Tuesday, December 7, 2021

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सावरकर का हिंदुस्थान-1: प्रतिशोध और प्रतिहिंसा पर आधारित है सावरकर का दर्शन

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सावरकर के आधुनिक पाठ में उन्हें वैज्ञानिक, आधुनिक और तार्किक हिंदुत्व के प्रणेता तथा हिन्दू राष्ट्रवाद के जनक के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। रणनीति कुछ ऐसी है कि जब सावरकर के इन कथित विचारों को प्रचारित किया जाता है तो इनकी तुलना अनिवार्य रूप से गांधी जी के विचारों के साथ की जाती है। गांधी जी को वर्ण व्यवस्था के पोषक, परंपरावादी, दकियानूस होने की हद तक धर्मभीरु और अतार्किक व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया जाता है- एक ऐसा व्यक्ति जो सावरकर के प्रखर तर्कों के आगे निरुत्तर हो गया है किंतु अपना अनुचित हठ छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। दरअसल ऐसा है नहीं।

सावरकर के चिंतन का सार संक्षेप चंद शब्दों में व्यक्त किया जा सकता है- हिंसा, प्रतिशोध, घृणा, बर्बरता। आक्रामक तथा क्रूर हिन्दू राष्ट्र की स्थापना उनका स्वप्न था। सावरकर ने अपनी बहुचर्चित पुस्तक हिंदुत्व में हिंदुत्व को निम्नानुसार परिभाषित किया- “हिन्दू वही है जो सिंधु नदी से सिंधु समुद्र पर्यंत विस्तृत इस देश को अपनी पितृ भूमि मानता है, जो रक्त संबंध से उस जाति का वंशधर है जिसका प्रथम उद्गम वैदिक सप्त सिन्धुओं में हुआ और जो बाद में बराबर आगे बढ़ती हुई, अंतर्भूत को पचाती और उसे महनीय रूप देती हुई हिन्दू जाति के नाम से विख्यात हुई, जो उत्तराधिकार संबंध से उसी जाति की उसी संस्कृति को अपनी संस्कृति मानता है जो संस्कृत भाषा में संचित और जाति के इतिहास, कला, धर्म शास्त्र, व्यवहार शास्त्र, रीति नीति, पर्व और त्यौहार – इनके द्वारा अभिव्यक्त हुई है और जो इन सब बातों के साथ इस देश को अपनी पुण्य भूमि, अपने अवतारों और ऋषियों की, अपने आचार्यों और महापुरुषों की निवास भूमि तथा सदाचार और तीर्थ यात्रा की भूमि मानता है। हिंदुत्व के ये लक्षण हैं- एक राष्ट्र, एक जाति और एक संस्कृति। इन सब लक्षणों का अंतर्भाव करके संक्षेप में यों कहा जा सकता है- हिन्दू वह है जो सिंधु स्थान को अपनी पितृ भूमि ही नहीं पुण्य भूमि भी मानता है।”(पृष्ठ 120)।

मुसलमानों और ईसाइयों को सावरकर की सलाह(सावरकर के समग्र वाङ्गमय को पढ़ने के बाद पाठक स्वयं सलाह शब्द को चेतावनी शब्द से प्रतिस्थापित कर देंगे) है- “तुम जो जाति,रक्त, संस्कृति और राष्ट्रीयता के बंधनों से हिन्दू ही हो और जिसे हिंसा के हाथ ने ही अपने पितृ गृह से जबरदस्ती खींच लिया, तुम्हें यही करना है कि अपनी अनन्य भक्ति इस माता को अर्पण करो और इसे केवल पितृ भूमि नहीं पुण्य भूमि मान कर पूजो और इस तरह फिर से हिन्दू संघ में आ जाओ।—- बोहरा, खोजा, मेमन तथा अन्य मुसलमानों और ऐसे ही क्रिस्तानों के लिए यही रास्ता खुला है और यह केवल उनकी मर्जी पर है कि वे इसे स्वीकार करें या न करें। परन्तु जब तक वे इस मार्ग पर नहीं हैं हम उन्हें हिन्दू नहीं कह सकते।”

सावरकर इस प्रकार टेरीटोरियल नेशनलिज्म के स्थान पर कल्चरल नेशनलिज्म की अवधारणा को प्रस्तुत कर रहे हैं। टेरीटोरियल नेशनलिज्म का उपहास श्री गोलवलकर ने अपनी पुस्तक बंच ऑफ थॉट्स के दसवें अध्याय में खूब उड़ाया है। उनके अनुसार भी भारत में पैदा हो जाने मात्र से कोई हिन्दू नहीं हो जाता उसे हिंदुत्व के सिद्धांत को अपनाना होगा।

सावरकर के हिंदुत्व का सार संक्षेप प्रस्तुत करते हुए प्रोफेसर शम्सुल इस्लाम लिखते हैं – “सावरकर ने हिंदुत्व के सिद्धांत की व्याख्या शुरू करते हुए हिन्दुत्व और हिंदू धर्म में फ़र्क किया। लेकिन जब तक वे हिंदुत्व की परिभाषा पूरी करते, दोनों के बीच अंतर पूरी तरह से ग़ायब हो चुका था। हिंदुत्व और कुछ नहीं बल्कि राजनीतिक हिंदू दर्शन बन गया। यह हिंदू अलगाववाद के रूप में उभरकर सामने आ गया। अपना ग्रंथ समाप्त करते हुए सावरकर हिंदुत्व और हिंदूवाद के बीच के अंतर को पूरी तरह भूल गए।”

सावरकर के मुताबिक केवल हिंदू भारतीय राष्ट्र का अंग थे और हिंदू वो थे – “जो सिंधु से सागर तक फैली हुई इस भूमि को अपनी पितृभूमि मानते हैं, जो रक्त संबंध की दृष्टि से उसी महान नस्ल के वंशज हैं, जिसका प्रथम उद्भव वैदिक सप्त सिंधुओं में हुआ था, जो उत्तराधिकार की दृष्टि से अपने आपको उसी नस्ल का स्वीकार करते हैं और इस नस्ल को उस संस्कृति के रूप में मान्यता देते हैं जो संस्कृत भाषा में संचित है।” राष्ट्र की इस परिभाषा के चलते सावरकर का निष्कर्ष था कि ‘ईसाई और मुसलमान समुदाय, जो ज़्यादा संख्या में अभी हाल तक हिंदू थे और जो अभी अपनी पहली ही पीढ़ी में नए धर्म के अनुयायी बने हैं, भले ही हमसे साझा पितृभूमि का दावा करें और लगभग शुद्ध हिंदू खून और मूल का दावा करें, लेकिन उन्हें हिंदू के रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती क्योंकि नया पंथ अपना कर उन्होंने कुल मिलाकर हिंदू संस्कृति का होने का दावा खो दिया है।’

सावरकर के अनुसार-“ हिन्दू भारत में-हिंदुस्थान में- एक राष्ट्र हैं जबकि मुस्लिम अल्पसंख्यक एक समुदाय मात्र।“(पृष्ठ 25, सावरकर एंड हिंदुत्व,ए जी नूरानी, लेफ्टवर्ड, 2003)

नीलांजन मुखोपाध्याय के अनुसार, “पितृ और मातृ भूमि तो किसी की हो सकती है, लेकिन पुण्य भूमि तो सिर्फ हिंदुओं, सिखों, बौद्ध और जैनियों की हो हो सकती है, मुसलमानों और ईसाइयों की तो ये पुण्यभूमि नहीं है। इस परिभाषा के अनुसार मुसलमान और ईसाई तो इस देश के नागरिक कभी हो ही नहीं सकते। एक सूरत में वे हो सकते हैं अगर वे हिंदू बन जाएं। सावरकर इस विरोधाभास को कभी नहीं समझा पाए कि आप हिंदू रहते हुए भी अपने विश्वास या धर्म को मानते रहें।”(15 अक्टूबर 2019)

सावरकर की हिंसा और प्रतिशोध की विचारधारा को समझने के लिए उनकी पुस्तक भारतीय इतिहास के छह स्वर्णिम पृष्ठ का अध्ययन आवश्यक है। इस पुस्तक में भारतीय इतिहास का पांचवां स्वर्णिम पृष्ठ शीर्षक खण्ड के चतुर्थ अध्याय को सावरकर ने “सद्गुण विकृति” शीर्षक दिया है। इस अध्याय में सावरकर लिखते हैं- “राजा जयसिंह ने पुनरुद्धारित सोमनाथ की पैदल यात्रा की। वह महान शिवभक्त था। हिन्दू धर्म पर उसकी अत्यधिक आस्था थी। संभवतः इसी कारण मुसलमानों के समान शत्रुओं को उसने अपने राज्य से निकाल बाहर नहीं किया। सोमनाथ सहित अनेक हिन्दू मंदिर नष्ट भ्रष्ट करने वाले उन म्लेच्छों को हिन्दू नहीं बनाया। अपितु अपने राज्य की परधर्म सहिष्णुता और उदारता प्रदर्शित करने के लिए हिंदुओं के खर्चे से मुसलमानों की गिरी मस्जिदें पुनः बनवाकर उन्हें राज्य का संरक्षण प्रदान किया इसके विपरीत महमूद गजनवी और मुहम्मद गोरी आदि तत्कालीन सुल्तानों के समय में दिल्ली से लेकर मालवा तक के उनके राज्य में कोई भी। हिन्दू अपने मंदिरों के विध्वंस के संबंध एक अक्षर भी उच्चारित करने का साहस नहीं कर सकता था।

उसकी चर्चा करना उस राज्य में भयंकर अपराध माना जाता था और उसके इस अपराध के लिए उसका उच्चारण करने वाले को ही नहीं उस क्षेत्र के समस्त हिंदुओं को गुलाम बनाकर मध्य एशिया के काबुल कंधार आदि स्थानों में बेच दिया जाता था। इस प्रकार के मुसलमानों की बड़ी बड़ी बस्तियों को अपनी परधर्मसहिष्णुता के कारण हिन्दू राजा बड़े ही आदर और सम्मान के साथ रहने देते थे। तत्कालीन इतिहास के सहस्रावधि प्रसंग इस बात के साक्षी हैं कि यहां शरणार्थी बनकर निवास करने वाले यही मुसलमान किसी बाह्य मुस्लिम शक्ति के द्वारा हिंदुस्थान पर आक्रमण करने के पर विद्रोही बन जाते थे। वे उस राजा को समाप्त करने के लिए जी तोड़ कोशिश करते थे। यह सब बातें अपनी आंखों से भली भांति देखने के बाद भी हिन्दू राजा देश, काल, परिस्थिति का विचार न कर परधर्मसहिष्णुता, उदारता, पक्ष निरपेक्षता को सद्गुण मान बैठे और उक्त सद्गुणों के कारण ही वे हिन्दू राजागण संकटों में फंसकर डूब मरे। इसी का नाम है सद्गुण विकृति।”

इसी अध्याय का अगला उपशीर्षक है-लाखों हिन्दू स्त्रियों का अपहरण एवं भ्रष्टीकरण। इसमें सावरकर लिखते हैं- मुसलमानों के धार्मिक आक्रमणों के भयंकर संकटों का एक और उपांग है। वह है मुसलमानों द्वारा हिन्दू स्त्रियों का अपहरण कर उन्हें मुसलमान बनाकर हिंदुओं के संख्याबल को क्षीण करना, इस कारण मुसलमानों की संख्या में वृद्धि होती गई। उनकी यह राक्षसी श्रद्धा थी कि यह तो इस्लाम की धर्माज्ञा है। उनके इस काम विकार को तृप्त करने वाली अंध श्रद्धा के कारण उनकी जनसंख्या जिस तीव्र गति से बढ़ने लगी उसी तेजी से हिंदुओं का जनबल कम होता गया। ——-यह एक सुनियोजित और भयंकर कृत्य है। उस धार्मिक पागलपन में भी एक सूत्र था क्योंकि मुसलमानों का यह धार्मिक पागलपन वास्तव में पागलपन नहीं था, अपितु एक अटल सृष्टि क्रम का अनुकरण कर अराष्ट्रीय संख्या बल बढ़ाने की एक पद्धति थी। ————-हिन्दू मुस्लिम संघर्ष के सैकड़ों साल के उस परंपरागत कालखंड में मुसलमानों ने जिन लक्षावधि हिन्दू स्त्रियों को बलात धर्म भ्रष्ट किया उनको कष्ट देने के कार्य में मुसलमानों का स्त्री समाज अत्यंत ही क्रूरतापूर्वक दिल खोल कर भाग लेता था। उनका आवेश पुरुषों से कम नहीं होता था। वैयक्तिक की बात छोड़ दें सामुदायिक दृष्टि से भी यह कथन पूर्ण रूपेण सत्य है। ——-इन मुस्लिम महिलाओं को तनिक भी भय नहीं था कि इस जघन्य क्रूर कर्म के लिए हिन्दू उन्हें दंडित करेंगे। विजय प्राप्त करने के बाद हिन्दू स्त्रियों को भ्रष्ट करने वाली मुस्लिम स्त्रियां मुसलमानों द्वारा सम्मानित की जाती थीं। मुस्लिम स्त्रियां आश्वस्त रहती थीं कि विजयी हिंदुओं के सेनापति सिपाही अथवा आम नागरिक तक उनका बाल भी बांका न होने देंगे।

क्योंकि हिंदुओं की मान्यता है कि स्त्रियां अवध्य होती हैं चाहे वे अत्चायारिणी हों अथवा शत्रु पक्ष की। ——–शत्रु की स्त्रियों के प्रति सौजन्य तथा आदर और राष्ट्रघाती एवं कुपात्र पर दिखाई गई उदारता की हजारों घटनाओं में से केवल दो का उल्लेख करना यहां अप्रासंगिक न होगा। छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा कल्याण के सूबेदार की वधू को सालंकृत उसके पति के पास पहुंचाने और चिमाजी अप्पा द्वारा पुर्तगीज किला विजित करने के बाद उनकी स्त्रियों को ससम्मान वापस भेजने की उपर्युक्त दोनों घटनाओं का वर्णन आज के हिन्दू बड़े गर्व के साथ करते हैं। परंतु क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है? शिवाजी महाराज अथवा चिमाजी अप्पा को खिलजी आदि मुसलमान सुल्तानों द्वारा दाहिर की गई राज कन्याओं, कर्णावती के राजा राजकुमारियों पर किए बलात्कार और लाखों हिन्दू स्त्रियों की अप्रतिष्ठा की बात याद नहीं आई। उन अप्रतिष्ठित हिन्दू राज महिलाओं और बलात्कारित लाखों हिन्दू ललनाओं के करुण चीत्कार और कलप कलप कर रोने की आवाज से उस समय भी हिंदुस्थान का सम्पूर्ण वायु मंडल सूक्ष्म ध्वनि के साथ सतत प्रकम्पित हो रहा था।

उनके चीत्कारों की प्रतिध्वनि शिवाजी और चिमाजी के कानों में क्यों नहीं पड़ी? वे बलात्कार से पीड़ित लाखों स्त्रियां कह रही होंगी कि हे शिवाजी राजा! हे चिमाजी अप्पा!! हमारे ऊपर मुस्लिम सरदारों और सुल्तानों द्वारा किए गए बलात्कारों और अत्याचारों को कदापि न भूलना। आप कृपा करके मुसलमानों के मन में ऐसी दहशत बैठा दें कि हिंदुओं की विजय होने पर उनकी स्त्रियों के साथ भी वैसा ही अप्रतिष्ठा जनक व्यवहार किया जाएगा जैसा कि उन्होंने हमारे साथ किया है यदि उन पर इस प्रकार की दहशत बैठा दी जाएगी तो भविष्य में विजेता मुसलमान हिन्दू स्त्रियों पर अत्याचार करने की हिम्मत नहीं करेंगे। लेकिन महिलाओं का आदर नामक सद्गुण विकृति के वशीभूत होकर शिवाजी महाराज अथवा चिमाजी अप्पा मुस्लिम स्त्रियों के साथ वैसा व्यवहार न कर सके। उस काल के परस्त्री मातृवत के धर्मघातक धर्म सूत्र के कारण मुस्लिम स्त्रियों द्वारा लाखों हिन्दू स्त्रियों को त्रस्त किए जाने के बाद भी उन्हें दंड नहीं दिया जा सका। हिंदुओं द्वारा मुस्लिम स्त्रियों के सतीत्व संरक्षण के इस कार्य ने इस संबंध में एक प्रभावी ढाल का कार्य किया।”

इस लंबे और बड़ी ही विद्वत्तापूर्ण और आकर्षक लगती भाषा में रचे गए उद्धरण का सार संक्षेप यह है कि जिन सद्गुणों पर हम गर्व करते रहे हैं दरअसल वे सावरकर के मतानुसार हमारे पतन का कारण हैं। हमें हिंसा और प्रतिशोध के रास्ते पर चलना होगा। मुस्लिम समुदाय की निष्ठा हिंदुस्थान के प्रति कभी हो ही नहीं सकती। मुस्लिम और ईसाई धर्मावलंबियों की एक ही नियति है कि वे हिंदुस्थान को अपनी पितृ भूमि और पुण्य भूमि मानकर शरणागत हो जाएं अन्यथा उन्हें दासवत जीवन व्यतीत करना होगा। तब भी शायद उन्हें उनके पूर्वजों के कथित अत्याचारों के दंड स्वरूप प्रतिशोध एवं बदले की कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। युद्ध में विजय प्राप्त करने वाले हिन्दू राजाओं द्वारा अपने अधीन किए गए मुसलमान राजाओं की पत्नियों तथा बहू-बेटियों और प्रजा में सम्मिलित मुस्लिम महिलाओं से बलात्कार न करना एक चूक थी। हिन्दू राजाओं और नागरिकों द्वारा एक साथ अनेक मुस्लिम स्त्रियों से जबरन विवाह करते हुए बलात शारीरिक संबंध बनाकर हिन्दू समुदाय की जनसंख्या बढ़ानी चाहिए थी। आज भी हिन्दू समुदाय को वह चूक नहीं करनी चाहिए जो शिवाजी महाराज और चिमाजी अप्पा ने की जब उन्होंने अपने द्वारा पराजित मुस्लिम सरदारों और सुल्तानों की बहू बेटियों को ससम्मान उनके घर पहुंचा दिया।

बहुत बाद में जब जाने माने अमरीकी युद्ध पत्रकार टॉम ट्रेनर ने 1944 के लंबे साक्षात्कार के दौरान सावरकर से पूछा- आप मुसलमानों के साथ किस तरह का बर्ताव करने की योजना बना रहे हैं? सावरकर का उत्तर था- एक अल्पसंख्यक समुदाय के रूप में, आपके यहां के नीग्रो लोगों के साथ जैसा बर्ताव होता है, उसी भांति। दुर्भाग्यवश यहां भी सावरकर नस्ली घृणा और हिंसा के साथ खड़े नजर आते हैं जो किसी समाज सुधारक या प्रगतिशील चिंतक का लक्षण नहीं है।

सावरकर यहां आधुनिक प्रजातांत्रिक उदार सर्वसमावेशी चिंतन से तो दूर चले ही जाते हैं अपितु वे अहिंसा, दया, करुणा, क्षमा, नारी सम्मान आदि हिन्दू धर्म के मूल नैतिक मूल्यों को भी खारिज कर देते हैं। सावरकर हिन्दू धर्म की उदारता और प्रगतिशीलता को अव्यावहारिक मानते हुए नकार कर देते हैं। सावरकर को प्रगतिशील और क्रांतिकारी चिंतक मानने से पूर्व उनके विचारों को भली प्रकार पढ़ना और समझना होगा।(क्रमशः)

(डॉ राजू पाण्डेय गांधीवादी चिंतक और लेखक हैं।)

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