Thursday, October 28, 2021

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न्यायपालिका में वैदिक आरक्षण कब तक

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अभी तक उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति कॉलेजियम सिस्टम से होती आ रही है। यह कॉलेजियम सिस्टम क्या है? कॉलेजियम सिस्टम वह पद्धति है जिसमें कुछ वरिष्ठ जज मिलकर खुद जजों की नियुक्ति करते हैं। इस नियुक्ति में विशुद्ध रूप से जजों के समूह की मनमर्जी चलती है। इसका परिणाम यह हुआ है कि कुछ जजों के परिवार और रिश्तेदार ही बारी-बारी से जज बनते रहते हैं। भारत में कई ऐसे परिवार हैं जिनकी अनेक पीढ़ियाँ एक के बाद एक जज बनती आ रही हैं। ये नियुक्तियाँ मनमाने ढंग से की जाती हैं। यह कॉलेजियम पद्धति संविधान की धज्जी उड़ाता है।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 312 ने उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए भारतीय न्यायिक सेवा के गठन का प्रावधान किया है। यह प्रावधान सन् 1950 से लागू संविधान में है। लेकिन न्यायपालिका में यह आज तक लागू नहीं किया गया है। संविधान के अनुच्छेद 312 को नहीं लागू करने के लिए न्यायालय खुद ही कटघरे में है।

उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश केवल सर्वोच्च न्यायालय के कुछ जजों की मर्जी पर सन् 1951 से नियुक्त होते आ रहे हैं। उच्च न्यायपालिका के जजों की नियुक्ति के लिए भारतीय न्यायिक सेवा का गठन 71 साल से टाले जाते रहना संविधान की धज्जी उड़ाने जैसा है। चिंतनीय यह है कि संविधान की यह धज्जी कोई और नहीं बल्कि सुप्रीम कोर्ट स्वयं उड़ा रहा है। वही सुप्रीम कोर्ट जिस पर इस देश ने उसे संविधान को लागू करने के लिए अधिकृत कर रखा है। ऐसा लगता है, यहाँ लोकशाही नहीं राजशाही चलती है।

सर्वोच्च न्यायालय के कुछ न्यायाधीशों, उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों, न्याय जगत एवं शिक्षा जगत की बड़ी-बड़ी हस्तियों, प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया ने इस कॉलेजियम प्रणाली (पाँच न्यायाधीशों द्वारा) के माध्यम से न्यायाधीशों की नियुक्ति की समय-समय पर कटु आलोचना की है। नियुक्तियों में जातिवाद, भाई-भतीजावाद और पक्षपातपूर्ण कार्य किये जाने के विरुद्ध आवाजें उठते रहते हैं। न्यायाधीशों की नियुक्ति में कोई पारदर्शिता नहीं है। यही न्यायाधीश भारतीय संविधान के भाग्य का फैसला करते हैं। उनके बारे में यह कहावत मशहूर है कि ‘पैरवी में है दम, जज बनेंगे हम।’’ भारतीय न्यायिक सेवा का गठन नहीं होने का दुष्परिणाम यह हुआ है कि नियुक्त जजों में से अधिकांशतः कुछ परिवारों के बेटा-बेटियों और संबंधियों का कब्जा है। केवल 300 या कुछ अधिक परिवारों के लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी न्यायाधीश बनते आ रहे हैं।

यही कारण है कि विभिन्न क्षेत्रों के लोग अब भारतीय न्यायिक सेवा के गठन और उसमें विभिन्न जाति समूहों को प्रतिनिधित्व देने की माँग जोर-शोर से उठाने लगे हैं। साथ ही न्यायपालिका के भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और पक्षपातपूर्ण कार्यों के विरुद्ध न्यायिक सतर्कता आयोग के गठन और न्यायाधीशों की जिम्मेदारी के लिए दिशा-निर्देशों संबंधी कानून बनाने की आवाज भी उठनी शुरू हो गई है। न्यायालय की सुनवाइयों का संसद की कार्यवाहियों की तरह सीधा प्रसारण हो, की माँग की जा रही है।

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के संक्रमण का प्रसार तेजी से हुआ। भ्रष्टाचार ने एक नया आकार लिया। भ्रष्टाचार केवल रुपये के लेन-देन को ही नहीं कहा जाता है। बल्कि इसमें भाई-भतीजावाद, संवेदनशील मामलों को बार-बार अपने मनोनुकूल जजों को सौंपना, सुनवाई के मामलों को मनमाने तरीके से सूचीबद्ध करना, तत्काल निष्पादन के मामलों की सुनवाई में भेदभाव करना, किसी के पक्ष या विपक्ष में जान बूझकर फैसला देना, समय पर निर्णय नहीं देना, सुनवाई के बाद मामलों पर निर्णय आदेश लम्बे समय तक सुरक्षित रखना, कई मामले वर्षों तक सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं होना, कोई सामान्य मामला भी तुरंत सुन लिया जाना, किसी महत्वपूर्ण मामले को भी टालते रहना, तारीख पर तारीख देना। ये सब न केवल भ्रष्टाचार और न्यायिक भेदभाव को बढ़ावा देते हैं, बल्कि इसने ‘‘सभी के लिए समान न्याय’’ के सिद्धान्त की नींव को हिला कर रख दिया है। अब न्यायालय इक्वलिटी बिफोर लॉ के सिद्धान्त की बजाय पारसियलिटी बिफोर लॉ की तरफ तेजी से बढ़ रहा है। न्यायपालिका में अनियमितता की जड़ें गहरी होती जा रही है। संविधान और कानून की बजाय जातीय-धार्मिक पूर्वाग्रह अदालतों में आज तेजी से बढ़ रहा है। न्याय प्रभावशाली सामाजिक वर्ग के पक्ष में होता जा रहा है। अधिकतर यह अमीरी-गरीबी, जाति और धर्म देखकर निर्णय दिए जाते हैं। संविधान के समानता, स्वतंत्रता और न्याय का सपना ध्वस्त होता जा रहा है। न्याय-तंत्र, जाति विशेष और सत्ता की कठपुतली बनने की ओर अग्रसर है। कुछ जज मनु के विधान को लागू करने पर तत्पर दिखते हैं।

विधि आयोग और मुख्य न्यायाधीशों के सम्मेलनों में समय पर जल्दी न्याय देने के प्रश्न पर समीक्षा की जाती है। स्थिति में सुधार के लिए विभिन्न सिफारिशें भी की गई हैं। हालांकि अभी तक कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई है। न्याय देने में विलंब जारी है। इसलिए कुछ संवेदनशील लोग गुस्से में खुले तौर पर कहते हैं कि भारतीय न्यायपालिका बड़े लोगों, अमीरों और शक्तिशाली साथियों की रक्षक बन गई है। यह गरीबों, अनुसूचित जातियों, जनजातियों के लोगों के लिए नहीं रह गई है। गरीबों और कमजोर सामाजिक समूहों के लिए न्याय एक आकाश कुसुम बन गई है।

यहाँ यह भी विचारणीय है कि अवमानना सिर्फ अदालत और जज की ही नहीं होती है बल्कि याचिकाकर्ता की भी होती है। लेकिन अदालत की अवमानना पर सजा दी जाती है और याचिकाकर्ता की अवमानना पर कोई सजा नहीं दी जाती है। क्या अदालतों की याचिकाकर्ता के प्रति कोई जवाबदेही नहीं है? वकील और जज की मिलीभगत से याचिकाकर्ता सालों साल अदालत के चक्कर लगाते रहते हैं। मुकदमा लड़ते-लड़ते कितने की सम्पत्ति तक बिक जाती है, कितने मर जाते हैं। फिर भी कितनों को न्याय नहीं मिल पाता है। क्या यह याचिकाकर्ता की अवमानना नहीं है? कहा जाता है कि अक्सर जज ही अदालत की अवमानना करते हैं। लेकिन चूंकि वे जज होते हैं, दण्ड देने का उन्हें अधिकार दिया गया है। इसलिए उनके खौफ के कारण उनके खिलाफ बोलने की हिम्मत लोग नहीं करते हैं। लाखों अदालती आदेशों का अनुपालन वर्षों लम्बित रहता है। उस पर अवमाननावाद दायर किए जाने के बावजूद अदालत वर्षों उस पर सुनवाई नहीं करती है। क्या यह जजों द्वारा अदालत की अवमानना नहीं है? सर्वोच्च न्यायालय को मुकदमों के फैसले में देरी, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, घूसखोरी आदि पर कार्रवाई की चिंता क्यों नहीं होती है? क्या इससे अदालत की अवमानना नहीं होती है? लेकिन विडंबना है कि इन प्रश्नों पर सवाल उठाने वाले के विरुद्ध ही जज अदालत के अवमानना की कार्रवाई चलाने लगते हैं। न्यायाधीशों में चयनात्मक और पक्षपातपूर्ण निर्णय देने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। जज सरकार के सामने झुकने लगे हैं। इस पर विस्तारपूर्वक चर्चा-परिचर्चा होनी चाहिए। मामलों को सर्वोच्च न्यायालय और सरकार के समक्ष मजबूती से उठाया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता के अवमानना को जन आंदोलन के माध्यम से भी उठाया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता के अवमानना पर भी सजा का कानून बनाना होगा। यह कहा जाता है कि अदालत में प्रवेश तुरंत हो जाता है लेकिन उसमें से निकलने (निर्णय होने) में वर्षों लग जाते हैं। यह न्यायिक तंत्र की कमजोरियों और नाकामियों को दर्शाता है। न्याय व्यवस्था में व्याप्त अनियमितताएं न्याय का गला घोंट रही हैं।

जज भी जनता के टैक्स के रूपये से ही वेतन और अन्य सुख-सुविधा पाते हैं। उनकी जिम्मेदारी, संविधान की रक्षा करनी होती है। अपने या किसी के निहित स्वार्थ की रक्षा करना संविधानद्रोही आचरण है। कानून का शासन, कानून से संचालित होना चाहिए, न कि किसी की इच्छा से। न्यायाधीश भी इंसान होते हैं जो न्यायालयों की अध्यक्षता करते हैं। मानव न्यायाधीश ही न्यायालय का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे केवल अदालत के दृश्यमान प्रतीक नहीं हैं। वे मानव रूप में न्यायालय के प्रतिनिधि और प्रवक्ता हैं। जिस तरह से न्यायाधीश अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं, उससे अदालतों की छवि, विश्वसनीयता और न्यायिक प्रणाली की उपयोगिता निर्धारित होती है। न्यायिक स्वतंत्रता के उल्लंघन की कई घटनाएं दर्ज की गई हैं और अब भी तेजी से प्रकाश में आ रही हैं। ऐसे जजों पर कठोर कार्रवाई का नियम बनाया जाना चाहिए। फलतः जनता का विश्वास न्याय प्रणाली में तेजी से घटता जा रहा है।

इस लोकतंत्र में कानून के समक्ष सभी बराबर हैं। अत्याचार और अन्याय के खिलाफ गरीब से गरीब व्यक्ति भी न्यायालय के दरवाजे पर जाकर अपनी शिकायत दर्ज करवा सकता है। अपने प्रति अत्याचार और दुख को रख सकता है। उसे समय पर न्याय देना और निर्भयता प्रदान करना न्यायालय का कर्तव्य है। समय पर न्याय देना न्यायालय से अपेक्षित है, चाहे अत्याचार करने वाला कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो? यहाँ तक कि देश के प्रधानमंत्री के खिलाफ भी शिकायत दर्ज की जा सकती है। इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में सबसे बड़े नौकरशाह  और प्रधानमंत्री तक को न्यायाधीश द्वारा अपराध के अनुसार सजा देने का संवैधानिक अधिकार हैं। भारत की सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को भी सन् 1975 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सजा दी थी। उनके लोकसभा चुनाव को निरस्त कर दिया था। लेकिन क्या आज न्यायपालिका ऐसा कर रही है?

न्यायशास्त्र में कहा गया है कि ‘‘न्याय हो ही नहीं बल्कि न्याय होता भी दिखे। तभी वह न्याय है अन्यथा पक्षपात है।’’ न्याय की देवी का प्रतीक चिन्ह आँखों पर पट्टी और हाथ में संतुलित तराजू है, ताकि वह मुँहदेखी फैसला न करे। वह डंडीमारी न कर सके। उसके फैसले किसी भी दबाव से मुक्त और निष्पक्ष होने चाहिए। नारी देवी ममता की भी प्रतीक होती है। उसके सब बच्चे बराबर हैं। वह अपने सबसे कमजोर बच्चे के अधिकारों की ओर विशेष ध्यान देती है। आज कहा जाता है कि न्याय रुपये से खरीदा जाता है। गरीबों के पास इसे खरीदने की ताकत नहीं है। वह उसे खरीद नहीं सकता है। उसे न्याय नहीं मिल सकता है। गरीबों को न्याय नहीं मिलने के कारण नक्सली गतिविधियों से लेकर अन्य कानून-व्यवस्था की समस्याओं में वृद्धि हुई है। समय पर न्याय नहीं मिलने से भी कई समस्याएं पैदा हुई हैं। यह एक दुष्चक्र के रूप में बदल गया है। सर्वोच्च न्यायालय को इस पर गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए। संविधान के सामाजिक आदर्श वाक्य के आलोक में गरीबों को त्वरित और सुलभ न्याय की आवश्यकता है। ऐसा नहीं है कि अदालत त्वरित निर्णय नहीं करती है। जिसमें वह चाहती है, सुनवाई तुरंत होती है, निर्णय भी एक दिन में सुना दिया जाता है। बाकी मामलों में तारीख-पर-तारीख पड़ता है। सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश पी.एन. भगवती ने अपने न्याय-निर्णय में कहा था कि ‘‘न्याय में देरी, न्याय से वंचित करना है।’’ न्यायालय का दायित्व पारदर्शी तरीके से निष्पक्ष और शीघ्र न्याय प्रदान करना है।

सर्वोच्च न्यायालय के एक और पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी.एन. खरे ने भी टिप्पणी की  थी कि ‘‘आम आदमी के लिए न्याय नहीं है। गरीब निर्दोष होने के बावजूद दोषी करार दिए जाते हैं। वे खुद को निर्दोष साबित नहीं कर पाते हैं। रूपये वाले शातिर लोग महँगे वकीलों की फौज से हारी हुई बाजी भी जीत लेते हैं।’’ समय-समय पर कुछ माननीय न्यायाधीशों की व्यवस्था पर टिप्पणियाँ तो होती हैं, लेकिन प्रश्न है कि इसे सुधारेगा कौन? सर्वोच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ को इस पर गम्भीरता से विचार करना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय गरीबों, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और पिछड़े वर्गों की सुरक्षा के संवैधानिक प्रावधानों का संरक्षक भी है। शीर्ष अदालत से इन वर्गों की अपेक्षाएं हैं। लेकिन आजकल भारतीय न्यायपालिका में इस पर गहरी उदासीनता है।

सामाजिक न्याय की धुरी पर कार्य करने वाले लोग समय-समय पर कॉलेजियम सिस्टम और सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को पद देने के खिलाफ आवाज उठाते रहते हैं पर सफल नहीं हुए। राजनीतिक दलों के ढुलमुल रवैये के कारण आज सर्वोच्च न्यायालय बेखौफ है। उसे संविधान की मर्यादा का डर इसलिए नहीं है क्योंकि उसे मुगालता है कि वह सर्वोच्च है। जबकि लोकतंत्र में जनता की शक्ति सर्वोच्च होती है। जिस संविधान ने न्यायिक कार्यों के लिए न्यायालयों को शक्ति दी है उस पर महाभियोग लगाने की शक्ति संसद को दी है। लेकिन यह प्रक्रिया जरा जटिल है, पर असंभव नहीं। इसलिए वे निश्चिंत रहते हैं, निर्भय रहते हैं।

उल्लेखनीय है कि संविधान के अनुच्छेद 234 के तहत राज्य न्यायिक सेवा आयोग के माध्यम से अवर न्यायाधीश से लेकर जिला न्यायाधीश तक के पदों पर नियुक्ति वर्षों से होती आ रही है। इसमें संबंधित राज्य के प्रतिनिधित्व और आरक्षण के नियम भी लागू किए गए हैं। पर उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति में संविधान के अनुच्छेद 312 की व्यवस्था अभी तक लागू नहीं होने दी गई है। उसे लागू करने की बजाय  भारत सरकार ने 2015 में उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति के लिए वर्तमान व्यवस्था के जगह NAGC कानून बनाया जिसे सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने निरस्त कर दिया। संविधान लागू होने के 71 साल बाद भी अनुच्छेद 312 के प्रावधान लागू नहीं कर भारत सरकार ने अनुसूचित जातियों/अनुसूचित जनजातियों और पिछड़े वर्गों के आरक्षण नियमों को लागू करने से बचने के लिए किया। जाहिर है भारत सरकार और सर्वोच्च न्यायालय मामले को दूसरी दिशा देकर नूरा कुश्ती कर रहे हैं। इसलिए मामले को दूसरी दिशा में मोड़ दिया गया। दोनों नहीं चाहते की उच्च न्यायपालिका में संवैधानिक आरक्षण लागू हो। उनकी नीयत वैदिक आरक्षण को जारी रखने की है। सामाजिक न्याय के लोग और प्रबुद्ध जनता इसे जानें, बूझें और समझें। अपनी माँग को विभिन्न मंचों पर उठावें और राष्ट्रव्यापी जनमत तैयार करने की दिशा में कार्य करें।

लोकतंत्र की जीवंतता और संवैधानिक संस्थाओं द्वारा सत्तापक्ष को अनुचित लाभ देने से बचाने के लिए, अब न्यायाधीशों, सेना के अधिकारियों, प्रशासनिक अधिकारियों के साथ ही सीएजी, निर्वाचन आयोग एवं अन्य संवैधानिक पद वाले व्यक्तियों को राजनीति में प्रवेश पर रोक लगाने और राज्यपाल जैसा लाभदायक पद नहीं देने का कानून बनाना होगा। उनके सेवानिवृत्ति के बाद कम से कम 5 वर्षों तक राजनीतिक दलों में प्रवेश पर कानूनन प्रतिबंध लगाई जाए। अन्यथा देश का लोकतंत्र-सत्तातंत्र तानाशाही में बदल जाएगा। इन परिस्थितियों में लोकतंत्र को जीवंत बनाने के लिए विशेष प्रावधान बनाने होंगे।

(इं. राजेन्द्र प्रसाद भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान बी. एच. यू. के छात्र के रूप में इंजीनीयिरिंग की डिग्री प्राप्त करने के बाद बिहार अभियंत्रण सेवा के वरिष्ठ अधिकारी के पद से सेवानिवृत हुए। वे निरंतर लेखन करते रहे हैं। ‘संत गाडगे और उनका जीवन संघर्ष’ और ‘जगजीवन राम और उनका नेतृत्व’ उनकी महत्वपूर्ण किताबें हैं। संप्रति वे पटना में रहते हैं।)

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