Sunday, October 17, 2021

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अखबार मरेंगे तो लोकतंत्र बचेगा?

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हम गाजियाबाद की पत्रकारों की एक सोसायटी में रहते हैं। वहां कई बड़े संपादकों और पत्रकारों (अपन के अलावा) के आवास हैं। इस सोसायटी में एक बड़े पत्र प्रतिष्ठान के ही पूर्व कर्मचारी अखबार सप्लाई करते हैं। वे बताते हैं कि कोरोना से पहले लोग तीन- तीन अखबार लेते थे। अब कुछ ने अखबार एकदम बंद कर दिया है और कुछ ने घर में लड़ाई झगड़े के बाद एक अखबार पर समझौता किया है। एक दिन पहले एक बड़े अखबार के बड़े पत्रकार ने बताया कि उनका वेतन एक तिहाई काट दिया गया है। यूरोप की फरलो (छुट्टी पर भेज दिए जाने) वाली कहानी यहां भी दोहराई जा रही है।

यह धीरे-धीरे मरते हुए अखबारों की एक अवस्था है जिसे कोरोना महामारी ने तेज कर दिया है। पूरी दुनिया में इस बात पर चर्चा हो रही है कि क्या कोरोना के बाद अखबार बच पाएंगे या पूरी तरह समाप्त हो जाएंगे? हिंदी हृदय प्रदेशों में अखबारों की धूम पर `हेडलाइन्स फ्राम हार्टलैंड’ जैसी  किताब लिखने वाली शेवंती नाइनन ने ‘द टेलीग्राफ’ में बहुत सारी जानकारियों से भरा हुआ लेख लिख कर बताया है कि किस तरह से पूरी दुनिया में प्रिंट मीडिया संकट में है। इस टिप्पणीकार को इंतजार है आस्ट्रेलिया के मीडिया विशेषज्ञ राबिन जैफ्री के किसी लेख का, जिन्होंने `इंडियाज न्यूज पेपर्स रिवोल्यूशन’ जैसी चर्चित किताब लिखी थी। जैफ्री ने नब्बे के दशक में भारत में उदारीकरण और वैश्वीकरण रूपी पूंजीवाद के विकास के साथ ही अखबार उद्योग की क्रांति देखी थी। जैफ्री भी बेनेडिक्ट एंडरसन की  `इमैजिन्ड कम्युनिटी’ वाली सोच को भारत में लागू करते हैं और देखते हैं कि किस तरह से इन नए क्षेत्रीय और राष्ट्रीय अखबारों के विकास के साथ एक नए किस्म का लोकतंत्र और राष्ट्रवाद विकसित हुआ है।

अखबारों के इस संकट के बारे में ‘द गार्जियन’ टिप्पणी करते हुए लिखता है, “  प्रिंट मीडिया दो दशक से बंद होने की आशंका से ग्रसित था। आज कोरोना ने पूरे ब्रिटेन में 380 साल पुराने अखबार उद्योग को नष्ट कर दिया है। लगता नहीं कि अब अखबार बच पाएंगे।’’ अखबारों के मौजूदा संकट के पीछे एक प्रमुख कारण विज्ञापनों का बंद होते जाना और दूसरा उसके कागज और स्याही पर लगा संक्रमण का आरोप है। पहला कारण लंबे समय से चल रहा था और दूसरे कारण ने उसके साथ मिलकर कोढ़ में खाज पैदा कर दी है। हालांकि मौजूदा स्थिति आने में प्रौद्योगिकी की भी बड़ी भूमिका है और डिजिटल टेक्नालाजी धीरे धीरे अखबारों को कागज और स्याही की दुनिया से निकालकर साइबर दुनिया में ला रही थी।

इस बीच गूगल और फेसबुक जैसे डिजिटल मंचों ने अखबारों की सामग्री का मुफ्त में इस्तेमाल करके उनके प्रति लोगों का आकर्षण भी कम कर दिया है।इसीलिए कहा जा रहा है कि जिस गूगल ने अखबारों को मारा है अब उसे ही उन्हें जीवन दान देने के लिए मदद देनी चाहिए। वे कुछ हद तक तैयार भी हैं क्योंकि नई सामग्री गूगल पैदा नहीं कर रहा। लेकिन संक्रमण का आरोप उसके पाठकों के जीवन और अस्तित्व से जुड़ा है और उसे मिटा पाना आसान नहीं है। 

संक्रमण के आरोप को सैनेटाइज करने के लिए अखबार उद्योग ने एक साथ मिलकर बहुत सारे जतन किए। पहली बार सभी अखबार समूहों ने मिलकर पूरे पूरे पेज के विज्ञापन दिए। जाहिर सी बात है कि इस विज्ञापन से कोई कमाई नहीं हुई होगी। उसमें अखबार को व्यक्ति के चेहरे पर मास्क की तरह लगाकर कहा गया था कि अगर झूठी खबरों के संक्रमण से बचना है तो अखबारों के मास्क का सहारा लीजिए। उसी के साथ यह भी कहा गया था कि अखबार की छपाई पूरी तरह मशीनीकृत है और उसमें किसी का हाथ नहीं लगता। यहां तक कि बिक्री केंद्रों पर भी दस्ताने लगाकर ही हाकर अखबार उठाते हैं। भारत के सूचना और प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने ट्वीट करके कहा-अफवाहों पर विश्वास न करें। समाचार पढ़ने से # CORONA नहीं होता। समाचार पत्र पढ़ने और कोई भी काम करने के बाद साबुन से हाथ धोना है। समाचार पत्रों से हमें सही खबरें मिलती हैं। 

इसके अलावा देश के बड़े वकीलों से भी बयान दिलवाए गए कि अखबार का प्रसार रोकना गैर कानूनी है। इस बीच इंडियन न्यूजपेपर्स सोसायटी (आईएनएस) के पदाधिकारी शैलेश गुप्ता ने सूचना प्रसारण मंत्री को पत्र लिखकर अखबार उद्योग को संकट से बचाने के लिए आर्थिक मदद की मांग की है। उनका कहना है कि सरकार विज्ञापन की दरें 50 फीसदी बढ़ा दे। न्यूज प्रिंट पर लगने वाला सीमा शुल्क पांच फीसदी घटाए। न्यूज प्रिंट पर दो साल का टैक्स हाली डे घोषित करे।

भारत में की जाने वाली यह सारी तदवीरें पूरी दुनिया में चल रही हैं। लेकिन लगता नहीं कि दवा काम करने वाली है। अखबारों को कागज और स्याही से रिश्ता तोड़ना ही होगा और डिजिटल दुनिया में जाना ही होगा। इसके अलावा उनके पास कोई चारा नहीं है। अखबारों ने विज्ञापन के बूते पर अपना मूल्य काफी घटा रखा था। वे विज्ञापन से मुनाफा कमाते थे, उससे कागज, स्याही, टेक्नालाजी और वितरण का खर्च निकलता था और कर्मचारियों को मोटी तनख्वाहें भी देते थे। इस तरह कौड़ियों के दाम बंटने वाले अखबारों ने अपनी सामग्री के बूते पर अपनी कमाई का कोई ढांचा नहीं बनाया था। यह विज्ञापन पर टिका परजीवी ढांचा था जो विज्ञापन के टेलीविजन और डिजिटल की ओर जाते ही लड़खड़ाने लगा। 

अखबारों के इस संकट को दुनिया भर के विशेषज्ञ पहले से आते हुए देख रहे थे। आस्ट्रेलिया के भविष्यवादी लेखक रास डाउसन ने 2011 में अखबारों के मरने की चेतावनी देते हुए पूरी दुनिया के लिए एक समय सारणी बना दी थी। उनका कहना था कि अमेरिका में 2018 में, ब्रिटेन में 2019 में, कनाडा और नार्वे में 2020 में, आस्ट्रेलिया में 2022 में अखबार मर जाएंगे। उन्होंने लिखा है कि फ्रांस में सरकार की मदद से 2029 तक और जर्मनी 2030 तक अखबार रह सकते हैं। जहां तक एशिया और अफ्रीका के विकासशील देशों की बात है तो वहां वे कुछ और दिनों तक अखबारों का भविष्य देखते हैं। 

अखबारों की मृत्यु का यह टाइम टेबल कुछ विद्वानों के लिए एक बेवजह का हौवा लगता रहा है। मार्क एज ने तो `ग्रेटली एक्जजरेडःद मिथ आफ डेथ आफ न्यूजपेपर्स’ लिखकर इसे खारिज भी किया था। लेकिन जो चीज हम अपनी आंख के सामने देख रहे हैं उसे कैसे खारिज कर सकते हैं। अब सवाल यह है कि अखबार कैसे बचेंगे। एक माडल सरकार से आर्थिक सहायता लेकर अखबार चलाने का है। इसकी अपील करने वाले अखबार को दूसरे उद्योगों की तरह एक उद्योग मानते हैं और उन्हीं की तरह सरकार से सहायता मांग रहे हैं। उनके लिए उसमें छपने वाले शब्द निष्प्राण किस्म के केमिकल हैं। वे मानव जीवन और प्रकृति के सत्य से संवाद  नहीं एक केमिकल लोचा पैदा करते हैं जो धंधे में कारगर होता है। दूसरा मॉडल सेविंग द मीडियाःक्राउड फंडिंग एंड डेमोक्रेसी जैसी किताब लिखकर जूलिया केज ने प्रस्तुत किया है। केज का कहना है कि मीडिया ज्ञान उद्योग यानी नालेज इंडस्ट्री का हिस्सा है। लोकतंत्र के कुशल संचालन के लिए इसका रहना जरूरी है।

अब सवाल यह है कि सरकार से सहायता लेकर चलने वाला मीडिया किस तरह सरकार की गलत नीतियों और गलत निर्णयों पर सवाल उठाएगा और अगर नहीं उठाएगा तो उसका मकसद तो कम्युनिस्ट और तानाशाही वाले देशों की तरह सरकार की नीतियों का प्रचार बन रह जाएगा। जहां तक क्राउडफंडिंग का मामला है तो वह मॉडल अभी तक बहुत सफल नहीं हुआ है। जूलिया इस आर्थिक ढांचे में सरकार की सहायता को भी रखती हैं लेकिन उनकी कल्पना में वे लोकतांत्रिक देश हैं जहां की सरकारें सहायता देने के बाद उन संस्थानों में हस्तक्षेप नहीं करतीं। इन माडलों से अलग तीसरा और बहुत पुराना माडल महात्मा गांधी ने प्रस्तुत करने का प्रयास किया था। उनका कहना था कि अखबार अपने ग्राहकों के खर्च से चलने चाहिए। अगर वे लोग अखबार का खर्च नहीं उठा सकते जिनके लिए अखबार निकाला जाता है तो अखबार को निकालने की जरूरत क्या है? वे अपने  `इंडियन ओपिनियन’ में इसी माडल को लागू कर रहे थे और 1915 में दक्षिण अफ्रीका से चले आने के बाद भी वहां रह गए अपने बेटे को इसी प्रकार की सलाह दे रहे थे।

सवाल यह है कि अखबार मरेंगे तो क्या टेलीविजन और डिजिटल मीडिया उस पूरी जिम्मेदारी को उठा पाएगा जो लोकतंत्र के जीवन के लिए जरूरी है। शायद उठा भी रहे हैं या नहीं उठा रहे हैं। उनकी चीख चिल्लाहट और चाटुकारिता देखकर तो लगता नहीं। वे ज्यादा से ज्यादा लोकतंत्र प्रोपेगंडा या मनोरंजन उद्योग के हिस्से हैं। आज के सात साल पहले द इकानमिस्ट टाम स्टैंडेज द्वारा लिखी अपनी कवर स्टोरी `बुलेटिन्स फ्राम फ्यूचर’ में इस बात पर बनाई थी कि आने वाले समय में समाचारों की दुनिया किस प्रकार की होगी। उस स्टोरी में अखबारों के मरने के साथ यह भविष्यवाणी की गई थी कि समाचारों की पारिस्थितिकी पूरी तौर पर बदल रही है। खबरों की संरचना धीरे धीरे मास मीडिया के आगमन से पहले वाली स्थिति में पहुंच जाएगी। हर कोई खबर दाता होगा और हर कोई उपभोक्ता। बहुत सारी चीजें गप की शक्ल में होंगी। 

निश्चित तौर पर आने वाला समय बड़े बदलाव का है और यह बदलाव लोकतंत्र को भी बदलेगा और हमारे ज्ञान के संसार को भी। संभव है अखबार डिजिटल के रूप में नया जन्म लें और अपनी विरासत को बचाए रखें और लोकतंत्र को भी नया रूप दे, क्योंकि आखिर में लोकतंत्र और तानाशाही कुछ और नहीं सिर्फ डाटा प्रणाली की अलग अलग वितरण व्यवस्था ही तो है।

(अरुण कुमार त्रिपाठी वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।) 

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