Sunday, October 17, 2021

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भीड़ का भय: 1984 पर भारी है मौजूदा दौर

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मेरा नाम मुसलमानों जैसा है
मुझ को कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो ।
मेरे उस कमरे को लूटो
जिस में मेरी बयाज़ें जाग रही हैं
और मैं जिस में तुलसी की रामायण से सरगोशी कर के
कालिदास के मेघदूत से ये कहता हूँ
मेरा भी एक सन्देशा है
मेरा नाम मुसलमानों जैसा है
मुझ को कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो ।
लेकिन मेरी रग रग में गंगा का पानी दौड़ रहा है,
मेरे लहू से चुल्लू भर कर
महादेव के मुंह पर फ़ेंको,
और उस जोगी से ये कह दो
महादेव ! अपनी इस गंगा को वापस ले लो,
ये हम ज़लील तुर्कों के बदन में
गाढ़ा, गर्म लहू बन बन के दौड़ रही है ।

राही मासूम रज़ा

जाने-माने पत्रकार सईद नक़वी ने रोहिंग्या शरणार्थियों की समस्या पर जनहस्तक्षेप: फासीवादी मंसूबों के विरुद्ध एक मुहिम द्वारा आयोजित सभा (26 सितंबर, 2017) में अपना भाषण रही मासूम रजा की इस कविता से समाप्त किया तो मुल्क के माहौल में व्याप्त दशहत की कल्पना से रूह कांप गयी। जून में हस्तक्षेप वेब पत्रिका में ‘मुसलमानों को जेयनयू और कश्मीर पर नहीं बोलना चाहिए’शीर्षक से मेरा लेख छपा था। आज धार्मिक अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों में एक अज्ञात भय का आलम इस हद तक है कि एक आम मुसलमान किसी संवेदनशील मुद्दे, खासकर कश्मीर, गोरक्षा आदि पर खुलकर नहीं बोलता। यही भय का आलम ये हुक्मरान सारी आबादी में भरना चाहते हैं। अखबारों में खबर है कि एक मुसलमान से नाम वाले हिंदुस्तान के एक सेवानिवृत्त फौजी अफसर को अपनी राष्ट्रीयता प्रमाणित करने का समन भेजा गया था। आज के हालात ने नवंबर 1984 की याद दिला दी, आंखों देखा पहला दंगा और राहत कार्य में सीधे, सक्रिय भागीदारी का पहला अनुभव। पूरे देश में सिख समुदाय में ऐसी ही दहशत थी। मेरे एक मित्र हिम्मत सिंह समेत तमाम सिखों ने बाल काट लिए थे। कई दिनों तक पगड़ी पहने लोग सड़क पर लगभग नहीं दिखते थे। अफवाहों का बाजार वैसे ही गरम था जैसे आज।

पिछले महीने (सितंबर) एक शाम लाइब्रेरी से घर आकर बहुत खुश था। कई दिनों से लटका लेख ढर्रे पर आ गया था। अगली सुबह 4 बजे उठकर चाय पीकर एक लंबा लेख पूरा करने बैठ गया। बीच में मनोरंजन के लिए फेसबुक खोल लिया। किसी ने एक खबर शेयर किया था कि जामिया के छात्र ट्रेन में आरक्षित डिब्बे में नहीं चलते कि चार्ट से नाम देखकर देशभक्त भीड़ की हिंसा के शिकार न हो जायें! उसी के नीचे हस्तक्षेप में छपा “मुसलमानों को कश्मीर और जेयनयू पर नहीं बोलना चाहिए”,मेरा लेख किसी ने शेयर किया था। मेरा दिमाग, या शायद फिर दिल, बचपन से अनसुलझी पहेली में फंसकर परेशान होने लगा। बचपन से ही मेरी समझ में यह पहेली नहीं आती कि एक इंसान किसी उन्मादी भीड़ का हिस्सा बनते ही हिंसक क्यों हो जाता है? बचपन से ही इसे सुलझाने के प्रयासों की नाकामी के ऐतिहासिक अनुभवों के बावजूद गाहे-बगाहे सुलझाने की कोशिस में मन को परेशान करता रहता हूं।
मैं इस पहेली में फंसा ही था कि अवसाद की संभावनाओं को चीरते हुए, 28 साल बाद एक दोस्त की आवाज सुनाई पड़ी, फोन पर जो उस समय कैंपस के आस-पास ही थी और 20 मिनट में सामने। अमरीका में रहती है और अगली ही भोर 4 बजे ही उसकी फ्लाइट थी सो 40-45 मिनट में चली गयी। लेकिन किसी भी दोस्त से मिलना हमेशा सुखद होता है, छोटी मुलाकात ही सही।

हमारी दोस्ती 1984 सिख जनसंहार के बाद राहत कार्यों के दौरान हुई थी। दर-असल दिल्ली विश्वविद्यालय और एम्स (अखिल भारतीय आयर्विज्ञान संस्थान) के जनपक्षीय छात्रों और डॉक्टरों से हम लोगों का व्यापक परिचय उसी दौरान हुआ। फिर हम लोगों ने मिलकर सांप्रदायिकता विरोधी आंदोलन (एसवीए) नाम से एक संगठन बनाया। अच्छा खासा संगठन था, हम लोग लगातार आंदोलन, सभा और सम्मेलन करते रहे। जीबीयम में 100 से अधिक लोग होते थे। जेयनयू सिटी सेंटर में पोस्टर के लिए संगठन के प्रमुख नारे पर बहस वाली जीबीएम में तो इससे बहुत ज्यादा लोग थे। पुरुषोत्तम अग्रवाल ने “कण कण में व्यापे हैं राम, मत भड़काओ दंगा लेकर उनका नाम” सुझाया। बहुत लंबी बहस चली। मैं इस नारे के विरुद्ध था। आप दुश्मन के ही प्रतीकों से दुश्मन से नहीं लड़ सकते। मध्यांतर में चाय के दौरान जो मुझसे सहमत थे, वे भी मीटिंग में दिलीप सीमियन और पुरुषोत्तम के तर्क से सहमत हो गये कि तत्कालीन धार्मिक, सामाजिक चेतना के मद्देनजर रणनीतिक तौर पर राम का सहारा वांछनीय था। मैं असहमत ही रहा और बहुमत की विजय हुई। अल्पमत में होना सही न होना नहीं है। लेकिन जनतंत्र का तकाज़ा है कि बहुमत से पारित नियमों का पालन करते हुए, सही मत के लिए जनमत तैयार करते रहना। क्योंकि न बहुमत स्थायी होता है न अल्पमत। धर्म को पवित्र, गोमाता मान लेना सांप्रदायिकता विरोधी और वाम अभियानों की एक बड़ी कमजोरी रही है।

1985 में हम लोगों ने भगत सिंह के लेख ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ की कई हजार प्रतियां बेची-बांटी थी। दिल्ली विश्वविद्यालय के बहुत से अराजनैतिक छात्र हमें सनकी समझते थे कि हम इतनी दूर से पर्चे बांटने आते थे! कई ‘देशभक्त’छात्र हमें वितृष्णा के साथ देखते थे कि हम आतंकवादियों की सहायता कर रहे थे! याद नहीं आ रहा है, सहयोग राशि शायद 50 पैसे या एक रूपये थी। हम जेयनयू से 7 बजे यू स्पेशल पकड़ डीयू आ जाते थे और घूम-घूम कर पर्चे बांटते। एक शाम लौटकर, हम काशीराम के ढाबे पर सारी रात गोर्की के मदर के क्रांतिकारी युवा पात्रों के यथार्थवादी चरित्र चित्रण पर चर्चा छिड़ गयी। मार्क्सवादी शब्दावली में विवेचना करते रहे। काशीराम ने ढाबा 3 बजे बंद कर दिया, हम डटे रहे। मदर के पात्रों से शुरू विमर्श सामाजिक साम्राज्यवाद की मंजिल पार करते हुए स्टालिन-ट्रॉट्स्की विवाद तक पहुंच गया। विमर्श में शाब्दिक ओजस्विता जब शाब्दिक गृहयुद्ध का संकेत देने लगी तो मैंने सबको कमरे में नींबू-चाय के लिए आमंत्रित किया और पेरिस कम्यून की किसी घटना के जिक्र से विषयांतर। 1992 में बाबरी विध्वंस के बाद एसवीए भी विसर्जित हो गया। लगभग एक चौथाई सदस्य अमरीका में बस गये हैं, वैसे भी मजदूर का कोई राष्ट्र नहीं होता। 1984-86 के दौरान सिखों में व्याप्त दहशत का माहौल आज के माहौल से गुणात्मक नहीं महज मात्रात्मक रूप से भिन्न था। एक फर्क तो यह है कि मुसलमान देखकर ही नहीं पहचाने जा सकते, सिख पहचान लिए जाते थे।

कहानी पर वापस आते हैं। हम 30-32 साल के बाद की मुलाकात में पुरानी यादें ताजी करने लगे। उनमें एसवीए के अनुभवों की यादें ज्यादा थीं। फोन पर अवसाद को चीरती आवाज उसके जाने के साथ ही चली गयी और कुछ अप्रिय यादें दस्तक देने लगीं, उसमें एक मित्र के भूतपूर्व हो जाने की भी याद है। ऑपरेशन ब्लूस्टार के बाद, जून, 1984 में बिहार में रामगढ़ कैंटोनमेंट के सिख रेजीमेंट में विद्रोह हो गया। बहुत से सिपाही हथियार सहित कैंटोनमेंट से भाग गए थे। मैं ग्रीष्मावकाश में घर गया था। पूर्वी उत्तर प्रदेश में अलग अलग जगहों पर आतंकवादी छिपे होने की अफवाहें थीं। जौनपुर में कई विद्रोही सानिक गिरफ्तार हुए थे। मैं छुट्टी से वापस दिल्ली आ रहा था। शाहगंज (जौनपुर जिला) स्टेशन से किसी ट्रेन में लखनऊ आ रहा था। उस दिन एक मित्र के यहां रुककर अगले दिन किसी ट्रेन से दिल्ली आना था। उसी डिब्बे में 50 साल के आस-पास की उम्र के, लंबी दाढ़ी-बाल वाले, बाबाओं की तरह सफेद कुर्ता-लुंगी पहने एक व्यक्ति बैठे थे।

बाराबंकी से लखनऊ के बीच एक ‘सजग’ यात्री ने उनके हाथ में कड़ा देख लिया और गश्त करते रेल पुलिस को डिब्बे में आतंकवादी होने की सूचना दी। पूरे डिब्बे में अफरा-तफरी मच गयी। पुलिस वालों और ‘देशभक्तों’सभी के एक ही तर्क थे, “आतंकवादी न होता तो भेष बदलकर क्यों चलता?”मैंने कहा, “क्योंकि तथाकथित देशभक्ति के जुनून में हम आतंकवादी हो गए हैं, पगड़ी देखते ही हम पर आतंकवाद का भूत सवार हो जाता है और हम अभुआने लगते हैं”। हिंसा शाब्दिक ही रही। उन्हें चारबाग स्टेशन के थाने लाया गया उनके कागज-पत्र जांचे गए और छोड़ दिया गया। जामिया के छात्रों के डर की खबर पढ़कर यही वाकया याद आया था। लखनऊ जब मित्र को यह घटना बताया तो उन्होंने कहा, “90 करोड़ को भी रहने की एक जगह चाहिए”। मैंने कहा, “90 करोड़ तो कहीं नहीं जगह ले ही लेंगे लेकिन जो 10 करोड़; 10 लाख; 10 हजार हैं, उन्हें भी रहने की कोई जगह चाहिए”। और हमारी मित्रता स्वतः भूतपूर्व हो गयी।
अफवाहें और सच

1984 का राज्य-प्रायोजित सिख जनसंहार और दंगों में अफवाहों की भूमिका के भयावह गुरुत्व का चश्मदीद हूं। राहत कार्य के दौरान एक दिन हम लोग सुल्तानपुरी के एक राहत कैंप में एम्स और मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज के कुछ युवा डॉक्टरों की टीम के साथ कुछ दवाएं और जमा चंदे से खरीदे कंबल पहुंचाने गए थे। हममें से ज्यादातर खानाबदोशी के दौर से गुजर रहे थे। सीताराम प्रसाद सिंह सोवियत कल्चरल सेंटर में नौकरी करते थे और बाबा खड़क सिंह मार्ग पर बांग्ला साहब गुरुद्वारा के सामने सबलेटिंग के एक फ्लैट में रहते थे। माधव पांडे (अब दिवंगत), मैं और 2 और साथी शायद श्रीकिशन और सुयोग्य ने सोचा कि बहुत दिनों से ढंग से खाना नहीं खाया गया है तो सीता के यहां धावा बोला जाये। पूरी दोपहर और शाम हमने खाते-पीते-गप्पियाते बिता दी। 8 बजे हम रीगल बस स्टॉप से 620 पकड़ने पहुंचे तो इंतजार कर रहे लोगों ने बताया कि दो घंटे से कोई बस नहीं आई थी। डेढ़ घंटे बाद, करीब साढ़े नौ बजे बस आई प्रतीक्षा करते लोगों की आंखों में ऐसी चमक दिखी जैसे रेगिस्तान में कोई जलाशय दिख गया हो। लोग ठुस्समठुस्सा बस में चढ़ लिए, सिख एक भी नहीं। सार्वजनिक स्थानों पर सिख एक्का-दुक्का ही दिखते थे। सिखों में उस समय के भय के आलम का अंदाज आज अल्पसंख्यकों में ही नहीं, धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों में भी व्याप्त भय के आलम से लगाया जा सकता है। अडानी के भ्रष्टाचार पर लेख लिखने और छापने पर ईपीडब्ल्यू के संपादक की बर्खास्तगी और लेख हटाने का समीक्षा ट्रस्ट का फैसला इसकी मिशाल है। गौरतलब है कि इस ट्रस्ट के ज्यादातर ट्रस्टी जाने-माने ‘प्रगतिशील’बुद्धिजीवी हैं।

हम मुनिरका बस स्टैंड पर उतरे तो जेयनयू का एक छात्र दिखा, काबुल में सब घोड़े ही नहीं होते। हमें देखते ही उसने सूचना दी कि बंगला साहब गुरुद्वारे में बहुत से आतंकवादी जुट गए हैं और एके 47 से चारों तरफ अंधाधुंध गोलीबारी कर रहे हैं, पुलिस छिपकर गुरुद्वारे की घेराबंदी कर रही है। हम जिस फ्लैट में थे उसकी बॉलकनी से गुरुद्वारा दिखता है, वहां 8 बजे तक कोई हलचल नहीं थी। हमने क्रोध नियंत्रित करते हुए उसकी शांतिपूर्ण, मौखिक धुनाई का रास्ता अपनाया। माधव ने, अपने स्वभाव के प्रतिकूल मृदुभाषिता का परिचय देते हुए पूछा कि उसने पुलिस की छिपकर घेरेबंदी कैसे देख लिया और यह कि उसे बंदूक का सही सही मॉडल कैसे पता चला? उसने कहा, वहां से आने वाली बस की सवारियों से उसे पता चला और यह कि एक घंटे में तीन बसें आईं। सभी यही बात बता रहे थे। मुनिरका से कैंपस तक हमने उसकी जम कर सामूहिक क्लास ली। वह न संघी था न कांग्रेसी, तफरीह में अफवाह फैला रहा था, कितनों को यह बताया होगा और मुल्क की जनता कान नहीं देखती कौव्वे के पीछे भागती है।

एक दिन पता चला कि दंगाइयों की एक बड़ी भीड़ आरकेपुरम् में सिखों के घरों पर हमला करने आ रही है। कन्हैया ने बयान दिया था कि 2002 की तरह 1984 राज्य प्रायोजित नहीं था। हमलावर लंपटों के पास कॉलोनी के हर सिख के घर के नंबरों की सूची थी। पुलिस या तो सहायक थी या तटस्थ उसी तरह जैसे “भीड़ न्याय” के मामलों में आजकल। जेयनयू से हम 400-500 लोग प्रतिरक्षा में निकलने को तैयार हुए। मुनिरिका पार करते करते देखा हम 20-25 बचे, बाकी “कैंपस की सुरक्षा”के लिए रुक गये। मैं समझ नहीं पाया कि कैंपस रक्षकों में यह कैसा अमूर्त भीड़-भय है? 400-500 संगठित, प्रतिबद्ध युवा शक्ति को देख 100-50 लंपट उल्टे पांव भागेंगे, उनके पास कितने भी हथियार क्यों न हों। कुत्तों की ही तरह गुंडे और मवाली कायर होते हैं जो झुंड में शेर बन जाते हैं और वैसे पत्थर उठाने के अभिनय से ही दुम दबाकर भागते हैं। 100-50 दंगाइयों के विरुद्ध कॉलोनी के हजारों लोग क्यों नहीं निकल पड़े? माहौल में नफरत की बयार थी।

हमने उनसे तर्क करना शुरू किया और उन्होंने कुतर्क। हम जानते थे कि वे हमारी हत्या नहीं करेंगे क्योंकि देशभक्त-बनाम-आतंकवादी से देशभक्त-बनाम-आम हिंदू की खबर दंगाइयों के लिए हानिकारक होती। यह योजना में नहीं था। 100 के आसपास दंगाई लाठी, रॉड और खंजरों के साथ एक सिख के घर के बाहर परिवार वालों को बाहर निकलने को ललकार रहे थे वरना दरवाजा तोड़ देने की धमकी दे रहे थे। 3-4 लड़कों को मैं समझाने की कोशिश कर रहा था। एक तैश में बोला, “तुगलकाबाद स्टेशन पर पंजाब से 100 सिर कटी हिंदुओं की लाशें पड़ी हैं आप वहां जाकर सरदारों को क्यों नहीं समझाते?”मेरे पूछने पर कि उसने खुद देखा है? उसके हां बोलने पर मैंने हवा में तीर चलाया कि 5 दिन से तो पंजाब से आने वाली रेल गाड़िया बंद हैं और सड़कों पर जगह जगह बैरक लगाकर चेकिंग हो रही है, लाशें किस रास्ते उड़कर आईं?

सकपकाकर बोला, जिसने देखा है उसने बताया और मैं तेज आवाज में उस पर अफवाह फैलाने के जुर्म की बात चिल्ला-चिल्लाकर करने लगा। हमारे और साथी भी यही कर रहे थे। हमारी हिम्मत देख कुछ पड़ोसी भी आ गए। लेकिन दंगाई तर्क की भाषा समझते नहीं और हम लोग मानव श्रृंखला में घर को घेर कर खड़े हो गए। वे जिस घर की तरफ गए हम भी वहां गए। वे जहां जाते, हम वहां जाते। थक कर वे गाली-गलौच करके चले गए। शायद गैर-सिखों को मारने का आदेश नहीं रहा होगा। हम माल का नुकसान तो नहीं बचा पाए, जान का नुकसान नहीं होने दिए। इस कामयाबी का राज़ आज तक रहस्य बना हुआ, लेकिन हम खुश थे। लौटते हुए मुनिरिका में एक सज्जन रोककर पूछने लगे हम कहां और क्यों गए थे बताने पर इंदिरा गांधी के हत्यारों को बचाने का आरोप लगाने लगे। बात बढ़ गयी। बोले ‘भाई हो इसलिए छोड़ देते हैं’। मैंने कहा मैं उस जैसे आततायी का भाई नहीं था वह जो करना चाहे करे, उसके चेहरे पर खा जाने वाले भाव थे। लेकिन उसने कुछ किया नहीं।

2002 में जब हम फैक्ट-फाइंडिंग के लिए गुजरात गये तो हर जगह शब्दशः फैलती अफवाहों ने 1984-85 की अफवाहों की याद दिला दी। जहां भी गये एक अफवाह सुनने को मिली कि कल्लोल के एक गांव में तालाब के किनारे कुछ हिंदू औरतों की स्तन कटी लाशें मिली थीं। हम उस गांव में गए तो न तो वहां कोई तालाब था न ही कोई दंगा हुआ न कोई लाशें थीं। जिस तरह उत्तर भारत के अखबार खासकर हिंदी के बाबरी विध्वंस के समय विहिप के मुखपत्र बने हुए थे वैसे ही 2002 में कई गुजराती अखबार। एक गुजराती अखबार में यह खबर छपी थी, एक अंतिम वाक्य के साथ कि प्रेस में जाने तक खबर की पुष्टि नहीं हो पायी थी। जो लोग सक्रिय सांप्रदायिक नहीं थे, वे भी मनसा सांप्रदायिक हो गए थे। ‘सिख होते ही ऐसे हैं’पूरे माहौल में प्रतिध्वनित था, वैसे ही जैसे गोधरा के बाद, 2002 में गुजरात में कि ‘मुसलमान होते ही ऐसे हैं’।
(ईश मिश्र दिल्ली विश्वविद्यालय के रिटायर्ड प्रोफेसर हैं।)

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