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राजस्थान में गढ़ी जा रही संविधान की नई परिभाषा

राजस्थान में जारी राजनीतिक घमासान सुप्रीम कोर्ट-हाईकोर्ट के साथ राजभवन के बीच राजस्थान फुटबाल बन गया है। न्यायपालिका और राजभवन संविधान और कानून के शासन की नई परिभाषा गढ़ रहे हैं। अशोक गहलोत सरकार ने राज्यपाल से सेशन बुलाने के लिए सिफारिश की है। कानूनी जानकार बताते हैं कि संवैधानिक व्यवस्था के तहत कैबिनेट का सलाह और सिफारिश मानने के लिए राज्यपाल बाध्य हैं। उनके अनुसार, अगर कैबिनेट ने विधानसभा का सेशन बुलाने की सलाह दी है तो राज्यपाल को उसके मुताबिक एक्ट करना होगा। संविधान के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट के संवैधानिक बेंच का फैसला कहता है कि राज्यपाल को मंत्रिपरिषद की सलाह से काम करना है।

राजस्थान में जो राजनीतिक और न्यायिक फुटबाल का खेल चल चल रहा है वह उच्चतम न्यायालय द्वारा पूर्व में दी गयी रुलिंग्स के खिलाफ है।उच्चतम न्यायालय ने 1992 में अपने एक फैसले में कहा था कि जो एंटी डिफेक्शन लॉ में पैराग्राफ-2 है, जिसमें दो चीजों के आधार पर विधायकों को अयोग्य घोषित किया जा सकता है। पहली कि अगर वो सदन में पार्टी व्हिप के खिलाफ वोट करते हैं और दूसरी कि अगर वो खुद बोलते हैं कि वो पार्टी छोड़ रहे हैं। इसमें कई सारी बाते हैं, क्योंकि अगर कोई पार्टी के खिलाफ काम कर रहा है तो भी वह इस कानून के तहत आ सकता है।

संविधान के प्रावधान के मुताबिक राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही काम करेंगे।वह औपाचारिक तौर पर कार्यपालिका के मुखिया हैं लेकिन कार्यकारी अधिकार मंत्रिपरिषद में निहित है और उसकी सलाह से ही काम करेंगे। गवर्नर खुद से फैसले नहीं ले सकते। संवैधानिक व्यवस्था है कि राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह और सिफारिश से काम करता है। चुनी हुई सरकार अगर सेशन बुलाने की सिफारिश करती है तो राज्यपाल को उसी अनुसार नोटिफिकेशन जारी करना होता है। अनुच्छेद-163 के तहत राज्यपाल को जब सेशन बुलाने की सलाह और सिफारिश की जाती है तो उसके मुताबिक विधानसभा सत्र बुलाने का प्रावधान है।

उच्चतम न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने अरुणाचल प्रदेश के नबाम केस (वर्ष 2016) में फैसला दिया था कि राज्यपाल मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद की सलाह को मानने के लिए बाध्य हैं। संवैधानिक प्रावधान के तहत वह मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही काम करेंगे। अगर राज्यपाल को लगता है कि सरकार बहुमत खो चुकी है तो भी उसे विधानसभा सत्र बुलाना है, क्योंकि बहुमत का फैसला फ्लोर टेस्ट से होगा और बोम्मई फैसले में उच्चतम न्यायालय व्यवस्था दे चुका है।

राजस्थान हाईकोर्ट में कई सवालों के जवाब लगातार उलझते जा रहे हैं। सवाल उठ रहे हैं कि सचिन पायलट और बागी विधायक बीजेपी में शामिल होंगे या फिर नहीं, क्या वो कांग्रेस सरकार को गिराने की कोशिश कर रहे हैं? इन सवालों पर कोर्ट में लगातार कंफ्यूजन जारी है। हाईकोर्ट ने कहा है कि जो याचिका सचिन पायलट और विधायकों ने दायर की है, वो उस पर सुनवाई करेंगे, लेकिन पूरी याचिका को नहीं सुनेंगे। वो तीन मुद्दों पर सुनवाई करेंगे, जिनके आधार पर कोर्ट ने 13 क़ानूनी सवाल बनाए हैं।

राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा है कि दल-बदल कानून के आधार पर हम देख सकते हैं कि विधायक सवाल उठाने पर और विरोध करने पर अयोग्य घोषित हो सकते हैं। वहीं दूसरी तरफ इसके आधार पर ये भी देखा जाएगा, जैसा कि सचिन पायलट कह रहे हैं कि वो कांग्रेस नहीं छोड़ना चाहते हैं और उन्हें गहलोत से दिक्कत है, वो पार्टी में बदलाव चाहते हैं। ऐसे में हाईकोर्ट ने कहा कि इस तरह के हालात में जब कोई विरोध करता है या फिर सवाल उठाता है वो दल बदल कानून में नहीं आना चाहिए, क्योंकि वो उनकी अभिव्यक्ति की आजादी में आता है। हालांकि कोर्ट ने इसे अभी सही नहीं बताया है, लेकिन इस पर बैठकर चर्चा करने की बात जरूर कही है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने ये कहा है कि वो इसे जरूर सुनेंगे, लेकिन पहले उच्चतम न्यायालय का इस पर फैसला आ जाए, क्योंकि उच्चतम न्यायालय  भी इसी मामले पर सुनवाई करने जा रहा है। हाईकोर्ट ने यथास्थिति को बनाए रखने की बात कही है। इससे ये मामला और लंबा खिंच गया है, क्योंकि अब उच्चतम न्यायालय में पता नहीं कब तक सुनवाई चलती है, उसके बाद फिर से हाईकोर्ट में मामले को सुना जा सकता है। तो अब मामला काफी लंबा खिंचता नजर आ रहा है।

उच्चतम न्यायालय ने राजस्थान में सत्तारूढ़ कांग्रेस में चल रहे राजनीतिक घमासान और पार्टी के बागी विधायकों के संदर्भ में जोर देकर कहा है कि लोकतंत्र में असहमति के स्वर दबाए नहीं जा सकते। लेकिन जो मामले भाजपा सरकारों को सूट नहीं करते उनमें उच्चतम न्यायालय के उक्त सिद्धांत का लोप हो जाता है। यक्ष प्रश्न है कि आखिर राजनीतिक पार्टियों के संसदीय दलों में सदस्यों की असहमति की क्या सीमा होनी चाहिए? क्या असहमति या असंतोष का सम्मान करते हुए निर्वाचित प्रतिनिधियों को अपनी ही पार्टी और सरकार के खिलाफ अपनी गतिविधियां जारी रखने की अनुमति दे दी जानी चाहिए?

गौरतलब है कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) में प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार निर्बाध नहीं है और आवश्यकता पड़ने पर इसे सीमित भी किया जा सकता है जबकि सांसद और विधायक पार्टी के संविधान के साथ ही दल बदल कानून से भी बंधे होते हैं।

इसलिए लोकतंत्र में असहमति व्यक्त करने की एक ‘लक्ष्मण रेखा’ जरूरी है। अगर असहमति व्यक्त करने की लक्ष्मण रेखा नहीं होगी तो फिर राजनीतिक दलों में ‘नरम दल-गरम दल’ बनेंगे और इससे इतर जन-आंदोलनों में हिंसा, तोड़फोड़ और विघटनकारी गतिविधियों को बढ़ावा देने वाले तत्व सक्रिय हो जायेंगे। लेकिन इसके साथ राजनीतिक दलों को भी प्राइवेट लि. कम्पनी सरीखी कार्यशैली से ऊपर आना होगा और पार्टी फोरम का मंच सबके लिए खोलना होगा ताकि स्वस्थ बहस कार्यकर्ता कर सकें। इसका वामपंथी दलों को छोड़कर अन्य सभी दलों में अभाव है।

राजस्थान में बर्खास्त उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट और 18 अन्य बागी विधायकों ने अभी तक न तो पार्टी से त्यागपत्र दिया है और न ही उन्हें पार्टी से निष्कासित किया गया है। ऐसी स्थिति में सवाल यह उठ रहा है कि विधायक दल के अंदर पनप रहे असंतोष को खत्म करने के प्रयास में संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत अपनाई गयी अयोग्यता की कार्यवाही का सहारा लेना उचित है या नहीं?

दरअसल दलबदल कानून बनाते समय ऐसे लूपहोल्स छोड़ दिए गये हैं जिनके सहारे दलबदल किये जा रहे हैं और न्याय पालिका किंकर्तव्यविमूढ़ दिख रही है। मसलन पहले एक तिहाई सदस्यों के दल बदल का प्रावधान था जो दुरूपयोग किये जाने पर तीन चौथाई में बदल दिया गया। इसकी काट निकाली गयी है कि जितने सदस्य कम होने पर कोई सरकार गिर सकती है उतने या उससे कुछ अधिक सदस्यों का विधानसभा से इस्तीफा करा दिया जाए और नई सरकार बनने पर उन्हें मंत्री पद से नवाज दिया जाए। अब यह राजनीतिक भ्रष्टाचार है या नहीं आप पाठक तय करें।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)

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