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सुशांत राजपूत की आत्म हत्या के प्रसंग में : अवसाद, अहम् और आदर्श के सवाल

किसी भी अवसादग्रस्त आदमी के साथ एक चरण में जा कर ऐसा होता है कि उसे अपने चारों ओर की अन्य सारी आवाजें सुनाई देना बंद हो जाती हैं। वह जैसे खुद में ही कैद हो जाता है। किसी और का उसके अंदर कोई स्थान नहीं रह जाता है। खुद में ही सवाल-जवाब करता है और इस प्रक्रिया में यदि कोई एक चीज उसके दिमाग में गूंजती है, जिसके गुंफन में वह फंस सा जाता है, वह है मृत्यु की प्रबल प्रेरणा (death drive) के गहरे सन्नाटे की गूंज।

आदमी की आत्मलीनता का एक नकारात्मक विकास। इस कामना की उत्तेजना में वह अजीबो-गरीब कल्पनाओं में डूबता चला जाता है, अपने अवचेतन को, अर्थात अपने अस्तित्व को ही तुच्छ करता हुआ उससे खेलने लगता है। उसे किसी अन्य की ओर ध्यान न देने के लिये मजबूर करता है। इस प्रकार वह अपनी इस दृष्टि से खुद को अंधा बना लेता है, अगल-बगल का कुछ भी देखने से इंकार करता है।

लकान कहते हैं कि आदमी की खुद को अंधा बना देने वाली यह दृष्टि ही उसका अहम है। उनका यह साफ कथन था कि मनोविश्लेषण के काम में अहम् का सही स्थान वहीं पर दिखाई देता है, जहां रोगी विश्लेषण में बाधक बनता है, अर्थात् उसमें अहम् की भूमिका महज अस्वीकार की भूमिका होती है। फ्रायड ने इसी के आधार पर आदमी के अहम् और उसकी कामेच्छा के बीच के संबंध के सिद्धांत को तैयार किया था । लकान के शब्दों में, अहम् हमारे अज्ञान के क्षेत्र को विस्तार देता है, ज्ञान को नहीं। जहां तक उसकी अपनी शक्ति का सवाल है, वह बिल्कुल अलग विषय है ।

इसी संदर्भ में लकान आदमी के आदर्श की भूमिका की चर्चा करते हैं और उसे आँख के लेंस की भूमिका से जोड़ते हैं । आँख का लेंस उसके कोर्निया से लगा हुआ एक पारदर्शी उभयोत्तल ढांचा होता है जो किसी भी चीज से आने वाली रोशनी को कोर्निया के सहयोग से आँख के पीछे के पर्दे, रेटिना पर उतारता है, और वह तस्वीर प्राणी के दिमाग में दर्ज हो जाती है, वह उस चीज को देख पाता है । इसी प्रकार, आदमी का आदर्श उसके अहम को दृष्टि देने वाले लेंस का काम करता है। इसके जरिये ही वह सच्चाइयों को देख पाता है। इसीलिये आदमी के मस्तिष्क में आदर्श एक बड़ी भूमिका निभाते हैं । लकान ने इस आदर्श के दो रूप बताए थे— अहम का आदर्श (Ego-ideal) और आदर्श अहम् (Ideal-ego) । इन दोनों पदों के बीच के फर्क को हम फ्रायड के काम में कई जगह पा सकते हैं ।

लकान के सूत्र में, आदर्श अहम् आपकी स्वयं की अपने बारे में मान ली गई छवि है, पर अहम् का आदर्श आपके चित्त से जुड़ा हुआ एक प्रतीकात्मक बिंदु है, एक सांस्कृतिक पहलू जो किसी को भी जीवन में उसका अपना एक स्थान प्रदान करता है और जहां से आपको देखा जाता है, उस बिंदु को भी तैयार करता है । मसलन्, यदि आप तेज गति से गाड़ी चला रहे हैं तो यह संभव है कि आप अपने को गाड़ियों की दौड़ में उतरा हुआ एक ड्राइवर मान कर ऐसा कर रहे हो । तब आप अपनी छवि को उस ड्राइवर के साथ जोड़ लेते हैं । वही आपका आदर्श अहम् हो जाता है। लेकिन वास्तविक सवाल यह उठता है कि वह व्यक्ति कौन है जिसे आप रेस में लगा ड्राइवर मान कर उससे खुद को जोड़ रहे हैं ? जब आप तेज गाड़ी चलाते हैं तब किसके बारे में सोचते हैं कि वह आपको देख रहा है ?

यह सवाल ही अहम् के आदर्श से जुड़ा हुआ सवाल है । आपको कोई नहीं देख रहा होता है, फिर भी आप मान कर चलते हैं कि वह देख रहा है। लकान अपने विश्लेषणों से बताते हैं कि सीधे-सीधे किसी रोगी को उसके आदर्श अहम् के बारे में बताने से, वह जिससे झूठी प्रतिद्वंद्विता कर रहा है, उसकी चर्चा करने से उस पर कोई खास असर नहीं होता है ;  उसके प्रभाव से मुक्त कराने के लिये जरूरी होता है कि उसके अपने प्रतीकात्मक आयाम पर,  अहम् के आदर्श के सांस्कृतिक कोने पर दस्तक दी जाए ।

आदमी के अहम् का आदर्श प्रतीकात्मक जगत से आता है, इसीलिये वह अहम् की तमाम अचेतन क्रियाओं पर आधारित होता है । फ्रायड ने इसी की व्याख्या के लिये एक दूसरी स्थानिकता (second topography) के अपने सिद्धांत को विकसित किया था । लकान कहते हैं कि इससे उनका मकसद किसी स्वायत्त अहम् की ओर लौटना नहीं था । ‘सामूहिक मनोविज्ञान और अहम् का विश्लेषण’ (Group Psychology and the Analysis of Ego) में फ्रायड ने यह सवाल उठाया था कि कैसे कुछ लोगों के लिये कोई लक्ष्य अपने सबसे जघन्य रूप में भी इस आदर्श अहम की वजह से ही उनकी पहचान में शामिल हो जाता है और उनमें कुछ भी कर गुजरने की एक मूर्खताजनित शक्ति आ जाती है ।

लकान कहते हैं कि हिटलर और सामूहिकता की परिघटना पर फ्रायड का कथन जैसे सभ्यता के संकट के हृदय में झांक लेने की एक अतिंद्रीय दृष्टि प्रदान करता है । (भारत में इससे भक्तों की परिघटना में भी समझा जा सकता है ।) लकान यहीं पर फ्रायड की शिक्षाओं की विडंबना की बात करते हुए कहते हैं कि उन्होंने जिन मनोविश्लेषकों के समुदाय को सभ्यता के इस संकट के निदान का दायित्व सौंपा था उसी ने उल्टे आदमी में एक मजबूत अहम् (strong ego) के संश्लेषण को अपने कामों का मुख्य उद्देश्य बना लिया । वही बाद में उनके विश्लेषण की तकनीक के केंद्र में कायम हो गया । उनकी यह मान्यता हो गई है कि इस प्रकार आदमी में किसी मजबूत आदर्श को मूर्त करके ही उन्हें अपने उपचारमूलक काम में परिणाम हासिल होते हैं । (Jacques Lacan, Ecrits, page – 667-678)

बहरहाल, यहां भी समस्या वही है कि मनोविश्लेषण का काम मनोविज्ञान की व्याख्या करने का है या उसे बदलने का । मनुष्य को उसकी नैसर्गिक स्वतंत्रता की कामना से जोड़ने के लिये किसी भी कथित आदर्श के बंधन से उसे बांधने के बजाय उससे मुक्त करने की जरूरत है,  जिसे, लकान के अनुसार, फ्रायड के वंश के तमाम लोगों ने त्याग दिया है । आज भी मनोविश्लेषक आदमी की खब्तों को किसी अन्य बड़े उद्देश्य की दिशा में दिशान्वित करना ही अपना प्रमुख काम मानते हैं । लकान इसके विपरीत कामनाओं के स्वातंत्र्य के प्रति निष्ठा में, आदर्श अहम् और अहम् के आदर्श के बीच संगति में आदमी के उपचार पर बल देते हैं । फिर याद आता है, अभिनव गुप्त का कथन —

“स्वतन्त्रात्मातिरिक्तस्तु तुच्छोऽतुच्छोऽपि कच्श्रन ।

न मोक्षो नाय तन्नास्य पृथङ्नामापि गृह्यते ।।

(स्वतंत्र आत्मा के अतिरिक्त मोक्ष नामक कोई भी तुच्छ या अतुच्छ पदार्थ नहीं है। इसीलिये इसका अलग से नाम भी नहीं लिया जाता है । )

(जॉक लकान के मनोविश्लेषण के सिद्धांतों पर हमारी लिखी जा रही पुस्तक, ‘अथातो चित्त जिज्ञासा’ का यह एक छोटा सा अंश है।)

(अरुण माहेश्वरी वरिष्ठ लेखक, चिंतक और स्तंभकार हैं। आप आजकल कोलकाता में रहते हैं।)

This post was last modified on June 17, 2020 1:54 am

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