Wednesday, October 27, 2021

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आजादी बाद पहली बार इतनी बड़ी संख्या में महिलाएं हैं देश भर की सड़कों पर

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आजादी के बाद देश में पहली बार इतनी बड़ी संख्या में महिलाएं सड़कों पर उतरी हैं। यह सभी एनआरसी-सीएए कानून की मुखालफत कर रही हैं। कहीं पुरुष विकल्प न होने की सूरत में अनपढ़ गृहणियां तो कहीं पुरुषों के होने के बावजूद आत्मविश्वास से भरी साक्षर स्त्रियां आगे बढ़कर विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व कर रही हैं।

इन विरोध प्रदर्शनों में लड़कियों ने ऐसे अलहदा तरीके अपना कर अपना एकल प्रतिरोध दर्ज करवाया, जिससे मीडिया और सरकार द्वारा बनाए गए मिथक टूटते नजर आए। जैसे जंतर मंतर पर बैरिकेड पर बैठी एक लड़की ने अपने हाथों से एक पोस्टर डिस्प्ले किया। इसमें लिखा था, “शर्मा जी की लड़की भी यहां है आप कहां हैं?”

इस तरह लड़की ने विरोध आंदोलन को मुस्लिम समुदाय का विरोध से निकाल कर हिंदू सवर्ण तक विस्तार दिया। वहीं इंदुलेखा की एक तस्वीर बहुत वायरल हुई, जिसमें वो हिजाब पहनकर प्रधानमंत्री मोदी को पहचान करने की चुनौती दे रही थीं। स्त्रियों के नेतृत्व वाले एनआरसी-सीएए विरोधी आंदोलनों पर एक नज़र…

बदायूं और संभल में स्त्रियां सम्हाल रही हैं विरोध प्रदर्शन
उत्तर प्रदेश के बदायूं और संभल जिले में मुस्लिम समुदाय के हजारों पुरुषों को संगीन धाराओं में गिरफ़्तार करके जेलों में भेज दिया गया है, और कई के खिलाफ़ बलवा, आगजनी, सरकारी संपत्ति के नुकसान समेत कई गंभीर धाराओं में गिरफ्तारी का वारंट जारी किया गया है। कई लोगों के पोस्टर बनाकर चौक-चौराहों पर अपराधी बनाकर टांग दिया गया। इसके चलते बदायूं और संभल जिले पुरुष प्रदर्शनकारियों से खाली हैं।

ऐसी स्थिति में विरोध का मोर्चा जिले की गृहिणी स्त्रियां सम्हाल रही हैं। वो आगे बढ़कर अपने अधिकारों की लड़ाई का नेतृत्व कर रही हैं और उसमें भाग ले रही हैं। स्त्रियों के नेतृत्व का एक फायदा ये हो रहा है कि जो गृहणियां कभी बाहर नहीं निकलती थीं वो भी पोस्टर बैनर लेकर विरोध प्रदर्शन का सिलसिला आगे बढ़ा रही हैं। जिन स्त्रियों के बच्चे छोटे हैं वो उन्हें भी साथ लेकर जुलूस में शामिल हो रही हैं। 

मुंबई में स्त्रियों की अगुवाई में हुआ विरोध प्रदर्शन
27 दिसंबर को मुंबई के आज़ाद मैदान में महिलाओं की अगुवाई में सीएए-एनआरसी के विरोध में भारी जनसमूह ने भाग लिया। प्रदर्शन के दौरान अगली कतार में खड़ीं स्त्रियां अपने परंपरागत हिजाब पहने हुए थीं और उनके हाथों में तिरंगा और बैनर पोस्टर था। ये अपने आप में अद्भुत था। लाखों लोग स्त्रियों के नेतृत्व में मुंबई के आजाद पार्क में जुटे और संविधान बचाने की प्रतिज्ञा ली और एक स्वर में संविधान की प्रस्तावना का पाठ किया। 

बैंग्लोर में पुरुष प्रदर्शनकारियों के चारों ओर घेरा बनाकर स्त्रियों ने प्रदर्शन किया। बेंग्लूरु में भाजपा की सरकार है। और यूपी पुलिस की ही तरह कर्नाटक पुलिस भी कहर बरपा रही थी। मैंग्लोर में चार लोग कर्नाटक पुलिस की गोली का निशाना बने थे। कर्नाटक में किसी भी कीमत पर प्रदर्शन नहीं करने दिया जा रहा था।

विशेषकर पुरुष प्रदर्शनकारियों को पुलिस की बर्बरता का शिकार होना पड़ रहा था। ऐसे में स्त्रियों और लड़कियों ने मिलकर एक नायाब तरीका निकाला। उन्होंने पुरुष प्रदर्शनकारियों को चारों ओर से घेरकर एक घेराबंदी तैयार कर ली और इस तरह चारों ओर से स्त्रियां थीं और बीच में पुरुष ताकि कर्नाटक पुलिस पुरुष प्रदर्शनकारियों को कोई नुकसान न पहुंचा सकें। उन्होंने इस तरह से यह साबित कर दिया कि आपकी आवाज को कोई दबा नहीं सकता है। 

जामिया की लड़कियों ने शुरू किया था विरोध का सिलसिला
जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी की छात्राओं ने सीएए-एनआरसी के खिलाफ़ अभियान शुरू किया था। जो दिल्ली पुलिस के दमन का शिकार होकर चिंगारी की तरह देश विदेश के तमाम यूनिवर्सिटी कैंपस में फैल गया। जामिया में एक छात्र को बर्बरता पूर्वक पीटती दिल्ली पुलिस के आगे तनकर खड़ी हुई आयशा रेना और लदीदा फरजाना की आईकॉनिक तस्वीर आंदोलन की प्रतीक तस्वीर बन गई। 

असम में स्त्रियों, लड़कियों की अगुवाई में निकल रहा विरोध प्रदर्शन और मशाल जुलूस 
नागरिकता संशोधन एक्ट (CAA) के खिलाफ पूर्वोत्तर में लगातार प्रदर्शन जारी है। इसका सबसे ज्यादा असर असम में दिखाई पड़ रहा है, इस बार विरोध प्रदर्शन की खास बात भी है। असम में जारी प्रदर्शन की अगुवाई महिलाएं कर रही हैं, जिसमें हर तबके की महिलाएं शामिल हैं। असम के कई क्षेत्रों की युवा, छात्राएं, फिल्म स्टार, डॉक्टर, सरकारी कर्मचारी और गृहिणियां इस कानून के खिलाफ सड़कों पर उतर रही हैं।

राज्य में जो प्रदर्शन हो रहे हैं, कई बार ऐसा भी देखने को मिला है कि महिलाओं की संख्या ने पुरुषों को पछाड़ दिया है। असम की छात्राओं की अगुवाई में एक मशाल जुलूस भी निकाली गया है और मानव चैन बनाकर भी प्रोटेस्ट किया।

असम फिल्मों की स्टार बरशा रानी भी नागरिकता संशोधन एक्ट के खिलाफ अधिकतर विरोध प्रदर्शनों में शामिल हुई हैं, उनका कहना है, “ये कानून असम की अस्मिता को नुकसान पहुंचाता है। आज हर असमी इस कानून के खिलाफ सड़कों पर है। असम में धर्म के आधार पर कोई बंटवारा नहीं है, लेकिन अब धर्म के आधार पर विदेशी लोग भारत की नागरिकता के लिए अप्लाई करेंगे। बांग्लादेशी हिंदू यहां आएंगे और हम अपनी भाषा, पहचान को खो बैठेंगे।”

कपड़े से पहचान वाले बयाने के बाद प्रोटेस्ट के लिए हिजाब पहनने लगी लड़कियां 
प्रधानमंत्री मोदी के कपड़े से पहचान वाले बयान के बाद स्त्रियां और लड़कियां हिजाब पहनकर प्रोटेस्ट करने लगीं। यहां ध्यान देने की बात ये भी है कि प्रोटेस्ट के लिए हिजाब पहनने वाली लड़कियां सिर्फ़ मुस्लिम समुदाय की नहीं थीं, बल्कि कई हिंदू लड़कियां भी प्रोटेस्ट के लिए हिजाब पहनने लगी।

एर्नाकुलम के गवर्नमेंट लॉ कॉलेज में प्रथम वर्ष की छात्रा इंदुलेखा पार्थन कहती हैं कि उन्होंने जिस दिन से नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) और भारत के राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनसीआर) के बारे में सुना था, इंदुलेखा पार्थन उनके खिलाफ विरोध प्रदर्शन में शामिल होना चाहती थीं। जब उसने सुना कि एक छात्र समुदाय द्वारा कोच्चि में एक प्रदर्शन होने जा रहा है, जिसमें 15 से अधिक कॉलेजों के छात्र शामिल होने वाले हैं तो वो छात्रों के साथ आंदोलन में शामिल हुई।

वो प्रधानमंत्री के कपड़े वाले बयान से आहत थीं, इसलिए उन्होंने विरोध प्रदर्शन के लिए अनोखा उपाय निकाला। वो हिजाब पहनकर एक प्लेकार्ड के साथ विरोध प्रदर्शन में शामिल हुईं। इंदुलेखा ने अपने उस प्लेकॉर्ड में लिखा था, “Mr. Modi I am Indulekha identify me by my DRESS? (मिस्टर मोदी, मैं इंदुलेखा हूं। मुझे मेरे पहनावे से पहचानिए?)” 

एमए राजनीति विज्ञान की छात्रा शकीना कहती हैं, “हम अपनी पहचान जाहिर करने के लिए हिजाब पहनकर विरोध प्रदर्शन में शामिल होती हैं।” तो क्या आप सिर्फ़ मोदी टीम को चिढ़ाने के लिए हिजाब पहनकर प्रदर्शन में शामिल होती हैं? यह पूछने पर शकीना कहती हैं, “नहीं, हर्गिज़ नहीं। हम दरअसल अपनी पहचान के साथ अपनी राष्ट्रीयता को रिक्लेम करने के लिए हिजाब पहनकर शामिल होती हैं। हमारे पूर्वजों ने 1947 में इस देश को अपना देश चुना था और हम उनके वंशज इस मुस्लिम-विरोधी कानून के खिलाफ़ प्रदर्शन करके अपने पहचान के साथ अपने राष्ट्र को पुनः क्लेम कर रहे हैं।” 

फेमिनिस्ट संजीव चंदन कहते हैं, “यह घटना अपने को फ़ॉर ग्रांटेड इस राष्ट्र का नागरिक मानने वालों के लिए एक सबक है कि सिर्फ ‘वंदे मातरम’ चिल्लाने और पूरे तौर पर उसे अशुद्ध गाने भर से कोई राष्ट्रवादी नहीं होता। सड़कों पर विभेदकारी कानूनों के खिलाफ़ हिंदुस्तान के पक्ष में नारे लगाते और तिरंगा और संविधान के साथ जुनूनी जोश से भरे लोग भी राष्ट्रवादी हैं।

सत्ता और पुलिस का रवैया इस मायने में राष्ट्रद्रोही है कि वे इन प्रदर्शनकारियों पर शत्रु नागरिक के भाव में डंडे बरसा रही हैं। ऐसा जामिया में डंडे चलाते वक़्त उनके द्वारा दी जा रही गालियों से स्पष्ट समझा जा सकता है या इससे भी कि प्रदर्शनकारियों को लेकर प्रधानमंत्री की कुर्सी के लिए चुना गया व्यक्ति क्या भाव रखता है- उन्हें उनके कपड़ों से किस तरह अलगा रहा है। 

इन प्रदर्शनों से एक खास परिवर्तनकारी दृश्य उपस्थित होता है। जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर की तस्वीरों के साथ, या संविधान की प्रतियों के साथ या प्रदर्शनों में पढ़ी जा रही प्रस्तावना के साथ। यह एक राष्ट्र के लिए सबसे सुखद क्षण है। यह संविधान को तार-तार करते और उसके सम्मान का छद्म बनाते सत्ताधारियों से अलग घटना है और यथार्थ है।”

सुशील मानव

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