माईक्रो लेवल के जाति आधारित रणनीति से भाजपा लड़ेगी अगले चुनाव

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भाजपा की मोदी नीत केंद्र सरकार हो या योगी नीत उत्तर प्रदेश, शिवराज नीत मध्य प्रदेश, रुपानी नीत गुजरात अथवा भाजपा की गठबंधन सरकारें हों ये गुड गवर्नेंस कर ही नहीं सकतीं क्योंकि गुड गवर्नेंस से इनके समर्थक कार्पोरेट्स, जमाखोर, वायदा कारोबारी और निहित स्वार्थी तत्वों को भारी आर्थिक नुकसान होगा, यह पिछले सात साल के मोदी शासन में पूरी तरह स्पष्ट हो गया है। इसलिए अब धर्म आधारित राजनीति के साथ पार्टी की पहली प्राथमिकता जातीय समीकरणों को सेट करने की है। भाजपा ने पंजाब में दलित सीएम की मांग उठाकर अपने इरादे जाहिर कर दिए हैं। हालांकि हरियाणा और यूपी में 20 फीसद से अधिक दलित आबादी है पर यहाँ जब मुख्यमंत्री बनाने की बात आयी थी तो भाजपा ने हरियाणा में खट्टर (पंजाबी) और यूपी में ठाकुर सीएम चुना था। तब भाजपा को दलित सीएम नहीं सूझा था।    

दरअसल हिन्दू मुसलमान के साथ हरियाणा में जाट बनाम अन्य और सीएम पंजाबी, राजस्थान में जाट बनाम राजपूत, पंजाब में दलित सिख बनाम जाट सिख, कर्नाटक में लिंगायत बनाम वोकालिंगा, बंगाल में ब्राह्मण बनाम ओबीसी, यूपी में राजपूत बनाम ब्राह्मण, यूपी बिहार में दलितों में महा दलित, पिछड़ों में अति पिछड़े की राजनीति पर भाजपा ने अमल करना भी शुरू कर दिया है। इस रणनीति की प्रयोगशाला बनेगा उत्तर प्रदेश सहित 5 राज्यों का 2022 में आगामी विधानसभा चुनाव। यदि अपेक्षित सफलता मिली तो इसका पूरी क्षमता से 2024 में इस्तेमाल करेगी भाजपा। 

किसान अंदोलन के चलते पंजाब में भाजपा का ग्राफ काफी नीचे चला गया है। किसानों की ओर से भाजपा नेताओं का विरोध किया रहा है,  जिस के चलते अब भाजपा पंजाब में 2022 के विधान सभा चुनाव में दलित कार्ड खेलने जा रही है और भाजपा किसी दलित को मुख़्यमंत्री के रूप में पेश कर सकती है। पंजाब भाजपा के महासचिव सुभाष शर्मा ने दलित महापंचायत में अनुसूचित जातियों के मुद्दों पर चंडीगढ़ रैली ग्राउंड में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति गठबंधन और दलित संघर्ष मोर्चा के बीच चर्चा में दावा किया कि पंजाब का अगला मुख्यमंत्री अनुसूचित जाति से होगा। उन्होंने कहा कि हम अगला मुख़्यमंत्री किसी दलित को बनाएंगे। दरअसल भाजपा इस बार अकेले विधानसभा चुनाव लड़ रही है क्योंकि अकाली दल ने उससे समझौता तोड़ दिया है।  

देश में सबसे ज्यादा 32 फीसदी दलित आबादी पंजाब में रहती है। पंजाब का यह वर्ग पूरी तरह कभी किसी पार्टी के साथ नहीं रहा है। पंजाब में दलित वोट अलग-अलग वर्गों में बंटा है। यहां रविदासी और वाल्मीकि दो बड़े वर्ग दलित समुदाय के हैं।

सूत्रों के हवाले से खबर आ रही है कि उत्तर-प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दो दिन के दिल्ली दौरे से मिशन-2022 यानी अगले विधानसभा चुनाव के लिए जीत का फार्मूला लेकर लौट आए हैं। भाजपा आलाकमान ने 2017 की ऐतिहासिक जीत को दोहराने के लिए खास रणनीति भी तैयार की है। पार्टी की पहली प्राथमिकता जातीय समीकरणों सेट करने की है। यूपी में ओबीसी करीब 40 फीसद हैं और दलित वर्ग भी कुल आबादी का करीब 21 फीसद है। इसके बाद नंबर आता है 20 फीसद अगड़ी जातियों का। इसमें सबसे ज्यादा 11फीसद ब्राह्मण, 6 फीसद ठाकुर और 3 फीसद कायस्थ और वैश्य हैं। अब ओबीसी हों या दलित हों ब्राह्मण हों या ठाकुर, ये सभी अलग अलग जातियों, वर्णों और गोत्रों में बंटे हुए हैं। नतीजतन आने वाले समय में माइक्रो लेवल पर निषाद जी, बिजली पासी जी, रैदास जी, पटेल जी, प्रजापति जी, माली जी, सरयूपारी जी, कान्यकुब्ज जी, सनाढ्य जी, साकलदीपी जी, बाबू साहब जी, ठाकुर साहब जी जैसे सम्बोधनों के साथ संघ कैडर गली गली गाँव-गाँव दिखने लगे तो कोई आश्चर्य नहीं होगा।   .

सूत्रों की मानें तो सीएम योगी को संगठन के साथ मिलकर इन छोटे दलों को साधने की रणनीति बनाने के लिए भी कहा गया है। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अलावा निषाद पार्टी और अपना दल (एस) को भी पार्टी के साथ लाना होगा। अपना दल की नेता अनुप्रिया पटेल को केंद्र के मंत्रिमंडल में शामिल किया जाएगा। साथ ही जिला पंचायत अध्यक्ष की कुछ सीटें भी अपना दल को दी जा सकती हैं। निषाद पार्टी के नेताओं ने भी एमएलसी एके शर्मा से दिल्ली में मुलाकात की है। माना जा रहा है कि अगर मंत्रिमंडल विस्तार होता है तो उन्हें भी जगह मिल सकती है।

इतना ही नही भारतीय सुहेलदेव समाज पार्टी अब भाजपा  के साथ नहीं है। इसकी काट के लिए बड़े राजभर नेता को भी पार्टी में शामिल कराने की रणनीति बनाई जा रही है। दिल्ली में पार्टी के बड़े रणनीतिकारों ने इस कैंपेन की डिजाइन कर लिया है।

पश्चिम बंगाल में भाजपा ने वर्ष 2016 के विधानसभा चुनावों में अनारक्षित सीटों पर भी बड़ी तादाद में अनुसूचित जाति/जनजाति और अन्य पिछड़ी जातियों के उम्मीदवारों के मैदान में उतारा था। राज्य में पार्टी का कोई मजबूत संगठन नहीं होने के बावजूद तब राज्य के पश्चिमी और उत्तरी हिस्सों में उसे 15 से 20 फीसदी तक वोट मिले थे। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने राज्य में बड़े पैमाने पर जाति आधारित राजनीति शुरू की। इसके तहत मतुआ और नमोशूद्र समुदाय को सीएए जैसे हथियारों से लुभाने की कवायद शुरू की गई और पार्टी को इसका काफी फायदा भी मिला।

लोकसभा चुनावों में बीजेपी से मिले झटकों के बाद ममता ने बीते साल जुलाई में पहली बार अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के 84 विधायकों के साथ एक अलग बैठक की थी। उसके बाद हाशिए पर रहने वाले समुदायों की दिक्कतों के निपटारे के लिए सितंबर में एक अलग सेल का गठन किया गया था। ममता ने बीते साल सितंबर में दलित साहित्य अकादमी का गठन कर उसे पांच करोड़ का अनुदान सौंपा था। उसके बाद दिसंबर में तृणमूल कांग्रेस ने जब अपनी सरकार के दस साल के कामकाज पर रिपोर्ट कार्ड जारी की तो उसमें अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति तबके के लिए शुरू की गई योजनाओं का खास तौर पर जिक्र किया गया था।

तमिलनाडु में भी बीजेपी ने जाति कार्ड खेला था लेकिन कामयाब नहीं हुआ लेकिन हो सकता है अगले या उसके अगले चुनाव में कामयाब हो जाए। विधानसभा चुनाव के पहले केंद्र सरकार ने एक क़ानून पारित कर दक्षिण तमिलनाडु की सात अनुसूचित जातियों को ‘देवेंद्र कूला वेल्लालुर’ नाम देकर एकजुट किया था। इसे भाजपा के दक्षिण तमिलनाडु की अनुसूचित जातियों को आकर्षित करने के प्रयास की संज्ञा दी गई थी।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।) 

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