‘बीसवीं सदी के तानाशाह’ में स्टालिन को शुमार करना इतिहास का मुर्गावलोकन है…

2010 में फ्रैंक डेकोटियर [Frank Dikötter] की किताब Mao’s Great Famine: The History of China’s Most Devastating Catastrophe,1958-62 छपी और काफी चर्चित भी रही। लेकिन यह चर्चा एक अन्य कारण से भी हुई। पुस्तक के कवर पर भूख से मरते जिस बच्चे का चित्र था, वह चीनी क्रांति से पहले 1946 का था। बाद के संस्करण में इसे हटा दिया गया। 

किताब में एक जगह डेकोटियर ने माओ को उद्धृत करते हुए लिखा है कि माओ ने कहा था कि आधी जनता को मार दो, ताकि शेष आधी आबादी को हम ठीक से खिला-पिला लें। कई चीनी स्कॉलरों और ‘मंथली रिव्यू’ के लेखक Joseph Ball ने जब उन्हें चुनौती दी कि माओ ने ऐसा कहाँ लिखा है, तो उन्होंने हांगकांग की एक आर्काइव में रखे माओ के दस्तावेजों का हवाला दिया। दस्तावेज की पड़ताल करने पर पता चला कि माओ ने किसी सन्दर्भ में यह कहा था कि हमें आधी परियोजनाएं बंद कर देनी चाहिए ताकि हम शेष आधी परियोजनाओं को आसानी से फंड उपलब्ध करा सकें।

डच स्कॉलर Dikötter ने नयी-नयी चीनी भाषा सीखी थी। लेकिन माओ व समाजवाद के प्रति अपने पूर्वाग्रह के कारण उन्होंने अर्थ का अनर्थ कर दिया। फिर भी उन्होंने माफ़ी नहीं मांगी और किताब में संशोधन भी नहीं किया। समाजवाद और माओ के बारे में जहर उगलने के कारण ही उन्हें ‘प्रतिष्ठित’ सम्युअल जानसन पुरस्कार भी मिल गया।

इसी लेखक ने 2020 में एक किताब लिखी – How to Be a Dictator: The Cult of Personality in the Twentieth Century इस किताब में लेखक ने अपने आठ तानाशाहों में स्टालिन और माओ को भी शामिल किया। और ठीक 5 साल बाद अशोक कुमार पाण्डेय ने इसी किताब की तर्ज पर अपने 6 तानाशाहों में स्टालिन को भी शामिल कर लिया और स्टालिन के बारे में मुख्य बातें लगभग वही वही दुहरा दी जो 5 साल पहले फ्रैंक डेकोटियर कह चुके थे। कहीं कहीं तो उन्होंने लगभग अनुवाद ही कर डाला है। 

 एक उदाहरण देखिये-  

‘’22 जून, 1941 को सुबह सवा तीन बजे जब तीस लाख जर्मन सैनिक सोवियत संघ की सीमाओं में घुसे तो उन्हें रोकने वाला कोई नहीं था और स्तालिन मास्को से दो सौ किलोमीटर दूर अपने साथियों के साथ खाने और शराब का आखिरी दौर निपटा रहा था। सेना प्रमुख जुकोव ने उसे फ़ोन पर सूचना दी तो भी स्तालिन को भरोसा नहीं हुआ। क्रेमलिन पहुँचने पर जब जर्मन राजदूत ने उसे बताया कि जर्मनी ने सोवियत संघ के विरुद्ध युद्ध घोषित कर दिया है’’  [पेज -130]

‘’Stalin was in bed in his dacha some two hundred kilometres outside Moscow when more than three million German soldiers poured across the border। Chief of General Staff Georgy Zhukov, who had warned him repeatedly of an impending invasion, phoned his master, who hurried back to the Kremlin। He still believed it was a conspiracy, until hours later the German ambassador clarified the situation: Germany was at war with the Soviet Union।’’ [How to Be a Dictator: The Cult of Personality in the Twentieth Century {epub format 32 percent}]

एक दूसरा उदाहरण देखिये- ‘’इन घटनाओं ने सोवियत संघ की बड़ी मेहनत से बनाई हुई ‘युद्ध विरोधी’ और ‘शान्तिप्रिय’ देश होने की छवि भी नष्ट हो गई और उसे लीग ऑफ़ नेशंस से निकाल दिया गया।’’ [पेज- 129]

‘’The country’s carefully fostered reputation as a peace-loving nation was also shattered। The League of Nations expelled the Soviet Union।’’ [epub, 31 percent ]

 तीसरा उदाहरण-

 ‘’स्तालिन अपनी ही पेशाब में भीगा सोफे पर पड़ा रहा।’’ [पेज-142]

 ‘’Stalin was found lying on the floor, soaked in his own urine।’’ [epub 34 percent, महत्वपूर्ण बात यह है कि डेकोटियर ने यह लाइन किताब के बाद के संस्करण में जोड़ी है, ताकि दिखाया जा सके कि स्टालिन कितनी बुरी मौत मरे]

हालाँकि कुछ नयी चीजें भी अशोक कुमार पाण्डेय ने अपनी इस किताब में जोड़ी हैं जो फ्रैंक डेकोटियर की उपरोक्त किताब में नहीं हैं। जैसे- 

“मैक्सिम गोर्की और उनके बेटे को जहर देने का आरोप भी लगाया गया, आम मान्यता है कि उसने यह स्टालिन के कहने पर किया था।” [116]

 “स्टालिन ने लाल सेना द्वारा किये गए बलात्कार का समर्थन किया था ।” [136]

1939 में संदेहास्पद परिस्थितियों में क्रुप्स्काया की मौत हो गयी। स्टालिन ने उन्हें हर साल की तरह केक भिजवाया था। उस पर जहर देने का आरोप लगा, लेकिन कभी कोई जांच नहीं हुई, [93]

एक जगह तो पाण्डेय जी ने हद ही कर दी। उन्होंने लिखा कि स्टालिन किसी बात को लेकर क्रुप्स्काया से नाराज थे और उन्होंने क्रुप्स्काया को फोन पर धमकाया कि अगर वे नहीं मानीं तो किसी और महिला को लेनिन की पत्नी घोषित कर देंगे। [90] क्या अशोक कुमार पाण्डेय बुलबुल पर बैठ कर अतीत यात्रा करते हुए यह बात सुन रहे थे?  

दरअसल यह बेसिर पैर की बातें भी अशोक कुमार पाण्डेय की कोई मौलिक कल्पना नहीं है। अंग्रेजी में भी बहुत से ‘अशोक कुमार पाण्डेय’ हैं। इससे भी ख़राब ख़राब बेसिरपैर की बातें “एंटी स्टालिन प्रोपगंडा” के तहत शीत युद्ध के दौरान और उसके बाद बार-बार कही जा चुकी है।

आपको याद दिला दूं कि सोवियत क्रांति के बाद अमेरिका में कई किताबें छापी गयीं जिसमें दावा किया गया कि रूस के कम्युनिस्ट बच्चों का मांस खाते हैं। मशहूर लेखक William Blum ने इसे अपनी किताब में दर्ज किया है। 

आप इतिहास को मनोहर कहानियों में कैसे बदल सकते हैं, इसका सशक्त उदाहरण अशोक कुमार पाण्डेय की इस किताब का स्टालिन वाला चैप्टर है। जिस तरह से आरएसएस [RSS] अपने ‘व्हाट्सअप ग्रुप’ में नेहरु के बारे में लिखता है, लगभग उसी तर्ज पर अशोक कुमार पाण्डेय ने स्टालिन के बारे में लिखा है। 

सभी स्टालिन विरोधी लेखकों की तरह अशोक कुमार पाण्डेय ने भी आँख मूदकर ‘कात्यन हत्याकांड’ [Katyn massacre] का आरोप स्टालिन पर मढ़ दिया। दरअसल जब हिटलर ने रूस पर हमला किया, उसके बाद पहली बार हिटलर के जर्मनी ने ही 13 अप्रैल, 1943 को यह ऐलान किया कि कात्यन क्षेत्र के जंगलों में बड़ी संख्या में गुमनाम कब्रें  मिली हैं और ये हत्याएं सोवियत रूस ने की हैं। सोवियत रूस ने तुरंत इसका खंडन किया और इन हत्याओं के लिए हिटलर को जिम्मेदार ठहराया। उस वक़्त हिटलर के खिलाफ पश्चिमी देशों के साथ सोवियत रूस का समझौता था। लिहाजा पश्चिम देशों ने भी यही माना की ये हत्याएं हिटलर ने करवाई हैं।

द्वितीय विश्व युद्ध ख़त्म होने के कुछ समय बाद ही शीत युद्ध की घोषणा हो गयी। पश्चिम और विशेषकर अमेरिका के अकादमिक जगत में Anti-Stalin Paradigm आकार लेने लगा। अब पश्चिम के अकादमिक जगत में यह दावा किया जाने लगा कि कात्यन हत्याकांड स्टालिन ने ही करवाया था।

बाद में गोर्बाचोव, येल्तसिन और पोलैंड के लेक वालेशा ने साम्राज्यवादियों को खुश करने के लिए ऐलान किया कि ‘कात्यन हत्याकांड’ स्टालिन ने करवाया था। इसके बाद तो ‘पूरी दुनिया’ ने मान लिया कि जब रूस के गोर्बाचेव और येल्तसिन खुद यह बात कह रहे हैं तो यही सच होगा। गोर्बाचोव और लेक वालेशा दोनों को ‘नोबेल पीस प्राइज’ मिल गया।

दरअसल यह ‘पीस प्राइज’ किसी ‘पीस’ के लिए नहीं बल्कि  स्टालिन पर कीचड़ उछालने में महत्वपूर्ण योगदान के लिए दिया गया था। 

2011 में यूनिवर्सिटी ऑफ़ ओटावा के प्रोफेस्सर  ‘Ivan Katchanovski’ ने एक शोध पूर्ण लेख [Owning a massacre: ‘Ukraine’s Katyn]  लिखा और एक अन्य महत्वपूर्ण स्रोत के हवाले से बताया कि कुछ कब्रों को जब खोला गया तो वहां से जो गोलियां मिलीं वे हिटलर की सेना इस्तेमाल करती थी। मतलब कात्यन हत्याकांड [Katyn massacre] को स्टालिन ने नहीं हिटलर ने अंजाम दिया था।

 लेकिन अशोक कुमार पाण्डेय को इस सबसे क्या मतलब उन्हें तो बस तोते की तरह अंग्रेजी में पढ़ी चंद स्टालिन विरोधी प्रोपगंडा किताबों को ज्यो का त्यों हिंदी में उगल देना है। इसे ही अंग्रेजी में ‘गीगो’ [GIGO यानी Garbage In, Garbage Out] कहते हैं। 

स्टालिन विरोधी लेखकों की यह सामान्य पद्धति है- एक दूसरे की किताबों को उद्धृत करते रहना और एक ही झूठ को बार-बार दोहराते रहना ताकि वह सच लगने लगे। 

जिस “एंटी स्टालिन पैराडाइम” के तहत ऐसी मनोहर कहानी नुमा इतिहास लिखा जाता है, उसके साम्राज्यवादी चरित्र को महज एक उदाहरण से समझा जा सकता है। 1986 में ब्रिटिश इंटेलिजेंस सर्विस में काम करने वाले Robert Conquest ने The Harvest of Sorrow नामक चर्चित किताब लिखी। इसमें उक्रेन में स्टालिन काल के दौरान हुए कृषि-सामूहिकीकरण के कारण हुई कथित मौतों को ‘जेनोसाइड’ बताया गया है और इसके लिए स्टालिन को जिम्मेदार ठहराया गया है। अशोक कुमार पाण्डेय ने भी इसका इस्तेमाल इस किताब में किया है।

इस किताब के बारे में मशहूर लेखक Domenico Losurdo अपनी प्रसिद्ध किताब Stalin: History and Critique of a Black Legend में लिखते हुए कहते हैं कि इस किताब को तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के कहने पर एक राजनीतिक-सांस्कृतिक अभियान के तहत लिखा गया, जिसका उद्देश्य उक्रेन के लोगों को रूस के खिलाफ भड़काना और उसे सोवियत रूस से अलग करना था। Robert Conquest ने तो सोवियत रूस द्वारा उक्रेन में सैन्य हस्तक्षेप की संभावना के मद्देनज़र एक और किताब What to do when the Russians come: A Survivalist’s Handbook भी लिख मारी। 

इसी तरह के एक और लेखक Stephen Kotkin हैं, जिनकी 1184 पेज की  किताब Stalin: Waiting for Hitler, 1929-1941 पर अशोक कुमार पाण्डेय काफी निर्भर हैं। और इसका हवाला भी दिया है। या यूं कहें कि पाण्डेय जी जैसे लेखकों के लिए यह किताब किसी ‘बाइबिल’ से कम नहीं है। 1184 पेज की इस किताब में करीब 300 पेज फुटनोट्स हैं। जिन्हें आप नंगी आँखों से नहीं पढ़ सकते। लेकिन इतने बारीक 300 पेज के फुटनोट्स को देखकर आपको यह विश्वास तो हो ही जायेगा कि लेखक ने अपनी बातें तथ्यों के आधार पर ही कही होंगी। यह वृहद किताब स्टालिन पर वे सारे आरोप लगाती है, जो स्टालिन-विरोधी अशोक कुमार पाण्डेय जैसे लोग उन पर लगाते रहे हैं। 

लेकिन Montclair State University’ [अमरीका] के प्रोफ़ेसर Grover Furr ने जब 2 सालों तक इन फुटनोट्स की जांच की तो पाया कि वे किताब में कही गयी बातों से या तो अलग हैं या एकदम झूठ हैं। एक जगह उन्होंने एक किताब का सन्दर्भ देते हुए उस किताब का 348 नंबर पेज का सन्दर्भ लगाया, लेकिन जांच में पता चला कि उस संदर्भित किताब में महज 250 पेज ही हैं। फुटनोट्स के इसी ‘रिसर्च’ पर आधारित उनकी किताब है-  ‘Stalin: Waiting For … The Truth’

ठीक इसी तरह लेनिन की कथित वसीयत का इस्तेमाल करके अशोक कुमार पाण्डेय ने स्टालिन पर हमला बोला है। जबकि बहुत पहले ही यह स्थापित हो चुका है कि यह कथित वसीयत लेनिन समग्र में बाद में जोड़ी गयी है। और पूरी तरह फ्राड है। लेनिन जैसे कम्युनिस्ट कभी वसीयत नहीं छोड़ते। इस पर मशहूर लेखक Grover Furr की किताब The Fraud of the “Testament of Lenin” देखी जा सकती है। लेकिन अशोक कुमार पाण्डेय स्टालिन विरोध में इतने अंधे हैं कि असली और नकली की पहचान भी भुला बैठे हैं। 

1917 की समाजवादी क्रांति के वैश्विक महत्व को धुर स्टालिन विरोधी भी नहीं नकारते। इसने इतिहास में पहली बार हजारों सालों से चले आ रहे वर्गीय समाज के उलट वर्गविहीन समाज का द्वार खोला और इसकी प्रेरणा से एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका में साम्राज्यवाद-विरोधी क्रांतियों/आंदोलनों की झड़ी लग गयी। लेकिन अशोक कुमार पाण्डेय इतिहास की इस बेहद महत्वपूर्ण घटना को कैसे देखते हैं? वे लिखते हैं- 

“मात्र दो लाख की सदस्यता वाली लेनिन की पार्टी ने पैतीस लाख ‘सर्वहारा’ के नाम पर पन्द्रह करोड़ वाली रूसी जनसंख्या पर कब्ज़ा कर लिया।” [पेज-85] सर्वहारा को भी उन्होंने कोट [“ “] में रखा है।

महान रूसी क्रांति पर इतना घटिया सूत्रीकरण मैंने आज तक नहीं देखा। इस सूत्रीकरण से यह साफ़ है कि वे स्टालिन के साथ-साथ लेनिन को भी तानाशाह मानते हैं। और यही कारण है कि वे पूरे चैप्टर में लेनिन और स्टालिन के लिए तो ‘था’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं लेकिन त्रात्स्की जैसे उनके विरोधियों के लिए सम्मानजनक ‘थे’ का प्रयोग करते हैं। यहाँ तक कि उन्होंने रूस के वर्तमान शासक पुतिन को भी सम्मानजनक ‘थे’ से संबोधित किया है। इससे लेखक की राजनीतिक ‘पोजीशन’ समझी जा सकती है।

यहाँ मैं अशोक कुमार पाण्डेय द्वारा स्टालिन पर लगाये गए तमाम आरोपों का जवाब नहीं दे रहा हूँ। बल्कि यहाँ मैं इसकी और इस जैसी अन्य किताबों की पद्धति [Methodology] की बात कर रहा हूँ और यह बताने की कोशिश कर रहा हूँ कि कैसे अशोक कुमार पाण्डेय जैसे लेखक Gabriel Rockhill के शब्दों में Imperial Theory Industry का जाने-अनजाने हिस्सा बन जाते है और स्टालिन विरोध से होते हुए किसी भी वर्गीय राजनीति या वर्गीय आन्दोलन के विरोधी बन जाते हैं। इसी माह आयी Gabriel Rockhill की किताब Who Paid the Pipers of Western Marxism? शीत युद्ध और उसके बाद की इसी राजनीति और उसकी आर्थिकी को बहुत विस्तार से समझाती है।

अशोक कुमार पाण्डेय ने अपनी किताब में बहुत सी कहानियाँ व चुटकुले सुनाये हैं। एक चुटकुले के बहाने से तो वे यहाँ तक कह जाते हैं कि रूसी क्रांति का सिर्फ यही फायदा हुआ कि वोदका 2 प्रतिशत सस्ती हो गयी।

मैं भी एक कहानी से ही अपनी बात समाप्त करूंगा। लेकिन यह कहानी सच्ची है। और आज भी बार-बार दोहराई जा रही है।

70 के दशक में अमेरिका में वियतनाम के पक्ष में चल रहे आन्दोलन में किसी युवा को वियतनाम का झंडा उठाये देखकर अशोक कुमार पाण्डेय जैसे किसी बुद्धिजीवी ने  उससे कहा कि वियतनाम की लड़ाई का समर्थन करना ठीक नहीं है। युवा ने आश्चर्य से पूछा कि ऐसा क्यों? उस बुद्धिजीवी ने जवाब दिया कि वियतनाम की गुरिल्ला लड़ाई का नेता ‘हो ची मिन्ह’ है। हो ची मिन्ह ने मास्को में स्टालिन के नेतृत्व में सैन्य ट्रेनिंग ली है और स्टालिन एक तानाशाह-हत्यारा है। मैंने उसे अपनी किताब ‘बीसवीं सदी के तानाशाह’ में शामिल कर किया है। यह सुनकर उस युवा का मुंह खुला का खुला रह गया। 

 (मनीष आज़ाद लेखक, एक्टिविस्ट और टिप्पणीकार हैं।)

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