Wednesday, October 27, 2021

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फैज को न इस्लाम पचा सकता है और न हिंदू खारिज कर सकता है!

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(पाकिस्तान में कभी जनरल ज़ियाउल हक़ की सैन्य सरकार को उखाड़ फेंकने के आह्वान का प्रतीक बनी मशहूर शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की नज़्म `हम देखेंगे` ने इन दिनों हिन्दुस्तान के शासकों को बेचैन कर रखा है। आईआईटी, कानपुर के विद्यार्थियों ने इस नज़्म को गाया तो हिन्दू विरोधी नज़्म गाने का आरोप लगाकर जांच बैठा दी गई है। दरअसल इस नज़्म में इस्लामी मिथ का इस्तेमाल है जिसकी ओट लेकर हास्यास्पद आरोप लगाया जा रहा है। हिन्दी के वरिष्ठ कवि असद ज़ैदी ने फ़ैज़ पर अपने एक लेख में इस नज़्म को लेकर महत्वपूर्ण बातें की थीं जिन्हें जनचौक के पाठकों के लिए यहां प्रकाशित किया जा रहा है।)

 फ़ैज़ के यहाँ इस्लाम के आरंभिक इतिहास और कुरानी आयतों की अनुगूँजें मिलती हैं। वह इन ‘इस्लामी’ सन्दर्भों का हमेशा बामक़सद, सेकुलर और पारदर्शी इस्तेमाल करते हैं। उनकी आवाज़ थियोलोजी में रंगी, धार्मिकता में भीगी हुई कम्पित आवाज़ नहीं है। वह किसी मज़हबी चाशनी में डूबे हुए कवि नहीं हैं। वह न हिन्दी के उन प्रोग्रेसिवों की तरह हैं जिनकी दो या तीन पीढ़ियाँ ऐसी तुलसी-मय रहती आई हैं कि कोई और रंग उन पर चढ़ता ही नहीं, न वे उर्दू के उन जदीदियों (आधुनिकतावादियों) की तरह हैं जो जवानी में अराजकतावाद की हदों से गुज़रकर अब तसबीह हाथ में लिए रहते हैं।

उनकी मशहूर नज़्म ‘हम देखेंगे’ लगभग पूरी की पूरी कुरान, तसव्वुफ़, और इस्लाम के कुछ ऐतिहासिक प्रसंगों पर टिकी हुई है, लेकिन उसका किसी भी तरह का धार्मिक दुरुपयोग नहीं किया जा सकता। पहले वह जनरल ज़ियाउल हक़ के फ़ौजी शासन के ख़िलाफ़ पाकिस्तान में अवामी बग़ावत का मुख्य प्रतीक बनती है, फिर इक़बाल बानो की आवाज़ में एक इन्कलाबी तराने का रूप ले लेती है-एक ऐसे वक़्त में जब सभी धार्मिक रूढ़िवादी तत्व ज़िया शासन का खुला समर्थन करते थे।

कुरान में ईश्वरीय प्रकोप की चेतावनी और दैवी गर्जना यहाँ सामाजिक क्रांति का महान यूटोपियन आह्वान बन जाती है -‘वो दिन कि जिसका वादा है / जो लौहे-अज़ल पे लिक्खा है’. ‘फ़ैसले का दिन’ इन्क़लाबी सत्तापलट का दिन हो जाता है, जब ज़ुल्मो-सितम के भारी पहाड़ ‘रूई की तरह’ उड़ जाएंगे, जब ‘तख्तो-ताज’ उछाले जाएंगे, जब शासितों के ‘पाँव-तले यह धरती धड़-धड़’ धड़केगी, जब ‘अनल हक़’ का नारा बलंद होगा, जब ‘खल्क़े-खुदा’ राज करेगी, ‘जो तुम भी हो और मैं भी हूँ’। मैं अक्सर सोचता हूँ कि कौन सा इस्लामी प्रतिष्ठान इस नज़्म को अपने साहित्य में दाखिल करेगा, कौन वाइज़ इसे अपने वाज़ का हिस्सा बनाएगा! क्या यह कभी जुमे के रोज़ किसी मस्जिद के मिम्बर से पढ़ी जाएगी? अभी तक तो ऐसा हुआ नहीं है, और मुझे नहीं लगता कि ऐसा कभी होगा।

इस पर कभी गौर नहीं किया गया कि फ़ैज़ तसव्वुफ़ (सूफ़ी दर्शन) को इस्लामी परम्परा के नैरन्तर्य में देखते हैं, उसके विरोध या प्रतिरोध में नहीं। जो बात इस्लाम के सन्दर्भ से नहीं कही जा सकती वह तसव्वुफ़ के सन्दर्भ से बहुत सफलता से कही जा सकती है ऐसा फ़ैज़ नहीं समझते। उनके लिए सूफ़ी मत इस्लाम का विकल्प नहीं है। अव्वल तो फ़ैज़ के यहाँ तसव्वुफ़ भी कोई विकल्प नहीं है। वह उनके लिए विचारधारा या जीवन दर्शन का रूप नहीं ले सकता। तसव्वुफ़ उनके लिए एक उपलब्ध मुहावरा और ज़बान है, जैसे वह ग़ालिब के लिए भी था। फ़ैज़ उतने ही ‘आध्यात्मिक’ हैं जितने महमूद दर्वीश या एडवर्ड सईद।

(नया पथ के 2010 में प्रकाशित फ़ैज़ जन्मशती विशेषांक से साभार)

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