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जयंती पर विशेष: ‘नई कहानी’ और ‘समांतर कहानी’ आंदोलन के जनक कमलेश्वर


हिन्दी साहित्य में कथाकार कमलेश्वर का शुमार उन साहित्यकारों में होता है, जिन्होंने कहानी को नई दिशा प्रदान की। हिन्दी कहानी का आज जो स्वरूप दिखाई देता है, उसमें उनका अमूल्य योगदान है। कहानी और नई कहानी का जब भी मूल्यांकन होगा, कमलेश्वर के बिना कोई बात पूरी नहीं हो पाएगी। ‘नई कहानी’ के तो वे आधार स्तम्भ थे। 6 जनवरी, 1932 को उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले में जन्मे कमलेश्वर का जब साहित्य में आगाज हुआ, तो जैनेन्द्र, यशपाल और अज्ञेय जैसे बड़े कथाकार अपने उरूज पर थे।

श्रेष्ठ होते हुए भी हालांकि, तीनों की कहानियां एक दूसरे से बिल्कुल जुदा थीं। जाहिर है कि कमलेश्वर को इन्हीं मुख्तलिफ धाराओं के बीच ही हिन्दी कथा साहित्य में अपना स्थान बनाना था। उन्होंने इन प्रचलित धाराओं के बरअक्स एक नई धारा को जन्म दिया। ‘नई कहानी’ का ढाँचा गढ़ा और ‘नई कहानी’ की इस परिकल्पना में कथाकार मोहन राकेश, राजेन्द्र यादव आगे चलकर उनके साझेदार हुए। कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव और मोहन राकेश की तिकड़ी ने हिन्दी कथा साहित्य की दिशा बदलकर रख दी। ‘राजा निरबंसिया’, ‘कस्बे का आदमी’ और ‘जॉर्ज पंचम की नाक’ जैसी कमलेश्वर की कहानियों ने कथा साहित्य में नये युग का सूत्रपात किया।

पहले ‘नई कहानियां’ और उसके बाद ‘सारिका’ कथा साहित्य को समर्पित लघु पत्रिकाओं के जरिए कमलेश्वर ने कहानी के क्षितिज पर हलचल मचा दी। सम्पादक भैरव प्रसाद गुप्त से ‘नई कहानियां’ पत्रिका का संपादन संभालते ही उन्होंने पत्रिका में नये कहानीकारों को लेकर तीन नवलेखन अंक निकाले। जिसमें दूधनाथ सिंह, रवीन्द्र कालिया, ज्ञानरंजन, कामतानाथ, काशीनाथ सिंह, श्रीकांत वर्मा आदि की शुरूआती कहानियां प्रकाशित हुईं, जो बाद में चोटी के कथाकार साबित हुए। कमलेश्वर ने न सिर्फ युवा कथाकारों को मौका दिया, बल्कि नई और पुरानी पीढ़ी को जोड़ने में भी मुख्य भूमिका निभाई। नई पीढ़ी को कथा के संस्कार दिए। हिन्दी साहित्य में ‘नई कहानी’ आंदोलन के अलावा ‘समांतर कहानी’ आंदोलन भी कमलेश्वर की ही देन है। साल 1974 में शुरू हुआ ‘समांतर कहानी’ आंदोलन तो हिन्दी के साथ-साथ देश की दीगर भाषाओं मसलन मराठी, तेलगू, उड़िया, असमिया आदि में भी फैला।

‘समांतर कहानी’ को कमलेश्वर ने आम आदमी के आस-पास आज की कहानियां करार दिया। ‘समांतर कहानी’ के पक्ष में तर्क देते हुए उन्होंने लिखा,‘‘आदमी को टुकड़े-टुकड़े में न देखकर सम्पूर्ण रूप में देखने और उसकी सम्यक सम्पूर्ण लड़ाई को दिशा और रूप देने का कार्य इस साहित्य ने अपने हाथों में लिया है, जो आज का समय सापेक्ष समांतर साहित्य है।’’ बहरहाल ‘समांतर आंदोलन’ से भी आगे चलकर कई अच्छे कहानीकार निकले। मसलन जितेन्द्र भाटिया, रमेश उपाध्याय, मधुकर सिंह, इब्राहीम शरीफ, गंगाप्रसाद विमल, से.रा. यात्री, मृदुला गर्ग, निरुपमा सेवती, मणि मधुकर आदि ‘समांतर कहानी’ आंदोलन की ही देन हैं।

हिन्दी साहित्य के अंदर छठवां दशक, कहानी दशक के तौर पर जाना जाता है। उस समय ‘हंस’, ‘निकष’, ‘ज्ञानोदय’, ‘संकेत’ कहानी की प्रमुख पत्रिकाएं थीं। इन पत्रिकाओं में कहानी को प्रमुखता से प्रकाशित किया जाता था। लेकिन यशस्वी संपादक भैरव प्रसाद गुप्त के संपादन में निकलने वाली पत्रिका ‘कहानी’ के नव वर्षांक ने जो कि साल 1956 में प्रकाशित हुआ, उसने हिन्दी कहानी में नवजागरण ला दिया। इस अंक में निर्मल वर्मा की ‘परिंदे’, भीष्म साहनी-‘चीफ की दावत’, अमरकांत-‘डिप्टी कलेक्टरी’, राजेन्द्र यादव-‘एक लड़की की कहानी’, शेखर जोशी-‘कोसी का घटवार’, मोहन राकेश-‘सेफ्टी पिन’, मार्कण्डेय-‘हंसा जाई अकेला’, रांगेय राघव-‘गदल’, धर्मवीर भारती-‘गुलकी बन्नो’ आदि कहानियां छपीं। जो आगे चलकर हिन्दी साहित्य में मील का पत्थर साबित हुईं।

जाहिर है कि कहानी के क्षेत्र में भूचाल सा आ गया। एक साथ कई नए लेखक नई भाव-भूमि, भाषा और शिल्प को लेकर हिंदी कहानी के मुहाने पर दस्तक दे रहे थे। गोया कि इसी साल ‘नई कहानी’ की बात उठाई गई। लेकिन ‘नई कहानी’ की परिकल्पना को सैद्धांतिक जामा पहनाया कमलेश्वर, मोहन राकेश और राजेन्द्र यादव की त्रिमूर्ति ने। इस तिकड़ी में भी कमलेश्वर का योगदान सबसे ज्यादा अहम है। साल 1967 में ‘सारिका’ का संपादन संभालने के बाद, कमलेश्वर ने इस पत्रिका को ‘नई कहानी’ का वैचारिक आधार प्रदान करने के लिए प्लेटफार्म की तरह इस्तेमाल किया।

दरअसल, ‘नई कहानी’ की आवाज वस्तुतः एक रचनात्मक संभावना को देखकर उठी थी। ‘नई कहानी’ का यदि आकलन करें, तो इन कहानियों में एक सर्जनात्मक कोशिश है। जीवंत अनुभव को तराश कर कहानी गढ़ी गई। इन कहानियों की प्रमुख विशेषता अनुभूति की प्रमाणिकता है। कमलेश्वर ‘नई कहानी’ के ध्वजवाहक रहे। ‘नई कहानी’ को लेकर उन्होंने अपने समय में खूब आरोप-प्रत्यारोप भी झेले। आलोचक शिवदानसिंह चौहान ने जब ‘नई कहानी’ की छीछालेदर करते हुए कहा,‘‘राकेश, कमलेश्वर या राजेन्द्र यादव ने जो अच्छी कहानियां लिखी हैं, वे नई से अधिक शुद्ध फार्मूलाबद्ध कहानियां ही हैं, जो नये मसनूई परिभाषा सूत्रों के अनुसार लिखी गई हैं।’’ तब वे कमलेश्वर ही थे, जो खुलकर ‘नई कहानी’ के पक्ष में आए।

उन्होंने ‘नई कहानी’ और नये कहानीकारों का पक्ष लेते हुए ‘प्रेत बोलते हैं’ शीर्षक से संपादकीय लिख चौहान का मुँह तोड़ जवाब दिया। कमलेश्वर का यह संपादकीय आज भी साहित्यिक हल्के में शिद्दत से याद किया जाता है। बहरहाल, इन विवादों से लोहा लेते हुए उन्होंने नये कहानीकारों को लेकर ‘नई कहानियाँ’ के एक के बाद एक तीन नव लेखन अंक निकाले। कमलेश्वर ने उस दौर में न सिर्फ ‘नई कहानी’ आंदोलन को धार दी, बल्कि कहानी लेखन में आए भटकावों पर भी अपनी नजर बनाए रखी। छठवें दशक के मध्य में जब हिन्दी कहानी में सेक्स-कुंठा और अश्लीलता का जोर बढ़ा, तो कमलेश्वर अपने आप को नहीं रोक पाए। कहानी में आई इस प्रवृत्ति पर उन्होंने तीखा प्रहार किया। बहुचर्चित समाचार पत्रिका ‘धर्मयुग’ में तीन किस्तों में प्रकाशित अपने लेख ‘अय्याश प्रेतों का विद्रोह’ में उन्होंने ऐसे कहानीकारों की धज्जियां उड़ाकर रख दीं।

‘नई कहानी’ के उस दौर में कहानी में भाषा, शैली और शिल्प की दृष्टि से काफी प्रयोग हुए। लेखक की निजी अनुभूतियों की तपिश कहानी में साफ-साफ महसूस की गई। यही वह दौर था जब आंचलिक कहानियां लिखी गईं। इन आंचलिक कहानियों ने हिन्दी साहित्य में एक नए युग का सूत्रपात किया। जिस तरह शेरवुड एंडरसन की गद्य कृति ‘विन्सबर्ग ओहियो’ की आंचलिक कहानियों ने अमरीकी कहानी के इतिहास को नया मोड़ दिया। उसी तरह हिन्दी में भी ये आंचलिक कहानियां नई इबारत लिख रहीं थीं। आंचलिक कहानियों को कमलेश्वर ने हमेशा अहमियत दी। आंचलिक कहानी के बारे में उनकी राय थी,‘‘हमारी आंचलिक कहानियों में बाजारवाद का जवाब है। अपने अंतःकरण के सच को अभिव्यक्त करने की अनूठी कला इनके पास है। अंचल की कहानियों में वैश्विक सोच और प्रतिरोध का स्वर दोनों है।’’

हिन्दी साहित्य लेखन के अलावा कमलेश्वर ने अपने जीवन में पत्रकारिता, स्तंभ लेखन, सिनेमा, टेलीविजन के लिए पटकथा-संवाद लेखन, कॉमेन्ट्री, सरकारी नौकरी आदि सब कुछ किया। लेकिन वे बार-बार कथा साहित्य की ओर वापस लौटे। कथा साहित्य ने कमलेश्वर को दिया भी बहुत-कुछ। ‘पद्मभूषण सम्मान’ के अलावा, उनके उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ को साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। कहानी पर कमलेश्वर कितना यकीन करते थे, यह उन्हीं की जबानी,‘‘कहानी जिंदगी को बदल तो नहीं सकती, लेकिन विचार के ऐसे बिन्दु तक जरूर ले जाती है, जहां पाठक की सोच में बदलाव की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। कहानी दरअसल, जनतांत्रिक मूल्यों की ऐसी साझी विरासत है, जो मानव समाज को आपस में बांधकर रखने में मददगार सिद्ध हो सकती है। क्योंकि, सारी पुरातन सभ्यताओं की लोक चेतना लगभग समान या सह अस्तित्ववादी है।’’ अपनी जिन्दगी में सात पत्रिकाओं का सफलतापूर्वक संपादन और तीन सौ से ज्यादा कहानियां लिखने वाले कमलेश्वर ने 27 जनवरी, 2007 को इस दुनिया से अपनी आखिरी विदाई ली।

(जाहिद खान वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल मध्य प्रदेश के शिवपुरी में रहते हैं।)


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This post was last modified on January 6, 2021 3:07 pm

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