटी जांच की मांग वाली दो याचिकाओं को संविधान पीठ को रेफर किया गया था।

कानून मंत्री जी, आपकी सरकार का दावा  है कि भृष्टाचार पर उसका ज़ीरो टालरेंस है, लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज एसएन शुक्ला को मेडिकल प्रवेश घोटाले में बदनीयती से अपने अधिकारों के दुरुपयोग का दोषी मानते हुए इनको पद से हटाए जाने की उच्चतम न्यायालय की सिफारिश के बावजूद आपकी सरकार उनके खिलाफ संसद में महाभियोग प्रस्ताव नहीं लाई और उनको कार्यकाल पूरा होने पर ख़ामोशी से रिटायर होने दिया गया। यही नहीं तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई द्वारा सीबीआई को कार्रवाई करने की मंजूरी दे दी गई पर अब तक जस्टिस शुक्ल पर कोई करवाई नहीं की गई, क्या इसका कारण बता सकते हैं कानून मंत्री जी।

क्या आप बता सकते हैं की अप्रैल 2017 में उच्चतम न्यायालय ने क्यों कहा था कि  सरकार खुद कुछ करना नहीं चाहती, ऐसे में अगर हम कोई निर्देश देते हैं तो कहा जाता है कि अदालत देश चला रही है? यह टिप्पणी करते हुए उच्चतम न्यायालय ने महिला एवं बाल विकास मंत्रालय पर एक लाख रुपये का जुर्माना किया है। वृंदावन सहित देश के अन्य शहरों में विभिन्न शेल्टर होम में रह रही विधवाओं के संरक्षण और पुनर्वास को लेकर केंद्र सरकार के रवैये पर आपत्ति जताते हुए न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, “आखिर विधवाओं को लेकर आप गंभीर क्यों नहीं हैं। आपको विधवाओं की चिंता क्यों नहीं है। आप हलफनामा दायर कर कहिए कि आपको देश की विधवाओं से कोई लेना देना नहीं है।”

क्या आप को याद है रविशंकर प्रसाद जी, कि लोकसभा में कानून मंत्री के रूप में मार्च 2017 को रविशंकर प्रसाद ने कहा है कि अगर कार्यपालिका अपने अधिकारों की सीमा से बंधी हुई है, तो न्यायपालिका को भी याद रखना चाहिए कि संविधान ने उसके लिए भी सीमा तय रखी है। न्यायपालिका की तरफ से विधायिका के कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप का मामला लोकसभा में जोर-शोर से उठा था।

26 नवंबर 2017 को संविधान दिवस के मौके पर आयोजित एक कार्यक्रम में कानून मंत्री के रूप में आपने कहा था कि न्यायपालिका अपने अधिकार क्षेत्र से परे जा रही है। आपने न्यायपालिका को विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच शक्ति के पृथक्करण के सिद्धांत की याद दिलाई थी। आपने कहा था कि शक्ति के पृथक्करण का सिद्धांत न्यायपालिका के लिए भी उतना ही बाध्यकारी है, जितना कार्यपालिका के लिए।

आज आप न्यायपालिका के बचाव में खड़े हैं, क्योंकि न्यायपालिका प्रतिबद्धता से कार्य कर रही है और आपकी शिकायतें ख़त्म हो गई हैं। आपने राफेल डील, तीन तलाक, अयोध्या विवाद के फैसलों का हवाला क्यों नहीं दिया। कानून मंत्री जी, ईमानदार होना ही नहीं चाहिए बल्कि दिखना भी चाहिए।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

This post was last modified on September 12, 2020 11:10 am

जेपी सिंह September 12, 2020
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