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उत्तरी सीमा पर तनाव और कूटनीतिक चुनौतियां

इधर, कोरोना आपदा के बाद सबसे अधिक चर्चा, भारत के विदेश नीति की हो रही है। इसी के साथ इस बात की भी चर्चा हो रही है कि, हमारा, हमारे पड़ोसियों से मधुर तो छोड़ ही दीजिए, सामान्य संबंध भी क्यों नहीं है। पाकिस्तान के साथ भारत की पुरानी रार है। यह रार आज़ादी के समय से चली आ रही है और चार-चार प्रत्यक्ष युद्धों और निरंतर चलते प्रच्छन्न युद्ध के बावजूद, यह रगड़ा झगड़ा कब तक चलेगा, यह अभी भी तय नहीं है। पर अन्य पड़ोसी मुल्क़ों के साथ हमारे संबंध अच्छे क्यों नहीं हो पा रहे हैं, यह कूटनीति के विशेषज्ञों के लिये चिंता और चिंतन का विषय है।

पिछले लगभग एक माह से भारत चीन और भारत नेपाल के बीच बेहद तल्ख अवसर आये, जिसका न केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अन्य देशों ने भी संज्ञान लिया है, बल्कि भारत में भी सभी राजनीतिक विश्लेषक इस पर अपनी-अपनी समझ से अपनी बात कह रहे हैं। भारत और चीन के बीच ऊपर ऊपर से सभी संबंध भले ही सामान्य रूप में, दिखते हों, पर भारत चीन सीमा विवाद, 1959 से चला आ रहा है। इसका मूल काऱण है चीन द्वारा तिब्बत का बलात, अधिग्रहण और भारत द्वारा दलाई लामा को राजनीतिक शरण देना रहा है।

तिब्बत चीन का भूभाग नहीं रहा है। वह चीन और भारत के बीच एक बेहद कम आबादी के घनत्व का, लेकिन क्षेत्रफल में विशाल, पहाड़ी और बंजर पर्वतीय देश है। यह बौद्ध धर्म का केंद्र और वज्रयान सहित बौद्ध तंत्र का सोया हुआ देश है। आवागमन के कठिन साधन, अनुपजाऊ भूमि तथा दुर्गम पर्वत मालाओं के कारण यह यूरोपीय ताकतों को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल नहीं हुआ। 1948 के बाद जब चीन में कम्युनिस्ट क्रांति हुई तो अपने देश में स्थिरता लाने के बाद, चीन ने तिब्बत की ओर निगाह की और उस पर, बलात कब्ज़ा कर लिया।

तिब्बत में, चीन के खिलाफ कोई बहुत सबल और सुगठित विरोध भी नहीं हुआ। तिब्बत का किसी देश से कोई जुड़ाव भी नहीं था, कि कोई, उसके लिए चीन जैसी उभरती ताक़त से लोहा लेता। तिब्बत आसानी से ड्रैगन के कब्जे में आ गया। नेहरू की तिब्बत नीति की जबरदस्त आलोचना हुई और तिब्बत के चीनी कब्जे पर उनकी चुप्पी एक ऐतिहासिक भूल कही जा सकती है। डॉ. राम मनोहर लोहिया ने इस चुप्पी की आलोचना की, और यह कहा था कि, कैलाश और मानसरोवर दोनों ही भारत के अंग हैं और इन्हें भारत को ले लेना चाहिए।

अब जरा इस पृष्ठभूमि पर भी नजर डालें। तिब्बत के बारे में चीन का तर्क यह है कि तिब्बत उसका अंग था, इसलिए उसने तिब्बत पर अपना अधिकार जमाया है। तिब्बत अपने इतिहास में, लगातार स्वतंत्र राष्ट्र ही रहा है पर, 1906-7 ई. में तिब्बत और नेपाल में युद्ध होने के बाद, चीन ने तिब्बत की तरफ से नेपाल के खिलाफ युद्ध लड़ा और तिब्बत पर अपना अधिकार बना लिया। लेकिन 1912 ई0 में चीन से मांछु शासन का अंत होने के बाद, तिब्बत ने अपने को पुन: स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया। लेकिन चीन तिब्बत पर कब्जे का प्रयास उसके बाद भी करता रहा। 1913 – 14 में तिब्बत पूर्वी और ल्हासा के इर्दगिर्द का तिब्बत, दो भागों में बंट चुका था। पूर्वी भाग जो पंछेन लामा के प्रभाव में था का झुकाव चीन की तरफ था, और मुख्य तिब्बत, दलाई लामा द्वारा शासित था, जो खुद को आज़ाद मानता था।

1948 की कम्युनिस्ट क्रांति के बाद आउटर तिब्बत यानी पूर्वी तिब्बत पर, चीन ने अपना प्रभाव जमा लिया और उसने वहां भूमि सुधार आदि समाजवादी कार्यक्रम शुरू कर दिए। इसके बाद वह दलाई लामा द्वारा शासित तिब्बत की ओर बढ़ा। 1956 एवं 1959 ई में दलाई लामा के तिब्बत में कम्युनिस्ट गतिविधियां तेजी से बढ़ गयीं । चीनी सक्रियता और हस्तक्षेप से किसी प्रकार बचकर दलाई लामा, 1959 में भारत आ गए। भारत ने दलाई लामा को राजनैतिक शरण दी। भारत ने तिब्बत को अलग देश के रूप में तो मान्यता नहीं दी, लेकिन दलाई लामा को राजनैतिक शरण देने से, भारत और चीन के बीच के संबंधों में, जो कटुता आयी वह इस तल्खी और, अविश्वसनीयता भरे सम्बन्धों का मूल कारण है।

चीन के साथ 29 अप्रैल सन् 1954 ई. को भारत ने, तिब्बत संबंधी एक समझौता, किया, जिसे कूटनीति के इतिहास में पंचशील के नाम से जाना जाता है। इस समझौते में इन पाँच सिद्धांतों की अवधारणा की गई ।

● एक दूसरे की प्रादेशिक अखंडता और संप्रभुता का सम्मान करना

● एक दूसरे के विरुद्ध आक्रामक कार्यवाही न करना

● एक दूसरे के आंतरिक विषयों में हस्तक्षेप न करना

● समानता और परस्पर लाभ की नीति का पालन करना तथा

● शांतिपूर्ण सह अस्तित्व की नीति में विश्वास रखना।

25 जून 1954 को चीन के प्रधान मंत्री चाऊ एन लाई भारत की राजकीय यात्रा पर आए और उनकी यात्रा की समाप्ति पर जो संयुक्त विज्ञप्ति प्रकाशित हुई उसमें घोषणा की गई कि वे पंचशील के उपरोक्त पाँच सिद्धांतों का परिपालन करेंगे। लेकिन, सन 1962 में चीन द्वारा भारत पर आक्रमण से इस संधि की मूल भावना को काफ़ी चोट पहुँची। अब यह संधि एक औपचारिकता मात्र है।

दलाई लामा को शरण देने से चीन भड़क गया और उसने भारत पर ही विस्तारवाद का आरोप लगा कर, सितंबर 1959 में मैकमोहन लाइन को मानने से इनकार कर दिया। साथ ही, सिक्किम और भूटान के करीब 50 हजार वर्ग मील के इलाके पर अपना दावा ठोंक दिया। 19 अप्रैल 1960 को तत्‍कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और चाऊ एन लाई के बीच नई दिल्‍ली में मुलाकात हुई। फरवरी 1961 में चीन ने सीमा विवाद पर चर्चा से मना कर दिया और नवम्बर 1962 में उसने लद्दाख और तत्कालीन नॉर्थ-ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी (नेफा) में मैकमोहन रेखा के पार भारत पर आक्रमण कर भारत के बहुत बड़े भूभाग पर कब्जा कर लिया। चीन के इस आक्रमण के कारण द्विपक्षीय संबंधों को एक गंभीर झटका लगा।

उधर, मार्च 1963 को चीन और पाकिस्‍तान में एक समझौता हुआ जिसमें, पाक अधिकृत कश्‍मीर का लगभग 5080 वर्ग किलोमीटर हिस्‍सा, पाकिस्तान ने चीन को दे दिया। फ़िर तो रिश्ते बराबर तल्ख ही बने रहे, यह अलग बात है कि कॉस्मेटिक गर्मजोशी भी बीच-बीच में, दिखती रही।

अब संक्षेप में तब से अब तक का घटनाक्रम समझें।

● 1974 में भारत ने अपना पहला शांतिपूर्ण परमाणु परीक्षण किया तो चीन ने उसका कड़ा विरोध किया।

● अप्रैल 1975 में सिक्किम भारत का हिस्‍सा बना। चीन ने इसका भी विरोध किया।

● अप्रैल 1976 में, चीन और भारत ने पुनः राजदूत संबंधों को बहाल किया। जुलाई में के आर नारायणन को चीन में भारतीय राजदूत बनाया गया। द्विपक्षीय संबंधों में धीरे-धीरे सुधार हुआ।

● फरवरी 1979 में तत्‍कालीन विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने चीन की यात्रा की।

● 1988 में, भारतीय प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने द्विपक्षीय संबंधों के सामान्यीकरण की प्रक्रिया शुरू करते हुए, चीन का दौरा किया। दोनों पक्षों ने “लुक फॉरवर्ड” के लिए सहमति व्यक्त की और सीमा के प्रश्न के पारस्परिक रूप से स्वीकार्य समाधान की बात की।

● 1991 में, 31 साल बाद चीन के सर्वोच्च नेता ली पेंग ने भारत का दौरा किया।

● 1992 में, भारतीय राष्ट्रपति आर वेंकटरमन ने चीन का दौरा किया। वह पहले राष्ट्रपति थे जिन्होंने भारत गणराज्य की स्वतंत्रता के बाद से चीन का दौरा किया।

● सितम्बर 1993 में तत्‍कालीन पीएम पीवी नरसिम्‍हा राव चीन गए।

● अगस्‍त 1995 में दोनों देश ईस्‍टर्न सेक्‍टर में सुमदोरोंग चू घाटी से सेना पीछे हटाने को राजी हुए।

● नवंबर 1996 में चीनी राष्‍ट्रपति जियांग जेमिन भारत आए।

● मई 1998 में भारत के दूसरे परमाणु परीक्षण का भी चीन ने विरोध किया।

● अगस्‍त 1998 में ही लद्दाख-कैलाश मानसरोवर रूट खोलने पर आधिकारिक रूप से बातचीत शुरू हुई।

● जब करगिल युद्ध हुआ तो चीन ने किसी का साथ नहीं दिया। युद्ध खत्‍म होने पर चीन ने भारत से दलाई लामा की गतिविधियां रोकने को कहा ताकि द्विपक्षीय संबंध सुधरें।

● नवम्बर 1999 में सीमा विवाद सुलझाने के लिये, भारत-चीन के बीच दिल्‍ली में बैठकें हुईं।

● जनवरी 2000 में 17 वें करमापा ला चीन से भागकर धर्मशाला पहुंचे और दलाई लामा से मिले। बीजिंग ने चेतावनी दी कि करमापा को शरण दी गई तो ‘पंचशील’ का उल्‍लंघन होगा। दलाई लामा ने भारत को चिट्ठी लिख कर करमापा के लिए सुरक्षा मांगी।

● 1 अप्रैल 2000 को भारत और चीन ने राजनयिक सम्बन्धों की 50वीं वर्षगाँठ मनाई।

● जनवरी 2002 में चीनी राष्‍ट्रपति झू रोंगजी भारत आए।

● 2003 में, भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने चीन का दौरा किया। दोनों पक्षों ने चीन-भारत संबंधों में सिद्धांतों और व्यापक सहयोग की घोषणा पर हस्ताक्षर किए, और भारत-चीन सीमा प्रश्न पर विशेष प्रतिनिधि बैठक तंत्र स्थापित करने पर सहमत हुए।

● अप्रैल 2005 में तत्‍कालीन चीनी राष्‍ट्रपति वेन जियाबाओ बंगलुरू आए।

● 2006 में नाथू ला दर्रा खोला गया जो कि 1962 के युद्ध के बाद से बन्द था।

● 2007 में चीन ने अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री को यह कह कर वीजा नहीं दिया था कि अपने देश में आने के लिए उन्‍हें वीजा की जरूरत नहीं है।

● 2009 में जब तत्‍कालीन पीएम मनमोहन सिंह अरुणाचल गए तो चीन ने इस पर भी आपत्ति जताई।

● जनवरी 2009 को मनमोहन चीन पहुंचे। दोनों देशों के बीच व्‍यापार ने 50 बिलियन डॉलर का आंकड़ा पार किया।

● नवंबर 2010 में चीन ने जम्‍मू-कश्‍मीर के लोगों के लिए स्‍टेपल्‍ड वीजा जारी करने शुरू किए।

● अप्रैल 2013 में चीनी सैनिक एलएसी पार कर पूर्वी लद्दाख में करीब 19 किलोमीटर घुस आए। भारतीय सेना ने उन्‍हें खदेड़ा।

● जून 2014 में चीन के विदेश मंत्री वांग यी भारत आये।

● जुलाई 2014 में भारतीय सेना के तत्‍कालीन चीफ विक्रम सिंह तीन दिन के लिए बीजिंग दौरे पर गए थे।

● उसी महीने ब्राजील में हुई ब्रिक्स देशों की बैठक में पीएम मोदी और चीनी राष्‍ट्रपति शी जिनपिंग की पहली मुलाकात हुई। दोनों ने करीब 80 मिनट तक बातचीत की थी।

● सितंबर 2014 में शी जिनपिंग भारत आए। नरेन्द्र मोदी ने प्रोटोकॉल तोड़कर अहमदाबाद में उनका स्‍वागत किया था। चीन ने पांच साल के भीतर भारत में 20 बिलियन डॉलर से ज्‍यादा के निवेश का वादा किया।

● फरवरी 2015 में सुषमा स्वराज ने चीन की यात्रा की और शी जिनपिंग से मिलीं।

● मई 2015 में प्रधानमंत्री मोदी का पहला चीन दौरा हुआ।

● अक्‍टूबर में जिनपिंग और मोदी की मुलाकात ब्रिक्स देशों की बैठक में हुई।

● जून 2017 में भारत को शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन (SCO) का पूर्ण सदस्‍य बनाया गया। मोदी ने जिनपिंग से मुलाकात की और इसके लिए उनका धन्‍यवाद किया।

● 2018-19 में राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने वुहान, चीन और महाबलीपुरम, भारत में भारतीय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के साथ एक अनौपचारिक बैठक की।

भारत चीन की सीमा के बारे में अक्सर मैकमहोन लाइन की बात आती है। हिमालय भारत की स्वाभाविक रूप से उतर दिशा की सीमा रही है, जिसे कालिदास ने अपने कुमार सम्भव में इस प्रकार से कहा है,

” अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः।

पुर्वापरौ तोयनिधी वगाह्य स्थितः पृथिव्या इव मानदण्डः॥१॥”

लंबे समय तक हिमालय, अल्लामा इकबाल के शब्दों में, ‘यह संतरी हमारा, यह पासबाँ’ हमारा रहा है। पर 1962 में जब पूर्वी दिशा से पहला विदेशी हमला हुआ तो हिमालय अलंघ्य नहीं रहा।

आज जो सीमा रेखा पूर्वी-हिमालय क्षेत्र के चीन एवं भारत के क्षेत्रों के बीच सीमा निर्धारित करती है, वह मैकमहोन रेखा कहलाती है। यही सीमा-रेखा 1962 के भारत चीन युद्ध का केन्द्र एवं कारण भी है। मैकमोहन रेखा भारत और तिब्बत के बीच की सीमा रेखा है, जो सन् 1914 में भारत की तत्कालीन ब्रिटिश सरकार और तिब्बत के बीच शिमला समझौते के बाद अस्तित्व में आई थी। लेकिन यह बस एक सीमा रेखा ही बनी रही।

1935 में ओलफ केरो नामक एक अंग्रेज प्रशासनिक अधिकारी ने तत्कालीन अंग्रेज सरकार को इसे आधिकारिक तौर पर लागू करने का अनुरोध किया, तब जाकर, 1937 में सर्वे ऑफ इंडिया के एक मानचित्र में मैकमहोन रेखा को आधिकारिक भारतीय सीमारेखा के रूप में प्रदर्शित किया गया। सर हैनरी मैकमहोन भारत की तत्कालीन अंग्रेज सरकार के विदेश सचिव थे। हिमालय से होती हुई यह सीमारेखा पश्चिम में भूटान से 890 किमी और पूर्व में ब्रह्मपुत्र तक 260 किमी तक फैली है।

भारत के अनुसार, चीन के साथ हमारी सीमा तो यही है, पर चीन 1914 के शिमला समझौते को मानने से इनकार करता है, और इस रेखा को नहीं मानता है। चीन का कहना है कि ब्रिटिश का जो समझौता तिब्बत के साथ हुआ था, वह गलत है, क्योंकि, तिब्बत एक संप्रभु देश नहीं था। लेकिन, चीन का यह कहना सही नहीं है कि, तिब्बत के पास समझौते करने का कोई अधिकार नहीं था। चीन अपने आधिकारिक मानचित्रों में मैकमहोन रेखा के दक्षिण में 56 हजार वर्ग मील के क्षेत्र को तिब्बती स्वायत्त क्षेत्र का हिस्सा बताता है। 1962 के भारत-चीन युद्ध के समय चीनी फौजों ने कुछ समय के लिए इस क्षेत्र पर अधिकार भी जमा लिया था, पर अब कुछ पर चीन अब भी काबिज है। चीन की इसी ज़िद के कारण ही वर्तमान समय तक इस सीमारेखा पर विवाद यथावत बना हुआ है, लेकिन भारत-चीन के बीच भौगोलिक सीमा रेखा के रूप में मैकमहोन रेखा को ही आधार माना जाता है।

तो, यह है, भारत चीन सीमा विवाद और तनाव की पृष्ठभूमि। चीन के साथ तनाव का एक इतिहास तो है, पर नेपाल के साथ सीमा विवाद की बात पहली बार तब उठी जब हाल ही में, हमने कैलाश मानसरोवर की सुगम तीर्थयात्रा के लिये लिपुलेख के पास से एक सड़क बनानी शुरू कर दी। चीन की तरह ही ब्रिटिश सरकार ने 1816 में, नेपाल के साथ, भारत नेपाल सीमा निर्धारण हेतु, सुगौली में एक संधि की थी और उससे जो सीमा बनी, वह अब तक दोनों ही देशों के लिये मान्य रही है। पर इधर नेपाली संसद ने एक नया नक़्शा स्वीकृत और जारी करके, भारत नेपाल की सीमा पर एक नये विवाद को जन्म दे दिया है।

बात अगर सीमा के नक्शे तक ही होती तो उतनी गम्भीर नहीं होती, पर हाल ही में सीतामढ़ी के पास नेपाल के शस्त्र बल ने गोली चलाई और एक भारतीय नागरिक की मृत्यु हो गयी। लखीमपुर खीरी जिले में भारत नेपाल सीमा पर नो मैन्स लैंड पर सीमा निर्धारण के खम्बे उखाड़ दिए गए हैं और उस पर खेती नेपाल के लोग करने लगे हैं । भारत नेपाल सीमा के रख रखाव की जिम्मेदारी, एसएसबी की है तो यह सवाल एसएसबी की कार्यकुशलता पर भी उठता है।

नेपाल के साथ हमारा सांस्कृतिक, धार्मिक और आत्मीय संबंध बहुत पहले से ही रहा है। लेकिन चीन के विस्तारवादी स्वरूप ने, नेपाल में दिलचस्पी लेना, तिब्बत पर कब्जे के बाद ही शुरू कर दिया था। चीन की दिलचस्पी न केवल, नेपाल में बल्कि उसकी दिलचस्पी श्रीलंका, मालदीव और बांग्लादेश में भी है। वह भारत को उसके पड़ोसियों से अल-थलग कर देना चाहता है। अब इसका कूटनीतिक उत्तर क्या हो यह हमारे नीति नियंताओं को सोचना होगा। नेपाल अपनी कई ज़रूरतों के लिए फिलहाल भारत पर निर्भर है लेकिन वह लगातार भारत पर अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश भी कर रहा है।

साल 2017 में नेपाल ने चीन के साथ अपनी बेल्ट एंड रोड परियोजना के लिए द्विपक्षीय सहयोग पर समझौता किया था और क्रॉस-बॉर्डर इकोनॉमिक ज़ोन बनाने, रेलवे को विस्तार देने, हाइवे, एयरपोर्ट आदि के निर्माण कार्यों में मदद पहुंचाने पर भी सहमति जताई थी। नेपाल के कई स्कूलों में चीनी भाषा मंदारिन का पढ़ाया जाना भी अनिवार्य कर दिया गया है जिसका व्यय चीन की सरकार उठा रही है। हालांकि, नेपाल के क़रीब जाने की कोशिश अकेले चीन ने ही नहीं बल्कि, अमरीका भी अपनी, अमरीका इंडो-पैसिफ़िक नीति के अनुसार कर रहा है । इसी साल जून में अमरीकी रक्षा विभाग ने इंडो-पैसिफ़िक स्ट्रैट्जी रिपोर्ट (आईपीएआर) प्रकाशित की है। इस रिपोर्ट में नेपाल के बारे में लिखा गया था, ”अमरीका नेपाल के साथ अपने रक्षा सहयोगों को बढ़ाना चाहता है. हमारा ध्यान आपदा प्रबंधन, शांति अभियान, ज़मीनी रक्षा ताक़त को बढ़ाने और आतंकवाद से मुक़ाबला करने पर है.”

हालांकि इसके जवाब में नेपाल सरकार ने कहा था कि नेपाल कोई भी ऐसा सैन्य गठबंधन नहीं करेगा जिसका निशाना चीन पर होगा।

हाल के दिनों की घटनाएं, जो लद्दाख क्षेत्र में, गलवां नदी और पयोग्योंग झील के पास आठ छोटे-छोटे पहाड़ी शिखरों, जिसे फिंगर्स कहा जाता है, तक भारत और चीन की साझी गश्ती टुकड़ियों के गश्त बीट के क्षेत्र के विवाद के रूप में सामने आयी हैं। यहां पर सीमा निर्धारित नहीं है। हम कभी फिंगर 8 तक तो वे कभी फिंगर 8 से कुछ भीतर तक आ जाते रहे हैं। लेकिन इस बार यह मामला, गश्ती दल का रूटीन गश्त नहीं बल्कि 7,000 चीनी सैनिकों के जमावड़े की बात है। डिफेंस एक्सपर्ट, अजय शुक्ल ने ट्वीट और लेख लिख कर बताया कि चीनी सेना हमारी सीमा में 8 से 10 किलोमीटर तक अंदर चली आयी। लेकिन इस सीमोल्लंघन पर, न तो मीडिया में देशभक्ति का ज्वार उमड़ा और न ही सरकार के प्रवक्ताओं का। 6 जून को दोनों ही सेना के जनरल अफसरों की फ्लैग मीटिंग हुई और कहा जा रहा है कि चीन की सेना कुछ पीछे हटी है। लेकिन अभी भी यह तय नहीं है कि स्थिति बिल्कुल पूर्ववत हो गयी है या नहीं।

चार कदम अंदर, फिर दो कदम पीछे, फिर भी दो कदम तो बचेगा ही। चीन के घुसपैठ का यह सिद्धांत है। चीन का ढाई किलोमीटर पीछे खिसक जाना खुशी की बात है, पर यह खबर किसी अधिकृत सरकारी अफसर यानी रक्षा मंत्रालय या भारतीय सेना ने दी है या यह सूत्र वाक है ? द टेलीग्राफ ने इसे एएनआई को मिले किसी सूत्र के हवाले से दी गयी खबर बताया है। कुछ सवाल अब भी अनुत्तरित हैं।

● चीन हमारी सीमा में कहाँ तक आ गया था और अब वह कहां तक वापस चला गया है ?

● फिंगर 8 तक हमारी गश्त जाती थी, कभी-कभी, और वह भी फिंगर 8 पार कर 6 तक आ जाता था। इस बार वह फिंगर 4 तक आ गया है तो अब वह कितना पीछे तक गया है ?

● फिंगर 8 तक क्या हमारी गश्त अब बेरोकटोक जा सकती है ?

● खबर है कि 60 वर्ग किलोमीटर ज़मीन उसके कब्जे में आ गयी है। कितनी ज़मीन उसने हमारी खाली कर दी ?

● क्या चीन ने गलवां नदी और पयोग्योंग झील के पास से अपना कब्जा हटा लिया है ?

● चीन की पीएलए के 7000 सैनिक इस समय वहां हैं और उन्होंने वहां बंकर भी बनाने शुरू कर दिए हैं। अब क्या स्थिति है ?

● जब सीमा निर्धारण ही तय नहीं है और दोनों ही देशों की सैनिक टुकड़ियां इधर उधर कभी हम फिंगर 8 तक तो वे फिंगर 6 तक आते जाते हैं तो फिर यह बंकर आदि और इतना सघन सैन्यीकरण क्यों चीन की तरफ से किया जा रहा है ?

जिस तरह साल 1999 में कारगिल में पाकिस्तानी सेना ने घुसपैठ कर सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण ठिकाने पर कब्जा कर लिया था, लगभग, वैसा ही 2020 में चीन लद्दाख में कर रहा है। करगिल के समय भी हम गाफिल रहे, बाद में चैतन्य हुए पर चीन के इस घुसपैठ पर एक असहज चुप्पी क्यों है ? चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने गलवां नदी और पयोग्योंग झील के किनारे वाले इलाक़े को अपने कब्जे में ले लिया है। भारत ने  दार्बुक-शायोक-दौलतबेग ओल्डी में सभी मौसम में काम करने वाली पक्की सड़क बना ली है। लेकिन अभी चीन के सैनिक जहाँ जमे हुए हैं, वह इस सड़क से सिर्फ 1.50 किलोमीटर दूर है।

गलवां घाटी में यह वह जगह है, जहाँ गलवां नदी में शायोक नदी आकर मिलती है। पीएलए की रणनीति साफ़ है, वह इस इलाक़े पर कब्जा कर चुकी है और वहाँ से हटना नहीं चाहती है। चीन की यह पुरानी और बेहद आजमाई हुयी विस्तारवादी रणनीति है। पहले वह अधिक दूर तक घुसपैठ करता है फिर वह खुद को शांति प्रिय दिखाने के लिये आधा हिस्सा खाली कर के पीछे चला जाता है और तब भी उसके पास कुछ न कुछ इलाक़ा दबा ही रहता है। 1962 में वह तेजपुर तक आ गया था, फिर पीछे हटता गया और अब भी उसके पास नेफा आज के अरुणांचल प्रदेश का अच्छा खासा भाग कब्जे में है।

भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर एक प्रोफ़ेशनल कूटनीतिज्ञ रहे हैं और वे कूटनीति की सभी पेचीदगियों को समझते हैं। पर वे अराजनीतिक व्यक्ति हैं और प्रोफ़ेशनल डिप्लोमेसी में जो पोलिटिकल एजेंडा का तड़का लगता है उसके वह शायद आदी न हों। भारत सरकार को अपने कूटनीतिक कदमों की समीक्षा करनी चाहिए। नेपाल के साथ हमारा संबंध पूर्ववत हो जाए, यह बहुत ज़रूरी है। भाजपा के ही सांसद डॉ सुब्रमण्यम स्वामी ने एक बात बहुत स्पष्ट शब्दों में कही कि, हमें अपनी विदेश नीति की रिसेटिंग करनी होगी, यानी एक गम्भीर समीक्षा आवश्यक है।

( विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

This post was last modified on June 17, 2020 8:39 am

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