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नेपाल पर भी हावी हैं राष्ट्रवादी लपटें, भारत-विरोध वहाँ की राजनीतिक मज़बूरी है

आख़िर क्यों, सदियों से भारत से दोस्ताना सम्बन्ध रखने वाला नेपाल देखते ही देखते दुश्मनों जैसा व्यवहार करने लगा? मौजूदा दौर में जब चीन, पाकिस्तान और नेपाल हमें तरह-तरह के तेवर दिखा रहे हैं, तब नेपाल के रवैये को ही सबसे असहज माना जा रहा है। पाकिस्तान और चीन की हरक़तों को लेकर अनेक बातें कही जाती हैं, लेकिन नेपाल के तेवर हमारे राजनयिकों, हुक़्मरानों और थिंक टैंक के भी गले नहीं उतर रहा। जबकि साफ़ दिख रहा है, नेपाल की मौजूदा राजनीति भी उसी राष्ट्रवाद की राह पर चल रही है, जिस पर सवार होकर नरेन्द्र मोदी और उनका संघ-बीजेपी अपनी निरंकुश सत्ता का मज़ा ले रहा है।

नेपाल भी भारत की राह पर ही चल निकला है। जिस तरह भारत में राजनीति चमकाने के लिए पाकिस्तान और मुसलमान को बात-बात पर गरियाया जाता है, उसी तरह नेपाल की राजनीति में भी शक्तिशाली और विशाल भारत से नहीं डरने और इसकी परवाह नहीं करने की होड़ अपनी पैठ जमा चुकी है। वहाँ भी उस नेता और पार्टी को उतना दमदार बनाकर पेश किया जाता है जितना वो भारत पर गुर्राने वाले तेवर दिखाये। नेपाल में भारत का वैसा ही चरित्र-चित्रण चल रहा है, जैसा कि भारत में हम पाकिस्तान और मुसलमान का देख रहे हैं। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि वहाँ मधेसी यानी ‘तराई में रहने वाली आबादी’ को भारतीय मुसलमान की जगह लेना बाक़ी है। लेकिन ये ख़तरा भी ज़्यादा दूर नहीं है।

नेपाल में मधेसियों की बड़ी आबादी होने के बावजूद नेपाली संसद में इनकी धाक कम है। 2008 में राजशाही के पतन के बाद से 3 करोड़ की आबादी वाले नेपाल पर पहाड़ी बनाम मधेसी वाली नस्लवादी राजनीति हावी रही है। मधेसियों का भारत से रोटी-बेटी वाला रिश्ता है। इनके पास ही नेपाल की कृषि, उद्योग-धन्धों और व्यापार की कमान है। जबकि पहाड़ी इलाकों में पर्यटन और परदेस से आने वाली प्रवासी नेपाली मज़दूरों की कमाई ही आमदनी का मुख्य ज़रिया है। नेपाल तराई के 22 ज़िलों में एक करोड़ से ज़्यादा मधेसी हैं। नेपाल के मूल निवासियों की नज़र में इन्हें पूरी तरह नेपाली नहीं माना जाता।

नेपाल की राजनीति में भी मधेसियों को उपेक्षित रखा गया है। नेपाल की संसद में 275 सांसद हैं। इसमें से मधेसी दलों के सिर्फ़ 33 सदस्य हैं। वहाँ पहाड़ी क्षेत्र की महज सात-आठ हज़ार की आबादी पर एक सांसद है तो तराई की 70 हज़ार से लेकर एक लाख की आबादी पर एक प्रतिनिधि संसद पहुँचता है। मधेसियों में 56 लाख लोगों को नेपाल की नागरिकता नहीं है। यानी, ये घुसपैठिये हैं और वो दिन दूर नहीं जब राष्ट्रवादी राजनीति को चमकाने के लिए इन्हें नेपाल से बाहर खदेड़ने की बातें मुखर होंगी।

राजशाही के पतन के बाद 2008 में जब नेपाल में नया संविधान बनाने की क़वायद शुरू हुई तभी से पहाड़ी नेता देश की राजनीति में अपना स्थायी वर्चस्व क़ायम रखने के लिए तरह-तरह की तिकड़में लगाते रहे हैं। इसी अलगाववाद ने दशकों तक नेपाल का संविधान नहीं बनने दिया। नेपाल में लोकतंत्र की जड़ें इसलिए भी कमज़ोर हैं क्योंकि राजशाही के बाद वहाँ हमेशा गठबन्धन वाली सरकारें ही बनीं। इसके घटक दलों में हमेशा देश-हित से ज़्यादा पार्टी-हित को लेकर होड़ लगी रहती है। ये स्वाभाविक भी है।

दरअसल, राजनीति का सीधा नियम है कि सभी पार्टियाँ सत्ता पाने की रेस में दौड़ती रहती हैं। सत्ता, संख्या बल से मिलती है। संख्या बल को अपनी ओर खींचने के लिए सभी पार्टियाँ सबसे आसान हथकंडा अपनाती हैं। सबकी कोशिश रहती है कि वो ख़ुद को ज़्यादा असली, मज़बूत, बेख़ौफ़ नेपाली जैसा पेश करके जनता को बताएँ कि उसका उनसे बड़ा हितैषी कोई नहीं हो सकता। नेपालियों को भारत ने बहुत करीब से दिखाया है कि राष्ट्रवाद से शानदार ज़ुबानी मिसाइल और कुछ नहीं हो सकती। नेपालियों को भी अनुच्छेद 370, राम मन्दिर, समान नागरिक संहिता, नागरिकता क़ानून (CAA) और नैशनल पॉपुलेशन रज़िस्टर (NPR) जैसे प्रोटोटाइप की ज़रूरत पड़ती रही है।

इसीलिए, रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने 8 मई को पिथौरागढ़-धारचूला से लिपुलेख को जोड़ने वाली सड़क का उद्घाटन किया तो 20 मई को नेपाली प्रधानमंत्री का सख़्त बयान आया कि कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा हमारा इलाका है। भारत ने इस पर अवैध कब्ज़ा कर रखा है, इसीलिए हम इसे वापस लेकर रहेंगे। हालाँकि, जिस वक़्त इस सड़क का निर्माण शुरू हुआ था, तब यही ओली बतौर विदेश मंत्री शिलान्यास कार्यक्रम में शामिल हुए थे। लेकिन प्रधानमंत्री ओली सिर्फ़ बयान देकर ख़ामोश नहीं रहे। उन्होंने अपने राष्ट्रवादी तेवर के मुताबिक, आनन-फ़ानन में देश का नया राजनीतिक मानचित्र बनवाकर उसे अपनी कैबिनेट से पास करवा लिया। फिर इसे नेपाली संसद के निचले सदन से 13 जून को और ऊपरी सदन से 18 जून को मंज़ूरी दिला दी।

ओली को कहीं कोई दिक्कत नहीं हुई क्योंकि नेपाल में जो भी सरकार के इस कदम के ख़िलाफ़ चूँ भी करता उस पर फ़ौरन राष्ट्रद्रोही और भारत का दलाल (एजेंट) होने का ठप्पा लग जाता। इसीलिए सारा वाकया बिल्कुल वैसे ही हुआ जैसे भारतीय संसद ने अनुच्छेद 370 को ख़त्म किया था या जैसे हमारी संसद ने CAA बनाया था। हालाँकि, इसकी एक और पृष्ठभूमि भी है। भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय तथा भारतीय सर्वेक्षण विभाग ने मिलकर देश का नया राजनीतिक मानचित्र बनवाया। ये 2 नवम्बर 2019 को जारी हुआ था।

इस नक्शे में कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख के इलाकों को भारतीय क्षेत्र बताया गया है। इसे लेकर नेपाल ने उसी वक़्त आपत्ति भी जतायी थी। लेकिन भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा कि नक्शे में नेपाल से सटी सीमा में कोई बदलाव नहीं है। ये तो सिर्फ़ भारत के सम्प्रभु क्षेत्र को दर्शाता है। तब विदेश मंत्रालय ने विवाद को बातचीत से सुलझाने का कोई वास्ता नहीं दिया। इसीलिए सही मौका देख ओली सरकार ने इसे नेपाल की आपत्तियों की अनदेखी और शक्तिशाली तथा बड़े पड़ोसी देश की हेकड़ी की तरह पेश किया, ताकि उसके राष्ट्रवादी एजेंडे को नयी हवा मिल सके। इसीलिए अब सारी बात भारत-नेपाल सीमा विवाद का रूप ले चुकी है।

फ़िलहाल, भारत के ज़्यादा क़रीबी समझे जाने वाले मधेसी नेता और उनकी पार्टियाँ भी ‘भारत विरोधी नेपाल’ वाले नैरेटिव से ‘हाँ में हाँ’ मिला रहे हैं या फिर दबी ज़ुबान में ही ओली सरकार का विरोध कर रहे हैं। क्योंकि इसी में उन्हें अपना राजनीतिक भविष्य सुरक्षित दिख रहा है। दरअसल, नेपाली समाज में भी सत्ता चमकाने के लिए पहाड़ियों और मधेसियों का वैसा ही ध्रुवीकरण हो चुका है, जैसा भारत के राष्ट्रवादियों ने हिन्दू-मुस्लिम नैरेटिव के ज़रिये कर दिखाया है। वहाँ मधेसी अब तलवार की ऐसी धार पर चल रहे हैं कि वो यदि भारत के पक्ष में न्यायोचित बातें भी कहेंगे तो भी उन्हें फ़ौरन वैसे ही राष्ट्रद्रोही बनाकर खदेड़ा जाएगा, जैसे हम काँग्रेस मुक्त भारत बनाने और मुसलमानों को पाकिस्तान जाने की धमकियाँ सुनते रहे हैं।

दरअसल, नेपाल को लेकर नरेन्द्र मोदी सरकार की विदेश नीति शुरुआत से ही ग़लत रही। 2014 में सत्ता सम्भालते ही नरेन्द्र मोदी ने हिन्दू बहुल नेपाल को अघोषित तौर पर बीजेपी शासित प्रदेश की तरह देखना शुरू कर दिया। इसीलिए अप्रैल 2015 में नेपाल में आये भीषण भूकम्प के वक़्त नरेन्द्र मोदी और उनके चहेते मीडिया ने मदद और राहत की ऐसे इंवेट वाली कवरेज़ की, जो ब्रान्ड मोदी के लिए भले ही उपयोगी लगे, लेकिन इससे नेपालियों के स्वाभिमान को गहरी चोट लगी। यही सिलसिला मोदी की सभी नेपाल यात्राओं में भी दिखा। इसे नेपालियों ने ऐसे देखा जैसे कोई दोस्ती दिखाने नहीं बल्कि दादागिरी दिखाने और मदद करने नहीं बल्कि भीख देने आया हो।

भारत विरोधी नेपाल का अगला नैरेटिव गरमाया अक्टूबर-नवम्बर 2015 के मधेसियों के आन्दोलन के दौरान। तब नेपाल के पहाड़ी इलाकों में ईंधन और ज़रूरी सामान की भारी किल्लत हो गयी क्योंकि क़रीब दो महीने तक रक्सौल बॉर्डर बन्द रहा। मधेसियों के उस आन्दोलन को भारत ने नेपाल के आन्तरिक मामले की तरह पेश किया, जबकि पहाड़ियों के वर्चस्व वाली देश की राजनीतिक सत्ता ने इसे भारत की मिलीभगत की तरह देखा। उन्हें अपनी संवैधानिक ख़ामियों के अंज़ाम का ठीकरा भारत के सिर पर फोड़ने का मौका मिल गया।

ओली को ये दिखाने का मौका मिल गया कि उन्हें भारत की कोई परवाह नहीं है, क्योंकि वो जिस नेपाल के नेता हैं वो स्वतंत्र राष्ट्र है। जैसे भारत में ‘नया भारत’ का नारा उछाला जाता है वैसे ही वहाँ भी ‘नया नेपाल’ है, जिसे कोई भारत का पिछलग्गू नहीं कह सकता। इसे साबित करने के लिए ओली ने चीन से नज़दीकी बढ़ा ली। फिर जब नेपाल पर चीन का खिलौना बनने का आरोप लगने लगा तो ग़रीब नेपाल में नया राष्ट्रवादी नैरेटिव पैदा हुआ कि नेपाल किसी से डरता नहीं, किसी के दबाव में आकर फ़ैसले नहीं लेता। नेपाली ‘सिर कटा सकता है लेकिन झुका नहीं सकता’ वाले नैरेटिव की माँग थी कि जो नेपाली नेता, भारत को जितना ललकारेगा, जितना धिक्कारेगा, जितना गरियाएगा, उसकी राजनीति उतनी ज़्यादा चमकेगी, क्योंकि लोग उसे ही ज़्यादा सच्चा और ज़बरदस्त नेपाली राष्ट्रभक्त समझेंगे।

दुर्भाग्यवश, भारतीय विदेश नीति ऐसे तमाम नैरेटिव से अंजान बनी रही। भारतीय नेताओं ने नेपाल की चीन से बढ़ती नज़दीकी पर जितना कटाक्ष किया, नेपाली नेताओं को भारत विरोधी तेवर दिखाने का उतना ही ज़्यादा मौका मिलता गया। मसलन, हाल ही में भारतीय थल सेना अध्यक्ष का ये कहना कि हमें मालूम है कि नेपाल किसके इशारे पर चल रहा है? या फिर योगी आदित्यनाथ का वो बयान-वीर वाला तेवर जिसमें वो नेपाल को तिब्बत का उदाहरण देकर चीन से सावधान रहने की बात करते हैं। जबकि कूटनीतिक परम्पराओं के लिहाज़ से जनरल नरवणे और मुख्यमंत्री को ऐसे बयानों से परहेज़ करना चाहिए था। अब इन्हें कौन बताए कि ऐसी नादानियों से नेपाल के भारत विरोधी नैरेटिव को और हवा ही मिली।

दरअसल, ‘नया नेपाल’ के लोग भारत पर अपनी निर्भरता को अपनी बेड़ियाँ नहीं समझना चाहते। जो प्रधानमंत्री ओली आज भारत विरोध का सबसे बड़ा चेहरा हैं, कभी उनकी छवि भारत समर्थक वाली थी। उन्होंने 1996 में नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी से अलग होकर अपनी पार्टी इसलिए बनायी क्योंकि वो भारत और नेपाल के बीच महाकाली नदी जल समझौते के पक्ष में थे जबकि उनके साथी नेता नहीं थे। ये वही नदी है, जिसके पूर्वी तट को भारत, 1816 की सुगौली सन्धि के मुताबिक, नेपाल की सीमा बताता है और जिसके पश्चिमी तट पर कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा जैसे इलाके हैं।

अब सवाल है कि ऐसा क्या हुआ कि कभी भारत समर्थक रहे ओली, अब ज़बरदस्त भारत विरोधी चेहरा बन चुके हैं? ओली का भारत विरोधी नज़रिया 2015 में तब शुरू हुआ, जब नेपाल में संविधान निर्माण की क़वायद के दौरान मधेसियों के आन्दोलन के बीच प्रधानमंत्री पद की दौड़ में ऐन वक़्त पर सुशील कोइराला के ख़िलाफ़ ओली ने ताल ठोंक दी। चुनाव में ओली ने भारत समर्थित माने गये कोइराला को हरा दिया। यहीं से नेपाली राष्ट्रवाद का जो नया नैरेटिव पैदा हुआ, उसके चलते ओली का भारत के प्रति मन बदल चुका था। देखते ही देखते ‘भारत-विरोध’ नेपाल की राजनीति की धुरी बन गयी।

भारतीय विदेश नीति बदलते वक़्त की नब्ज़ को भाँप ही नहीं सकती थी, क्योंकि इससे तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राष्ट्रवाद की वो मान्यताएँ ही ध्वस्त हो जातीं, जो मोदी सरकार की ताक़त का सबसे बड़ा हथकंडा थी। उधर, भूकम्प की त्रासदी से जूझ रही ओली सरकार ने भारत की सीमाएँ बन्द होने की वजह से जो दुश्वारियाँ झेलीं, उसके आगे भारत विरोधी तेवर ही नेपालियों की राजनीतिक मज़बूरी बनता चला गया। अब नेपाल की हरेक आन्तरिक समस्या के लिए भारत को वैसे ही कोसने की राजनीति फल-फूल रही है, जैसे मोदी सरकार की हरेक नाकामी के पीछे पाकिस्तान और कांग्रेस का हाथ होता है।

बहरहाल, अगले साल 2016 में ओली ने भारतीय हितों की अनदेखी करके चीन से ऐसी संधि की जिससे नेपाल को शुष्क बन्दरगाहों, रेल लिंक सहित बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के तहत चीनी इलाकों से जुड़ने का सीधा रास्ता मिल गया। हालाँकि, नेपाल और पाकिस्तान के अलावा भारतीय हितों के ख़िलाफ़ जाकर चीनी कर्ज़ों के जाल में फँसने वाले देशों में बांग्लादेश, श्रीलंका और मालदीव भी शामिल हैं।

अगले साल 2017 में ओली के सामने प्रचंड यानी पुष्प कमल दहल के धड़े की बग़ावत खड़ी हो गयी। ओली ने इसे ‘भारत के इशारे पर’ हुई बग़ावत की तरह पेश किया। ख़ैर, चुनाव में एक बार फिर ओली का भारत विरोधी नेपाली राष्ट्रवाद परवान चढ़ा और उन्हें जीत मिली। इसीलिए सियासी ज़रूरतों की ख़ातिर अब ओली अपनी कट्टर भारत विरोधी छवि के साथ खुलकर सबके सामने डटे हुए हैं। अब वो नेपाल के मोदी बनने की राह पर हैं।

बहरहाल, ओली की राजनीति को, उनके नेपाली राष्ट्रवाद को वक़्त रहते नहीं भाँप पाने का नतीज़ा ये रहा कि नेपाल पर चीन की पकड़ मज़बूत होती चली गयी और भारत का एक पुराना मित्र राष्ट्र इससे बहुत दूर चला गया। ताज़ा सीमा विवाद भले ही दीर्घावधि में नेपाल के लिए अहितकर साबित हो, लेकिन सत्ता की ख़ातिर देश-हित का सौदा करने वाले ओली कोई अकेले राजनेता नहीं हैं।

राष्ट्रवादी आग में झुलस रहे दर्ज़नों देशों में यही हो रहा है। इसीलिए, आपसी विवाद को बातचीत से हल करने की हरेक कोशिश आगामी दशकों तक बेनतीज़ा ही साबित होती रहेगी। क्योंकि राष्ट्रवादी आग को बुझाने से नहीं बल्कि और धधकाने से ही नेपाली पार्टियों की राजनीति चमकेगी। अब तो नेपाल की जो पार्टी भारत के ख़िलाफ़ जितना जहर उगलेगी, उसे जनता का उतना अधिक समर्थन मिलेगा। देश-हित वहाँ भी पार्टी-हित से ऊपर नहीं होगा।

(मुकेश कुमार सिंह स्वतंत्र पत्रकार और राजनीतिक प्रेक्षक हैं। तीन दशक लम्बे पेशेवर अनुभव के दौरान इन्होंने दिल्ली, लखनऊ, जयपुर, उदयपुर और मुम्बई स्थित न्यूज़ चैनलों और अख़बारों में काम किया। अभी दिल्ली में रहते हैं।)

This post was last modified on June 18, 2020 5:54 pm

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