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गांधी दर्शन: समरसता की बुनियाद पर टिकी अर्थव्यवस्था और राजनीति

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महात्मा गांधी। फोटो साभार-गूगल

हम सब विकास के जिस मॉडल को आदर्श मानते हैं वह मनुष्य विरुद्ध प्रकृति के नैरेटिव पर आधारित है। यही कारण है कि हमारी अभिव्यक्तियां प्रकृति पर विजय प्राप्त करना और प्रकृति को अपने अधीन करना जैसी होती हैं। प्रकृति के साथ हिंसात्मक बर्ताव करते हुए उसका अपनी लोलुपता और भोग लिप्सा के लिए मनमाना दोहन कर हमने अपने पर्यावरण को नष्ट कर लिया है। पर्यावरण रक्षा के हमारे उपाय कॉस्मेटिक अधिक हैं, क्योंकि हमारी विकास प्रक्रिया में ही प्रकृति के निरादर और अपमान की प्रवृत्ति छिपी हुई है। गांधी के लिए प्रकृति उपभोग की वस्तु नहीं है। गांधीवाद की अवधारणा अनेक स्थानों पर मनुष्य और प्रकृति के सहअस्तित्व से भी आगे निकल जाती है। गांधीवाद मनुष्य को प्रकृति के एक अविभाज्य अंग के रूप में देखता है, यदि मनुष्य प्रकृति को नुकसान पहुंचाता है तो इस तरह वह खुद का ही अहित करता है।

हमें विकास की हमारी अवधारणा पर पुनर्विचार करना होगा। विकास किसका? विकास किसके लिए? जैसे प्रश्न हमें स्वयं से पूछने होंगे। असमानता की बढ़ती खाई, नष्ट होते पर्यावरण, अनिश्चित होते आर्थिक जीवन और तकनीकी द्वारा अपहृत होती निजता के बीच महात्मा गांधी एक आशा की किरण की भांति नजर आते हैं। आधुनिक सभ्यता की आलोचना जितनी समग्रता से गांधी जी ने की वैसी शायद किसी अन्य मनीषी ने नहीं की। किंतु गांधी को पुरातनपंथी मानना बड़ी भूल होगी। उनका प्रत्येक विचार तर्क और इससे भी बढ़कर आचरण की कसौटी पर कसे जाने के बाद ही आम जन तक पहुंचता था।

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गांधी जी के आर्थिक दर्शन के मूल मंत्र थे- अपनी जरूरत के मुताबिक उत्पादन करना, आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना, लोभ न करना, यदि आप के पास अधिक धन संपत्ति है तो यह समझना कि परमात्मा द्वारा प्रदत्त दौलत के आप मालिक नहीं हैं, अपितु एक ट्रस्टी हैं। और परमात्मा की इस दौलत का जनकल्याण के लिए अधिकतम उपयोग करने की जिम्मेदारी आप पर है।

आज जिस मुक्त अर्थव्यवस्था के मॉडल का हम अनुकरण कर रहे हैं वह भी अंततः पूंजीवाद के  उस सिद्धांत पर आधारित है जो बाजार की शक्तियों पर विश्वास करता है। अपनी आदर्श स्थिति में बाजार क्रेता और विक्रेता के लिए बेस्ट डील के सारे अवसर प्रदान करता है। ग्लोबलाइज्ड इकोनॉमी उच्च स्तरीय टेक्नोलॉजी का उपयोग करती है जिसके विषय में यह कहा जाता है कि वह क्रेता और विक्रेता दोनों के लिए अनंत संभावनाएं पैदा करती है और वे विश्व बाजार का अधिकतम लाभ उठाने की स्थिति में आ जाते हैं। टेक्नोलॉजी मानवीय अकार्यकुशलता और भ्रष्टाचार आदि पर अंकुश लगाकर व्यापार को सुगम बनाने वाली मानी जाती है।

गांधी जी ने बहुत पहले ही समझ लिया था कि कोई भी अर्थव्यवस्था जो केवल भौतिक समृद्धि और भौतिक संसाधनों के बंटवारे तथा आधिपत्य को केंद्र में रखती है, कभी भी सफल नहीं हो सकती। नैतिक रूप से पतित मनुष्य बाजार के संतुलन से अपने निजी मुनाफे के सृजन के लिए हमेशा खिलवाड़ करेगा और टेक्नोलॉजी का उपयोग अपने वर्चस्व की स्थापना के लिए करेगा।

यदि आप बहुत सतर्कतापूर्वक अवलोकन करें तो टेक्नोलॉजी का उपयोग विकसित देशों द्वारा अविकसित एवं विकासशील देशों को स्वयं पर आश्रित बनाए रखने तथा मनुष्य की निजता पर अतिक्रमण करते हुए उसे अपनी सतत निगरानी और नियंत्रण में रखने हेतु किया जा रहा है। पहले के उपनिवेशवाद के दौर में शक्ति और वर्चस्व की भूख सैन्य हस्तक्षेप और युद्धों की जन्मदात्री थी किंतु नवउपनिवेशवाद के इस दौर वैश्विक अर्थव्यवस्था और तकनीकी क्रांति तथा नवउदारवाद अप्रत्यक्ष आर्थिक नियंत्रण द्वारा सत्ता और सर्वोच्चता की भूख की हिंसक परितुष्टि कर रहे हैं। 

भौतिक संसाधनों के समान वितरण के लिए एक प्रयास साम्यवाद द्वारा किया गया जो सर्वहारा की हिंसक तानाशाही पर आधारित था। अपने बाहरी स्वरूप में पूंजीवाद का विलोम लगने वाला साम्यवाद दरअसल उसी मूल्य मीमांसा पर विश्वास करता था जो पूंजीवाद की बुनियाद हैं- हिंसा, प्रतिशोध, भौतिक समृद्धि और सर्वोच्चता की आकांक्षा। इसलिए इसका असफल होना अवश्यम्भावी था। गांधी जी के शब्दों में पूंजीवाद एवं साम्यवाद ने अर्थ विद्या और नीति विद्या में विभेद किया इसलिए समानता और समरसता लाने में ये पूर्णतः विफल रहे।

गांधी जी का आर्थिक दर्शन सामाजिक समरसता की स्थापना की सम्पूर्ण कार्य योजना प्रस्तुत करता है। गांधी जी लिखते हैं-  मेरी राय में भारत की- न सिर्फ भारत की बल्कि की सारी दुनिया की अर्थ रचना ऐसी होनी चाहिए कि किसी को भी अन्न और वस्त्र के अभाव की तकलीफ ना सहनी पड़े। दूसरे शब्दों में हर एक को इतना काम अवश्य मिल जाना चाहिए कि वह अपने खाने पहने की जरूरत पूरी कर सके। और यह आदर्श निरपवाद रूप से तभी कार्यान्वित किया जा सकता है जब जीवन की प्राथमिक आवश्यकताओं के उत्पादन के साधन जनता के नियंत्रण में रहें। वे हर एक को बिना किसी बाधा के उसी तरह उपलब्ध होने चाहिए जिस तरह के भगवान की दी हुई हवा और पानी हमें उपलब्ध है। किसी भी हालत में वे दूसरों के शोषण के लिए चलाए जाने वाले व्यापार का वाहन ना बने। किसी भी देश, राष्ट्र या समुदाय का उन पर एकाधिकार अन्यायपूर्ण होगा।(यंग इंडिया 15 नवंबर 1928)

यह प्रकृति का निरापद बुनियादी नियम है कि वह रोज केवल उतना ही पैदा करती है जितना हमें चाहिए और यदि हर एक आदमी जितना उसे चाहिए उतना ही ले, ज्यादा न ले तो दुनिया में गरीबी न रहे और कोई आदमी भूखा न मरे। मैं समाजवादी नहीं हूं और जिनके पास संपत्ति का संचय है उनसे मैं उसे छीनना नहीं चाहता लेकिन यह मैं जरूर कहता हूं कि हममें से जो लोग प्रकाश की खोज में प्रयत्नशील हैं उन्हें व्यक्तिगत तौर पर इस नियम का पालन करना चाहिए। (स्पीचेस एंड राइटिंग्स ऑफ महात्मा गांधी, पृष्ठ 384)

जिस तरह सच्चे नीति धर्म में और अच्छे अर्थशास्त्र में कोई विरोध नहीं होता उसी तरह सच्चा अर्थशास्त्र कभी भी नीति धर्म के ऊंचे से ऊंचे आदर्श का विरोधी नहीं होता जो अर्थशास्त्र धन की पूजा करना सिखाता है और बलवानों को निर्बल लोगों का शोषण करके धन का संग्रह करने की सुविधा देता है उसे शास्त्र का नाम नहीं दिया जा सकता।(हरिजन 9 अक्टूबर 1937)। ——–आर्थिक समानता के लिए काम करने का मतलब है पूंजी और मजदूरी के बीच के झगड़ों को हमेशा के लिए मिटा देना। इसका अर्थ यह होता है कि एक ओर से जिन मुट्ठी भर पैसे वालों के हाथ में राष्ट्र की संपत्ति का बड़ा भाग इकट्ठा हो गया है उनकी संपत्ति को कम करना और दूसरी ओर से जो करोड़ों लोग आधे पेट खाते और नंगे रहते हैं उनकी संपत्ति में वृद्धि करना।

जब तक मुट्ठी भर धनवानों और करोड़ों भूखे रहने वालों के बीच बेइंतहा अंतर बना रहेगा तब तक अहिंसा की बुनियाद पर चलने वाली राज्य व्यवस्था कायम नहीं हो सकती। अगर धनवान लोग अपने धन को और उसके कारण मिलने वाली सत्ता को खुद राजी खुशी से छोड़कर और सब के कल्याण के लिए सब के साथ मिलकर बरतने को तैयार ना होंगे तो यह समझ लें कि हमारे देश में हिंसक और खूंखार क्रांति हुए बिना न रहेगी। ट्रस्टीशिप के मेरे सिद्धांत का बहुत मजाक उड़ाया गया है, मैं फिर भी उस पर कायम हूं। (रचनात्मक कार्यक्रम पृष्ठ 40-41)। ————मेरी सूचना है कि यदि भारत को अपना विकास अहिंसा की दिशा में करना है तो उसे बहुत सी चीजों का विकेंद्रीकरण करना पड़ेगा। केंद्रीकरण किया जाए तो फिर उसे कायम रखने के लिए और उसकी रक्षा के लिए हिंसा बल अनिवार्य है। गांवों को मुख्य मानकर जिस भारत का निर्माण होगा उसे शहर प्रधान भारत की अपेक्षा विदेशी आक्रमण का कम खतरा रहेगा भले ही शहर प्रधान भारत जल,स्थल और वायु सेनाओं से अधिक सुसज्जित होगा। (हरिजन 30 दिसंबर 1939)।

सामाजिक समता की स्थापना के लिए विकेन्द्रीकृत शासन व्यवस्था को गांधी जी आवश्यक मानते थे। उनके अनुसार ऐसा ही विकेंद्रीकरण देश के आर्थिक जीवन में भी होना चाहिए। वे बड़े बड़े कल कारखानों की स्थापना के विरुद्ध थे। उनके विकेंद्रीकरण के सिद्धांत का विस्तार यदि पर्यावरण के क्षेत्र में करें तो विशाल बांधों की स्थापना के बजाए छोटे छोटे स्टॉप डैम्स की स्थापना और तालाबों के संरक्षण तथा संवर्धन का सिद्धांत सामने आता है। ग्राम स्वराज्य की अवधारणा पर्यावरण मित्र जीवन शैली की आदर्श अवस्था को दर्शाती है।

ग्राम स्वराज्य के विषय में उन्होंने लिखा- ग्राम स्वराज्य की मेरी कल्पना यह है कि वह एक ऐसा पूर्ण प्रजातंत्र होगा जो अपनी अहम जरूरतों के लिए अपने पड़ोसी पर भी निर्भर नहीं करेगा और फिर भी बहुत सी ऐसी दूसरी जरूरतों के लिए जिनमें दूसरों का सहयोग अनिवार्य होगा वह परस्पर सहयोग से काम लेगा। इस तरह हर एक गांव का पहला काम यह होगा कि वह अपनी जरूरत का तमाम अनाज और कपड़े के लिए कपास खुद पैदा कर ले। उसके पास इतनी सुरक्षित जमीन होनी चाहिए जिसमें ढोर चर सकें और गांव के बड़ों व बच्चों के लिए मनबहलाव के साधन और खेलकूद के मैदान वगैरह का बंदोबस्त हो सके। इसके बाद भी जमीन बची तो उसमें वह ऐसी उपयोगी फसलें उगाए जिन्हें बेचकर वह आर्थिक लाभ उठा सके। (हरिजन सेवक, 2 अगस्त 1942)

गांधी जी के सपनों के गांव में सामाजिक समरसता ही वह ताना बाना होगी जिस पर शांतिपूर्ण सहअस्तित्व में विश्वास करने वाली राष्ट्र एवं विश्व व्यवस्था कायम होगी। वे कहते हैं-   आजादी नीचे से शुरू होनी चाहिए। हर एक गांव में जम्हूरी सल्तनत या पंचायत का राज होगा। उसके पास पूरी सत्ता और ताकत होगी। इसका मतलब यह है कि हर एक गांव को अपने पांव पर खड़ा होना होगा। अपनी जरूरतें खुद पूरी कर लेनी होंगी ताकि वह अपना सारा कारोबार खुद चला सके यहां तक कि वह सारी दुनिया के खिलाफ अपनी रक्षा खुद कर सके। ——- इस तरह आखिर हमारी बुनियाद व्यक्ति पर होगी। ——– जिस समाज का हर एक आदमी यह जानता है कि उसे क्या चाहिए और इससे भी बढ़कर जिसमें यह माना जाता है कि बराबरी की मेहनत करके भी दूसरों को जो चीज नहीं मिलती है वह खुद भी किसी को नहीं लेनी चाहिए, वह समाज जरूर ही बहुत ऊंचे दर्जे की सभ्यता वाला होना चाहिए। ऐसे समाज की रचना सत्य और अहिंसा पर ही हो सकती है।

मेरी राय है कि जब तक ईश्वर पर जीता जागता विश्वास ना हो तब तक सत्य और अहिंसा पर चलना असंभव है।——– ऐसा समाज अनगिनत गांवों का बना होगा। उसका फैलाव एक के ऊपर एक के ढंग पर नहीं बल्कि लहरों की तरह एक के बाद एक की शक्ल में होगा। जिंदगी मीनार की शक्ल में नहीं होगी जहां ऊपर की तंग चोटी को नीचे के चौड़े पाये पर खड़ा होना पड़ता है। वहां तो समुद्र की लहरों की तरह जिंदगी एक के बाद एक घेरे की शक्ल में होगी और व्यक्ति उसका मध्य बिंदु होगा।  इस समाज में सबसे बाहर का घेरा या दायरा अपनी ताकत का उपयोग भीतर वालों को कुचलने के लिए नहीं करेगा बल्कि उन सब को ताकत देगा और उनसे ताकत पाएगा। ——— यूक्लिड की परिभाषा वाला बिंदु कोई मनुष्य खींच नहीं सकता फिर भी उसकी कीमत हमेशा रही है और रहेगी। इसी तरह मेरी इस तस्वीर की भी कीमत है। जिस चीज को हम चाहते हैं उसकी सही सही तस्वीर हमारे सामने होनी चाहिए तभी हम उससे मिलती-जुलती कोई चीज पाने की आशा रख सकते हैं।

इस तस्वीर में उन मशीनों के लिए कोई जगह नहीं होगी जो मनुष्य की मेहनत का स्थान लेकर कुछ लोगों के हाथों में सारी ताकत इकट्ठी कर देती हैं। सभ्य लोगों की दुनिया में मेहनत की अपनी अनोखी जगह है। उसमें ऐसी ही मशीनों की गुंजाइश होगी जो हर आदमी को उसके काम में मदद पहुंचाए। (हरिजन सेवक, 28 जुलाई 1946) ———-ग्राम उद्योगों का यदि लोप हो गया तो भारत के सात लाख गांवों का सर्वनाश ही समझिए। अनेक आलोचकों ने तो मुझे यह सलाह दी है कि मनुष्य की अन्वेषण बुद्धि ने प्रकृति की जीवनी शक्तियों को अपने वश में कर लिया है, उनका उपयोग करने से ही गांवों की मुक्ति होगी। उन आलोचकों का यह कहना है कि प्रगतिशील पश्चिम में जिस तरह पानी, हवा, तेल और बिजली का पूरा-पूरा उपयोग हो रहा है उसी तरह हमें भी इन चीजों को काम में लाना चाहिए। इस रास्ते अगर हम हिंदुस्तान में चले तो मैं बेधड़क कह सकता हूं कि हमारे प्रत्येक मनुष्य की गुलामी बेतहाशा बढ़ जाएगी।

यंत्रों से काम लेना उसी अवस्था में अच्छा होता है जब किसी निर्धारित काम को पूरा करने के लिए आदमी बहुत ही कम हों या नपे तुले हों। पर यह बात हिंदुस्तान में तो है नहीं। यहां काम के लिए जितने आदमी चाहिए उनसे कहीं अधिक बेकार पड़े हुए हैं। इसलिए उद्योगों के यंत्रीकरण से यहां की बेकारी घटेगी या बढ़ेगी? हमारे यहां सवाल यह नहीं है कि हमारे गांव में जो लाखों-करोड़ों आदमी पड़े हैं, उन्हें परिश्रम की चक्की से निकालकर किस तरह छुट्टी दिलाई जाए बल्कि यह है कि उन्हें साल में जो कुछ महीनों का समय यूं ही बैठे-बैठे आलस में बिताना पड़ता है उसका उपयोग कैसे किया जाए? कुछ लोगों को मेरी यह बात शायद विचित्र लगेगी पर दरअसल बात यह है कि प्रत्येक मिल सामान्यतः आज गांव की जनता के लिए त्रासरूप हो रही है। उनकी रोजी पर यह मायाविनी मिलें छापा मार रही हैं।(हरिजन सेवक 23 नवंबर 1934)।

गांधी जी द्वारा राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था के विकेंद्रीकरण और मशीनों के नकार का आग्रह अनायास नहीं था। उनकी यह दृढ़ मान्यता थी कि लोकतंत्र मशीनों यानी कि प्रौद्योगिकी एवं उत्पादन के केंद्रीकृत विशाल संसाधनों यानी कि उद्योग का दास होता है। गांधी जी यह जानते थे कि लोकतंत्र पर अंततः कॉर्पोरेट घरानों और टेक्नोक्रेट्स का नियंत्रण स्थापित हो जाएगा। लोकतांत्रिक व्यवस्था  बिग बिज़नेस हाउसेस के हितों की रक्षा के लिए समर्पित हो जाएगी। 

गांधी जी का आर्थिक और राजनीतिक दर्शन भी अहिंसा की ही बुनियाद पर टिका हुआ है। मुनाफे और धन पर अनुचित अधिकार जमाने की वृत्ति आर्थिक हिंसा को उत्पन्न करती है। जबकि धार्मिक-सांस्कृतिक तथा वैचारिक-राजनीतिक- सामरिक आधिपत्य हासिल करने की चाह राज्य की हिंसा को जन्म देती है। गांधी राज्य की संगठित शक्ति को भी हिंसा के स्रोत के रूप में परिभाषित करते थे। यही कारण था कि वे शक्तियों के विकेंद्रीकरण के हिमायती थे। व्यक्तिगत स्वातंत्र्य उनके लिए सर्वोपरि था। किंतु उन्हें पश्चिम के अराजकतावादियों की श्रेणी में रखना ठीक नहीं है। वे एनलाइटण्ड अनार्की के समर्थक थे। उनके मतानुसार जब मनुष्य नैतिक रूप से इतना विकसित हो जाएगा कि स्वयं पर शासन कर सके तब राज्य की आवश्यकता नहीं रहेगी। किंतु जब तक ऐसा नहीं होता राज्य की जरूरत बनी रहेगी।

गांधी जी आधुनिक सभ्यता के उदारवाद से भी कभी सहमत नहीं हो पाए। उदारवाद का पूरा दर्शन अमूर्त व्यक्ति के लिए निरपेक्ष स्वतंत्रता की स्थापना पर आधारित है। किंतु जैसा अभय कुमार दुबे और विश्वनाथ मिश्र जैसे गांधी के आधुनिक व्याख्याकार स्पष्ट करते हैं कि समाज में न तो अमूर्त व्यक्ति होता है, न ही निरपेक्ष स्वतंत्रता। गांधी आधुनिक सभ्यता की समानता की अवधारणा को भी स्वीकार नहीं कर पाते क्योंकि यह केवल भौतिक संसाधनों के समान वितरण तक सीमित रह जाती है। गांधी जी की समानता और समरसता की अवधारणा मानव मात्र की समानता और बंधुत्व तक सीमित नहीं है अपितु इसका विस्तार मानवेतर जगत तक है जिसमें पशु-पक्षी-लता-पादप आदि सभी जीवित अजीवित अस्तित्व सम्मिलित हैं।

(डॉ. राजू पाण्डेय वरिष्ठ टिप्पणीकार हैं और आजकल रायगढ़ में रहते हैं।)

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