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Categories: बीच बहस

किसानों ने फेर दिया आरएसएस के मंसूबों पर पानी

आज तीन कृषि कानूनों को लेकर सरकार व किसान आमने-सामने खड़े है। महीनों से शांतिपूर्ण व लगातार गति को प्राप्त करते इस आंदोलन को लेकर कई सवाल खड़े होते हैं। जिस तरह आंदोलन को विभिन्न वर्गों द्वारा जन समर्थन मिल रहा है उसको देखकर लगता है कि मसला सिर्फ तीन कानूनों तक सीमित नहीं है। पिछले 100 साल की सियासत, धार्मिक उन्माद, आजादी के आंदोलन, सत्ता द्वारा बहुसंख्यक वर्ग के साथ नीतिगत भेदभाव आदि मुद्दे भी जीवंत होकर पटल पर आ चुके हैं।

भारतीय आजादी के आंदोलन की दो घटनाओं पर हमें गौर करना चाहिए। 1885 में कांग्रेस की स्थापना एओ ह्यूम एक अंग्रेज ने थियरी ऑफ सेफ्टी वाल्व के रूप में की थी। शुरू में कट्टर जातिवादी चितपावन पेशवाई ब्राम्हणों का कांग्रेस पर कब्जा था और 1893 में बाल गंगाधर तिलक गणेशोत्सव की नींव रखते हैं। हालांकि शुरुआत के दौर में कांग्रेस पर अंग्रेजों की गुलाम होने के आरोप लगते हैं लेकिन बाद की घटनाओं को देखते हुए यह मानने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए कि कांग्रेस की स्थापना भारत की आजादी के लिए हुई थी व गणेशोत्सव की शुरुआत हिन्दू राष्ट्र की आजादी के लिए पहला बड़ा कदम था।

कांग्रेसी नेता ज्यादातर यूरोप/ब्रिटेन में पढ़े हुए थे इसलिए वो समानता, स्वतंत्रता व बंधुता से प्रभावित थे। दूसरी तरफ लाल/बाल/पाल नामक तिकड़ी जिसे गरम दल का नेता भी कहा जाता था, मनुस्मृति से प्रभावित थे। 1920 तक इन हिन्दू राष्ट्र की चाहत वाले नेताओं को जनसमर्थन नहीं मिला था इसलिए ये कांग्रेस को हाइजेक करने की कोशिश में लगे थे लेकिन इनको पराजय का सामना करना पड़ा।

1915 के कांग्रेस अधिवेशन के बाद इनको जमीन की सच्चाई पता चलते ही ब्राम्हण नेता मदन मोहन मालवीय ने अखिल भारतीय हिन्दू महासभा की स्थापना कर दी उस समय सावरकर जेल में माफीनामा लिख रहे थे लेकिन वे कांग्रेस के साथ होने का नाटक करते रहे लेकिन साथ में अपनी अलग तैयारी कर ली। 1920 में तिलक का देहांत हो गया। खिलाफत आंदोलन के समय महाराष्ट्र में हेडगेवार ने जान बूझकर कानून तोड़ा व एक साल की सजा हुई।

1922 में रिहा हुए तो उनको एक कैडर बेस वाले संगठन की कमी महसूस हुई व इसी के मद्देनजर विजयादशमी के दिन 1925 को आरएसएस की स्थापना की गई। ध्यान रखिएगा गणेशोत्सव के बाद विजयादशमी हिन्दू राष्ट्र वालों के खाते में शामिल होने वाला दूसरा बड़ा धार्मिक पर्व था।

1925 के बाद कांग्रेस व हिन्दू महासभा/आरएसएस आदि के रास्ते अलग हो चुके थे! जन समर्थन की कमी के कारण मनुवादियों ने चाहे साथ होने के लाख दावे किए हों लेकिन आरएसएस द्वारा लिखित हेडगेवार की जीवनी व ब्रिटिश सरकार के मेमो/नोट/आरएसएस के विश्वास देने वाले वादों आदि से जाहिर होता है कि आरएसएस ने आजादी की लड़ाई लड़ने के बजाय अंग्रेजों के साथ अपना सामान्य व्यवहार बरकरार रखा।

आरएसएस द्वारा प्रकाशित की गई हेडगेवार की जीवनी के मुताबिक जब गांधी ने 1930 में अपना नमक सत्याग्रह शुरू किया, तब उन्होंने (हेडगेवार ने) ‘हर जगह यह सूचना भेजी कि संघ इस सत्याग्रह में शामिल नहीं होगा। हालांकि, जो लोग व्यक्तिगत तौर पर इसमें शामिल होना चाहते हैं, उनके लिए ऐसा करने से कोई रोक नहीं है। इसका मतलब यह था कि संघ का कोई भी जिम्मेदार कार्यकर्ता इस सत्याग्रह में शामिल नहीं हो सकता था’।

1940में आरएसएस ने बॉम्बे सरकार को विश्वास दिलाया था कि हमारे स्वयंसेवक सिविल गॉर्ड की भर्ती को प्रोत्साहित करेंगे जो कि आंतरिक शांति स्थापित करने के लिए हो रही थी। देश के लोग द्वितीय विश्वयुद्ध का फायदा उठाकर अंग्रेजों को देश छोड़ने के लिए मजबूर करना चाहते थे और आरएसएस सिविल गॉर्ड की भर्ती में सहयोग करके इनको दबाना चाहता था।

ज्ञात रहे 1934 में कांग्रेस ने अपने कार्यकर्ताओं पर आरएसएस/हिन्दू महासभा/मुस्लिम लीग में शामिल होने पर रोक लगा दी थी।1942 में जब भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ तो संघ के लोगोँ ने इसमें कोई योगदान नहीं दिया। यह इस बात से साबित होता है कि भारत छोड़ो आंदोलन शुरू होने के डेढ़ साल बाद, ब्रिटिश राज की बॉम्बे सरकार ने एक मेमो में बेहद संतुष्टि के साथ नोट किया कि ‘संघ ने पूरी ईमानदारी के साथ ख़ुद को क़ानून के दायरे में रखा है।ख़ासतौर पर अगस्त, 1942 में भड़की अशांति में यह शामिल नहीं हुआ है।’

आरएसएस पर पहली बार प्रतिबंध पंजाब की यूनियनिष्ट सरकार ने 24जनवरी, 1947 को इस आधार पर लगाया कि यह विध्वंशकारी सोच,उतेजित भाषणों से दंगा भड़काने की साजिश रचते है हालांकि चार दिन बाद यह प्रतिबंध आरएसएस की तरफ से सफाई पेश करने के बाद हटा दिया गया था।

आरएसएस ने अरबिंदो के देश के लिए त्याग करने वाले नारे का बहुत उपयोग किया। इन्होंने कैडर तैयार करते हुए युवकों को कहा कि देश के लिए त्याग करो। उसी का नतीजा है कि आरएसएस में दो तरह के कार्यकर्ता होते हैं प्रचारक व विस्तारक। प्रचारक शादी नहीं करते हैं और विस्तारक गृहस्थ वाले होते हैं।

1947में देश के विभाजन के समय हिन्दू-मुस्लिम मार-काट मची, उस समय अपनी वैधता हासिल करने के लिए संघ के कार्यकर्ता हिंदुओं के संरक्षक होकर लड़ने लगे थे! लेकिन गांधीजी की हत्या के बाद भड़के असंतोष ने संघ को कठघरे में खड़ा कर दिया था। सरदार पटेल ने 4फरवरी 1948 को  संघ पर प्रतिबंध लगा दिया व तमाम आरएसएस के नेताओं को गिरफ्तार कर लिया था। पटेल ने आरएसएस को कहा कि एक आरएसएस का संविधान बनाओ, पूरा रिकॉर्ड रखो व लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव करो व राजनीति से दूर रहो तो प्रतिबंध हटाया जा सकता है। सारी शर्तें मान ली गईं लेकिन मन से कभी लागू नहीं किया।

आरएसएस ने शुरुआत में तिरंगे झंडे को नहीं अपनाया 17जुलाई1947 व 22जुलाई 1947 को संघ के मुखपत्र आर्गेनाइजर में दो लेख छपे थे जिसमें तिरंगे की मुखालफत व भगवे झंडे की पैरवी की थी लेकिन 14नवंबर 1947से लेकर 26जनवरी 1950 तक नागपुर मुख्यालय पर तिरंगा झंडा लगाया था। उसके बाद तिरंगे झंडे को हटाकर वापस भगवा झंडा लगा दिया था जो ऐतिहासिक प्रतीक हड़पो योजना के तहत शिवाजी महाराज का चुराया था!

गांधी की हत्या व तिरंगे को हटाने के कारण आरएसएस की देशभर में फजीहत हुई थी जिसके कारण लोग इनसे जुड़ने से डरने लगे थे। वैधता हासिल करने के लिए 1962के भारत चीन युद्ध में आरएसएस के कार्यकर्ता सेना के जवानों की सेवा व मदद को आगे आये जिससे खुश होकर पंडित नेहरू ने आरएसएस को 1963 की गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल होने का न्यौता दिया।

1966 में गोलवलकर की एक किताब “बंच ऑफ थॉट्स”प्रकाशित हुई जिसमें ड्रिफ्टिंग एंड ड्राफ्टिंग नामक लेख में तिरंगे के बारे में लिखा गया था “हमारे नेताओं ने देश के लिए एक नया झंडा स्थापित किया है। उन्होंने ऐसा क्यों किया? यह सिर्फ बहने और अनुकरण करने का मामला है … हम गौरवशाली अतीत के साथ एक प्राचीन और महान राष्ट्र है। फिर, क्या हमारे पास कोई झंडा नहीं था? क्या इन हजारों वर्षों में हमारे कोई राष्ट्रीय प्रतीक नहीं थे? निस्संदेह हमारे पास था। तो यह हमारे दिमाग में यह पूरी तरह से शून्य/खाली वैक्यूम क्यों है?”मतलब गणतंत्र दिवस की परेड पर फिर पानी फेर दिया और अंदर का जहर दुबारा छलक उठा।

1971 में भारत पाकिस्तान युद्ध में आरएसएस के स्वंयसेवक फिर जवानों की मदद को आगे आये व 1975 में इंदिरा गांधी द्वारा लगाए आपातकाल की मार से बचने के लिए इस मदद का हवाला दिया गया और जेपी आंदोलन में शामिल न होने की बात कही व संघ को प्रतिबंध से मुक्त करवाने के लिए विनोबा भावे को मध्यस्थ बनाकर संजय गांधी के कार्यालय से संपर्क किया गया लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली व इंदिरा गांधी ने आरएसएस पर भी प्रतिबंध लगा दिया।

मजबूरी कभी कभी ताकत के रूप में भी उभर जाती है।आरएसएस ने भूमिगत होकर आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी। देशभर के लोगों के बीच विश्वास हासिल करने में यह उपयोगी साबित हुआ।

1977के बाद जनसंघ व आरएसएस ने लोगों के बीच जो पैठ बनाई थी उसका उपयोग लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा में किया गया व परिणति 6दिसंबर 1992में बाबरी मस्जिद ढहाने के रूप में सामने आई और आरएसएस पर चौथी बार प्रतिबंध लगाया गया। 26 जनवरी 2001 को राष्ट्रप्रेमी युवा दल के लोगों ने नागपुर कार्यालय पर जबरदस्ती तिरंगा फहरा दिया जिसके लिए आरएसएस ने मुकदमा कर दिया व उस समय यह मुद्दा भारतीय संसद में उछला। 2002 में ध्वज संहिता बनी व 52साल बाद नागपुर कार्यालय पर तिरंगा फहराया गया।

आरएसएस का संविधान विरोधी रुख भी जगजाहिर रहा है। 6 फरवरी 1950 में आर्गेनाइजर ने शंकर सुब्बा अय्यर नामक एक सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीश द्वारा लिखित “मनु नियम हमारे दिल में” नामक एक लेख छापा जिसने मनुस्मृति को भारत के संविधान के बजाय हिंदुओं के लिए अंतिम कानून बनाने के अधिकार के रूप में उनके समर्थन की पुष्टि की।

1966 में गोलवलकर ने बंच ऑफ थॉट्स नामक अपनी पुस्तक में लिखा कि “हमारा संविधान भी पश्चिमी देशों के विभिन्न संविधानों से विभिन्न लेखों के साथ एक बोझिल और विषम पैकिंग है। इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसे स्वयं अपना कहा जा सकता है। क्या हमारे मार्गदर्शक सिद्धांतों में संदर्भ का एक भी शब्द है कि हमारा राष्ट्रीय मिशन क्या है और जीवन में हमारा मुख्य अर्थ क्या है? नहीं! ”

संसद के दरवाजे पर अम्बेडकर मुर्दाबाद,मनुस्मृति जिंदाबाद के नारों के साथ संविधान की प्रतियां जलाई जाएं तो इसमें नया क्या है!अचरज की क्या बात है?यह तो इन लोगों का पुश्तैनी कृत्य है जो सदा करते आये हैं! अब तक तो हिन्दू राष्ट्र/रामराज्य की स्थापना की आवाज गूंज रही थी! न्याय पालिका,कार्य पालिका,मीडिया सब बिक/गुलाम हो चुका है।नया किसान आंदोलन है जो इतना विस्तृत स्वरूप ले चुका है कि दशकों की बेहूदगी को महीने भर में वहां ले जाकर खड़ा कर दिया है जहाँ से आगे खत्म होने के अलावे दूसरा कोई विकल्प नहीं है।

किसान आंदोलन ने हिन्दू-मुस्लिम आदि धार्मिक उन्माद व मनुवाद के 95 साल से सरपट दौड़ते घोड़े वाली टापों की कर्कश आवाज पर ब्रेक लगा दिया है।जो काम विपक्षी राजनैतिक पार्टियां व कैडर बेस संगठन दशकों में नहीं कर पाए वो काम कैडर विहीन लेकिन सामूहिकता की सोच लिए किसानों ने महीने भर में कर दिया।

प्रेमाराम सियाग

( स्वतंत्र पत्रकार मदन कोथुनियां और प्रेमाराम सियाग का लेख।)

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This post was last modified on December 30, 2020 6:11 pm

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