Saturday, October 23, 2021

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चार ट्वीट्स से समझें अफगानिस्तान पर हिन्दुस्तान में बेचैनी क्यों?

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अफगानिस्तान के संकट को लेकर हिन्दुस्तान बेचैन है। इस बेचैनी के कई आयाम हैं। कई किस्म की बेचैनियों का उदाहरण बन रहा है भारत। बेचैनियों की ये अलग-अलग वजहें एक-दूसरे से तकरार को या तो जन्म दे रही हैं या फिर तकरार के ये कारण पहले से इस धरती पर मौजूद हैं और अब अफगान संकट के बहाने सामने आ रही हैं। चार अलग-अलग ट्वीट्स के जरिए अफगानिस्तान के संकट और उस संदर्भ में भारत में बेचैनी को समझने की कोशिश करते हैं।

अफगानों को शरण देने में क्या सीएए है बाधक?

मशहूर लेखिका तवलीन सिंह ने पूछा है कि क्या जानलेवा, बर्बर तालिबान से भाग रहे अफगान मुसलमानों को भारत में शरण दी जाएगी? जो महिलाएं पत्थरों या सिर कलम किए जाने की स्थितियों से बचकर शरण मांग रही हैं उनके लिए क्या भारत के दरवाजे खुले हैं? या फिर सीएए यानी नागरिकता संशोधन कानून इस पर रोक लगाता है।

तवलीन सिंह का ट्वीट मोदी सरकार की उस सोच पर सवाल है जो सीएए कानून लाए जाते वक्त पड़ोसी देशों के लोगों को नागरिकता देने से जुड़ी है। गृहमंत्री अमित शाह ने साफ किया था कि किसी इस्लामिक देश में मुसलमानों का उत्पीड़न नहीं हो सकता। लिहाजा मुसलमानों को छोड़कर बाकी धर्म के लोगों को अल्पसंख्यक होने की वजह से उत्पीड़न के आधार पर भारत में नागरिकता दी जानी चाहिए।

अफगानिस्तान की घटना बताती है कि तालिबानियों के नेतृत्व में शरीअत का कानून लागू होने से पहले ही लोग देश छोड़ने को उतावले हैं। राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति समेत आला नेतृत्व रातों-रात देश छोड़कर भाग चुका है। और, हवाई अड्डों पर देश छोड़ने के लिए हो रही भगदड़ वाली तस्वीर भयावह है। कहने की जरूरत नहीं है कि देश छोड़ने की चाहत रखने वाले लोगों के रिश्ते भारत से अच्छे रहे हैं और तालिबान से ख़राब। सवाल यह है कि क्या मानवीय संवेदना के आधार पर भी इन अभागे लोगों को भारत में शरण नहीं मिलना चाहिए?

तालिबान का विरोध भारत में देशभक्ति की शर्त क्यों हो?

पत्रकार राणा अय्यूब ने लिखा है कि उन्हें उल्लिखित हर तीसरे ट्वीट में तालिबान की ओर से माफी मांगने या उनकी निंदा करने के लिए कहा जा रहा है। सरकारी संरक्षण में बर्बरता का साथ दे रहे लोग हमारी देशभक्ति की परीक्षा ले रहे हैं। ऐसे लोगों के लिए राणा अय्यूब ने लिखा है- दफा हो जाओ।

हिन्दुस्तान में तालिबान कभी लोकप्रिय नहीं रहा। उसने अजहर मसूद जैसे आतंकियों को भारत की जेल से आज़ाद कराने में भूमिका निभाई। उसका स्त्री विरोधी रुख, कट्टरता आदि को भारतीय पसंद नहीं करते। फिर भी संभव है कि मुट्ठीभर लोग तालिबान के समर्थक भी हों। मगर, इसका मतलब यह नहीं है कि हर मुसलमान को भारत में तालिबान समर्थक या विरोधी की कसौटी पर आंका जाए। तालिबान की निंदा या प्रशंसा हममें से किसी का मत हो सकता है लेकिन यह देशभक्ति या गद्दार तय करने का मानक नहीं हो सकता। राणा अय्यूब ने अपनी बात तीन लफ्जों में कह दी है।

मुस्लिम देश क्यों न शरण दें अफगानियों को?

हिन्दुस्तान के एक आम नागरिक का ट्वीट है, जिसकी प्रोफाइल यह नहीं बताती कि वह किसी संगठन से जुड़ा हुआ है, कि दुनिया में 195 देश हैं जिनमें 57 इस्लामिक हैं लेकिन अफगानी सांसदों और नागरिकों को शरण देने के लिए भारत सरकार ही आगे क्यों आए? वे आगे लिखते हैं कि फिर भी भारतीय मुस्लिम सोचते हैं कि वे असुरक्षित हैं!  वे फिलीस्तीनियों का समर्थन कर रहे थे और अब तालिबान की जीत का जश्न मना रहे हैं!

निश्चित रूप से आम नागरिक का यह ट्वीट यह अपेक्षा रखता है कि संकट की घड़ी में इस्लामिक देशों को आगे आना चाहिए और तालिबान के निशाने पर आए या आ सकने वाले लोगों का बचाव करना चाहिए। दुनिया में दूसरी बड़ी आबादी वाले भारत के लोगों की यह चिंता आम है जो पहले से शरणार्थियों का बोझ ढोए चला आ रहा है। यह चिंता भी भारतीय राजनीति का अभिन्न हिस्सा है। यही वजह है कि लोग टकटकी लगाकर अफगानी शरणार्थियों के बारे में भारत सरकार के स्पष्ट रुख का इंतज़ार कर रहे हैं।

तालिबान के बजाए इस्लाम से डर रहे हैं लोग?

चौथा ट्वीट भारत के नागरिक का नहीं है। यह बांग्लादेश से निष्कासित और निर्वासित जीवन जी रही लेखिका तस्लीमा नसरीन का है। वह खुद भी मुसलमान हैं और शरणार्थी या निर्वासित होने की पीड़ा को भी समझती हैं। लिहाजा तस्लीमा नसरीन का ट्वीट बहुत महत्वपूर्ण है।

तस्लीमा नसरीन ने ट्वीट कर यह बताना चाहा है कि अफगानिस्तान में तालिबान के आने के बाद लोग डरे हुए हैं और डरकर भाग रहे हैं क्योंकि उन्हें इस्लाम से डर लगता है जो एक धर्म या संहिता के रूप में क्रूर और स्त्री विरोधी है। तस्लीमा ने लिखा है कि तालिबान ने अपने नियम नहीं बनाए हैं। वे सिर्फ शुद्ध इस्लामी नियम ही लागू करते हैं। फिर भी क्यों हजारों अफगान तालिबान शासन से भागने की कोशिश कर रहे हैं?

तस्लीमा ने जो सवाल उठाया है वह आम मुसलमानों के लिए जहां बेचैनी की बात है वहीं भारत में मुस्लिम विरोध की सियासत कर रहे लोगों के लिए एक अवसर भी बनाता है। हर धर्म खुद को दूसरे से बेहतर बताता है। यही वजह है कि जब कभी भी धर्म सियासत को संचालित करने लगता है तो दूसरे धर्म के लोगों के लिए यह चिंता का सबब बन जाता है। हालांकि यह खुद उस धर्म के लोगों के लिए भी चिंता का सबब होना चाहिए जो कट्टरता की आड़ में नागरिक अधिकारों का हनन करने को ही कानून समझ लेता है।

अफगानिस्तान में अगर शरीअत के नाम पर शासन चलाते हुए महिलाओं के अधिकारों को रौंदा जाने वाला है तो इससे उन लोगों को इसकी निन्दा करने का अधिकार कैसे मिल जाता है जो खुद दूसरों के खान-पान और पहनावे आदि को तय करने में दिन रात जुटे हुए हैं? फिर भी ऐसी प्रतिक्रियाएं हो रही हैं और होंगी। अफगानिस्तान में जो कुछ घटित हो रहा है उसे न भारत सरकार और भारतीय रोक सकते हैं और न ही प्रभावित करने की स्थिति में हैं। मगर, वहां घट रही घटनाएं हमें प्रभावित नहीं करेंगी ऐसा नहीं हो सकता।

(प्रेम कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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