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Friday, September 24, 2021

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किसान आंदोलन हमारे राजनीतिक अर्थशास्त्र को भी बदलेगा: अखिलेंद्र

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स्वराज अभियान के अध्यक्ष मंडल के सदस्य अखिलेंद्र प्रताप सिंह आजकल दिल्ली के दौरे पर हैं। पिछले चार-पांच दिनों में उन्होंने किसान आंदोलन वाले मोर्चों सिंघु बॉर्डर, टिकरी बार्डर, जयपुर रोड और यूपी बार्डर का न केवल दौरा किया बल्कि वहां उन्होंने किसानों की सभा को भी संबोधित किया। वहां से लौटने के बाद उनकी जनचौक के संस्थापक संपादक महेंद्र मिश्र से बातचीत हुई। पेश है उनके साथ बातचीत का प्रमुख अंश:   

अखिलेंद्र प्रताप सिंह इस आंदोलन को बिल्कुल अलग नजरिये से देखते हैं। उनका मानना है कि यह आंदोलन देश में हुए अब तक के आंदोलनों से बिल्कुल जुदा है। पहले के किसान आंदोलन और मौजूदा किसान आंदोलन के फर्क़ को साफ करते हुए अखिलेंद्र कहते हैं, “इससे पूर्व के जितने भी किसान आंदोलन रहे हैं उनके समानांतर मौजूदा किसान आंदोलन की रेखाएं नहीं खींची जा सकतीं। ये नये दौर का नया किसान आंदोलन है जो सीधे-सीधे सरकार की प्रो-कार्पोरेट पॉलिसी से टकरा रहा है। इसलिए अपनी अंतर्वस्तु में ये किसान आंदोलन राजनीतिक है और ये किसान आंदोलन हमारे राजनीतिक अर्थशास्त्र को भी बदलेगा।”

अखिलेंद्र आगे कहते हैं, “यह आंदोलन अभी तीन किसान विरोधी कानूनों पर केंद्रित है। और साथ ही साथ राष्ट्रीय स्तर पर समर्थन मूल्य के लिए कानून बने और कृषि लागत मूल्य आयोग को संवैधानिक वैधता मिले। उसके साथ में और भी मांगें जुड़ी हुई हैं जैसे कि सरकार द्वारा प्रस्तावित बिजली बिल को खारिज करवाना। ये सब मांगें भारत सरकार इसलिए नहीं स्वीकार कर रही है क्योंकि अगर वो उसको स्वीकार करेगी तो उसकी जो प्रो-कार्पोरेट पॉलिसी है उससे सरकार को पीछे हटना पड़ेगा। और यह बात अब किसी से छुपी नहीं है कि मोदी सरकार की जितनी भी पॉलिसी हैं वो अंतराराष्ट्रीय, राष्ट्रीय पूंजी के दबाव में हैं। और उसी दबाव में उसने इस देश में लगभग सभी क्षेत्रों को निजीकरण की तरफ धकेल दिया है, जिससे देश को कोई फायदा नहीं हुआ।”

उन्होंने कहा कि कोरोना पीरियड में हमने देखा कि जो भी राहत जनता को मिली उसमें प्राइवेट सेक्टर के अस्पतालों की भागीदारी बिल्कुल न के बराबर थी। जो कुछ मिला वो पबलिक सेक्टर के अस्पताल से मिला। शिक्षा में भी यही दिखता है। आज दुनिया के तमाम देशों के लोग बाज़ारवाद पर नियंत्रण की वकालत कर रहे हैं। और भारतवर्ष जैसे देश में कोई बाज़ार राज्य से अनियंत्रित हो जाये तो देश में विदेशी कंपनियों और पूंजी का इतना बड़ा वर्चस्व होगा कि देश के 90 प्रतिशत लोग बर्बाद हो जायेंगे। इसलिए इस आंदोलन के साथ पूरे समाज का पूरे नागरिकों का एक भाव जुड़ गया है। और यह जो भाव जुड़ा है इस किसान आंदोलन से इससे ये सरकार घबरायी हुई है। इसलिए इसके खिलाफ दुष्प्रचार कर रही है। लेकिन कोई उसको स्वीकार करने के लिये तैयार नहीं है।

किसान आंदोलन ने राष्ट्रीय आकार ग्रहण कर लिया है

सिंघु, टिकरी, जयपुर हाईवे और यूपी बार्डर पर चल रहे किसानों के आंदोलन का दौरा करके लौटे अखिलेंद्र की नजर में देश की राजनीति और आंदोलन के इतिहास में यह सब बिल्कुल नया हो रहा है। वह किसान आंदोलन के तेजी से व्यापक होते जाने के चरित्र को उद्घाटित करते हुए बताते हैं, “हमने ये देखा है कि जयपुर दिल्ली रूट पर स्थित शाहजहांपुर में योगेंद्र और सीपीएम के कार्यकर्ता उनके पूर्व विधायक अमरा राम सब हैं। वहां बड़े पैमाने पर गुजरात और राज्स्थान जैसे दूसरे राज्यों की भी हिस्सेदारी देखी जा सकती है।

हरिय़ाणा की खट्टर सरकार नहीं आने दे रही है तब भी लोग आ रहे हैं। और जनता के सहयोग से वहां खाने-पीने रहने की सब व्यवस्था हो रही है। ये बाद की बात है। लेकिन इस आंदोलन ने बड़ी तेजी से विस्तार किया है। जहां तक देश के अन्य हिस्सों की बात है, तो कोलकाता में एक बड़ी रैली हुई। मुंबई में होने जा रहा है। चेन्नई में सुनाई दे रहा है। तो इस आंदोलन ने एक राष्ट्रीय आकार ग्रहण कर लिया है। और जो लोग इस आंदोलन में शारीरिक रूप में शरीक नहीं हैं। उनका मन भी इस आंदोलन के साथ जुड़ गया है। इसलिये यह एक राष्ट्रीय आंदोलन हो गया है। जो अपने चरित्र में संपूर्ण है। राजनीतिक है, सामाजिक है, सांस्कृतिक है। और ये फैल रहा है।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण हमने सिंघु बॉर्डर पर देखा है। वहां पूरा एक पंजाब की संस्कृति का नज़ारा है। ढोल, नगाड़े, मजीरे की ताल पर वहां कार्पोरेट और मोदी सरकार के विरुद्ध नारा लग रहा है। और मजूरा-किसान जिंदाबाद कार्पोरेट मुर्दाबाद का नारा केवल ऊपर के सर्किल में नहीं बल्कि जन जन में महिलाओं से लेकर बच्चों तक का नारा बना गया है। पंजाब से लेकर देश के अन्य हिस्सों के कलाकार वहां आ रहे हैं। गुरु गोविंद सिंह कहते थे कि देग और तेग संभालो। डेग का मतलब है वहां जो भी है किसी को भोजन का संकट नहीं हो। सिख धर्म में जो सेवाभाव है अगर देखना है तो सिंघु से लेकर टिकरी बॉर्डर तक दिल्ली-राजस्थान रूट और यहां तक कि गाजीपुर बॉर्डर पर जो भीड़ है यहां भी लंगर लगे हुए हैं। और गांव के किसानों की तरफ से बड़े पैमाने पर भोजन के और लकड़ी आदि समर्थन में आ रहे हैं। ये बेहद बड़ा जन उभार होता जा रहा है। और लोग ये समझ रहे हैं कि कार्पोरेट के लिए ये सरकार पूरे देश को बर्बाद कर रही है।

सरकार के पास कृषि कानून के समर्थन में कोई तर्क नहीं है

अखिलेंद्र प्रताप किसानों की मांगों को न्यायसंगत ठहराते हुए कहते हैं, “उनकी मांगें भी बहुत वाजिब हैं कि आप किसान विरोधी कानून वापस लीजिये। किसान जो पैदा कर रहा है उसके खरीद की गारंटी लीजिये। एक राष्ट्रीय कानून बनाइये। साथ ही कृषि लागत मूल्य आयोग का गठन करिये। ये स्वमीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करो अभी तक ये प्रचार का नारा था अब ये बड़े आंदोलन का नारा बन गया है। लेकिन भारत सरकार इसे स्वीकार न करने के पीछे कोई तर्क नहीं दे पा रही है। इनका तर्क ये है कि कार्पोरेट के आने से क्या दिक्कत है। तो सरकार को अगर कार्पोरेट की व्यवस्था देखनी है तो कार्पोरेट को कौन रोके हुए है। यूपी, बिहार, झारखंड में जाकर खरीदे कार्पोरेट। सरकार एक न्यूनतम मूल्य तय कर दे फिर कार्पोरेट खरीदे। पूरा देश तो खाली है। इनकी नज़र पंजाब और हरियाणा पर ही क्यों केंद्रित है। क्योंकि यहां किसानों में अब भी बीजेपी घुस नहीं पाई है।   

अखिलेंद्र प्रताप हरियाणा पंजाब के किसानों के सरकारी दमन को चिन्हित करके कहते हैं कि “बीजेपी यहां राजनीतिक लड़ाई भी लड़ रही है और कार्पोरेट सेवा तो उसका भाव है ही। जिनके लिए इन्होंने पूरी अर्थव्यवस्था को ही खोल दिया है।”

कृषि के व्यवसायीकरण के सवाल पर वो कहते हैं, “हां कुछ बुद्धिजीवी इसे भी उठा रहे हैं। करिये फूल की खेती, औषधियों की खेती करिए विश्व मार्केट में सप्लाई कीजिए लेकिन साल 2001 में जब अटल बिहारी प्रधानमंत्री थे वीपी सिंह के साथ आंदोलन में साल 2001 में हमने एक बात उठाई थी कि हम फूल की खेती करेंगे लेकिन उसे यूरोप अमेरिका नहीं लेता। कहता है इससे छूत की बीमारी हो जाएगी। तो उनके ऊपर खरीदने के लिए दबाव भी नहीं डाल सकती ये सरकार”।

कुल मिला जुलाकर ये आंदोलन है इसके विरुद्ध जितने तर्क दिये जा रहे हैं वो तर्क अपने में खोखले हैं। आप आवश्यक वस्तु अधिनियम को क्यों खारिज कर रहे हैं। क्यों अकूत ताक़त उनको देना चाहते हैं। कल सट्टेबाजी होने लगेगी, काला कारोबार होने लगेगा और राज्य कहेगा की हम उसमें हस्तक्षेप ही नहीं करेंगे। तो राज्य की भूमिका क्या रह गई। एक ऐसे समय में जब आपने क्वांटेटिव रिस्ट्रिक्शन हटा दिया है। विदेशी माल अटल बिहारी के द्वारा हटाने की वजह से भरे पड़े हैं। तो विदेशी ताक़तें आकर किसानों के साथ मनमानी करें और राज्य कहे कि हम उसमें दख़ल ही नहीं करेंगे तो इस देश का आम नागरिक अनाथ हो जाएगा।

उन्होंने कहा कि ये राज्य का धर्म है कि वो अपने नागरिकों की रक्षा करे। लेकिन यदि कोई सरकार अपने नागरिक की रक्षा नहीं कर पा रही है तो उसे सत्ता में रहने का कोई अधिकार नहीं है।

ये आंदोलन विकास मॉडल पर सवाल उठा रहा है

अखिलेंद्र प्रताप आगे समर्थन मूल्य और सब्सिडी के सवाल पर कहते हैं, “ जहां तक सब्सिडी की बात है तो आप कितना सब्सिडी देते हैं, बहुत कम देते हैं। विश्व व्यापार संगठन में खुद एसपी शुक्ला जो भारत सरकार के प्रतिनिधि थे, गैट (GATT) में, जिनकी आईपीएफ के गठन में बड़ी भूमिका थी उन्होंने बताया कि गैट (GATT) के आर्टिकल-18 में साफ तौर पर लिखा है कि खाद्य सुरक्षा के दृष्टिकोण से हम ज़्यादा से ज़्यादा सब्सिडी दे सकते हैं। ऐसी कोई बाध्यता नहीं है। तो ये पूरे प्रश्न भरमाने के लिए हो रहे हैं। न्यूनतम समर्थन के लिये लागत के हिसाब से पचास प्रतिशत जोड़कर स्वामीनाथन कमीशन की सिफारिश लागू कर दे। इसमें ढाई तीन लाख करोड़ से ज़्यादा खर्च नहीं होगा। तो आप किसानों पर इतना भी खर्च नहीं करना चाहते।”

न्यूनतम समर्थन मूल्य लागू करने के सवाल पर आजकल तमाम मीडिया सरकारी खजाना लुट जाने की दुहाई दे रहे हैं। इस सवाल पर अखिलेंद्र कहते हैं, “न्यूनतम समर्थन मूल्य की बात आती है तो आप राजस्व घाटे के अनुशासन की दुहाई देते हैं। तो आप अपने सरकारी खर्च में क्यों नहीं कटौती करते। बहुत सारे पद आपने बना रखे हैं जिनकी ज़रूरत ही नहीं है। ऐसी स्थिति में आप फिस्कल रिस्पांसबिलिटी मैनेजमेंट एक्ट 2003 का जो एक्ट है उसमें बदलाव कीजिए। 3 प्रतिशत या उससे ज़्यादा खर्च होता है तो उसको खर्च कीजिए। फिर जब हमारा सरप्लस जेनरेट होगा तो धीरे-धेरे राजस्व घाटा पूरा कर लेंगे।”

अखिलेंद्र अर्थव्यस्था संबंधी मौजूदा नीतियों को बर्बादी की जड़ बताते हुए कहते हैं, “अर्थव्यवस्था की जो दिशा ली गई है वो गलत है। इस किसान आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि इसने विकास के मॉडल पर सवाल खड़ा कर दिया है। कि कार्पोरेट आधारित विकास होगा कि कृषि आधारित विकास होगा। जितना भी पूंजी आधारित विकास होना था वो हमारे देश में हो गया। अब इससे आगे हम नहीं बढ़ सकते। क्योंकि इसके आगे सिर्फ़ भुखमरी होगी, बेकारी होगी, बेरोजोगारी बढ़ेगी। इसके विरुद्ध हमें कृषि आधारित अर्थव्यवस्था का रास्ता लेना होगा। और कृषि के आधार पर खड़े होकर हमें अपने देश की अर्थव्यवस्था को सुधारना होगा। कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ाना होगा, सहकारीकरण करना होगा। इन्होंने हर जगह लिबरलाइजेशन कर दिया है अब यदि कोऑपरेटिव का रजिस्ट्रेशन कराना चाहें तो उसकी इज़ाज़त नहीं है। 

भारतीय राजनीति का नया व्याकरण लिख रहा है ये आंदोलन

मौजूदा किसान आंदोलन को भारतीय राजनीति की दिशा बदलने वाला बताते हुए अखिलेंद्र कहते हैं, “इस किसान आंदोलन को जनता का बड़ा समर्थन है। इन आंदोलनों के खिलाफ यदि आप चाहें कि कुप्रचार करें, दमन करके कत्म करें तो ये खत्म नहीं होगा। क्योंकि ये आंदोलन भारतीय राजनीति के नये व्याकरण की व्याख्या कर रहा है। नये व्याकरण की शुरुआत कर रहा है। ये दमन से नहीं झुकने वाला है। ये अपना राजनीतिक कोर्स पूरा करेगा। इस आंदोलन की अंतर्वस्तु बहुत ही समृद्ध है और ये भारत के नवनिर्माण का कारण भी बनेगा।”

उन्होंने आगे कहा, “अमूमन खाप को लेकर जनवादी सर्किल में अच्छी राय नहीं है। लेकिन मैंने देखा गाजीपुर में कि 84 गांव के महासचिव से लेकर सभी लोग वहां थे। सबों ने इस बात को साफ तौर पर कहा है कि हम पहले किसान हैं बाद में हम खाप हैं। खाप हमारे सामाजिक रीति-रिवाज के लिये है। नरेंद्र मोदी सरकार ने उत्तर प्रदेश में दंगा कराके समाज को हिंदू-मुस्लिम में विभाजित कर दिया। लेकिन कल की मीटिंग में मैंने गाजीपुर में देखा कि कई मुस्लिम चौधरियों ने भाषण दिया। भाईचारे की जो लंबी परंपरा थी वो पुनर्जीवित हो रही है। ये किसान आंदोलन प्रतिकार करता है।”

अखिलेंद्र ने आगे उगरहा के हवाले से बताया कि उगरहा से तीन घंटे बात हुई। उन्होंने कहा हम किसान आंदोलन के साथ हैं। हमारे बारे में गलत फैलाया गया है। यदि हमने किसान और गरीब गुरबे के अधिकारों के लिए लिखने वाले आनंद तेलतुंबडे, सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा जैसे लोगों के लिए आवाज़ उठाया तो क्या गलत किया। तो इस आंदोलन में बहुत सुलझे हुए लोग हैं। और ये किसान आंदोलन बिल्कुल ज़मीन से उठ रहा है। और राष्ट्रीय स्तर पर ठीक ढंग से ये कोआर्डिनेट हो रहा है। इसलिए ज़मीनी स्तर के नेता राष्ट्रीय भूमिका में आ रहे हैं। यह भी भारतवर्ष के लिये नई परंपरा है। इस आंदोलन में कोई चाहे कि जोड़-तोड़ करके अपने में मिला लेंगे तो संभव नहीं है। तो सरकार के पास इन तीनों कृषि कानूनों के बचाव में कोई तर्क नहीं है, केवल झूठ और गलतबयानी है।

गाजीपुर बार्डर पर अखिलेंद्र प्रताप सिंह और सुमति यादव।

वो कहते हैं, “ये आंदोलन अगर लोकतांत्रिक तरीके से जनता के प्रश्नों को उठा रहा है तो क्या गलत कर रहा है। अपने मुद्दों को ही नहीं बल्कि जनता के मुद्दों पर भी लड़ रहा है। दरअसल ये आंदोलन कार्पोरेट बनाम किसान संघर्ष बन गया है। कार्पोरेट बनाम किसान आज के दौर का बड़ा भारी विरोधाभास है और जो लोग देश को कार्पोरेट से, उनकी मोनोपोली से मुक्त कराना चाहते हैं उनका समर्थन इस किसान आंदोलन से जुड़ता जा रहा है। और अगर ये किसान आंदोलन से हुआ तो जितने काले क़ानून हैं यूएपीए, देशद्रोह से लेकर सब पर पुनर्विचार करना पड़ेगा।”

जब जनता ये कहने लगे कि नरेंद्र मोदी अडानी-अंबानी का चौकीदार है। जब किसान कार्पोरेट-मोदी मुर्दाबाद, किसान-मजूरा जिंदाबाद के नारे लगाने लगे तो भारतीय राजनीति नए फेज में प्रवेश कर रही है। और उस संदर्भ को लेते हुए प्रशांत भूषण ने एक मीटिंग बुलाई है जिसमें मुख्यधारा के राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि, सामाजिक आदोलन के प्रतिनिधि, नागरिक आंदोलन के प्रतिनिधि जो एक ऐसे राजनीतिक मंच का निर्माण करना चाहते हैं जो देश में चल रहे लोकतांत्रिक आंदोलनों की दिशा में एकजुटता कायम करे बढ़ाये, आदि लोग शामिल हो रहे हैं। वित्तीय पूंजी का आक्रमण जो आम जनता पर था, जिसमें मजदूरों का कार्यदिवस 8 घंटे से बढ़ाकर 12 घंटे कर दिया। इन सब चीजों पर लगाम लगाने सीमा विवाद, बेरोजगारी आदि के प्रश्नों पर लोगों में नई चेतना पैदा करेगा।

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