Monday, January 24, 2022

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आजादी के 70 साल बाद भी आबादी के बड़े हिस्से को नसीब नहीं हो पाया एक अदद आशियाना

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आधी रात के समय बिहार के समस्तीपुर जिले की भागपुरा पंचायत के एक गांव चटोली के तालाब के पास कुछ पचास लोग बड़ी ही व्याकुलता और चिंता के साथ चर्चा कर रहे थे। वह यहाँ इकट्ठे हुए थे अपने सर की छत जो चाहे कच्ची थी उसको बचाने के लिए। तालाब के पास घुप अंधेरे में टिमटिमाते बिजली के एक छोटे से बल्ब की मद्धिम रोशनी में भी उनकी आँखों में आशंका और अपने घोंसले छिन जाने का डर साफ़ दिख रहा था क्योंकि अभी दिन में ही उनको पता चला था कि वह जगह जिस पर उन्होंने अपना जहां बसाया है, तिनका तिनका कर अपना घरौंदा बनाया है, कानूनी तौर पर उनके नाम नहीं हैं।

उस जगह जहां उन्होंने जन्म लिया, जो उनका सब कुछ थी, वह उनसे छिनने वाली थी क्योंकि बिहार सरकार ने राज्य के एक अभियान ‘जल, जीवन, हरियाली’ के तहत उनको वहां से खदेड़ कर तालाब के सौंदर्यीकरण की ठान ली थी। और जैसा कि भारतीय समाज में प्रचलित है गंव के ये लोग जिनमें से अधिकतर दलित मेहनतकश खेत मजदूर हैं, जो केवल आर्थिक तौर पर ही वंचित नहीं बल्कि सामाजिक तौर भी शोषित हैं, को  सौंदर्यीकरण पर धब्बा माना जाता है, उनके जीवन या उनके आशियाने का देश की तथागथित प्रगति के सामने क्या मोल।

इन लोगों को बिना किसी वैकल्पिक जगह दिए यहां से हटाया जा रहा था क्योंकि जब इनके घर की जगह क़ानूनी तौर पर इनके नाम पर नहीं तो वैकल्पिक जगह या मुआवजे का सवाल ही नहीं। ऐसे हालात से गुजरने वाला यह एकमात्र गांव नहीं है बल्कि यह उन करोड़ों भूमिहीन भारतीयों की कहानी है जिनके पास अपना सिर छिपाने के लिए घर बनाने लायक ज़मीन की भी मलकियत नहीं है। इन लोगों के जीवन की अनगिनत अनिश्चितताओं पर रोक लगाने के लिए अपना घर होना पहला कदम है। 

भारत की जनता और मेहनकश अवाम ने बड़ी ही आशाओं और आकांक्षाओं के साथ साम्राज्यवादी ब्रिटानिया हुकूमत के खिलाफ आज़ादी की जंग लड़ी थी कि उनको भी देश के संसाधनों में बराबरी की हिस्सेदारी मिलेगी परन्तु आज़ादी के 75 साल बाद भी इनके आँखों के सपने अधूरे हैं। और अब तो शनै: शनै: यह क्षीण होते जा रहे हैं क्योंकि अभी भी आबादी के बड़े हिस्से के पास सम्मानपूर्वक जीवन जीने के लिए न्यूनतम जरुरत अपनी छत भी हासिल नहीं है। 

भारत में 2011 की जनगणना के अनुसार, ग्रामीण इलाके में औसत व्यक्ति 40.03 वर्ग फुट जगह का उपभोग करता है। वहीं शहरी इलाकों में औसत व्यक्ति 39.20 वर्ग फुट पर रहता है। हालाँकि यह तथ्य चौंकाने वाला है क्योंकि सामान्यतया यह समझा जाता है कि शहरों में जगह की कमी के कारण लोगों को घर नहीं मिलता परन्तु ग्रामीण क्षेत्रों में भी लोगों को भी उनके हिस्से की घर के लिए ज़मीन मयस्सर नहीं है। मतलब यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों के पास छोटे घर या अपना घर न होने का कारण जगह की कमी नहीं बल्कि भूमि का असमान वितरण और गरीबों के बीच संसाधनों की कमी है।

हालाँकि देश में बेघरों के बारे में कोई ठोस आंकड़ा नहीं है लेकिन  2011 जनगणना के अनुसार भारत के बेघरों की संख्या का आधिकारिक अनुमान 1.77 मिलियन था। पिछले दशक निस्संदेह इस संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है क्योंकि बड़ी संख्या में लोग अलग-अलग कारणों से विस्थापित हुए हैं। हालांकि इन सब में मुख्य कारण कॉरपोरेट्स या सरकार द्वारा उनकी ओर से भूमि हड़पना ही है।

मानव के विकास में, कृषि के विकास के साथ इंसान के घुमंतू जीवन छोड़ एक जगह रहना एक महत्वूर्ण चरण है। तब से ही रहने के लिए अपना घर एक महत्वपूर्ण सवाल बन गया जिसने सभ्यता के विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। इसलिए विकास के किसी भी मॉडल के लिए सबको घर मुहैया करवाना मुख्य लक्ष्य होना चाहिए। वास्तव में पर्याप्त आवास एक मानव अधिकार के रूप में मान्यता दी गई है और और सरकारें सभी के लिए पर्याप्त आवास सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी आवास के अधिकार को सरकार की जिम्मेदारी के रूप में मान्यता प्राप्त है। पहली बार इसका उल्लेख 1948 में मानव अधिकार की सार्वभौम घोषणा में मिलता है।

समग्रता में उचित आवास को लोगों के स्वास्थ्य और कल्याण को सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा के अनुच्छेद 25 में कहा गया है,” प्रत्येक व्यक्ति को अपने और अपने परिवार के स्वास्थ्य तथा हितवर्धन के लिए अपेक्षित जीवनस्तर प्राप्त करने का, भोजन, वस्त्र, निवास, उपचार और आवश्यक सामाजिक सहायता प्राप्त करने का अधिकार है”। यहाँ यह समझना बहुत जरूरी है कि आवास (घर) के क्या मायने हैं। दरअसल घर के बारे में सामन्यतया हमारी समझ बहुत ही संकीर्ण है। जब हम घर के बारे में बात करते हैं तो इसका मतलब केवन चार दीवारें और एक छत नहीं।

इसका मतलब है कि घर में रहने लायक सब सुविधायों के साथ प्रर्याप्त जगह होना जिसमें बिजली, पानी, हवा, रोशनी, शौचालय आदि सब शामिल हैं। 1991 में आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र समिति द्वारा पर्याप्त आवास पर सामान्य टिप्पणी संख्या 4 में स्पष्ट किया गया है कि आवास के अधिकार की व्याख्या संकीर्ण या प्रतिबंधात्मक अर्थों में नहीं की जानी चाहिए। इसका मतलब केवल आश्रय के लिए सिर पर छत होना नहीं है या आश्रय को विशेष रूप से एक वस्तु के रूप में देखना नहीं है। बल्कि इसे सुरक्षा, शांति और गरिमा के साथ रहने के अधिकार के रूप में देखा जाना चाहिए (संयुक्त राष्ट्र 1991)।

भारत की सरकार भी आवास की अवधारणा को मानती है और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संधियों और अनुबंधों का हिस्सा होने के चलते आवास के अधिकार का समर्थन करती है।  इसलिए चाहे कागजों में ही क्यों न हो भारत की सरकारें अपने सभी नागरिकों के लिए आवास प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। इसका जिक्र समय-समय पर सरकारी दस्तावेजों में जोर शोर से किया जाता है लेकिन इस अवधारणा को अमली जामा पहनाने के लिए असल प्रयास नदारद रहे हैं। 

हालांकि कल्याणकारी राज्य होने के नाते समय-समय पर योजनाएं देश की सरकारों द्वारा घोषित होती रही हैं। ऐसी ही एक योजना थी इंदिरा आवास योजना (आईएवाई) जिसमें केवल मकान की न्यूनतम ईमारत खड़ी करने की व्यवस्था की गई थी। वर्ष 2015 में वर्तमान सरकार के समय में भी प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रधान मंत्री आवास योजना- ग्रामीण के नाम से तथाकथित दुनिया की सबसे बड़ी आवास योजना लागू करने की घोषणा की जिसका मकसद 2022 से पहले ग्रामीण भारत में सभी के लिए उपयुक्त घर उपलब्ध करवाने के लिए 30 मिलियन घर बनाना था।

हम तो जानते हैं कि हमारे प्रधानमंत्री को तो विश्व कीर्तिमान ही बनाने हैं- इसलिए विश्व की सबसे बड़ी आवास योजना। सच्चाई तो यह है कि अन्य योजनाओं की तरह प्रधान मंत्री आवास योजना- ग्रामीण भी भाजपा सरकार के प्रचार तंत्र का एक अंग बन कर ही रह गई और बेघर लोगों के जीवन में कोई बड़ा बदलाव लाने का प्रयास भी नज़र नहीं आया। नरेंद्र मोदी की आंकड़ों के साथ बाजीगरी की महारत से तो सभी वाकिफ हैं ही इसलिए राज्य में चुनावों से पहले झूठे आंकड़े तो मीडिया में आते ही रहते हैं। हाल ही में मोदी जी ने घोषणा कर दी कि इस योजना के तहत 10 मिलियन घर लोगों को सौंपे जा चुके हैं परन्तु आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार केवल 7 मिलियन घरों का निर्माण ही संभव हुआ था।

भारत में बेघरों के लिए आवास की समस्या बहुत ही जटिल है इसलिए अभी तक की सभी योजनाएं उनको समग्र रूप में देखने में विफल रही हैं। सरकारी योजनाएं भूमिहीनों के लिए घरों की समस्या का समाधान करने में असमर्थ हैं उल्टा ज्यादातर सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए पात्रता ही ज़मीन की मिलकियत है। घर बनाने के लिए वित्तीय सहायत पाने के लिए ज़मीन के मिलकयत होना ज़रूरी शर्त रहती है। 

हालाँकि भूमिहीनों को ज़मीन उपलब्ध करवाने के कई कानूनी प्रावधान हैं। भूमि सुधारों के कानूनों के अनुसार ज़मीन हदबंदी के ऊपर ज़मीन सरकारें भूमिहीनों में बाँट सकती थीं, हैं। पंचायतों की सामूहिक ज़मीन को दलितों और आदिवादी भूमिहीनों को देने के कई प्रावधान हैं। वनाधिकार कानून 2006 का मुख्य मकसद आदिवसियों को ज़मीन का हक़ देना था परन्तु किसी भी सरकार ने इसे कभी मन से लागू ही नहीं किया। यह प्रश्न राजनीतिक इच्छा शक्ति और सरकारों की प्राथमिकता का है। कुछ राज्य सरकारों ने भूमि सुधार लागू किये हैं, या जहां जनांदोलन मज़बूत रहे हैं वहां, सामान्य राजनैतिक चलन के विपरीत सरकारों को भूमिहीनों को ज़मीन देने के लिए मज़बूर किया है। 

यह समस्या का एक पहलू है जहाँ लोगों के पास घर नहीं है लेकिन दूसरी तरफ ऐसे असंख्य भूमिहीन हैं जिनके पास घर की ईमारत तो है परन्तु जिस ज़मीन पर यह ईमारत है, उस पर उनकी मिलकियत नहीं है। मायने कि छत होने के बावजूद, छत छिनने का डर हमेशा बना रहता है। यह परिवार कभी भी सरकारों या गांव के ज़मीदारों के द्वारा विस्थापित किये जा सकते हैं। आदिवासी परिवारों का एक बड़ा हिस्सा अपने घरों से सरकारों या बड़ी कंपनियों द्वारा खदेड़ा जाता है। ऐसे परिवारों की दिनचर्या में सरकारी अफसरों या ज़मींदार परिवारों के हाथों कई तरह की जिल्लतों और अपमानों का सामना करना पड़ता है। 

उदाहरण के लिए पंजाब के गुरदासपुर जिले के छोटा पनोआल गांव में दलित बस्ती में परिवार जमींदार की ज़मीन पर कई पुश्तों से रह रहे हैं। कहने को तो इनके अपने घर हैं परन्तु ज़मीन की मिलकियत नहीं है। इसलिए ज़मींदार की दादागिरी सहनी पड़ती है। अभी हाल तक तो लगभग सभी परिवारों को धान की फसल की कटाई का काम बेगारी में करना पड़ता था। वर्तमान में भी जब भी कोई छोटी मोटी कहा सुनी होती है तो दलित बस्ती का रास्ता बंद कर दिया जाता है।  बस्ती के चारों तरफ की ज़मीन जमींदार की है इसलिए जब कभी कोई परिवार घर की मरम्मत करवाता है या पक्का घर बनवाने का काम शुरू करता है तो ज़मींदार अदालत से स्टे आर्डर ले आता है और फिर शुरू होता है आर्थिक और मानसिक यंत्रणा का दौर। यह केवल एक उदाहरण है, इस श्रेणी में आने वाले सब परिवारों की हालत लगभग ऐसी ही है। 

भारत में भूमिहीनता एक बड़ा सवाल है और बेघरों की समस्या महीनता से इससे जुड़ी हुई है। इसका सामना किये बिना सबके लिए घर का सपना पूरा नहीं हो सकता। इस लेख का मक़सद भूमिहीनों और भूमि सुधारों की समस्या पर चर्चा करना नहीं है लेकिन देश में ज़मीन की गैबराबरी का विकराल रूप की सांकेतिक तस्वीर पेश करना तो लाज़मी है। इंडिया स्पेंड की वर्ष 2016 की रिपोर्ट के अनुसार, देश में केवल 4.9 प्रतिशत लोगों के पास भारत की एक तिहाई कृषि भूमि है, और औसतन एक बड़े जमींदार के पास एक सीमांत किसान की तुलना में 45 गुना अधिक भूमि होती है। वर्तमान में भूमि सुधार और भूमि वितरण का एजेंडा राजनीतिक चर्चा से गायब हो गया है।

उल्टा कुछ लोगों का मानना है कि भारत में भूमि सुधार की संभावनाएं समाप्त हो गई हैं और भविष्य में ग्रामीण क्षेत्रों में विकास केवल निजी निवेश से ही हो सकता है। हालत यह है कि पिछले दशकों में विशेष रूप से नव-उदारवादी सुधारों के बाद से भूमि सुधारों की उपलब्धियों को पलटा जा रहा है। अगर हम एनएसएसओ के 43वें दौर के सर्वेक्षण (1987-88) के दौरान भूमिहीन परिवारों के प्रतिशत की तुलना एनएसएसओ के 68वें दौर (2011-12) के सर्वेक्षण से करें तो लोगों से ज़मीन छीनने के खतरनाक अनुपात का अंदाजा लगाया जा सकता है। इस अवधि के दौरान ग्रामीण इलाकों में भूमिहीन परिवार (0.01 हेक्टेयर से कम भूमि वाले) 35 प्रतिशत से बढ़कर 49 प्रतिशत हो गए।

भारत सरकार दावा तो करती है कि वह सभी के लिए आवास मुहैया करवाने पर काम कर रही है लेकिन यह प्रयास केवल कुछ योजनाओं तक ही सीमित है।  दूसरी तरह पूर्व की यूपीए और वर्तमान एनडीए सरकार द्वारा अपनाई गई नई आर्थिक नीतियां लोगों को उनके घरों से विस्थापित कर रही हैं। आदिवासियों और पारंपरिक वनवासियों को भूमि का अधिकार देने वाले वनाधिकार अधिनियम जैसे अधिनियमों का उपयोग लाखों आदिवासियों को उनकी भूमि से विस्थापित करने के लिए किया जा रहा है। विकास परियोजनाओं के नाम पर किसानों से हजारों एकड़ कृषि भूमि भी छीन कर कॉरपोरेट्स को सौंप दी जाती है। भारत में जबरन बेदखली पर द हाउसिंग एंड लैंड राइट्स नेटवर्क (HLRN) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र और राज्य सरकार के अधिकारियों ने 2017, 2018, और 2019 में 177,700 से अधिक घरों को तोड़ा है। जिसका अर्थ है कि इस दौरान प्रतिदिन कम से कम 519 लोगों ने अपने घरों को खो दिया। लगभग पांच घरों को प्रति घंटा नष्ट किया जा रहा है, लगभग 22 लोगों को हर घंटे अपने घरों से बेदखल किया जा रहा है।

इसके अलावा, भारत भर में लगभग 15 मिलियन लोग वर्तमान में विस्थापन के खतरे में जी रहे हैं। एचएलआरएन की रिपोर्ट के अनुसार ही महामारी के दौरान (16 मार्च और 31 जुलाई, 2020 के बीच) भी, भारत में राज्य के अधिकारियों ने कम से कम 20,000 लोगों को उनके घरों से जबरन बेदखल कर दिया है। हालांकि बहुत चिंता पैदा करने वाले ये आंकड़े भी पूरी तस्वीर पेश नहीं करते हैं क्योंकि यह केवल एचएलआरएन को ज्ञात मामले हैं। ग्रामीण भारत में बेदखली के ज्यादातर ऐसे मामले तो किसी भी एजेंसी की नज़र में ही नहीं आते। 

सामान्यतया हम कहते हैं कि जीने के लिए क्या चाहिए ‘दो वक्त की रोटी और सिर छुपाने के लिए छत’ लेकिन भारत में जब हम आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं, भारत के लोग अभी इन आधारभूत जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। भूख सूचकांक (हंगर इंडेक्स) में भारत 101वें स्थान पर है; ऐसे देश में लाखों लोग भूखे मर रहे हैं जहां भारतीय खाद्य निगम के गोदामों में खाद्यान्न का आवश्यक का दोगुना भंडार है। इसी तरह, खुद के घर का सपना असंभव होता नज़र आ रहा है बावजूद इसके कि देश में इसके लिए पर्याप्त ज़मीन उपलब्ध है। दरअसल भारत में करोड़ों लोगों का सम्मान के साथ जीवन जीने के लिए आधारभूत जरूरतें जैसे काम, भोजन, ज़मीन, अपना घर, सामाजिक बराबरी आदि का सपना पूरे न होने का कारण संसाधनों की कमी नहीं बल्कि कॉरपोरेट-जमींदार की साठगांठ से नियंत्रित सरकारों की नीतियां हैं। भारत में समृद्ध संसाधन हैं, लेकिन सरकार द्वारा अपनाए जा रहे विकास मॉडल बहुमत को वंचित रख कुछ मुट्ठी भर लोगों को लाभान्वित कर रहा है।

(डॉ. विक्रम सिंह आल इंडिया एग्रिकल्चरल वर्कर्स यूनियन के संयुक्त सचिव हैं।)

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