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उर्मिलेश की कलम से: सपा-बसपा के परशुराम!

महामारी के इस भयावह दौर में जब सरकारें अपनी चौतरफा विफलताओं से लोगों का ध्यान हटाने की हर चंद कोशिश कर रही हैं, उत्तर प्रदेश के दो प्रमुख विपक्षी दल  बिल्कुल अनोखे अंदाज में पेश आ रहे हैं। ऐसा लगता है, मानो देश के सबसे बड़े सूबे में सियासत के सारे समीकरण और पैमाने उलट-पुलट गये हों! क्या इन दलों की राजनीति की समाज और जनता से तनिक भी सम्बद्धता नजर आ रही है? समाजवादी पार्टी को महामारी और बेहाली के इस भयानक दौर में मूर्ति-स्थापना की याद सबसे पहले आई!  उसके नेताओं के हवाले से खबर आई कि अब वह प्रदेश में जगह-जगह परशुराम जी की प्रतिमाएं लगवायेगी।

यूपी के कुछ अखबारों में यह खबर प्रमुखता से छपी। समाजवादी पार्टी के इस ऐलान के बाद अब बहुजन समाज पार्टी ने ऐलान किया है कि वह सत्ता में आयी तो परशुराम जी के नाम पर सपा की परशुराम प्रतिमा से भी ज्यादा भव्य प्रतिमा लगवायेगी। बसपा ने इसमें एक नयी बात यह जोड़ा है कि वह सत्ता में आने पर ‘ब्राह्मण समुदाय की आस्था और स्वाभिमान के खास प्रतीक माने जाने वाले’ श्री परशुराम के नाम पर जगह-जगह बड़े अस्पताल भी बनवायेगी।

‘सर्वजन’ के बसपाई नजरिये का ख्याल करते हुए बयान में यह भी जोड़ा गया है कि बसपा सत्ता में आई तो सभी जातियों व धर्मों में जन्मे महान संतों, गुरुओं और महापुरुषों के नाम पर बड़ी संख्या में अस्पताल व सभी जरूरी सुविधा-युक्त कम्युनिटी सेंटर का भी निर्माण करायेगी। लेकिन उसने सपा से अपने एजेंडे की तुलना को काफी महत्व देते हुए फरमाया कि सपा द्वारा प्रस्तावित परशुराम जी की प्रतिमा से वह ज्यादा भव्य प्रतिमा बनवायेगी! यानी मेरे परशुराम जी बड़े कि तुम्हारे परशुराम जी! बसपा ने इस बारे में जो प्रेस विज्ञप्ति जारी की है, उसमें अयोध्या के राम मंदिर के भूमि पूजन का भी जिक्र है। पार्टी ने कहा है कि उस दिन प्रधानमंत्री मोदी द्वारा मंदिर निर्माण की नींव रखी गई। उस समारोह में दलित समाज से आने वाले राष्ट्रपति को भी बुला लिया गया होता तो अच्छा होता, इसका संदेश अच्छा होता!

हम सपा-बसपा जैसे दलों की विचार-शून्यता और उनके नेतृत्व के संपूर्ण बौद्धिक दिवालियेपन जैसे सैद्धांतिक विषयों पर चर्चा के बजाय यहां सिर्फ इनकी मौजूदा राजनीति और रणनीति की बेचारगी पर बात करेंगे। महामारी, बेकारी, बाढ़ और बेहाली के इस भयावह दौर में ये दोनों विपक्षी दल भला सत्ताधारी दल की मंदिर-मूर्ति राजनीति में क्यों फंस रहे हैं? क्या सत्ताधारी दल को घेरने के लिए इनके पास मुद्दों और विषयों की कमी है? ये इतने असहाय क्यों नजर आ रहे हैं? क्या इन्हें कहीं से निर्देशित किया जा रहा है? दोनों विपक्षी दल भाजपा-आरएसएस आदि की मंदिर-राजनीति के नैरेटिव में कैसे उतर आये? मैं समझता हूं, आरएसएस की यह सबसे बड़ी वैचारिक विजय है कि सपा-बसपा सहित ज्यादातर विपक्षी दल आज उसकी मंदिर-मूर्ति की राजनीति में न सिर्फ शामिल हो गये हैं, अपितु सभी उसके जरिये ‘अपनी-अपनी राजनीति के राम’ खोज रहे हैं!

चलिये, ये अच्छी बात है कि बसपा ने महामारी के दौर में अस्पतालों के निर्माण की बात की। पर अस्पताल की याद उसे तब आई, जब वह विपक्ष में है। सत्ता में आयेगी तो अस्पताल बनवायेगी और वह भी परशुराम जी के नाम पर! एक दौर में जब वह सत्ता में थी तो उसने बहुत खर्चीले और भव्य पार्कों और स्मारकों का आदि का निर्माण कराया था। इनमें ज्यादातर बहुजन नायकों के नाम पर बने थे। कुछेक जगह बसपा सुप्रीमो ने दिवंगत बहुजन नायकों के अलावा अपनी भी मूर्ति बनवा दी। इस बार परशुराम जी के नाम पर अस्पताल और ‘सपा से भी ज्यादा उनकी भव्य मूर्तियां’ बनवाने का बसपा ने ऐलान किया है।

बसपा की प्रेस रिलीज के शब्दों और वाक्यों को ध्यान से पढ़िये तो साफ लगता है कि देश की मौजूदा सत्ताधारी पार्टी और सरकार के शीर्ष नेतृत्व से वह डरी-सहमी भाषा में कुछ अपीलें कर रही है या कुछ सुझाव भर पेश कर रही है! यहां तक कि यूपी सरकार के बारे में उसकी टिप्पणी में भी बेहद सावधानी बरती गई है। बसपा की तरफ से भरपूर कोशिश की गई है कि केंद्र और राज्य सरकार का शीर्ष नेतृत्व उसके ताजा बयान से किसी स्तर पर आहत न हो! पर इसमें समाजवादी पार्टी पर खास ढंग से निशाना ज़रूर साधा गया है और सपा नेतृत्व के विरूद्ध तीखे शब्दों का इस्तेमाल भी किया गया है। कहने का मतलब ये कि एक विपक्षी दल सिर्फ दूसरे विपक्षी दल पर हमलावर है। सरकार को लेकर अपने शब्दों में वह बहुत सतर्क और मुलायम है।

फिर अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी और सुश्री मायावती की बहुजन समाज पार्टी के इस ‘परशुराम-मूर्ति प्रकरण’ को कैसे समझा जाए? क्या यह अयोध्या के मंदिर के शिलान्यास या भूमि-पूजन की भाजपा-राजनीति की जवाबी कार्रवाई है या यह कहीं से निर्देशित बयानबाजी है या यूपी के ब्राह्मणों में भाजपा को लेकर दिख रही कथित नाराज़गी को अपने समर्थन में ले जाने की कोशिश है? क्या सपा-बसपा, दोनों को चिंता सता रही है कि ब्राह्मणों का एक हिस्सा अगर कांग्रेस की तरफ जाता है तो इससे यूपी में कांग्रेस को फिर से खड़ा होने का मौका मिल सकता है! तीसरा कोण भी कम गौरतलब नहीं। वह ये कि इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि इस सपा-बसपा दोनों दलों की ताजा बयानी-रणनीति के तार कहीं और से जुड़े हों ताकि कथित नाराज ब्राह्मण-वोटों में इस कदर विभाजन करा दिया जाये कि कांग्रेस जैसी पार्टी को खास फायदा न मिले!

समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का ‘परशुराम मूर्ति प्रकरण’ सिर्फ भाजपा की मंदिर-राजनीति का जवाब नहीं लगता! यह स्वाभाविक भी नहीं लगता! अगर ऐसा होता तो समाजवादी पार्टी को सन् 90 के बाद ही इस तरह के प्रतीकात्मक कदमों या किसी जाति, वर्ण या धर्म से नत्थी किये गये कतिपय मिथकीय चरित्रों के बारे में ऐसी कोई घोषणा करनी चाहिए थी। पर सपा तो लंबे समय से अपने वास्तविक वैचारिक नायकों (जिनके लिखित इतिहास-भूगोल सबको ज्ञात हैं) की मूर्ति या स्मारकों के निर्माण पर जोर देती रही है। यही हाल बसपा का भी रहा! उसने धार्मिक या मिथकीय चरित्रों या ईश्वरीय प्रतीकों के बजाय डॉ. बीआर अम्बेडकर, ज्योतिबा फुले या शाहूजी महराज जैसे वास्तविक और बड़े बहुजन नायकों के स्मृति चिन्हों या स्मारकों आदि पर जोर देती रही है। फिर अचानक यह हृदयांतरण क्यों और कैसे हो गया?

अगर किसी वजह से हृदयांतरण वास्तविक है तो आज ही क्यों हुआ, पहले क्यों नहीं हुआ? मौके तो पहले भी थे! अगर ये सब भाजपा की मंदिर या मूर्ति-राजनीति की जवाबी कार्रवाई है तो भाजपा तो बीते तीस साल से अयोध्या के मंदिर अभियान में जुटी हुई थी। मंडल आयोग की सिफारिशें आने के साथ ही उसने ‘मंडल’ के विरुद्ध ‘कमंडल’ का सहारा लिया था। उस वक्त हिंदी भाषी समाज के सवर्ण समुदायों, खासकर ब्राह्मण समाज का कांग्रेस से क्रमशः अलगाव देखा गया और वे भाजपा की तरफ झुकते नजर आये। सन् 191-92 के बाद के चुनावों के नतीजों का अध्ययन करें तो यह तस्वीर साफ-साफ दिखती है। लेकिन उस वक्त सपा या बसपा ने सवर्ण समुदाय की किसी बिरादरी विशेष को अपनी तरफ आकृष्ट करने के नाम पर किन्हीं धार्मिक या मिथकीय़ नामों या प्रतीकों का सहारा नहीं लिया! ऐसा क्यों? इसी संक्षिप्त सवाल में दोनों दलों की जनता और समाज से कटी राजनीति, उनके वैचारिक दिवालियेपन, उनके नेताओं की मजबूरियों और बेचारगियों की असल कहानी छुपी है—-और यह कहानी अब किसी के लिए रहस्य नहीं रह गयी है। दोनों दलों का नेतृत्व अपनी-अपनी मजबूरियों के चलते अब विरोध और संघर्ष की राजनीति करने का जोखिम नहीं ले सकता!

(वरिष्ठ लेखक और पत्रकार उर्मिलेश राज्यसभा टीवी के संस्थापक एग्जीक्यूटिव संपादक रह चुके हैं।)

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This post was last modified on August 10, 2020 1:27 pm

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