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Categories: बीच बहस

किसान, बाजार और संसदः इतिहास के सबक क्या हैं

जो इतिहास जानते हैं, जरूरी नहीं कि वे भविष्य के प्रति सचेत हों। लेकिन जो इतिहास जानते ही नहीं, वे बने बनाये रास्ते पर भी नहीं चल पाते। जो इतिहास के चेहरे पर झूठ का कचरा फेंकते रहते हैं, उनसे आप क्या उम्मीद कर सकते हैं! वे अक्सर इतिहास को श्राप की तरह प्रयोग करते हैं जिससे निकलने के लिए अक्सर ही उन्माद भरे रास्तों का प्रयोग करते हैं।

कई बार होता है, जब इतिहास की इस धक्का-मुक्की में वे समानताएं साफ दिखने लगती हैं जिससे सबक लेकर हमें सचेत रहना जरूरी हो जाता है। संसद में जब किसानों की खेती और बाजार को लेकर अध्यादेश को कानून बनाकर पारित किया जा रहा था, तब मुझे 1770 का वह परिदृश्य याद आ रहा था जिसमें बंगाल सूबे की आबादी का एक तिहाई हिस्सा मौत के मुंह में समा गया था। लेकिन दूसरी ओर ब्रिटिश हुकूमत यहां से न सिर्फ अनाज, मुद्रा को पूंजी बनाकर बल्कि आय के तौर पर विशाल कमाई को पहले से अधिक ब्रिटेन वापस भेज रही थी।

उस समय क्या हालात थे? 1757 में प्लासी के युद्ध में सिराजुद्दौला हार चुका था। अंग्रेजों ने सबसे पहले बंगाल के सूबे में व्यापार, बाजार को अपने नियंत्रण में लिया। 1764 में बक्सर के युद्ध में अवध, बंगाल और दिल्ली की सेना को परास्त कर बंगाल, उड़ीसा और बिहार सूबे की खेती को भी अपने नियंत्रण में ले लिया। 1757 से 1764 के बीच भारत के कपड़ा, कागज, शराब और चीनी उद्योग को बर्बाद किया। उन्होंने यह काम निर्यात पर ऊंचा कर और घरेलू बाजार में चुंगी वसूली बढ़ाया।

दूसरी ओर उन्होंने अपने उत्पाद को आयात कर में छूट और घरेलू बाजार में मुक्त बाजार का रास्ता लिया। लेकिन जब वे भारत से माल खरीदकर या लूटकर निर्यात करते हुए, खरीद और बिक्री में अच्छा-खास फर्क रखते थे। इस फर्क को वे ‘लागत पूंजी’ का नाम देते थे। यह लागत पूंजी ईस्ट इंडिया कंपनी के स्टेक का हिस्सा होता थी जिसमें ब्रिटिश सांसद भी हिस्सा लेते थे। यह भारतीय मुद्रा, पूंजी और माल तीनों की लूट थी। जोर-जबरदस्ती, घूस, लूट, वसूली, डकैती आदि अलग से थी।

इसका नतीजा क्या हुआ? उत्तर-मुगलकालीन विशाल शहर बर्बाद हो गये। एक बहुत बड़ी जनसंख्या शहर से गांव की ओर लौट गई। जो नहीं बढ़ सके भुखमरी के शिकार हुए। शिल्प और दस्तकार गिल्डों ने विद्रोह भी किये जिन्हें अंग्रेजी कानूनों के तहत मौत के मुंह में डाल दिया गया।

उत्तर-मुगलकालीन जो उद्यम तेजी से उभर रहे थे वे खेती पर निर्भर थे। आरम्भिक पूंजीवादी दौर की आर्थिकी दरअसल ऐसी ही होती है। कपड़ा उद्योग, कागज, शराब और चीनी जैसे उभर रहे उद्योग इसी प्रकृति के थे। लोहा और इस्पात भी उभरता उद्योग था लेकिन मुख्य उद्योग खेती पर ही निर्भर थे। घरेलू बाजार की मांग में कमी से खेती में नगद खेती भी बर्बाद हुई। इन खेतों पर अनाज उगाना ही मजबूरी हो गया। नगद में तेजी से कमी आई।

अंग्रेजों ने व्यापार से होने वाली आय से आगे बढ़कर जब खेती से और अधिक स्थिर आय की ओर बढ़े। उन्होंने 1759-60 के बीच चौबीस परगना में खेती से कर वसूलने की व्यवस्था बनायी जिसमें उन्होंने कर वसूलने की नीलामी लगाई, और एकमुश्त कर हासिल करने का रास्ता लिया। 1765-70 के बीच हरेक साल के आधार पर ऊंची बोली लगाने वाले जमींदारों या कारिंदों का एक वर्ग खड़ा किया। और, अधिकतम कर वसूल किया। एक आंकड़े के अनुसार 1764 में कर-संग्रहण 81,80,000 रुपये था, जो 1771 में 2,32,00,000 हो गया। इस दौरान एक के बाद एक अकाल पड़े, खेत जंगलों में बदलने लगे, अकेले बंगाल सूबे की आबादी एक तिहाई हो गई।

इसके बाद गवर्नर कार्नवालिस का आगमन हुआ। उसे तीन जिम्मेदारियां थीं। पहली, किसानों पर कर उतना ही हो जितने से अतिरिक्त आबादी समेत जीवित रह सके। इसके लिए स्थाई बंदोबस्त कर कर वसूली को स्थिर और वार्षिक समीक्षा से नियमित किया जाए। दूसरा, अंतर्राष्ट्रीय बाजार और इंग्लैंड की पूंजी के लिए कच्च्चा माल, जिसमें कपास, नील, गन्ना जैसे नकद खेती को बढ़ावा दिया जाए। तीसरा, भारत को अनाज मंडी में बदलना और ‘लागत पूंजी’ से पूंजी निर्माण को आगे बढ़ाना था जिससे राजकीय खर्च को नियमित किया जा सके।

आज जब शहर बर्बाद हालत में खड़े हैं। करोड़ों नौकरियां खत्म हो गई हैं। करोड़ों लोग गांव की तरफ चले गये हैं और हताश हाल में गांव से शहर और शहर से गांव का चक्कर लगा रहे हैं, …गांव पर अतिरिक्त आबादी का दबाव बढ़ चुका है। राज्य, इसे सूबा भी कह सकते हैं, के कर पर केंद्र काबिज हो गया है। बाजार में मुद्रा के प्रचलन को नोटबंदी में तेजी से गिराया गया और डिजिटल के नाम पर मुद्रा को बैंक तक सीमित रखकर और उसे निजी हाथों में सौंपकर इस नियंत्रण को और भी बढ़ाया जा रहा है। एनपीए और विकास के नाम व्यापार, उत्पाद और अधिग्रहण की व्यवस्था कर ‘लागत पूंजी’ के नाम पर कुछ पूंजीपतियों की कुल संपदा में विशाल वृद्धि हो रही है। औद्योगिक पूंजी का वास्तविक निर्माण गिर रहा है।

यहां तक कि जीडीपी में गिर रहा है जबकि बैंकों में मुद्रा का भंडारण बढ़ रहा है। ऐसे में, भारत के किसानों को अंतर्राष्ट्रीय बाजार में उतारने के लिए ‘अन्न बाजार’ का जो सपना दिखाया जा रहा है उसका निहितार्थ समझना इतना कठिन है? नहीं। निश्चित ही इसे किसान समझ रहा है। जब स्थिर मूल्य पर न्यूनतम समर्थन मूल्य भी किसानों को मौत की तरफ ठेलता जा रहा है उसका बड़ा कारण लागत मूल्य है जो बाजार मूल्य से अनियंत्रित तरीके से काम करता है। बीमा योजना कुल मिलाकर खेती से वसूली के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। बाजार और न्यूनतम समर्थन मूल्य के नाम पर किसानों से जो कर-वसूली है उसमें सबसे बड़ा हिस्सा लागत मूल्य है जिसमें कर्ज उतना ही बड़ा हिस्सा है, जिसमें फंसकर किसान मरता है।

दूसरा, उत्पाद पर सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकारी और आढ़तियों द्वारा खरीद है, यहां सरकार खरीद कम करने पर जोर देती है, जबकि आढ़ती पहले से कूते गये मूल्य पर खरीद करते हैं और अक्सर उनकी खरीद बाजार मूल्य से नीचे होती है। तीसरा, भंडारण है जिसकी लागत बाजार मूल्य से अक्सर ही अधिक होती है जिसकी वजह से प्याज, आलू और हरी सब्जियों की खेती शिकार होती है। गन्ना और कपास की खेती अब भी अंतर्राष्ट्रीय बाजार की मांग पर निर्भर है जिसमें सरकार की भूमिका ‘उदासीन’ होती है लेकिन निर्यात में वसूली के दौरान सक्रिय होती है।

इन करों के अलावा, बाजार में सापेक्षिक कर वसूली है जो औद्योगिक उत्पाद से जुड़ा होता है। एक निश्चित श्रम-काल पर आधारित उत्पाद का मूल्य तय करते समय औद्योगिक उत्पाद वरीयता में होता है, जबकि खेती वरीयता में एकदम नीचे होती है। यह खेती से पूंजी निर्माण की निरंतर चलने वाली लूट होती है, जिसे प्राकृतिक नियम जैसा मान लिया गया है।

जब प्रधानमंत्री मोदी लोकल से वोकल, और खेती से विकास का रास्ता खोजने की बात कर रहे हैं तो इसका अर्थ है दस्तकारों, शिल्पकारों, किसानों की लूट से पूंजी निर्माण करना है। तो, क्या यह संभव है? भारत का बमुश्किल 12 से 17 प्रतिशत किसान बाजार के लिए उत्पादन करता है। किसानों का बहुमत सीमांत किसान है। मध्यम किसानों का हिस्सा जमीन बंटवारों से ग्रस्त है और वह खेती पर निर्भरता अपने लिए अनाज पैदा करने से आगे नहीं बढ़ पाता है। खेतिहर मजदूरों की विशाल संख्या का अत्यंत छोटा सा हिस्सा गांव में नरेगा-मनरेगा के माध्यम से जीविका चलाने भर का भी काम नही हासिल कर पाता।

पूंजी निर्माण के लिए जरूरी है श्रम और संसाधन को साथ मिलाना। यानी जो श्रमिक हैं उन्हें खेत और उद्योग पर काम मिले। पूंजी निर्माण के लिए जरूरी है कि श्रम और साधन से हासिल उत्पाद को घरेलू बाजार मिले। यानी श्रम को साधनों का हक मिले और उत्पाद लोगों की जरूरत को पूरा करे। साधनों और श्रमिकों को विकसित किया जाए। यदि इन तीन पक्षों को नकार कर सिर्फ बाजार से कर-संग्रहण का रास्ता बनाकर पूंजी निर्माण का रास्ता लिया गया तब न सिर्फ साधन यानी खेत बर्बाद होंगे साथ ही खेती पर बसी पूरी आबादी मौत के मुंह की तरफ बढ़ जायेगी।

इतिहास को संदर्भ में रखकर मोदी सरकार ने किसानों को लेकर जो अध्यादेश संसद के सारे नियम-कानूनों की धज्जियां उड़ाकर, धोखे में रखकर और प्रतिनिधित्व के न्यूनतम संवैधानिक मूल्यों पर हमला कर पारित किया है, देखने से भविष्य की राह बेहद भयावह दिख रही है। मोदी सरकार के दौर में हम इसी तरह का निर्णय देख रहे हैं। वर्तमान की चुनौतियों का ठीकरा अक्सर नेहरू और ‘समाजवादी बुद्धिजीवियों’ पर थोप दिया जाता है। यह सब कुछ और नहीं, सिर्फ और सिर्फ भयावह निर्णयों को छुपा ले जाने वाली कार्यनीतियां हैं। मूल मसला रणनीतिक निर्णय हैं जिससे हम, भारत के लोगों का भविष्य निर्धारित हो रहा है।

(अंजनी कुमार सामाजिक कार्यकर्ता हैं।)

This post was last modified on September 21, 2020 3:52 pm

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