देश के 32 लाख हथकरघा कामगारों के सामने भुखमरी के हालात

वो मई का महीना था, जब दिल्ली के सीलमपुर से आशा नाम की एक महिला ने मेरे मोबाइल नंबर पर फोन कर कहा था, “राशन दिलवा दीजिए नहीं तो हम भूखे मर जाएंगे। मेरे बच्चे तीन दिन से भूखे हैं।” 

आशा दिल्ली की एक धागा कंपनी में काम करती थी। फैक्ट्री लॉकडाउन के बाद बंद हो गई थी। बिहार की रहने वाली आशा के पास न तो राशन कार्ड था न ही आधारकार्ड। ये तो सिर्फ़ एक आशा की बात थी, लेकिन पूरे देश में ऐसी जानें कितनी आशाएं भुखमरी के सामने हताश खड़ी होंगी?    

चौथे ‘ऑल इंडिया हैंडलूम सेंसस ऑफ इंडिया 2019-20’ के मुताबिक देश में कुल 31,44,839 हथकरघा कामगार हैं। 27,48,445 ग्रामीण इलाके में और 3,96,394 शहरी इलाके में हैं। पिछले पांच महीने से राजनीतिक अदूरदर्शिता की वजह से उपजे हालात और लॉकडाउन के चलते हथकरघा कुटीर उद्योग में काम ठप्प पड़ा  है। इसके कामगारों के सामने भुखमरी का संकट खड़ा हो गया है। कोविड-19 वैश्विक महामारी के बावजूद हथकरघा उद्योग के लिए केंद्र सरकार ने किसी भी तरह का राहत पैकेज नहीं दिया है।

दलित, आदिवासी, मुस्लिम, स्त्री वर्ग सबसे ज्यादा पीड़ित
हथकरघा कामगारों के समाजिक समूह की बात करें तो इसमें 4,48737 (14.3%) दलित, 6,01,661 (19.1%) आदिवासी, 10,55,882 (33.6%) ओबीसी और 10,38559 (33%) अन्य हैं।अन्य की कटेगरी में शामिल 5,49,767 (17.5%) मुस्लिम हैं। 2,09,920 (6.7%) ईसाई समुदाय के लोग हैं। लैंगिक आधार पर बात करें तो हथकरघा उद्योग में काम करने वालों में 28 प्रतिशत कामगार पुरुष हैं और 72.3% कामगार स्त्रियां। 

पांच हजार महीना पर करते हैं गुजारा
हथकरघा उद्योग में काम करने वाले कामगार मुख्यतः दो तरह के होते हैं। बुनकर और संबद्ध कामगार (allied)। बुनकरों की संख्या 26,73,891 (75.9%) है जबकि आश्रित कामगारों की संख्या 8,48,621 (24.1%)। हथकरघा उद्योग में 73.2% लोग अपना खुद का काम करते हैं और केवल 6.3% कोऑपरेटिव सोसायटी के अंतर्गत।

अब बात करते हैं प्रतिम माह होने वाली आय की। तो चौथे हैंडलूम जनसंख्या के मुताबिक प्रतिमाह 5000 रुपये से कम पाने वालों की संख्या 21,09,525 है यानि 68.5%। जबकि 5001-10,000 रुपये प्रतिमाह आय करने वालों की संख्या 8,24,021 यानि 26.2 % और 10-15 हजार रुपये कमाई कर पाने वालों की संख्या 1,40,509 है यानि महज 4.5%।  

उपरोक्त सरकारी आंकड़ों से स्पष्ट है कि हथकरघा कुटीर उद्योग में लगे कामगारों की कमाई इतनी भी नहीं है कि उसमें कुछ बचत संभव हो। ऐसे में जबकि पिछले पांच महीने से काम-काज बिल्कुल ठप्प है, हैंडलूम कामगारों के परिवार के सामने भुखमरी की स्थिति उत्पन्न हो गई है।   

आमदनी कम होने से हैंडलूम कामगारों में साक्षरता दर कम है और स्कूल ड्रॉपआउट दर ज़्यादा है। 23.2% कामगार निरक्षर,14.3 % प्राइमरी से भी कम पढ़े, 18% प्राइमरी तक शिक्षा प्राप्त हैं। मिडिल क्लास तक शिक्षित बुनकर 20% है। जबकि मैट्रिक तक शिक्षित कामगारों की संख्या महज 13% है।

शिक्षा पर नज़र डालने पर स्पष्ट होता है कि हथकरघा उद्योग में काम करने वाले लोग समाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक रूप से बेहद पिछड़े लोग हैं। इनके आजीविका का एकमात्र साधन बंद हो जाने से ये लोग बेहद संकटग्रस्त स्थिति में हैं।

43 प्रतिशत हैंडलूम कामगारों के पास नहीं है आधारकार्ड
इस देश में आधार कॉर्ड बुनियादी नागरिक अधिकारों को हासिल करने का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज बन चुका है। आधार कॉर्ड नहीं है तो राशन नहीं है। आधार कॉर्ड नहीं है तो सरकारी स्कूलों में शिक्षा नहीं है। आधार कार्ड बिना कई और जरूरी सुविधाएं नहीं मिलतीं।

बावजूद इसके इस देश के 43 प्रतिशत हैंडलूम कामगारों के पास आधारकॉर्ड नहीं है। कोरोनाकाल में केंद्र सरकार ने 3.5 करोड़ लोगों के राशनकार्ड सिर्फ़ इसलिए रद्द कर दिए, क्योंकि वे आधारकार्ड से लिंक नहीं थे।

आप सहज ही अनुमान लगा सकते हैं कि ऐसे में कोविड-19 महामारी के समय में इन 43 प्रतिशत आधारकार्ड हीन हैंडलूम कामगारों को सरकारी राशन का एक दाना तक नहीं मिला होगा।

ये कोविड-19 वैश्विक महामारी का समय है। ऐसे में यदि हम हैंडलूम कामगारों के इंश्योरेंस की बात करें तो सरकारी सर्वे के मुताबिक केवल 3.8 प्रतिशत हैंडलूम कामगारों का ही बीमा हुआ है, जो कि बेहद हैरान और निराश करने वाला आंकड़ा है। 

प्रवासी हथकरघा कामगारों का रिवर्स माइग्रेशन
महाराष्ट्र और दिल्ली समेत कई राज्यों की हथकरघा कंपनियों में काम करने वाले लाखों कामगार लॉकडाउन के दौरान पैदल ही अपने गृह राज्यों को लौटने को विवश हुए थे। गृह राज्यों में लौटने के बाद अब इन कामगारों के हाथ खाली हैं। इनके पास कोई काम नहीं है।

ये मजदूर शहरों के हथकरघा कंपनियों में 14-18 घंटे काम करने के बावजूद महीने के 7-10 हजार रुपये ही कमा पाते थे। जहां इन्हें एक साल में महाराष्ट्र में 310 दिन, आंध्र प्रदेश में 302 दिन, दिल्ली में 292 दिन, छत्तीसगढ़ में 290 दिन, और पुडुचेरी में 286 दिन काम मिलता था।   

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

This post was last modified on August 1, 2020 8:32 pm

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