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कोश्यारी ने एक बार फिर खुद को नालायक साबित किया है!

संविधान की अनदेखी कर मनमाने तरीके से काम करने और अपने सूबे की सरकार के लिए नित-नई परेशानी खड़ी करने के लिए कुख्यात महाराष्ट्र के राज्यपाल भगतसिंह कोश्यारी ने एक बार फिर उद्दण्डता और निर्लज्जता का परिचय देते हुए साबित किया है कि वे राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद पर बने रहने की न्यूनतम पात्रता भी नहीं रखते हैं। कोरोना महामारी की वजह से लॉकडाउन के दौरान बंद किए गए मंदिरों को खोलने की अनुमति न दिए जाने पर सवाल उठाते हुए राज्यपाल कोश्यारी ने सूबे के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को जिस बेहूदा लहजे में पत्र लिखा है, वह न सिर्फ मुख्यमंत्री का बल्कि देश के उस संविधान का भी अपमान है, जिसकी शपथ लेकर वे राज्यपाल के पद पर बैठे हैं।

गौरतलब है कि महाराष्ट्र देश का सर्वाधिक कोरोना संक्रमण प्रभावित राज्य है और राज्य सरकार ने महामारी की इस चुनौती से निबटने के लिए लॉकडाउन के दौरान बंद किए गए धार्मिक स्थलों को खोलने की अनुमति अभी नहीं दी है। मंदिरों को बंद रखा जाना भाजपा को रास नहीं आ रहा है। उसका कहना है कि जब रेस्तरां और बार खोलने की इजाजत दे दी गई तो मंदिरों को खोलने की इजाजत क्यों नहीं दी जा रही है। मंदिरों को खोलने की मांग को लेकर मुंबई सहित राज्य के कई शहरों में भाजपा की ओर से सड़कों पर पूजा-आरती के आयोजन की नौटंकी की जा रही है।

मंदिर के नाम पर भाजपा के इस राजनीतिक उपक्रम को मुखरता प्रदान करते हुए राज्यपाल कोश्यारी ने नेता प्रतिपक्ष के अंदाज में मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को लिखे पत्र में न सिर्फ बंद पड़े मंदिरों को खोले जाने पर विचार करने को कहा, बल्कि तंज करते हुए लिखा है, ”आप तो हिंदुत्व के मजबूत पक्षधर रहे हैं। खुद को राम का भक्त बताते हैं। क्या आपको धर्मस्थलों को खोले जाने का फैसला टालते रहने का कोई दैवीय आदेश मिला है या फिर क्या आप अचानक ‘सेक्युलर’ हो गए हैं, जिस शब्द से आपको नफरत थी।’’

ठाकरे ने अपने जवाबी पत्र में राज्यपाल से सवाल किया है, ”क्या धर्मनिरपेक्षता हमारे संविधान का हिस्सा नहीं है, जिसके नाम पर आपने शपथ लेकर राज्यपाल का पद ग्रहण किया है?’’ ठाकरे ने अपने पत्र में लिखा है, ”लोगों की धार्मिक भावनाओं और आस्थाओं को ध्यान में रखने के साथ ही उनके जीवन की रक्षा करना भी सरकार का अहम दायित्व है। जैसे अचानक लॉकडाउन लागू करना सही नहीं था, उसी तरह इसे एक बार में पूरी तरह से खत्म कर देना भी उचित नहीं होगा।’’ ठाकरे ने खुद को ‘सेक्युलर’ कहे जाने पर पलट वार करते हुए कहा, ”हां, मैं हिंदुत्व को मानता हूँ और मेरे हिंदुत्व को आपके सत्यापन की आवश्यकता नहीं है। मुंबई को पीओके बताने वाली का स्वागत करने वाले मेरे हिंदुत्व के पैमाने पर खरे नहीं उतर सकते। सिर्फ धार्मिक स्थलों को खोल देना ही हिंदुत्व नहीं है।’’

राज्यपाल कोश्यारी ने अपने पत्र में जिस तरह बेहूदा बातें कही थीं, उसका तार्किक और मर्यादित जवाब यही हो सकता था, जो मुख्यमंत्री ठाकरे ने दिया है। मगर सवाल है कि कोश्यारी इस तरह का पत्र लिखने के बाद राज्यपाल के पद पर कैसे बने रह सकते हैं? कोश्यारी के पत्र पर नाराजगी जताते हुए महाराष्ट्र के वरिष्ठतम नेता शरद पवार ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में उचित ही कहा है कि किसी मुद्दे पर राज्यपाल की राय राज्य सरकार की राय से भिन्न हो सकती है, लेकिन राज्यपाल कोश्यारी ने जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल अपने पत्र में किया है और उस पत्र को मीडिया के जरिए सार्वजनिक किया है, वह बेहद दुखद है

दरअसल, सेक्युलरिज्म यानी पंथनिरपेक्षता किसी पार्टी का नारा नहीं बल्कि हमारे स्वाधीनता संग्राम से जुडा मूल्य है, जिसे केंद्र में रखकर हमारे संविधान की रचना की गई है। 15 अगस्त, 1947 को जिस भारतीय राष्ट्र राज्य का उदय हुआ, उसका अस्तित्व पंथनिरपेक्षता यानी सेक्युलरिज्म की शर्त से बंधा हुआ है। पंथनिरपेक्षता या कि धर्मनिरपेक्षता ही वह एकमात्र संगठक तत्व है, जिसने भारतीय राष्ट्र राज्य को एक संघ राज्य के रूप में बनाए रखा है।

जाहिर है कि संविधान और खासकर उसके इस उदात्त मूल्य के बारे में कोश्यारी की समझ या तो शून्य है या फिर वे समझते-बूझते हुए भी उसे मानते नहीं हैं। दोनों ही स्थिति में वे राज्यपाल के पद पर रहने की पात्रता नहीं रखते हैं। लेकिन जिस केन्द्र सरकार की सिफारिश पर राष्ट्रपति ने कोश्यारी को राज्यपाल नियुक्त किया है, उस सरकार से या राष्ट्रपति से यह उम्मीद करना बेमानी है कि वे कोश्यारी को बर्खास्त कर संविधान के प्रति अपनी निष्ठा और सम्मान प्रदर्शित करेंगे। अगर उन्हें ऐसा करना ही होता तो बहुत पहले ही कर चुके होते, क्योंकि कोश्यारी इससे पहले भी अपने पद की गरिमा और संवैधानिक मर्यादा को कई बार लांघ चुके हैं।

पिछले साल महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव के बाद भाजपा की सरकार न बनने की स्थिति में राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफारिश करने में भी कोश्यारी ने अनावश्यक जल्दबाजी की थी और फिर देवेंद्र फडणवीस को आधी रात को आनन-फानन में मुख्यमंत्री की शपथ दिलाने में भी उन्होंने संवैधानिक निर्देशों और मान्य लोकतांत्रिक परंपराओं को नजरअंदाज किया था। उनके और प्रकारांतर से केंद्र सरकार तथा राष्ट्रपति के इस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने कडी टिप्पणी की थी। बाद में जब देवेंद्र फडणवीस सरकार गिर गई और उद्धव ठाकरे की अगुवाई में महाविकास अघाड़ी यानी गठबंधन की सरकार बनी तो उसे अस्थिर करने की भी उन्होंने कई बार कोशिशें कीं।

राज्यपाल के रूप में सिर्फ कोश्यारी का ही नहीं, बल्कि अन्य राज्यों और खासकर गैर भाजपा शासित राज्यों के राज्यपालों का आचरण भी कोश्यारी से भिन्न नहीं रहा है। कई राज्यपालों ने धर्मनिरपेक्षता की खिल्ली उड़ाई है, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के बारे में भी अपमानजनक टिप्पणियां की हैं और विपक्षी दलों की सरकारों को अस्थिर करने की कोशिशें की हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि उन्होंने ऐसा केंद्र सरकार में बैठे नियोक्ताओं की शह पर ही किया है।

जहां तक धर्मनिरपेक्षता या पंथनिरपेक्षता की बात है, उसकी खिल्ली उड़ाने का काम तो खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही अक्सर करते रहते हैं। 2019 का चुनाव जीतने के बाद अपने पहले सार्वजनिक संबोधन में ही उन्होंने कहा था कि चुनाव नतीजों ने धर्मनिरपेक्षता के मुद्दे को अप्रासंगिक बना दिया है। वे अपनी सरकार के आलोचकों को भी अक्सर सेक्युलर गिरोह और सेक्युलर गैंग कहते रहते हैं। उनका अनुसरण उनकी पार्टी के दूसरे नेता भी करते हैं। इसलिए कोश्यारी ने जो कुछ उद्धव ठाकरे को लिखे पत्र में कहा है वह कोई नया उदाहरण नहीं है बल्कि उसे एक सुनियोजित अभियान का हिस्सा माना जाना चाहिए।

(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

This post was last modified on October 14, 2020 3:08 pm

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